Excellencies,


आज हमने राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को सुना। कल मेरी उनसे मुलाकात भी हुई थी।मैं वर्तमान परिस्थिति को राजनीति या अर्थव्यवस्था का मुद्दा नहीं मानता।मेरा मानना है कि यह मानवता का मुद्दा है, मानवीय मूल्यों का मुद्दा है।हमने शुरू से कहा है, कि डायलॉग और डिप्लोमेसी ही एकमात्र रास्ता है।और इस परिस्थिति के समाधान के लिए, भारत से जो कुछ भी बन पड़ेगा, हम यथासंभव प्रयास करेंगे।

Excellencies,

वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि हम सब का साझा उद्देश्य है।आज के inter-connected world में, किसी भी एक क्षेत्र में तनाव सभी देशों को प्रभावित करता है।और, विकासशील देश, जिनके पास limited resources हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।वर्तमान वैश्विक स्थिति के चलते, food, fuel और fertiliser crisis का अधिकतम और सबसे गहरा प्रभाव इन्हीं देशों को भुगतना पड़ रहा है।

Excellencies,

यह सोचने की बात है, कि भला हमें शांति और स्थिरता की बातें अलग-अलग फोरम में क्यों करनी पड़ रही हैं?UN जिसकी शुरुआत ही शांति स्थापित करने की कल्पना से की गयी थी, भला आज conflicts को रोकने में सफल क्यों नहीं होता?आखिर क्यों, UN में आतंकवाद की परिभाषा तक मान्य नहीं हो पाई है?अगर आत्मचिंतन किया जाये, तो एक बात साफ़ है।पिछली सदी में बनाये गए institutions, इक्कीसवीं सदी की व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं। वर्तमान की realities को रिफ्लेक्ट नहीं करते।इसलिए जरूरी है, कि UN जैसे बड़े institutions में रिफॉर्म्स को मूर्त रूप दिया जाये।इनको ग्लोबल साउथ की आवाज भी बनना होगा। वरना हम संघर्षो को ख़त्म करने पर सिर्फ चर्चा ही करते रह जाएंगे।UN और Security Council मात्र एक टॉक शॉप बन कर रह जायेंगे।

Excellencies,

यह जरूरी है, कि सभी देश UN Charter, अंतर्राष्ट्रीय कानून और सभी देशों की सोवरनटी और टेरीटोरियल इंटेग्रिटी का सम्मान करें।यथास्थिति को बदलने की एकतरफा कोशिशों के खिलाफ मिलकर आवाज उठायें।भारत का हमेशा यह मत रहा है कि किसी भी तनाव, किसी भी विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से, बातचीत के ज़रिये, किया जाना चाहिए।और अगर कानून से कोई हल निकलता है, तो उसको मानना चाहिए।और इसी भावना से भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने लैंड और मेरीटाइम बाउंड्री विवाद का हल किया था।

Excellencies,

भारत में, और यहाँ जापान में भी, हजारों वर्षों से भगवान बुद्ध को follow किया जाता है।आधुनिक युग में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान हम बुद्ध की शिक्षाओं में न खोज पाएं। दुनिया आज जिस युद्ध, अशांति और अस्थिरता को झेल रही है, उसका समाधान बुद्ध ने सदियों पहले ही दे दिया था।

भगवान बुद्ध ने कहा है:

नहि वेरेन् वेरानी,
सम्मन तीध उदासन्,
अवेरेन च सम्मन्ति,
एस धम्मो सन्नतन।

यानी, शत्रुता से शत्रुता शांत नहीं होती। अपनत्व से शत्रुता शांत होती है।

इसी भाव से हमें सबके साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए।

धन्यवाद।

 

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प्रधानमंत्री ने भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को उजागर करते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
May 08, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि राष्ट्र की गरिमा और सम्मान की रक्षा में भारतीय सशस्त्र बलों के साहस और शौर्य से प्रत्येक नागरिक गौरवान्वित है। उन्होंने कहा कि भारत माता के लिए सब कुछ बलिदान करने का उनका जज्बा सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

प्रधानमंत्री ने संस्कृत का एक श्लोक साझा किया-

"स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकंपितुमर्हसि |

धर्म्याधि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियौ न विद्यते ||"

इस श्लोक में यह बताया गया है कि जब व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति सजग हो जाता है, तो उसके मन में किसी भी प्रकार की झिझक या भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि न्याय की वेदी पर धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए किया गया संघर्ष एक योद्धा के लिए आत्म-कल्याण का सबसे उत्कृष्ट और गौरवशाली मार्ग है।