जिस व्यक्ति के दिल में गरीबों के लिए अवमानना का भंडार होगा वही व्यक्ति सड़क किनारे पकौड़ा बेचने वाले को एक भिखारी से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा। जिस राजनीतिक नेता ने सहज रूप से यह घोर अपमानजनक तुलना की है वह कांग्रेस के बड़े नेता पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम हैं।
निश्चित रूप से यही वह मानसिकता है जिसके चलते दशकों की अपनी सत्ता में भी कांग्रेस यह नहीं समझ पाई कि पकौड़ा विक्रेता भी एक उद्यमी है। वह भी एक व्यवसायी है जो बैंकों के माध्यम से वित्तीय ऋण पाने का हकदार है।
चिदंबरम जी आप यह जान लें कि सड़क किनारे स्टॉल पर पकौड़ों के गुमनाम विक्रेता किसी एहसान के लिए भीख नहीं मांगते; कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी के साथ जीवन-यापन कर वे उन लोगों की तुलना में अधिक इज्जतदार हैं जो उनसे घृणा करते हैं। वह पकौड़ा वाला भी अभिलाषा और दृढ़ संकल्प का एक प्रतीक है।
2018-2019 का बजट गरीबी के खिलाफ जंग में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है, लेकिन यह कांग्रेस का विशेष लक्षण रहा है कि इस ऐतिहासिक बजट पर प्रतिक्रिया देने का जिम्मा उसने उस पूर्व वित्त मंत्री को सौंपा जिसे गरीबी और नाउम्मीदी में जीने वालों के प्रति जरा भी सहानुभूति नहीं। निश्चित रूप से यही वह मानसिकता है जिसके चलते दशकों की अपनी सत्ता में भी कांग्रेस यह नहीं समझ पाई कि पकौड़ा विक्रेता भी एक उद्यमी है। वह भी एक व्यवसायी है जो बैंकों के माध्यम से वित्तीय ऋण पाने का हकदार है।
यह पहले की उस परिपाटी के ठीक उल्टा है जिसमें कुछ बैंक चुनिंदा लोगों को ही ऋण देने को मजबूर थे। आज, बैंक भी गरीबों की सेवा करते हैं।
आज उसके लिए मुद्रा योजना है, एक ऐसी स्कीम जिसके तहत 10 करोड़ से अधिक छोटे और माइक्रो स्केल उद्यमियों को 4,00,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण बिना गारंटी के दिए जा चुके हैं। मुद्रा से एक इनोवेशन यह सामने आया है कि इसके तहत आवंटित ऋणों में से 75% महिलाओं के पास गए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो करीब 7.5 करोड़ महिलाओं को बैंकों के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया है। यह पहले की उस परिपाटी के ठीक उल्टा है जिसमें कुछ बैंक चुनिंदा लोगों को ही ऋण देने को मजबूर थे। आज, बैंक भी गरीबों की सेवा करते हैं।
2018-19 के बजट में एक सजग आर्थिक नीति का व्यापक परिणाम उभरकर सामने आया है। आर्थिक पिरामिड के आधार पर 10 करोड़ परिवारों के जीवन में बेहतरी लाने के लिए 2014 से ही काम शुरू कर दिया गया था। इसके लिए पहले क्रमिक रूप से कदम उठाए गए जिसके बाद अब एक लंबी छलांग लगाई गई है। कई तरह की पहल करते हुए सुधारों पर कठिन मेहनत की गई और फिर तीन बजट के बाद इसके अच्छे नतीजे आने शुरू हुए। वंचितों और शोषितों के सामाजिक कल्याण की इस पूरी कवायद के दौरान सिस्टम में पसरे रहे कैंसररूपी भ्रष्टाचार से भी निपटने की चुनौती सामने आती रही।
जानकर आश्चर्य हो सकता है कि नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम दुनिया में किसी भी सरकार द्वारा वित्त पोषित सबसे बड़ा स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम है। सरकार की प्रतिबद्धता का यह एक ऐसा प्रदर्शन है जिससे विरोधियों को झटका लगा है।
देश की प्रगति की दिशा में यह बजट एक ऐतिहासिक कदम है। परिकल्पना और परिमाण दोनों ही दृष्टिकोण से अभूतपूर्व है यह बजट। नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम, जिसे नमो-केयर भी कहा जा रहा है, यह स्कीम लगभग 50 करोड़ "गरीब और कमजोर" भारतीयों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने वाली है। जानकर आश्चर्य हो सकता है कि यह दुनिया में किसी भी सरकार द्वारा वित्त पोषित सबसे बड़ा स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम है। सरकार की प्रतिबद्धता का यह एक ऐसा प्रदर्शन है जिससे विरोधियों को झटका लगा है।
2014 से अब तक उन 30 करोड़ भारतीयों के पास भी आज बैंक अकाउंट है जिन्होंने कभी बैंक में जाने सपना भी नहीं देखा था। बैंक में जमा करने के लिए कोई पैसा नहीं होने पर भी उनका अकाउंट खुला है। आज, 50 करोड़ भारतीय जिन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे एक अस्पताल का खर्च करने में सक्षम होंगे, ऐसे लोग सचमुच, एक नया जीवन देख रहे हैं। देश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा अब सरकार द्वारा फंड की जाने वाली सालाना 5 लाख रुपये तक की कवरेज पाएगा। यह कवरेज उन्हें secondary और tertiary अस्पतालों में इलाज पर मिलेगी। हमारी मेडिकल इंडस्ट्री के विस्तृत दायरे में इसके अलग-अलग तरह के फायदे सामने आएंगे, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य गरीबों के बीच नया आत्मविश्वास और नई आशा पैदा करना है। इसके जरिये उन्हें यह महसूस होगा कि देश वैसे ही उनके लिए है जैसे वो देश के लिए हैं।
जब स्वच्छ भारत शुरू हुआ, कांग्रेस ने कहा था कि अभियान यह काम नहीं करेगा। आज ग्रामीण भारत में 75% से अधिक हिस्से में शौचालय हैं जो महिलाओं की गरिमा और आत्म सम्मान का आश्वासन देते हैं। जब जन धन लॉन्च हुआ था, तो कांग्रेस हंसी थी। यह योजना सिर्फ तीन महीनों में लागू की गई थी।
कांग्रेस इसे पचाने में असमर्थ है क्योंकि वो इसकी ना तो कल्पना कर सकती थी ना खुद ऐसा कुछ कर सकती थी। उसके पास अपने घिसे-पिटे अंदाज में प्रतिक्रिया देने के सिवाय और कोई जवाब नहीं है। कांग्रेस वही प्रतिक्रिया लेकर आती है जो उसके किराये के social media misleaders सुझाते हैं। कांग्रेस सबसे बड़ी बात यही कह सकती है कि हेल्थ स्कीम काम नहीं करेगी। कांग्रेस की ऐसी प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगाना आसान होता है। जब स्वच्छ भारत शुरू हुआ, कांग्रेस ने कहा था कि अभियान यह काम नहीं करेगा। आज ग्रामीण भारत में 75% से अधिक हिस्से में शौचालय हैं जो महिलाओं की गरिमा और आत्म सम्मान का आश्वासन देते हैं। जब जन धन लॉन्च हुआ था, तो कांग्रेस हंसी थी। यह योजना सिर्फ तीन महीनों में लागू की गई थी। जब प्रधानमंत्री मोदी ने गरीब महिलाओं को रसोई में धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए मुफ्त गैस सिलेंडर बांटना शुरू किया, तब भी कांग्रेसियों ने हंसी उड़ाई थी। इस बजट में, फ्री गैस कनेक्शन देने के 5 करोड़ घरों के शुरुआती लक्ष्य को संशोधित कर 8 करोड़ कर दिया गया है।
उत्पादन लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान अनिश्चितता को समाप्त करता है और प्रोडक्टिव रिटर्न की गारंटी देता है। यह किसानों के आत्मविश्वास के लिए जरूरी है।
अगर स्वास्थ्य इस बजट की आत्मा है, तो इस बजट का दिल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़े पुनरुद्धार कार्यक्रम हैं। उत्पादन लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान अनिश्चितता को समाप्त करता है और प्रोडक्टिव रिटर्न की गारंटी देता है। यह किसानों के आत्मविश्वास के लिए जरूरी है। वहीं बुनियादी ढांचे का विस्तार यह सुनिश्चित करेगा कि किसानों के लिए बाजार की पहुंच आसान बने। भले ही restructured National Bamboo Mission शहरी लोगों के लिए बहुत मायने नहीं रखे, लेकिन सिकुड़ती जमीन का यही एकमात्र निदान है।
एक बजट सरकार की प्राथमिकताओं और खर्च की व्यापक अभिव्यक्ति है, और इसलिए एक आलेख के सीमित दायरे में इस पर सब कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन संदेश स्पष्ट है: नया भारत एक साझा समृद्धि का देश होगा, जिसमें सबसे पहला लाभ सबसे अधिक जरूरतमंद को मिलेगा। गरीबों, कृषि क्षेत्र, अनिश्चितता में घिरे बुजुर्गों के साथ ही उन उत्साही युवाओं को भी पहली प्राथमिकता मिलेगी जो अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और बहुआयामी कौशल के साथ राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करेंगे। इकोनॉमिक टाइम्स की मुख्य हेडलाइन से बजट के सार तत्त्व को समझा जा सकता है: FM Prescribes Modicare for Bharat; Focus on Jobs, Labour Reforms & Health Sector
पकौड़ा बेचने वाले की खिल्ली न उड़ाएं; उसके पास विरासती सौभाग्य नहीं था, ना ही पढ़ने को कोई विशेषाधिकार प्राप्त स्कूल था। जिस दिन आप गरीब को समझ लेंगे, आप इस बजट को भी समझ जाएंगे।
एक अंतिम बात, चिदंबरम जी किसी भिखारी पर भी मत हंसिए। गरीब अपनी पसंद से याचक नहीं बनते, बल्कि वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें कोई और विकल्प नहीं मिलता। कटोरा ली हुई प्रत्येक महिला, हाथ पसारे खड़ा प्रत्येक बच्चा आधुनिक भारत के लिए शर्म की बात है। पकौड़ा बेचने वाले की खिल्ली न उड़ाएं; उसके पास विरासती सौभाग्य नहीं था, ना ही पढ़ने को कोई विशेषाधिकार प्राप्त स्कूल था।
जिस दिन आप गरीब को समझ लेंगे, आप इस बजट को भी समझ जाएंगे।
(विदेश राज्यमंत्री मोबाशर जावेद "एमजे" अकबर मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं।)
ऊपर व्यक्त की गई राय लेखक की अपनी राय है। यह आवश्यक नहीं है कि नरेन्द्र मोदी वेबसाइट एवं नरेंद्र मोदी ऐप इससे सहमत हो।


