Your Excellencies और मेरे मित्र राष्ट्रपति शी और पूतिन।

पिछले वर्ष अर्जेंटीना में लंबे समय के बाद हम तीन देश शिखर-स्तर पर मिले थे।

विश्व के सामने प्रमुख मुद्दों पर विचारों के उपयोगी आदान-प्रदान के बाद हम भविष्य में फिर मिलने पर सहमत हुए थे।

आज इस RIC अनौपचारिक शिखर बैठक में आपका स्वागत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है।

अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के रुप में विश्व की आर्थिक, राजनैतिक और सुरक्षा की स्थिति पर, हमारे बीच विचार-विनिमय महत्वपूर्ण है। हमारी आज की यह त्रिपक्षीय मुलाकात प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर चर्चा और समन्वय का एक उपयोगी माध्यम है।

हमारे विदेश मंत्रियों की इस साल फरवरी में चीन में हुई बैठक में कई मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया था। इनमें counter-terrorism, international hot-spot issues, reformed multilateralism, climate change तथा RIC के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना शामिल हैं।

अब मैं His Excellency राष्ट्रपति शी से अनुरोध करता हूँ कि वे अपने opening remarks रखें। (राष्ट्रपति शी के opening remarks के बाद)

धन्यवाद राष्ट्रपति शी।

अब मैं, His Excellency राष्ट्रपति पूतिन से उनके opening remarks के लिए अनुरोध करता हूँ। (राष्ट्रपति पूतिन के opening remarks के बाद)

धन्यवाद, राष्ट्रपति पूतिन।

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प्रधानमंत्री ने सुख, समृद्धि और ज्ञान के लिए आशीर्वाद मांगते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
September 10, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने सभी के कल्याण, शुभता, सुरक्षा, शांति, ज्ञान और समृद्धि के लिए आशीर्वाद की कामना का भाव रखने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया। इस सुभाषितम में भगवान इंद्र, भगवान सूर्य, भगवान गरुड़ और भगवान बृहस्पति से आशीर्वाद की कामना की गई है।

प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषितम साझा किया-

“स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥”

सुभाषित का अर्थ है कि वैभवशाली भगवान इंद्र हमें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दें। संपूर्ण ब्रह्मांड के ज्ञाता और सबका पालन-पोषण करने वाले भगवान सूर्य हमारे लिए मंगलकारी हों। विघ्‍नों का नाश करने वाले भगवान गरुड़ हम सबकी रक्षा करें। ज्ञान के देवता भगवान बृहस्पति हमें शांति सद्बुद्धि और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर लिखा;

“स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥”