Published By : Admin |
November 18, 2014 | 07:00 IST
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महामहिम प्रधानमंत्री टोनी एबाट, मीडिया के मेरे दोस्तों,
मैं अब तक की भव्य यात्रा के लिए प्रधानमंत्री एबाट, ऑस्ट्रेलिया की संघीय एवं राज्य सरकारों तथा ऑस्ट्रेलिया के लोगों का धन्यवाद करना चाहता हूँ।
प्रधानमंत्री एबाट एवं मैंने एक साथ पिछला सप्ताह बिताया – पूर्वी एशिया शिखर बैठक, जी-20 शिखर बैठक में तथा इस द्विपक्षीय शिखर बैठक के लिए। यह हमारे संबंधों की विस्तृत रूपरेखा को दर्शाता है जो शांतिपूर्ण एवं समृद्ध विश्व के लिए बढ़ती साझेदारी तथा मजबूत एवं विस्तृत द्विपक्षीय संबंध पर आधारित है।
यह एक स्वाभाविक साझेदारी है जो हमारे साझे मूल्यों एवं हितों तथा हमारे सामरिक समुद्री लोकेशन से उत्पन्न हुई है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच काफी आर्थिक तालमेल है। ऐसे हर क्षेत्र में साझेदारी के लिए विशाल अवसर हैं जिनके बारे में हम सोच सकते हैं – कृषि, कृषि प्रसंस्करण, संसाधन, ऊर्जा, वित्त, अवसंरचना, शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी।
भारत में आर्थिक जलवायु बदल गई है। मेरा यह विश्वास है कि अवसरों को ठोस परिणामों में बदलना अब काफी आसान होगा। प्रधानमंत्री एबाट और मैंने इस बारे में चर्चा की कि हमें अपने आर्थिक संबंध को सही मायने में गति प्रदान करने के लिए क्या करना चाहिए।
सीईओ मंच का पुनर्गठन एक महत्वपूर्ण कदम है। हम व्यापक आर्थिक साझेदारी करार पर वार्ता को गति देने के लिए सहमत हो गए हैं। मैंने ऑस्ट्रेलिया के बाजार में भारतीय कारोबार केलिए सरल पहुंच तथा निवेश को शीघ्रता से अनुमोदन प्रदान करने की भी मांग की।
भारत 2015 में ऑस्ट्रेलिया में एक ‘मेक इन इंडिया शो’ का आयोजन करेगा। ऑस्ट्रेलिया भी जनवरी, 2015 में भारत में व्यवसाय सप्ताह का आयोजन करेगा। हम असैन्य परमाणु करार पर जल्दी से क्लोजर प्राप्त करने पर भी सहमत हुए जो ऑस्ट्रेलिया को विश्व में सबसे अधिक सुरक्षित एवं निरापद परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक में भागीदारी करने का अवसर प्रदान करेगा। क्रिकेट और हाकी हमारे लोगों के बीच स्वाभाविक जोड़ हैं। मुझे पता है कि यहां योग बहुत लोकप्रिय है। हमें अपने लोगों को और जोड़ने की जरूरत है। मैं नए सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम से बहुत प्रसन्न हूँ जिस पर आज हस्ताक्षर किया गया है। भारत फरवरी, 2015 में सिडनी में एक सांस्कृतिक केंद्र स्थापित करेगा। हम 2015 में ऑस्ट्रेलिया में एक भारत महोत्सव तथा एक पर्यटन सप्ताह का आयोजन करना चाहते हैं।
सामाजिक सुरक्षा करार वास्तव में एक सकारात्मक विकास है। यह हमारे कारोबारी संबंधों को और मजबूत बनाने में मदद करेगा, विशेष रूप से सेवा क्षेत्र में।
मैं सुरक्षा सहयोग के लिए नई रूपरेखा का बहुत स्वागत करता हूँ। क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता बनाए रखने तथा आतंकवाद एवं राष्ट्रपारीय अपराधों से लड़ने के लिए नई भारत – ऑस्ट्रेलिया साझेदारी के उभरते क्षेत्र हैं।
प्रधानमंत्री एबाट के साथ ऑस्ट्रेलियाई युद्ध स्मारक की आज सवेरे की यात्रा ने हमें यह याद दिलाई कि हमें बेहतर विश्व के लिए साथ मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। निष्कर्ष के तौर पर, मैं यह कहना चाहूँगा कि लगभग तीन दशक बीत गए हैं जब भारत के पिछले प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया की यात्रा की थी। यह तथ्य कि हमने दो माह के अंदर दौरों का आदान – प्रदान किया है, अच्छे दिन आने का संकेत है।
मुझे संसद में बोलने का जो अवसर प्राप्त हुआ उससे मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूँ तथा उम्मीद करता हूँ कि प्रधानमंत्री एबाट के साथ मेलबोर्न क्रिकेट मैदान में आज की शाम गुजारने का अवसर प्राप्त होगा।
श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफी भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक अनमोल धरोहर बनेगी: पीएम मोदी
August 12, 2026
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आज हमें श्री राम नाथ कोविंद जी की आत्मकथा का विमोचन करने का अवसर मिला है; मुझे इस कार्यक्रम का हिस्सा बनकर प्रसन्नता हो रही है: प्रधानमंत्री
उनका जीवन लोगों की सेवा और राष्ट्र की प्रगति के प्रति समर्पित रहा है: प्रधानमंत्री
कोविंद जी के साथ मेरा दीर्घकालिक परिचय और उनके प्रति उनका विशेष स्नेह एवं आत्मीयता मेरे लिए सबसे बड़ी संपत्ति रही है: प्रधानमंत्री
महात्मा गांधी, बाबासाहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने एक ऐसे नए भारत का सपना देखा था जहाँ सबसे गरीब और सबसे वंचित लोग भी शिखर तक पहुँच सकें: पीएम मोदी
कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने न केवल खुद का जीवन बदला है, बल्कि भारत के लिए अपने सपने और विजन को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाई है: पीएम मोदी
राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर काम कर रहे हैं; यह संकल्प लोकतंत्र में एक नया अध्याय शुरू कर सकता है: प्रधानमंत्री
हमारे पूर्व राष्ट्रपति श्रीमान रामनाथ कोविंद जी, लोकसभा के अध्यक्ष आदरणीय ओम बिरला जी, श्रीमती सविता कोविंद जी, सभाग्रह में सभी वरिष्ठ जन बैठे हैं, सबका उल्लेख नहीं कर पाऊंगा, लेकिन मेरे लिए बहुत आनंद है कि एक पारिवारिक कार्यक्रम लग रहा है।
भाइयों-बहनों,
आज हमें श्री रामनाथ कोविंद जी की आत्मकथा के विमोचन का अवसर मिला है। मुझे खुशी है कि मुझे भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है। कोविंद जी से मेरा बहुत लंबा परिचय रहा है, उन्हें करीब से जानने का भी अवसर मिला और राष्ट्रपति के रूप में उनका मार्गदर्शन और इस सबके साथ-साथ उनका मेरे प्रति विशेष स्नेह, उनकी आत्मीयता, ये मेरी बहुत बड़ी पूंजी रही है। मैंने उनके जीवन को जितना समझा है, उनकी कार्यक्षमताओं को जितना जाना है, मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफ़ी अपने आप में भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक धरोहर बनेगी। कोविंद जी की जीवन यात्रा, समाज और राष्ट्र के लिए उनका योगदान, ऐसा कितना कुछ है जिसके बारे में मैं विस्तार से बात कर सकता हूं, लेकिन बुक रिलीज़ में केवल ‘कर्टन रेज़र’ ही होना चाहिए। आप सब किताब का पूरा लाभ पढ़कर ही लें, तो ही ज्यादा अच्छा है।
साथियों,
कोविंद जी की जीवन यात्रा को आप उनके शब्दों में जानें, उनकी लेखनी को, उनके अनुभवों को देश की नई पीढ़ी पढ़े, इससे हर किसी को काफी कुछ सीखने को मिलेगा। मैं रामनाथ कोविंद जी को इस आत्मकथा के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
साथियों,
कोविंद जी ने अपनी इस पुस्तक को बहुत ही सटीक नाम दिया है- “Triumph of the Indian Republic: My Life, My Struggles” कहने का भाव ये कि जीवन और जीवन के संघर्ष उनके व्यक्तिगत हैं, लेकिन उन संघर्षों के परिणामस्वरूप मिली जीत, भारत के गणतंत्र की है, भारत के लोकतंत्र की है।
साथियों,
हम सब अक्सर अनुभव करते हैं कि इंसान का एक स्वभाव होता है, लोग अपनी सफलता का श्रेय खुद को देते हैं और जीवन की मुश्किलों के लिए, कठिनाइयों के लिए समाज को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन, जब हृदय उदार हो, भारतीय संस्कार हों, तब व्यक्ति समाज की कमियाँ निकालने में समय नहीं गँवाता, वो उसके सकारात्मक पक्ष पर फोकस करता है, वो अपनी सफलता में समाज को बराबर का भागीदार मानता है। कोविंद जी की आत्मकथा और उसका शीर्षक इसके उदाहरण हैं। आप उनका जीवन देखिए, एक बेहद सामान्य परिवार में, कानपुर देहात में उनका जन्म हुआ। कोविंद जी ने अभी भी कुछ वर्णन किया और अपनी किताब में भी लिखा है, कैसे गर्मी के मौसम में एक दिन उनके घर में आग लग गई, उनकी माँ अपनी चिंता छोड़कर घर की चीजों को बचा रही थीं। आखिर, एक सामान्य परिवार में, माँ के लिए एक-एक चीज बच्चों के पालन-पोषण का जरिया होती है। उसी कोशिश में, आग में फंसकर उनकी माता जी की मृत्यु हो गई। आप कल्पना कर सकते हैं, छोटी सी उम्र में इस तरह की घटना, माँ को इस तरह खो देना, ये कितना दर्दनाक रहा होगा। मैं तो भाग्यशाली रहा हूं, मेरी मां 100 साल से भी अधिक जीवित रही और मुझे आशीर्वाद देती रही। उसके बावजूद भी, आज भी मैं मां की कमी महसूस करता हूं।
साथियों,
उनके जीवन का एक ऐसा दर्दनाक ये घटनाक्रम था, कोई भी इससे टूट सकता था, लेकिन कोविंद जी को उन मुश्किलों ने मजबूत किया। पड़ोस की एक माता जी ने उनके पालन-पोषण में मदद की। इससे उन्होंने समाज की एकता और सौहार्द की ताकत को समझा। इस घटना के बाद कोविंद जी के जीवन में उनके पिता की भूमिका और बड़ी हो गई और जिस तरह से उन्होंने अपने परिवार को संभाला, बच्चों को संस्कार दिये, इसीलिए, कोविंद जी अपने पिता को अपना हीरो मानते हैं।
साथियों,
बचपन के इन संघर्षों के बीच, कोविंद जी ने शिक्षा को, अपने सामर्थ्य को बढ़ाने का मार्ग बनाया। उन्होंने मेहनत की, उन्होंने संसाधनों की कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया। और, एक ऐसे मुकाम तक पहुंचे, जिसकी कल्पना भी तब लोगों ने नहीं की थी। वो भारत जैसे विशाल देश के राष्ट्रपति बने।
साथियों,
इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी कोविंद जी का विनम्र व्यक्तित्व, उनकी सादगी ऐसे ही कायम रही। मुझे याद है प्रधानमंत्री के तौर पर मैं राष्ट्रपति भवन में उनसे मिलने जाता था। प्रोटोकॉल के हिसाब से जो बातें नहीं हो सकती हैं, वो बातें वो करते थे। वो प्रधानमंत्री को छोड़ने के लिए गाड़ी के दरवाजे तक आते थे। मैं शुरू में उनको प्रार्थना करता रहता था, प्लीज आप ऐसा मत कीजिए, लेकिन उन्होंने जीवन के आखिर तक अपनी उस विनम्रता को कभी छोड़ा नहीं। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे अपने गांव परौंख गए, तो उन्होंने वहाँ अपने गुरुओं के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया। गाँव की मिट्टी को नमन करके उन्होंने गाँव के सामान्य लोगों का धन्यवाद किया। पूरे देश ने वो भावुक दृश्य देखा था। उनके इस आचरण ने दुनिया के सामने भारत के संस्कारों की ऐसी तस्वीर सामने रखी, जिस पर हर भारतवासी गर्व करता है।
साथियों,
गुलामी के सैकड़ों साल में हमारे देश ने आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत कुछ खोया था। हमारे पूर्वजों ने सदियों तक संघर्ष किया। महात्मा गांधी, बाबा साहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रबाई फुले, ऐसी कितनी ही महान विभूतियों ने भारत के नवनिर्माण का सपना देखा था। एक ऐसा भारत जहां गरीब से गरीब, वंचित से वंचित को शिखर तक पहुँचने का अवसर मिल सके। कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने अपने श्रम और काबिलियत से केवल खुद का जीवन ही बदला, इतना नहीं है, उन्होंने सदियों के उस स्वप्न को, उस विज़न को भी साकार करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। और इस दिशा में हम सबके प्रयास अभी भी जारी हैं। हमें भविष्य में कोविंद जी जैसे अनेकों युवा चाहिए, जो परेशानियों से परास्त न हों, जो मुश्किलों के सामने मायूस न हों, बल्कि अपनी मेहनत से हर मंजिल को आसान बनाने का हौसला रखें। इसी बदलाव से सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प पूरा होगा। यहीं से आत्मनिर्भर और विकसित भारत का रास्ता बनेगा।
साथियों,
ऐसे युवाशक्ति के निर्माण के लिए जो प्रेरणा चाहिए, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी उसका अहम स्रोत बन सकती है।
साथियों,
कोविंद जी ने अपनी जीवनी में मोरारजी भाई देसाई के साथ अनुभवों के बारे में भी इसमें विस्तार से बताया है। कोविंद जी के भीतर देशसेवा की जो भावना थी, मोरारजी भाई के साथ काम करके उन्हें जो सीखने को मिला, जो रास्ता मिला। कोविंद जी ने राजनीति और समाजसेवा को अपना मार्ग बनाया। वो अपने कर्तव्यों के लिए समर्पित रहे। सेवा को उन्होंने अपना लक्ष्य बनाकर काम किया। संसद में उनका कार्यकाल गवाह है। राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया। राष्ट्रपति के रूप में भी हमें उनकी यही कर्तव्यनिष्ठा दिखाई देती रही। यहाँ तक कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद से सेवामुक्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम नहीं लिया है। वो अभी भी ‘एक देश, एक चुनाव’ One Nation, One Election जैसे महत्वपूर्ण विषय पर काम कर रहे हैं। देश को जगा रहे हैं। ये एक ऐसा विषय है, जिसका समाधान देश के लोकतंत्र का नया अध्याय शुरू कर सकता है। मैं मानता हूँ, कोविंद जी की इस कर्तव्यनिष्ठा और सेवाभाव से देश के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं।
साथियों,
सामाजिक जीवन में सक्रिय रहते हुये ऑटोबायोग्राफ़ी के लिए समय निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है। कोविंद जी ने ये काम हम सबके लिए किया है, क्योंकि उनके जीवन में ऐसा कितना कुछ है, जिसमें गरीब वंचित तबके से आए तमाम लोग अपने जीवन की परछाई देख सकते हैं। कैसे एक साधारण परिवार मुश्किल हालातों में भी जीवन की शुचिता और ईमानदारी से समझौता नहीं करता, कैसे वही आदर्श आगे चलकर हमारे जीवन का आधार बनते हैं, हमारे कठिन समय के मूल्य किस तरह जीवनभर हमें रोशनी देते हैं, कैसे इस पवित्रता से हमें राष्ट्र सेवा की शक्ति मिलती है। अलग-अलग पदों का दायित्व निभाते हुए, कोविंद जी ने समाज को निरंतर इसकी प्रेरणा दी है।
साथियों,
मुझे विश्वास है, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी, इसमें उनके जीवन की ही नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की भी अहम स्मृतियाँ सुरक्षित होंगी। मैं एक बार फिर उन्हें उनकी आत्मकथा के लिए शुभकामनाएं देता हूं। और मैं खास करके युवा पीढ़ी से आग्रह करूंगा, रील का जमाना है, सोशल मीडिया में इनफ्लुएंसर आपको खींच के कहीं-कहीं ले जाते हैं। इस शॉर्टकट के युग में भी एक बात हम जरूर याद रखें, रेलवे स्टेशन पर लिखा हुआ होता है, कुछ लोगों को पटरी पर कूद कर के जाने की आदत होती है, ब्रिज पर नहीं जाते। तो वहां लिखा होता है, शॉर्टकट विल कट यू शॉर्ट। और अगर शॉर्टकट के रास्ते से भी कहीं बाहर निकलना है, तो मैं नौजवानों को कहूंगा आपको जिसका भी पसंद हो ऑटोबायोग्राफी जरूर पढ़ें। ऑटोबायोग्राफी उस कालखंड की इतिहास की घटनाओं को अलग तरीके से समझने का अवसर देती है। इतिहास से काफी निकट होता है वो कालखंड बायोग्राफी का और इसलिए मैं जरूर चाहूंगा कि कोविंद जी की जो मेहनत है, वो आने वाली पीढ़ियों को काम आए, युवा पीढ़ी को विशेष रूप से काम आए। बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद।