प्रधानमंत्री ने कहा - साहस और सत्य के साथ खड़े रहने की भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के समय में थी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज 'हिंद दी चादर' श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 350वें शहादत समागम को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आज हम सभी इस महत्वपूर्ण जयंती पर महान गुरु को याद कर रहे हैं। श्री मोदी ने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक तथा पवित्र आयोजन का हिस्सा बनना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत का इतिहास वीरता, सद्भाव और सहयोग से परिभाषित है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की धरती पर आयोजित इस आयोजन के माध्यम से हम उसी विरासत को देख रहे हैं। श्री मोदी ने कहा कि जिस युग में गुरुओं ने बलिदान की पराकाष्ठा को छुआ, उस दौरान सामाजिक एकता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि समाज के हर वर्ग के लोगों ने उनसे प्रेरणा लेकर सत्य और संस्कृति के प्रति अडिग रहने का संकल्प लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "श्री गुरु गोविंद सिंह जी की 'गुरु नानक नाम-लेवा संगत' जैसी परंपराओं ने सामाजिक एकता के उस महान यज्ञ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।"

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकता के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि आज जब देश को एक बार फिर सामाजिक एकता की सबसे अधिक आवश्यकता है, तब संगत का यह अद्भुत जमावड़ा देश को आश्वस्त करता है कि गुरुओं और संतों का आशीर्वाद हमारे साथ है।

प्रधानमंत्री ने समागम को एक सतत यात्रा बताया जो पिछले वर्ष नागपुर में शुरू हुई और नांदेड़ के ऐतिहासिक तख्त श्री हजूर साहिब की भूमि पर आगे बढ़ी। श्री मोदी ने जोर देते हुए कहा, “नवी मुंबई में, इस यात्रा ने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है, जिससे श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का इतिहास महाराष्ट्र के हर कोने तक, हजारों गांवों और बस्तियों तक पहुंच गया है।” प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए महाराष्ट्र सरकार को विशेष रूप से बधाई दी।

प्रधानमंत्री ने हाल के समारोहों को याद करते हुए हरियाणा के कुरुक्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने के अपने सौभाग्य का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार गुरु साहिबों से संबंधित हर ऐतिहासिक अवसर को राष्ट्रीय स्तर पर मना रही है। श्री मोदी ने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 400वें प्रकाश पर्व (जिसके उपलक्ष्य में एक स्मारक डाक टिकट और विशेष सिक्का जारी किया गया) और गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व जैसे महत्वपूर्ण अवसरों का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रत्येक अवसर को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उन्होंने साहिबजादों के सम्मान में प्रतिवर्ष ‘वीर बाल दिवस’ मनाने की नई राष्ट्रीय परंपरा पर भी प्रकाश डाला। प्रधानमंत्री ने रिकॉर्ड समय में 'करतारपुर साहिब कॉरिडोर' के पूरा होने और 'श्री हेमकुंड साहिब यात्रा' के लिए नई सुविधाओं के निर्माण सहित प्रमुख उपलब्धियों का उल्लेख किया। श्री मोदी ने कहा, "सरकार ने सिख संस्थाओं और गुरुद्वारों से जुड़े संगठनों को एफसीआरए के तहत राहत प्रदान की है, साथ ही यह सुनिश्चित किया है कि सिख इतिहास को स्कूली पाठ्यक्रम और सांस्कृतिक चर्चा में उचित स्थान मिले, जिससे समुदाय के दशकों से प्रतीक्षित कार्य पूरे हुए हैं।"

प्रधानमंत्री ने सम्मान और न्याय के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए वर्ष 1984 के दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच समिति (एसआईटी) और बंद पड़े मामलों को फिर से खोलने का जिक्र किया, जिसके परिणामस्वरूप दोषियों को सजा मिली। उन्होंने 1984 के पीड़ितों के परिवारों के लिए घोषित अतिरिक्त मुआवजे और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को दी गई अधिक सक्रिय भूमिका के बारे में भी बात की।

प्रधानमंत्री ने अफगानिस्तान में सिख भाइयों की सुरक्षा और गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों की सम्मानजनक वापसी के संबंध में सरकार के "मिशन मोड" में कार्य करने के बारे में बताया। श्री मोदी ने कहा, "सरकार ने अफगान सिखों और हिंदुओं के लिए नागरिकता का मार्ग प्रशस्त किया, सीएए के माध्यम से सताए गए शरणार्थियों को राहत प्रदान की और जम्मू-कश्मीर में सिख परिवारों के लिए पुनर्वास पैकेज लागू किए।" प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ओसीआई और वीजा नियमों को सरल बनाया गया और विदेशों में रहने वाले सिखों की यात्रा को आसान बनाने के लिए हजारों नामों को ब्लैकलिस्ट से हटाया गया।

प्रधानमंत्री ने कहा, “सिख समुदाय की आस्था का सम्मान करना और उनकी प्रगति के लिए नए अवसर सृजित करना सरकार का दायित्व और सेवा का विशेषाधिकार दोनों है।”

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के समापन में कहा कि साहस और सत्य के साथ खड़े रहने की भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अतीत में थी। श्री मोदी ने जोर देते हुए कहा, “जब नई पीढ़ी इन मूल्यों से जुड़ती है, तो परंपरा केवल एक स्मृति बनकर न रहकर भविष्य का मार्ग बन जाती है।” प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा, “समागम का उद्देश्य केवल इतिहास को याद रखना नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण में आत्मसात करना है।”

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