प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किंग चार्ल्स तृतीय से उनके ग्रीष्मकालीन निवास सैंड्रिंघम एस्टेट में भेंट की।

प्रधानमंत्री ने किंग चार्ल्स के स्वास्थ्य में सुधार और उनके शाही कर्तव्यों के प्रति अपना कार्यभार पुनः संभालने पर प्रसन्नता व्यक्त की। प्रधानमंत्री और किंग चार्ल्स ने आयुर्वेद और योग सहित स्वास्थ्य और सतत जीवन से जुड़े मुद्दों और विश्वभर के लोगों तक इनके लाभों को पहुंचाने के तरीकों पर चर्चा की।

दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर से आपसी साझेदारी को नई गति मिलेगी। प्रधानमंत्री ने किंग चार्ल्स को सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में भारत द्वारा की गई प्रगति से अवगत कराया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और स्थिरता के संबंध में अपने साझा दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और सहयोग करने के तरीकों पर भी चर्चा की।

प्रधानमंत्री और किंग चार्ल्स ने ब्रिटेन और भारत के राष्ट्रमंडल में संयुक्त रूप से कार्य करने के तौर-तरीकों पर भी विचार-विमर्श किया।

प्रधानमंत्री ने हरित अभियान – ‘एक पेड़ मां के नाम’ में सहभागी बनने के लिए किंग चार्ल्स को धन्यवाद दिया और उन्हें एक पौधा सौंपा जिसे आगामी शरद ऋतु के दौरान सैंड्रिंघम एस्टेट में लगाया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने किंग चार्ल्स को उनके आतिथ्य के लिए धन्यवाद देते हुए उन्हें भारत की राजकीय यात्रा पर आने का निमंत्रण भी दिया।

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प्रधानमंत्री ने पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित करने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
March 10, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने संस्कृत में रचित सुभाषितम् को साझा किया, जिसमें पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है।

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”

सुभाषितम् का अर्थ है कि पृथ्वी, जो महासागरों के रूप में जल से परिपूर्ण है और बाहरी रूप से जल से घिरी है, जिसे विद्वानों ने अपने ज्ञान से जाना है और जिसका हृदय विशाल आकाश में शाश्वत सत्य से ओत-प्रोत है - वह पृथ्वी एक महान राष्ट्र के रूप में हमारी ऊर्जा और शक्ति को बनाए रखे।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर अपनी पोस्‍ट में लिखा;

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”