कच्छ ने पूरे देश को दिखाया है कि अपने संसाधनों पर, अपने सामर्थ्य पर भरोसा करते हुए किस तरह आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ा जा सकता है : पीएम मोदी
किसान भाई-बहनों की हर शंका के समाधान के लिए सरकार 24 घंटे तैयार है : प्रधानमंत्री मोदी
21वीं सदी के भारत के लिए जिस तरह एनर्जी सिक्योरिटी जरूरी है, उसी तरह वाटर सिक्योरिटी भी महत्वपूर्ण है : पीएम मोदी
सिर्फ सवा साल के भीतर जल जीवन मिशन अभियान के तहत करीब 3 करोड़ घरों तक पानी का पाइप पहुंचाया गया है : प्रधानमंत्री

गुजरात के मुख्यमंत्री, श्री विजय रुपानी जी, उपमुख्यमंत्री श्री नितिन पटेल जी, गुजरात सरकार के मंत्रिगण, सांसदगण, और मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, की अयो कच्छी माडुओ? शी केड़ो आय? शियारो अने कोरोना, बोय मे ध्यान रखजा ! अज कच्छ अची, मुके, बेवडी खुशी थई रही आय, बेवड़ी ऐटले आय,के कच्छड़ों मुझे धिल जे बोरो वटे आय, ब्यो एतरे के, अज, कच्छ गुजरात ज न, पण, देश जी ओड़ख मे पण, हकड़ो तारो, जोडेलाय वेने तो।

साथियों,

आज गुजरात और देश के महान सपूत, सरदार वल्ल्भ भाई पटेल जी की पुण्यतिथि भी है। मां नर्मदा के जल से गुजरात का कायाकल्प करने का सपना देखने वाले सरदार साहेब का सपना तेजी से पूरा हो रहा है। केवड़िया में उनकी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा, हमें दिन-रात एकजुट होकर देश के लिए काम करने की प्रेरणा देती है। सरदार साहब का स्मरण करते हुए हमें इसी तरह देश और गुजरात का गौरव बढ़ाते ही रहना है।

साथियों,

आज कच्छ में भी नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। सोचिए, हमारे कच्छ में, दुनिया का सबसे बड़ा Hybrid Renewable Energy पार्क। और ये कितना बड़ा है? जितना बड़ा सिंगापुर देश है, बहरीन देश है, लगभग उतने बड़े क्षेत्र में कच्छ का ये Renewable Energy पार्क होने वाला है। अब आपको अंदाज आता होगा कि कितना विशाल होने वाला है। 70 हजार हेक्टेयर, यानि भारत के बड़े-बड़े शहरों से भी बड़ा ये कच्छ का Renewable Energy पार्क। ये जब सुनते हैं न, ये शब्द कान में पड़ते हैं ये  सुनकर ही कितना अच्छा लगता है ! लगता है कि नहीं लगता है कच्छ वालों को ! मन कितना गर्व से भर जाता है !

साथियों,

आज कच्छ ने New Age Technology और New Age Economy, दोनों ही दिशा में बहुत बड़ा कदम उठाया है। खावड़ा में Renewable Energy पार्क हो, मांडवी में डी-सेलीनेशन plant हो, और अंजार में सरहद डेहरी के नए ऑटोमैटिक प्लांट का शिलान्यास, तीनों ही कच्छ की विकास यात्रा में नए आयाम लिखने वाले हैं। और इसका बहुत बड़ा लाभ यहां के मेरे किसान भाईयों बहनों को, पशुपालक भाईयों बहनों को, यहां के सामान्य नागरिकों को और विशेषकर हमारी माताओं बहनों को होने वाला है।

साथियों,

मैं जब कच्छ के विकास की बात करता हूं तो मन में बहुत सारी पुरानी सारी यादें सारी तस्वीरें एक साथ आने लगती हैं। एक समय कहा जाता था कच्छ इतनी दूर है, विकास का नामोनिशान नहीं है, कनेक्टिविटी नहीं है। बिजली-पानी-सड़क, चुनौती का एक प्रकार से दूसरा नाम ही ये था। सरकार में भी ऐसा कहा जाता था। कि अगर किसी को Punishment posting देना है तो कच्छ में भेज दो और लोग भी कहते थे काला पानी की सजा हो गई। आज स्थिति ऐसी है लोग सिफारिश करते हैं मुझे कुछ समय कच्छ में मौका मिल जाये काम करने का। कुछ लोग तो ये भी कहते थे कि इस क्षेत्र में विकास कभी हो ही नहीं सकता। ऐसे ही हालात में कच्छ में भूकंप की त्रासदी भी आई। जो भी बचा-खुचा था, भूकंप ने वो भी तबाह कर दिया था। लेकिन एक तरफ माता आशापुरा देवी और कोटेश्वर महादेव का आशीर्वाद, तो दूसरी तरफ कच्छ के मेरे खमीरवंत लोगों का हौसला, उनकी मेहनत, उनकी इच्छाशक्ति। सिर्फ कुछ ही वर्षों में इस इलाके के लोगों ने वो कर दिखाया, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। कच्छ के लोगों ने निराशा को आशा में बदला। मैं समझता हूं यही तो माता आशापुरा देवी का आर्शीवाद है। यहां निराशा का नाम नही, आशा ही आशा होती है। भूकंप ने भले उनके घर गिरा दिए थे, लेकिन इतना बड़ा भुकंप भी कच्छ के लोगो के मनोबल को नहीं गिरा पाया। कच्छ के मेरे भाई-बहन फिर खड़े हुए। और आज देखिए, इस क्षेत्र को उन्होंने कहां से कहां पहुंचा दिया है।

साथियों,

आज कच्छ की पहचान बदल गई है, आज कच्छ की शान और तेजी से बढ़ रही है। आज कच्छ देश के तेज़ी से विकसित होते क्षेत्रों में से एक अहम श्रेत्र बन गया है। यहां की कनेक्टिविटी दिनों-दिन बेहतर हो रही है। इस सीमावर्ती इलाके में लगातार पलायन, और पहले तो जनसंख्या का हिसाब देख लिजिये, Minus Growth होता था। और जगह पर जनसंख्या बढ़ती थी यहां कम होती थी क्योंकि लोग चले जाते थे और ज्यादातर सीमावर्ती इलाके से लोग पलायन कर जाते थे, और उसके कारण सुरक्षा के लिए भी मुश्किल पैदा होना स्वाभाविक था। अब जब पलायन रुका है, तो जो गांव कभी खाली हो रहे थे, उनमें रहने के लिए लोग वापस आते जा रहे हैं। इसका बहुत बड़ा सकारात्मक प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ा है।

साथियों,

जो कच्छ कभी वीरान रहता था, वही कच्छ देश और दुनिया के पर्यटकों का प्रमुख केंद्र बन रहा है। कोरोना ने जरूर मुश्किलें खड़ी की हैं लेकिन कच्छ का सफ़ेद रण, कच्छ का रणोत्सव पूरी दुनिया को आकर्षित करता है। औसतन 4 से 5 लाख टूरिस्ट रण-उत्सव के दौरान यहां आते हैं, सफेद रेगिस्तान और नीले आसमान का आनंद उठाते हैं। इस तरह के बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, कच्छ के स्थानीय सामानों की इतने बड़े पैमाने पर बिक्री, यहां पारंपरिक खानपान की लोकप्रियता, एक जमाने में कोई सोच भी नहीं सकता था। आज मुझे कई मेरे पुराने जान पहचान वालों से गप्पे – गोष्टी करने का मौका मिल गया। तो ऐसे ही मुझे बता रहे थे। बोले अब तो हमारे बच्चे अंग्रेजी बोलना सीख गए। मैने कहा कैसे, बोले अब तो हम Home Stay करते हैं। हमने घरों की रचना की है तो Home Stay के लिए लोग रहते हैं। तो हमारे बच्चे भी बोलते बोलते बहुत कुछ सीख गए हैं। कच्छ ने पूरे देश को दिखाया है कि अपने संसाधनों पर, अपने सामर्थ्य पर भरोसा करते हुए किस तरह आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ा जा सकता है। मैं दुनिया के डवलपमेंट एक्सपर्ट्स, यूनिवर्सिटीज रिसर्चरस इससे जुड़े लोगों से कहूंगा कि भूकंप के बाद जिस तरह कच्छ का चौतरफ विकास हुआ है, मुझे लगता है ये केस स्टडी है उसकी स्टडी की जानी चाहिए, रिसर्चरस करना चाहिए और ये किस प्रकार से मॉडल काम कर रहा है। इतने बड़े भयंकर भुकंप हादसे के दो दशक के अंदर – अंदर इतना बड़ा सर्वांगीण विकास हर क्षेत्र में वो भी जहां ज्यादातर भूमी सिर्फ – सिर्फ रेगिस्तान है। ये अध्यन का विषय है।

साथियों,

मैं हमेशा मानता हूं ईश्वर की मुझ पर कई कृपा रही हैं और ईश्वर की कृपा का ही कारण होगा शायद कि मुझे भी उस भूकंप के समय विशेष रूप कच्छ के लोगों की सेवा करने का ईश्वर ने अवसर दिया। इसे संयोग ही कहेंगे कि भूकंप के अगले साल बाद, जब राज्य में चुनाव हुए, तो जिस दिन नतीजे आए, वो तारीख भी 15 दिसंबर थी और आज 15 दिसंबर है। कोई कल्पना नही कर सकता था कि इतने बड़ भूकंप के बाद यहां पर हमारी पार्टी को लोग आर्शीवाद देंगे। बड़ी नकारात्मक चर्चा चल रही थी। उस चुनाव में जब 15 दिसंबर को रिजल्ट आया तो देखा कच्छ ने जो प्यार बरसाया, आर्शीवाद दिये वो आज भी उसी परंपरा चल रही है। आज भी देखिये आपके आर्शीवाद। वैसे साथियों, आज 15 दिसंबर की तारीख के साथ एक और संयोग जुड़ा हुआ है। शायद कई लोगों के लिए जानकारी सुखद आशचर्य होगी। देखिए हमारे पुवर्ज भी कितनी लंबी सोच रखते थे। कितने दूर का सोचते थे। आजकल कभी कभी नई पीढ़ी की सोच वाले लोग, पुराना सब निकम्मा है, बेकार है एसी बाते करते है ना, मैं एक घटना सुनाता हूं। आज से 118 साल पहले, आज ही के दिन 15 दिसंबर को ही अहमदाबाद में एक Industrial Exhibition का उद्घाटन किया गया था। इस Exhibition का मुख्य आकर्षण था- भानुताप यंत्र। यानि 118 साल पहले यहां के हमारे Entrepreneur की सोच देखिए। भानुताप यंत्र यानि सूर्यताप यंत्र, ये सबसे बड़े आकर्षण का कारण था। भानुताप यंत्र ने सूर्य की गर्मी से चलने वाला यंत्र। और एक तरह से सोलर कुकर की तरह उन्होंने विकसित किया। आज 118 साल बाद अब आज 15 दिसंबर को ही सूरज की गर्मी से चलने वाले इतने बड़े Renewable Energy पार्क का उद्घाटन किया गया है। इस पार्क में सौलर के साथ-साथ पवन ऊर्जा, दोनों से करीब 30 हजार मेगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता होगी। इस Renewable Energy पार्क में करीब-करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का निवेश होगा। सोचिए, रेगिस्तान की कितनी बड़ी भूमि का सदुपयोग होगा। सीमा के साथ पवन चक्कियां लगने से सीमा सुरक्षा भी और अधिक बेहतर होगी। आम लोगों का बिजली का बिल कम करने के जिस लक्ष्य को लेकर देश चल रहा है, उसे भी मदद मिलेगी। इस प्रोजेक्ट से किसानों और उद्योगों दोनों को बहुत बड़ा लाभ होगा। और सबसे बड़ी बात, इससे प्रदूषण कम होगा, हमारे पर्यावरण को भी लाभ होगा। इस Renewable Energy पार्क में जो बिजली बनेगी, वो प्रतिवर्ष 5 करोड़ टन कार्बन डायोक्साइड एमिशन को रोकने में मदद करेगी और ये जो काम होने वाला है, अगर उसको पर्यावरण के हिसाब से देखना है तो ये काम करीब-करीब 9 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर होगा। ये एनर्जी पार्क, भारत में Per Capita कार्बन डायोक्साइड emission को भी कम करने में बहुत बड़ा योगदान देगा। इससे करीब एक लाख लोगों को रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे। इसका बहुत बड़ा लाभ कच्छ के मेरे युवाओं को होगा।

साथियों,

एक समय था जब गुजरात के लोगों की मांग होती थी कि कम से कम रात में खाना खाते समय तो कुछ देर बिजली मिल जाए। आज गुजरात, देश के उन राज्यों में से एक है जहां शहर हो या गांव, 24 घंटे बिजली सुनिश्चित की जाती है। आज जो 20 साल का नौजवान होगा उसे पता नहीं होगा की पहले क्या हालत थी। उसे तो अंदाज भी नही होगा कि इतना बड़ा बदलाव आया है। ये बदलाव गुजरात के लोगों के अथक प्रयासों से ही संभव हो पाया है। अब तो किसानों के लिए किसान सूर्योदय योजना के तहत, अलग से पूरा नेटवर्क भी तैयार किया जा रहा है। किसानों को रात में सिंचाई की मजबूरी ना हो, इसके लिए विशेष लाइनें बिछाई जा रही हैं।

भाइयों और बहनों,

गुजरात देश का पहला राज्य है जिसने सौर ऊर्जा को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाईं, निर्णय लिए। हमने नहरों तक पर सोलर पैनल लगा दिए जिसकी चर्चा विदेशों तक में हुई है। मुझे याद है जब गुजरात ने सोलर पावर को बढ़ावा देना शुरू किया था, तो ये भी बात आई थी कि इतनी महंगी बिजली का क्या करेंगे? क्योंकि जब गुजरात ने इतना बड़ा कदम उठाया था तब सोलर पावर उससे जो बिजली थी वो 16 रुपए या 17 रुपए प्रति यूनिट बिजली मिलने की बात थी। लेकिन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए गुजरात ने इस पर काम जारी रखा। आज वही बिजली गुजरात ही नहीं पूरे देश में 2 रुपए, 3 रुपए प्रति यूनिट बिक रही है। गुजरात ने तब जो काम किया था, उसके तब के अनुभव आज देश को दिशा दिखा रहे हैं। आज भारत Renewable energy के उत्पादन के मामले में दुनिया की चौथी बड़ी ताकत है। हर हिन्दुस्तानी को गर्व होगा दोस्तों, बीते 6 साल में हमारी सौर ऊर्जा, उसकी हमारी क्षमता 16 गुणा बढ़ गई है। हाल में एक क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट रैंकिंग आई है। इस क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट रैंकिंग जो है 104 देशों का मूल्यांकन हुआ है और नतीजा ये निकला है कि दुनिया के 104 देशों में पहले तीन में भारत ने अपनी जगह बना ली है। क्लाइमेट चेंज के खिलाफ लड़ाई में अब भारत, पूरी दुनिया को दिशा दिखा रहा है, नेतृत्व कर रहा है।

साथियों,

21वीं सदी के भारत के लिए जिस तरह Energy Security जरूरी है, उसी तरह Water Security भी महत्वपूर्ण है और मेरा शुरू से ये कमिटमेंट रहा है कि पानी की कमी की वजह से न लोगों का विकास रुकना चाहिए और न ही किसी क्षेत्र का विकास रुकना चाहिए। पानी को लेकर भी गुजरात ने जो काम किया है, वो आज देश के लिए दिशादर्शक बना है। एक समय था जब कच्छ में मां नर्मदा का पानी पहुंचाने की बात की जाती थी, तो कुछ लोग मजाक उड़ाते थे। वो यही कहते थे, ये तो राजनीतिक बातें  हैं, होने वाला कुछ नहीं है। कभी – कभी लोग कहते थे 600-700 किलोमीटर दूर मां नर्मदा वहां से पानी यहां कैसे पहुंच सकता है।  ये कभी भी नहीं होगा। आज कच्छ में नर्मदा का पानी भी पहुंच रहा है और मां नर्मदा का आशीर्वाद भी मिल रहा है। कच्छ का किसान हो या सरहद पर खड़ा जवान, दोनों के लोगो की पानी की चिंता दूर हुई है। मैं यहां के लोगों की विशेष प्रशंसा करूंगा जिन्होंने जल संरक्षण को एक जन-आंदोलन में बदल दिया। गांव-गाव में लोग आगे आए, पानी समितियां बनीं, महिलाओं ने भी मोर्चा संभाला, चेक डैम्स बनाए, पानी की टंकियां बनाईं, नहरें बनाने में मदद की। मैं वो दिन कभी भूल नहीं सकता, जब नर्मदा का पानी यहां पहुंचा था, वो दिन मुझे बराबर याद था, जिस दिन मां नर्मदा का पानी पहुंचा, शायद दुनियां में कहीं पर भी कच्छ ही होगा जब नर्मदा मा यहां कच्छ की धरती पर पहुंची थी हर किसी की आंख में हर्ष के आसूं बह रहे थे। वो दृश्य मैने देखा था। पानी क्या है, ये कच्छ को लोग जितना समझ सकते हैं शायद कोई समझ सकता है। गुजरात में पानी के लिए जो विशेष ग्रिड बनाए गए, नहरों का जाल बिछाया गया, उसका लाभ अब करोड़ों लोगों को हो रहा है। यहां के लोगों के प्रयास, राष्ट्रीय स्तर पर जल जीवन मिशन का भी आधार बने हैं। देश में हर घर में पाइप से पानी पहुंचाने का अभियान तेज गति से चल रहा है। सिर्फ सवा साल के भीतर इस अभियान के तहत करीब-करीब 3 करोड़ घरों तक पानी का पाइप पहुंचाया गया है। यहां गुजरात में भी 80 प्रतिशत से अधिक घरों में नल से जल की सुविधा पहुंच चुकी है। मुझे बताया गया है कि अगले कुछ समय में ही गुजरात के हर जिले में पाइप से पानी की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।

भाइयों और बहनों,

पानी को घरों तक पहुंचाने के साथ-साथ पानी के नए स्रोत बनाना भी बहुत ज़रूरी है। इसी लक्ष्य के साथ ही समंदर के खारे पानी को शुद्ध करके इस्तेमाल करने की व्यापक योजना पर भी काम हो रहा है। मांडवी में तैयार होने वाला Desalination plant, नर्मदा ग्रिड, सौनी नेटवर्क और वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट जैसे प्रयासों को और विस्तार देगा। पानी सफाई का ये प्लांट जब तैयार हो जाएगा तो इससे मांडवी के अलावा मुंद्रा, नखातराना, लखपत और अबदासा के लाखों परिवारों को लाभ होगा। इस प्लांट से इन क्षेत्र के करीब-करीब 8 लाख लोगों को रोज टोटल मिलाकर के 10 करोड़ लीटर साफ पानी की सप्लाई हो सकेगी। एक और लाभ ये होगा कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से यहां आ रहा नर्मदा का पानी, उसका भी हम ज्यादा सदुपयोग कर पाएंगे। ये पानी कच्छ के अन्य तालुका, जैसे रापर, भचाऊ, गांधीधाम और अंजार को सुचारू रूप से मिल सकेगा।

साथियों,

कच्छ के अलावा दहेज, द्वारका, घोघा भावनगर, गीर सोमनाथ वहां पर भी ऐसे प्रोजेक्ट्स आने वाले समय में शुरू होने जा रहे हैं।  मुझे विश्वास है कि समंदर किनारे बसे दूसरे राज्यों को भी मांडवी का ये प्लांट, नई प्रेरणा देगा, उन्हें प्रोत्साहित करेगा।

भाइयों और बहनों,

समय और ज़रूरत के साथ बदलाव करना, यही कच्छ की, गुजरात की ताकत है। आज गुजरात के किसान, यहां के पशुपालक, यहां के हमारे मछुआरे साथी, पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है। इसका एक कारण ये भी है कि यहां खेती की परंपरा को आधुनिकता से जोड़ा गया, फसलों की विविधता पर फोकस किया गया। कच्छ सहित गुजरात में किसान ज्यादा डिमांड और ज्यादा कीमत वाली फसलें, उसकी तरफ मुड़ गए और आज उसमें आगे बढ़ रहे हैं। अब यहीं हमारे कच्छ में से देखिए, यहां के खेत उत्पादन विदेशों में एक्सपोर्ट हो, क्या किसी ने कभी सोचा था, आज हो रहे हैं यहां खजूर, यहां कमलम और ड्रैगन फ्रूट जैसे उत्पादों की खेती ज्यादा होने लगी है। सिर्फ डेढ़ दशक में गुजरात में कृषि उत्पादन में डेढ़ गुणा से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

भाइयों और बहनों,

गुजरात में कृषि सेक्टर मजबूत होने का एक और बड़ा कारण ये रहा कि यहां बाकी उद्योगों की तरह ही खेती से जुड़े व्यापार में भी सरकार टांग नही अड़ाती, दखल नहीं करती है। सरकार अपनी दखल बहुत सीमित रखती है, खुला छोड़ दिया है। आज हम देखते हैं कि डेयरी और फिशरीज़ इससे जुड़े दो सेक्टर ऐसे हैं, जो देश में सबसे तेज़ी से विकास हो रहा हैं। बहुत कम लोगों ने इसका स्टडी किया है, बहुत कम लोग इसको लिखते हैं। गुजरात में भी दूध आधारित उद्योगों का व्यापक प्रसार इसलिए हुआ क्योंकि इसमें सरकार की तरफ से पाबंदियां कम से कम रहीं। सरकार जरूरी सहूलियत देती है, बाकी का काम या तो Co-operatives सेक्टर वाले करते हैं, या तो हमारे किसान भाई- बहन करते हैं। आज अंजार की सरहद डेयरी भी इसका एक उत्तम उदाहरण है। मुझे याद है कच्छ में डेयरी होनी चाहिए इस बात को लेकर के शुरू में बात करता था तो जिससे मिलू सब निराशा की बात करते थे। यहां क्या, ठीक है थोड़ा बहुत हम इधर-उधर कर देते हैं। मैने कहा भई छोटे से भी शुरू करना है। देखते हैं क्या होता हैं, वो छोटा सा काम आज कहां पहुंच गया देखिये। इस डेयरी ने कच्छ के पशुपालकों का जीवन बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। कुछ साल पहले तक कच्छ से और वो भी बहुत कम मात्रा में दूध को प्रोसेसिंग के लिए गांधीनगर की डेयरी में लाया जाता था। लेकिन अब वही प्रोसेसिंग अंजार के डेयरी प्लांट में हो रही है। इससे हर दिन ट्रांसपोर्टेशन में ही किसानों के लाखों रुपए बच रहे हैं। अब सरहद डेयरी के ऑटोमैटिक प्लांट की क्षमता और बढ़ने जा रही है। आने वाले दिनों में यहां का डेयरी प्लांट हर दिन 2 लाख लीटर ज्यादा दूध की प्रोसेसिंग करेगा। इसका आसपास के जिलों के पशुपालकों को बहुत लाभ होगा। यही नहीं, नए प्लांट में दही, बटर मिल्क, लस्सी मक्खन, खोआ जैसे अनेक मिल्क प्रोडक्ट्स में वैल्यू एडिशन भी संभव हो पाएगा।

साथियों,

डेयरी सेक्टर में जिन पशुपालकों को लाभ हो रहा है उसमें से ज्यादातर छोटे किसान ही हैं। किसी के पास 3-4 पशु हैं, किसी के पास 5-7, और ऐसा करीब-करीब पूरे देश में ही है। यहां कच्छ की बन्नी भैंस तो दुनिया में अपना नाम कमा रही है। कच्छ में तापमान चाहे 45 डिग्री हो या फिर तापमान शून्य से नीचे हो, बन्नी भैंस आराम से सबकुछ सहती हैं और बहुत मौज से रहती है। इसे पानी भी कम चाहिए और चारे के लिए दूर-दूर तक चलकर जाने में बन्नी की भैंस को कोई दिक्कत नहीं होती है। एक दिन में ये भैंस औसतन करीब-करीब 15 लीटर दूध देती है और इससे सालाना कमाई 2 से 3 लाख रुपए तक की होती है। मुझे बताया गया है कि अभी हाल ही में एक बन्नी भैंस 5 लाख रुपए से भी ज्यादा में बिकी है। देश के और लोग सुनते होंगे उनको आशचर्य होगा, बन्नी की भैंस 5 लाख रूपया, यानि जितने में 2 छोटी कार खरीदें इतने में बन्नी की एक भैंस मिलती है।

साथियों,

साल 2010 में बन्नी भैंस को राष्ट्रीय मान्यता मिली थी। आजादी के बाद भैंस की ये पहली ब्रीड थी जिसे राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की मान्यता मिली।

साथियों,

बन्नी भैंस के दूध का कारोबार और उसके लिए बनी व्यवस्था यहां कच्छ में बहुत सफल रही है। देश में बाकी जगह पर भी दूध उत्पादक और दूध का व्यवसाय करने वाला प्राइवेट और कोऑपरेटिव सेक्टर,

दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं और एक बेहतरीन सप्लाई चेन उन्होंने खड़ी की है। इसी तरह फल-सब्ज़ी से जुड़े व्यवसाय में भी ज्यादातर बाज़ारों पर सरकारों का सीधा दखल नहीं है।

साथियों,

ये उदाहरण मैं विस्तार से इसलिए दे रहा हूं क्योंकि आजकल दिल्ली के आसपास किसानों को भ्रमित करने की बड़ी साजिश चल रही है। उन्हें डराया जा रहा है कि नए कृषि सुधारों के बाद किसानों की जमीन पर दूसरे कब्जा कर लेंगे।

भाईयों-बहनों,

मैं आपसे जानना चाहता हूं, क्या कोई डेयरीवाला आपसे दूध लेने का कान्ट्रेक्ट करता है तो आपकी गाय-भैंस ले जाता है क्या? कोई फल-सब्जी खरीदने उद्यम करता है तो क्या आपकी जमीन ले जाता है क्या आपकी प्रॉपर्टी उठाकर ले जाता है क्या?

साथियों,

हमारे देश में डेयरी उद्योग का योगदान, कृषि अर्थव्यवस्था के कुल मूल्य में 25 प्रतिशत से भी ज्यादा है।

ये योगदान करीब-करीब 8 लाख करोड़ रुपए होता है। दूध उत्पादन का कुल मूल्य, अनाज और दाल के कुल मूल्य से भी ज्यादा होता है। इस व्यवस्था में पशुपालकों को आजादी मिली हुई है। आज देश पूछ रहा है कि ऐसी ही आजादी अनाज और दाल पैदा करने वाले छोटे और सीमांत किसानों को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

साथियों,

हाल में हुए कृषि सुधारों की मांग, बरसों से की जा रही थी। अनेक किसान संगठन भी पहले ही मांग करते थे कि अनाज को कहीं पर भी बेचने का विकल्प दिया जाए। आज जो लोग विपक्ष में बैठकर किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, वो भी अपनी सरकार के समय, इन कृषि सुधारों के समर्थन में थे। लेकिन अपनी सरकार के रहते वो निर्णय नहीं ले पाए, किसानों को झूठे दिलासे देते रहे। आज जब देश ने ये ऐतिहासिक कदम उठा लिया, तो यही लोग किसानों को भ्रमित करने में जुट गए हैं। मैं अपने किसान भाई-बहनों से फिर एक बार कह रहा हूं बार-बार दोहराता हूं कि उनकी हर शंका के समाधान के लिए सरकार चौबीसों घंटे तैयार है। किसानों का हित, पहले दिन से हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक रहा है। खेती पर किसानों का खर्च कम हो, उन्हें नए-नए विकल्प मिलें, उनकी आय बढ़े, किसानों की मुश्किलें कम हों, इसके लिए हमने निरंतर काम किया है। मुझे विश्वास है, हमारी सरकार की ईमानदार नीयत, हमारी सरकार के ईमानदार प्रयास और जिसको करीब-करीब पूरे देश ने आर्शीवाद दिए हैं, देश के हर कोने के किसानों ने आर्शीवाद दिए हैं, मुझे विश्वास है देशभर के किसानों की आर्शीवाद की ये ताकत, जो भ्रम फैलाने वाले लोग हैं, जो राजनीति करने पर तुले हुए लोग हैं, जो किसानों के कंधे पर बंदूके फोड़ रहे हैं, देश के सारे जागरूक किसान उनको भी परास्त करके रहेंगे।

भाईयों-बहनों,

इसी के साथ मैं फिर एक बार कच्छ को अनेक – अनेक बधाई देता हूं। अभी कुछ देर में, जब मैं यहां आया हूं तो प्रलोत्सव के प्रति मेरा आकर्षण तो रहता ही है, कच्छ की विरासत, यहां की सांस्कृति को नमन कर रहे एक और कार्यक्रम प्रलोत्सव का भी हिस्सा लूंगा। फिर से एक बार थोड़ा उस पल को जीने का प्रयास करूंगा। कच्छ के विश्व प्रसिद्ध White Desert की यादें भी अपने साथ फिर एक बार दिल्ली ले जाउंगा।कच्छ विकास की नई ऊंचाइयां छूता रहे, मेरी हमेशा यही कामना रहेगी। मैं फिर एक बार आप सबको बहुत बहुत बधाई देता हूं। बहुत – बहुत शूभकामनाएं देता हूं।

बहुत-बहुत आभार !!!

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21वीं सदी के इस दशक में भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है: ET Now ग्लोबल बिजनेस समिट में पीएम मोदी
February 13, 2026
Amid numerous disruptions, this decade has been one of unprecedented development for India, marked by strong delivery and by efforts that have strengthened our democracy: PM
In this decade of the 21st century, India is riding the Reform Express: PM
We have made the Budget not only outlay-focused but also outcome-centric: PM
Over the past decade, we have regarded technology and innovation as the core drivers of growth: PM
Today, we are entering into trade deals with the world because today's India is confident and ready to compete globally: PM

आप सभी का इस ग्लोबल बिजनेस समिट में, आप सबका मैं अभिनंदन करता हूं। हम यहां A Decade Of Disruption, A Century Of Change, इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। विनीत जी का भाषण सुनने के बाद मुझे लगता है कि मेरा काम बहुत सरल हो गया है। लेकिन एक छोटी request करूं, इतना सारा आपको पता है, तो कभी ET में तो दिखना चाहिए।

साथियों,

21वीं सदी का बीता दशक अभूतपूर्व डिसरप्शन का रहा है। ग्लोबल Pandemic, ग्लोब के अलग-अलग हिस्सों में तनाव, युद्ध और ग्लोब के संतुलन को हिला देने वाले Supply Chain Breakdowns, दुनिया ने एक दशक के भीतर काफी कुछ देख लिया। लेकिन साथियों, कहते हैं, संकट के समय ही किसी देश के सामर्थ्य पता चलता है और मुझे बहुत गर्व है, अनेक Disruptions के बीच भी भारत के लिए यह दशक, अभूतपूर्व डेवलपमेंट का रहा है, शानदार डिलीवरी का रहा है और डेमोक्रेसी को मजबूत करने वाला रहा है। जब पिछला दशक शुरू हुआ था, तो भारत ग्यारहवें नंबर की अर्थव्यवस्था था। इतनी उथल-पुथल में पूरी आशंका थी कि भारत और नीचे चला जाएगा, लेकिन आज भारत, बहुत तेजी के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने जा रहा है। और आप जिस Century Of Change की बात कर रहे हैं, उसका बहुत बड़ा आधार और यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं, इसका बहुत बड़ा आधार भारत ही होने जा रहा है। आज भारत, दुनिया की ग्रोथ में 16 परसेंट से ज्यादा योगदान दे रहा है। और मुझे विश्वास है, इस सेंचुरी के हर आने वाले साल में हमारा योगदान और भी बढ़ता रहेगा, निरंतर बढ़ता रहेगा। मैं वह मदान की तरह astrologer के रूप में नहीं आया हूं। भारत, दुनिया की ग्रोथ को ड्राइव करेगा, दुनिया की ग्रोथ का नया इंजन बनेगा।

साथियों,

दुनिया में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एक नई वैश्विक व्यवस्था बनी थी, एक नए वर्ल्ड ऑर्डर ने आकार लिया था। लेकिन सात दशक के बाद, वो व्यवस्था टूट रही है। दुनिया आज एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है। आखिर यह क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब जो व्यवस्था बनी थी, उसकी नींव One Size Fits All, इसी सोच पर टिकी थी। तब ये माना गया कि World Economy Core में होगी, Supply Chains मजबूत और विश्वसनीय हो जाएगी। इस व्यवस्था में नेशन्स को केवल कंट्रीब्यूटर्स के रूप में ही देखा गया। लेकिन आज, इस मॉडल को चुनौती मिल रही है। यह अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। आज हर देश को यह पता चल रहा है कि उसे अपनी रज़ीलियन्स खुद बनानी होगी।

साथियों,

आज दुनिया जिसकी चर्चा कर रही है। उसको भारत ने 2015 में, आज से 10 साल से पहले, 2015 में ही अपनी नीति का हिस्सा बना लिया था। दस साल पहले जब नीति आयोग बना, तो उसके फाउंडिंग डॉक्यूमेंट में ही भारत ने अपना विजन क्लीयर कर दिया था और विजन यह कि भारत किसी दूसरे देश से कोई सिंगल डेवलपमेंट मॉडल इंपोर्ट नहीं करेगा। हम भारत के विकास के लिए भारतीय अप्रोच को लेकर ही चलेंगे। इस नीति ने भारत को अपने हिसाब से, अपनी रिक्वायरमेंट के हिसाब से, अपने हित में फैसले लेने का आत्मविश्वास दिया और यह एक बड़ा कारण है कि डिसरप्शन के दशक में भी भारत की इकोनॉमी कमजोर नहीं पड़ी, निरंतर मजबूत होती गई।

साथियों,

आज 21वीं सदी के इस दशक में भारत Reform Express पर सवार है और इस Reform Express की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हम इसे compulsion में नहीं, बल्कि conviction के साथ, Reform के कमिटमेंट के साथ गति दे रहे हैं। यहां तो बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में बड़े-बड़े expert बैठे हैं, अर्थजगत के दिग्गज बैठे हैं। आपने भी 2014 से पहले का दौर देखा है। जब तक हालात मजबूर न कर दें, जब तक कोई संकट न आ जाए, जब कोई और रास्ता न बचे, तब मजबूरन रिफॉर्म्स किए जाते थे। आप याद करिए, 1991 का रिफॉर्म्स भी तब हुआ, जब देश पर दिवालिया होने का खतरा आ गया था। जब देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। पहले की सरकारों का यही तरीका था, वो reforms compulsion में ही किया करती थीं। जब 26/11 का आतंकी हमला हुआ, कांग्रेस सरकार की कलई खुल गई, तो NIA का गठन किया गया। जब पावर सेक्टर बर्बाद हो गया, ग्रिड फेल होने लगे, तब मजबूरी में कांग्रेस को पावर सेक्टर में याद आई।

साथियों,

ऐसी एक लंबी सूची है, जो याद दिलाती है कि जब compulsion में, मजबूरी में reform होता है, तो न सही नतीजे मिलते हैं, न देश को सही परिणाम मिलते हैं।

साथियों,

आज मुझे गर्व है कि बीते 11 वर्षों में हमने पूरे conviction के साथ रिफॉर्म किए हैं और यह रिफॉर्म Policy में हुए हैं, Process में हुए, Delivery में हुए और इतना ही नहीं, Mindset में भी reform हुआ है। क्योंकि साथियों, अगर पॉलिसी बदले, लेकिन प्रोसेस वही रहे, माइंडसेट वही रहे, डिलीवरी ठीक से ना हो, तो रिफॉर्म्स सिर्फ और सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। इसलिए हमने पूरे सिस्टम को बदलने के लिए ईमानदारी से कोशिश की है।

साथियों,

मैं प्रोसेस की बात करूं, तो एक साधारण लेकिन बहुत जरूरी प्रोसेस है, कैबिनेट नोट्स का। यहां कई लोगों को अंदाजा होगा कि पहले की सरकारों में एक कैबिनेट नोट बनने में ही कुछ महीने लग जाते थे, महीने। अब इस स्पीड से देश का विकास कैसे होता? इसलिए हमने इस process को बदला। हमने डिसीजन मेकिंग को time-bound और technology-driven बनाया। हमने यह तय कर दिया कि इस अफसर की टेबल पर यह कैबिनेट नोट इतने घंटे से ज्यादा रहेगा ही नहीं। या तो रिजेक्ट करो या निर्णय लो और इसका नतीजा आज देश देख रहा है।

साथियों,

मैं आपको रेलवे ओवर ब्रिज के अप्रूवल का भी उदाहरण दूंगा। पहले R.O.B का एक डिजाइन अप्रूव कराने के लिए कई वर्ष लग जाते थे, कई सारी क्लीयरेंस की ज़रूरत थीं, कई जगह चिट्ठियां लिखनी पड़ती थीं और यह मैं प्राइवेट के लिए नहीं कह रहा हूं, सरकार को। हमने इसको भी बदला और आज देखिए कितनी तेजी से रोड और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। विनीत जी ने बहुत विस्तार से इस बात को बताया।

साथियों,

एक बड़ा Interesting उदाहरण बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का है। अब बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर देश की security से जुड़ा हुआ होता है। आप कल्पना कर सकते हैं, एक समय था, जब बॉर्डर एरियाज़ में एक साधारण सी सड़क बनाने के लिए भी कुछ परमिशन दिल्ली से लेनी पड़ती थी। जिला स्तर पर निर्णय लेने के यानी इसके सामने एक प्रकार से उसका कोई अधिकारी ही नहीं थे, दीवार ही दीवार थीं, वो निर्णय नहीं कर सकता था और इसलिए तो दशकों बाद भी हमारे देश में बॉर्डर इंफ्रा इतना बेहाल रहा। 2014 के बाद हमने इस प्रोसेस में भी रिफॉर्म किया, हमने स्थानीय प्रशासन को Empower किया और आज हम देश के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से डेवलप होते देख रहे हैं।

साथियों,

बीते दशक में भारत के जिस Reform ने दुनिया में हलचल मचा दी है, वो है UPI, भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम। यह सिर्फ एक App नहीं है, यह policy, process और delivery के एक शानदार कन्वर्जेंस का प्रमाण है। जो लोग कभी बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़े बेनिफिट्स के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, UPI देश के ऐसे नागरिकों को सर्व कर रहा है। यह जो डिजिटल इंडिया है, डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जनधन आधार मोबाइल की ट्रिनिटी है, यह रिफॉर्म किसी compulsion से नहीं हुआ, यह हमारा कन्विक्शन था। और कन्विक्शन यह था कि जिन लोगों तक पहले की सरकारें कभी नहीं पहुंची, हमें ऐसे नागरिकों का इंक्लूजन करना है। जिसे कोई नहीं पूछता, उसे मोदी पूजता है। और इसलिए यह रिफॉर्म्स किए गए हैं और आज भी हमारी सरकार इसी सोच के साथ चल रही है।

साथियों,

भारत का यह जो नया मिज़ाज है, वो हमारे बजट में भी रिफ्लेक्ट होता है। पहले जब बजट की चर्चा होती थी, तो फोकस सिर्फ Outlay पर होता था। कितना पैसा आवंटित हुआ, क्या सस्ता हुआ, क्या महंगा हुआ और उस दिन टीवी देखेंगे, तो पूरी टीवी एक ही यानी इनके लिए, बजट मतलब इंकम टैक्‍स ऊपर गया कि नीचे गया, इसके आगे उनको देश दिखता ही नहीं है। और होता क्‍या था, कितनी नई ट्रेनें घोषित हुईं, यही चलता रहता था, उन घोषणाओं का बाद में क्या हुआ, कोई पूछने वाला ही नहीं था। और इसलिए हमने बजट को Outlay के साथ-साथ Outcome सेंट्रिक बनाया।

साथियों,

बजट में एक और बड़ा बदलाव आया है। 2014 से पहले Off-Budget Borrowing पर बहुत अधिक चर्चा होती थी। लेकिन अब Off-Budget Reforms की चर्चा होती है। बजट से बाहर, नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म्स हुए, प्लानिंग कमीशन की जगह नीति आयोग बनाया, आर्टिकल 370 की दीवार गिरा दी, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया, नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया।

साथियों,

बजट में घोषित हों, या बजट से बाहर, रिफॉर्म एक्सप्रेस लगातार गति पकड़ रही है। अगर मैं पिछले एक साल की ही बात करूं तो हमने Ports & Maritime सेक्टर में Reform किया, शिप बिल्डिंग इंडस्ट्री के लिए अनेक Initiative लिए, जन-विश्वास एक्ट के तहत रिफॉर्म्स को और आगे बढ़ाया, Energy Security के लिए Shanti Act बनाया, लेबर कानूनों से जुड़े रिफॉर्म्स को लागू किया, भारतीय न्याय संहिता लेकर आए, वक्फ कानून में Reform किया गया है, गांव में रोजगार के लिए नया G RAM G कानून बनाया, ऐसे अनेक Reforms साल भर होते रहे हैं।

साथियों,

इस साल के बजट ने रिफॉर्म एक्सप्रेस को और आगे बढ़ाया है। वैसे तो बजट के बहुत सारे आयाम हैं, लेकिन मैं दो Important फैक्टर्स की बात करूंगा। Capex और Technology, बीते वर्षों की भांति इस बजट में भी, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को बढ़ाकर करीब 17 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। और आप जानते हैं कि कैपेक्स का मल्टीप्लायर effect कितना बड़ा होता है। इससे देश की कैपेसिटी और प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। अनेकों सेक्टर्स में बहुत बड़ी संख्या में जॉब क्रिएशन भी होती है। पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप का निर्माण, देश के टीयर-2, टीयर-3 शहरों के लिए सिटी इकोनॉमिक रीजन्स का निर्माण और सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, ऐसे बजट अनाउंसमेंट्स, सही मायने में युवाओं पर, देश के फ्यूचर पर, यह इन्वेस्टमेंट हैं।

साथियों,

बीते दशक में हमने टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को ग्रोथ का कोर ड्राइवर माना है। इसी सोच के साथ, देश में स्टार्टअप कल्चर, हैकाथॉन कल्चर, उसको हमने प्रमोट किया। आज देश में, दो लाख से अधिक स्टार्टअप, रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स हैं और यह डायवर्स सेक्टर्स में काम कर रहे हैं। हमने युवाओं को प्रोत्साहित किया, देश में रिस्क टेकिंग कल्चर को पुरस्कृत करने का भाव जगाया और परिणाम हमारे सामने है। इस साल का बजट, हमारी इसी प्राथमिकता को और मजबूत करता है। विशेष तौर पर बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर और AI जैसे सेक्टर के लिए, इस बजट में महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं।

साथियों,

आज जब देश की आर्थिक ताकत बढ़ी है, तो हम राज्यों को भी उतना ही ज्यादा सशक्त कर रहे हैं। मैं एक और आंकड़ा आपको देना चाहता हूं। 2004 से 2014, 10 साल, इस दरमियान राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के तौर पर 18 लाख करोड़ रुपए के आसपास ही मिले थे, 2004 से 2014 तक। जबकि 2014 से लेकर 2025 तक, राज्यों को 84 लाख करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। अगर मैं इस साल बजट में प्रस्तावित लगभग 14 लाख करोड़ का आंकड़ा और जोड़ दूं, तो हमारी सरकार में राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के करीब-करीब 100 लाख करोड़ रुपए मिलने तय हुए हैं। यह राशि केंद्र सरकार की तरफ से अलग-अलग राज्य सरकारों को मिली है, ताकि वो अपने यहां विकास के कार्यों को आगे बढ़ा सकें।

साथियों,

आजकल आप लोग भारत के FTA’s यानि फ्री ट्रेड डील्स पर काफी चर्चा कर रहे हैं और मैं यहां enter हुआ, वहीं से शुरू हो गए लोग। दुनियाभर में इसका एनालिसिस हो रहा है। लेकिन मैं आज इसका एक और इंटरेस्टिंग एंगल आपको बताता हूं, मीडिया को जो चाहिए, वो तो इसमें नहीं होगा शायद, लेकिन हो सकता है कि कुछ काम में आ जाए। और मैं पक्का मानता हूं, जो बात मैं कहने जा रहा हूं, आपने भी इसके बारे में विचार नहीं किया होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि आज इतने सारे विकसित देशों के साथ फ्री-फ्री ट्रेड डील्स हो रहे हैं, क्या यही काम 2014 से पहले क्यों नहीं हो पाए? देश वही, युवा शक्ति वही, सरकारी सिस्टम वही, तो बदला क्या? बदलाव, सरकार के विजन में आया है, नीति और नीयत में बदलाव आया है, भारत के सामर्थ्य में बदलाव आया है।

साथियों,

आप ज़रा सोचिए, फ्रेजाइल फाइव इकोनॉमी जब थी, तब कौन हमारे साथ डील करता? गांव में भी गरीब की बेटी को कोई रईस के परिवार वाला शादी करता है क्या? वो उसको छोटा मानता है, हमारा भी यही हाल था भाई दुनिया में। जब देश पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा था, चारों तरफ घोटाले और घपले थे, तब कौन भारत पर भरोसा कर पाता? 2014 से पहले भारत में मैन्युफैक्चरिंग का बेस बहुत कमजोर था और जिसके कारण, पहले की सरकारें भी डरती थी, एक तो कोई आता नहीं था और जरा सा भी कोई कोशिश करें, तो यह लोग भी डरते थे और डर यह था कि अगर विकसित देशों के साथ डील हो गई, तो वो हमारे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, वो यहां अपने प्रोडक्ट डंप करने लगेंगे, हताशा-निराशा के उस माहौल में 2014 से पहले यूपीए सरकार सिर्फ चार देशों के साथ ही कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट कर पाई थी। जबकि, बीते दशक में भारत ने जो ट्रेड डील्स की हैं, उनमें दुनिया के 38 कंट्री कवर होते हैं, 38 कंट्री। और यह दुनिया के अलग-अलग रीजन्स में हैं। आज हम इसलिए दुनिया के साथ ट्रेड डील्स कर रहे हैं क्योंकि आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है। आज का भारत, दुनिया के साथ कंपीट करने के लिए तैयार है। बीते 11 वर्षों में भारत ने मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम देश में विकसित किया है। इसलिए, आज भारत समर्थ है, सशक्त है और इसलिए दुनिया भी हम पर भरोसा करती है। यही बदलाव हमारी Trade Policy में आए Paradigm Shift का आधार बने और यही Paradigm Shift विकसित भारत की हमारी यात्रा का अनिवार्य स्तंभ बना है।

साथियों,

आज हमारी सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ देश के हर नागरिक को विकास में सहभागी बनाते हुए कार्य कर रही है। जो विकास की दौड़ में पीछे छूट गया, हम उसके विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। पहले की सरकारों ने दिव्यांग जनों के लिए सिर्फ घोषणाएं कीं, हम भी उसी रास्ते को जारी रख सकते थे, लेकिन ये सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है। आप में से शायद जो बातें मैं बता रहा हूं, आप जिस लेवल के लोग हैं, शायद उसमें फिट नहीं बैठती होगी। हमारे दिव्यांग जनों के लिए जैसे हमारे यहां Language में बिखराव है ना, Sign Language का भी वही हाल था जी। तमिलनाडु में जाओ तो एक Sign Language, उत्तर प्रदेश में जाओ तो दूसरी, गुजरात में जाओ तो तीसरी, असम में जाओ तो चौथी, अगर यहां का दिव्‍यांग असम गया, तो बेचारा समझ ही नहीं पाता था। अब यह कोई बड़ा काम तो नहीं था। अगर संवेदनशील सरकार होती है ना, तो उसको यह काम छोटा नहीं लगता है। और देश ने पहली बार Indian Sign Language को institutionalise किया, common किया, व्यवस्था बनाई है। ऐसे ही, देश की Transgender community कब से अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी। हमने उनके लिए भी कानून बनाकर उन्हें सम्मान से जीने का कवच दिया है। बीते दशक में ही देश की करोड़ों बहनों को तीन-तलाक की कुरीति से मुक्ति मिली, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण पक्का हुआ।

साथियों,

आज सरकारी मशीनरी की सोच भी बदली है, उसमें संवेदनशीलता आई है। सोच का अंतर क्या होता है, यह हम जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज देने वाली स्कीम में भी देखते हैं। विपक्ष के कुछ लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं और कुछ अखबारों में जरा छपता भी ज्यादा है। कोई मजाक उड़ाता है कि जब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल ही गए हैं, तो उनको मुफ्त राशन क्यों मिलता है? अजीबोगरीब सवाल है। अगर आप बीमार हैं, अस्पताल में गए और अस्पताल से आपको छुट्टी मिली, तो भी डॉक्टर कहता है कि सात दिन तक यह-यह संभालना, पंद्रह दिन तक यह-यह संभालना, कहता है कि नहीं कहता है? गरीबी से बाहर निकले हैं, लेकिन यह सवाल पूछ रहे हैं कि निकले हैं, तो फिर अनाज क्यों देते हो? ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग, यह नहीं सोचते कि सिर्फ गरीबी से बाहर निकालना काफी नहीं होता, बल्कि जो व्यक्ति नियो मिडिल क्लास में आया है, वो फिर गरीबी के चंगुल में न फंस जाए, यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है। इसलिए उसे आज अनाज मुफ्त की सुविधा मिल रही है, यह आवश्यक है। बीते वर्षों में केंद्र सरकार ने इस योजना पर लाखों करोड़ रुपए खर्च किए हैं, इससे गरीब और नियो मिडिल क्लास को बहुत बड़ा संबल मिला है।

साथियों,

सोच का एक और फर्क हम अपने आसपास भी देखते हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि ये मोदी 2047 की बात क्यों करता है? 2047 में विकसित भारत बनेगा, नहीं बनेगा, किसने देखा? हम रहें या ना रहें, उससे हमारा लेना देना क्या है? अब देखिए, यह सोच है और यह बड़े-बड़े लोगों की सोच है, यह कोई मैं अपने शब्द नहीं बता रहा हूं।

साथियों,

जिन लोगों ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, लाठियां खाईं, कालापानी की सज़ाएं पड़ी, फांसी के तख्त पर चढ़ गए, अगर वो भी यही सोचते कि आजादी पता नहीं कब मिले, हम क्यों आज आजादी के लिए लाठी खाएं, तो सोचिए, क्या उस सोच के साथ देश कभी आजाद हो पाता क्या? जब राष्ट्र प्रथम का भाव हो, जब देश हित सर्वोपरि हो, तो हर निर्णय देश के लिए होता है, हर नीति देश के लिए बनती है। हमारी सोच स्पष्ट है, विजन साफ है, हमें देश को विकसित बनाने के लिए निरंतर काम करना है। 2047 तक हम रहें न रहें, लेकिन यह देश रहेगा, इस देश की संतानें रहेंगी। इसलिए हमें और इसलिए हमें अपना आज खपाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का कल सुरक्षित रहे, उज्ज्वल रहे। मैं आज अपनी आज बो रहा हूं क्योंकि कल की पीढ़ी को फल खाने को मौका मिले।

साथियों,

दुनिया को अब डिसरप्शन के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा। समय के साथ इनके नेचर में बदलाव आएगा, लेकिन यह तय है कि अब व्यवस्थाएं बहुत तेजी से बदलेंगी। AI से जो Disruption हो रहे हैं, वो तो आप देख ही रहे हैं। आने वाले समय में AI और भी क्रांतिकारी बदलाव लेकर आने वाली है, भारत इसके लिए भी तैयार है। कुछ ही दिनों में भारत में ग्लोबल AI इम्पैक्ट समिट होने जा रही है। दुनिया के अनेक देश, दुनियाभर के टेक लीडर्स, इस समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रहे हैं। सभी के साथ मिलकर, हम एक बेहतर विश्व बनाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। इसी भरोसे के साथ, एक बार फिर इस Summit के लिए आप सभी को बहुत सारी मेरी शुभकामनाएं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!