प्रधानमंत्री ली केकियांग

सीपीएएफएफसी की अध्‍यक्ष मैडम ली शाओलिन

माननीय मुख्‍यमंत्री, गवर्नर और मेयर,

भारत और चीन के संबंधों में यह ऐतिहासिक क्षण है।

आज, हम दोनों देशों के बीच जारी सहयोग को और आगे बढ़ाने के लिए एक नये माध्‍यम की शुरुआत कर रहे हैं।

आने वाले समय में, यह हमारी आर्थिक भागीदारी और हमारी जनता के बीच संपर्क बढ़ाने का एक सबसे महत्‍वपूर्ण साधन साबित होगा।

तेरह वर्षों तक मुख्‍यमंत्री पद और एक वर्ष से प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने के नाते इस मंच की मेरे दिल में खास जगह है।

लेकिन, इस नयी संस्‍था को इतना ज्‍यादा महत्‍व देने की वजह केवल मेरी भावनाएं ही नहीं हैं।

अपने अनुभवों की बदौलत मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि राष्‍ट्र के विकास में राज्‍य महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह बात भौगोलिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्‍तर पर अत्‍यधिक विविधताओं सहित विशाल और घनी आबादी वाले देशों के मामले में विशेष रूप से सत्‍य है।

जब संवैधानिक एवं राजनीतिक प्रणालियों का ढांचा संघीय हो, तो यह बात और भी ज्‍यादा प्रासांगिक हो जाती है, ।

दुनिया के सबसे ज्‍यादा घनी आबादी वाले देशों भारत और चीन दोनों में ये गुण विद्यमान हैं।

भारत के संविधान में, राज्‍य सरकारों की आर्थिक एवं सामाजिक विकास में प्रमुख भूमिका है।

केंद्र सरकार समग्र आर्थिक माहौल तैयार करती है। वह राष्‍ट्र के लिए व्‍यापक सामाजिक एवं आर्थिक कार्यसूची एवं दिशाएं तय कर सकती है।

वह विकास संबंधी नीतियां और योजनाएं शुरू कर सकती है। वह संसाधनों का प्रबंधन कर सकती है।

लेकिन, आखिरकार, उनके कार्यान्‍वयन में राज्‍य सरकारों को अहम भूमिका निभानी होती है।

लेकिन, जैसा मैंने अपने अनुभव से देखा है, राज्‍य सरकारें राज्‍यों के विकास के लिए अनेक तरह की पहल कर सकती हैं।

हमारे संविधान के अंतर्गत वे इस स्‍तर की स्‍वायत्‍तता एवं उत्‍तरदायित्‍व का लाभ उठाती हैं।

समान राष्‍ट्रीय माहौल में, राज्‍य अलग-अलग स्‍तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

कारोबारी निवेशकों के लिए भी, चाहे वे भारतीय हों या विदेशी, उनका सफर भले ही दिल्‍ली से शुरू हो, लेकिन उनकी कामयाबी आखिरकार राज्‍यों की राजधानियों पर निर्भर करती है। 

सफलता की बहुत सी महत्‍वपूर्ण जरूरतों में- बुनियादी ढांचा, जमीन, सुवि‍धाएं, कुशल मानव संसाधन और बहुत सी मंजूरियां शामिल हैं-जो अंत में राज्‍य सरकारों पर निर्भर करती हैं।

लेकिन, मेरे लिए, हमारे राष्‍ट्रीय प्रयास में राज्‍यों की भागीदारी सिर्फ उनके संवैधानिक और कानूनी उत्‍तरदायित्‍वों की वजह से नहीं है।

यह भी बुनियादी प्रबंधन सिद्धांत से उपजी है। जब हम सभी में भागीदारी की भावना उत्‍पन्‍न करते हैं, जब हम सबको सफलता में हिस्‍सा देते हैं, तो सफलता की सम्‍भावना बढ़ जाती है।

इसलिए मैं टीम इंडिया की बात करता हूं। इसलिए मेरा यकीन है कि भारत के विकास का आधार केंद्र सरकार का अकेला स्‍तम्‍भ नहीं होगा, बल्कि केंद्र सरकार और हमारे सभी राज्‍यों की सरकारों के 30 स्तम्‍भ होंगे।

यह विज्ञान के साधारण नियम का अनुसरण करता है कि यह बुनियाद मजबूत और ज्‍यादा स्थिर होगी। यह विकास के काफी बड़े ढांचे को सहारा दे सकती है।

इसलिए मैं सहकारी संघवाद की बात करता हूं, जहां केंद्र और राज्‍य भागीदार हों। मैं सहकारी और प्रतिस्‍पर्धात्मक संघवाद की बात भी करता हूं, जिसमें राज्‍य निवेश और नौ‍करियां आकृष्‍ट करने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्‍पर्धा करते हैं।

इस विजन को आकार देने के लिए हमने पिछले वर्ष तेजी से कार्य किया ।

जब हमने पुराने योजना आयोग को नीति आयोग नामक संस्‍था से बदला, तो हमने भारत में पहली बार इस तरह की संस्‍था में राज्‍य सरकारों को औपचारिक स्‍थान और भूमिका प्रदान की।

हमने केंद्र सरकार द्वारा राज्‍य सरकारों को दिये जाने वाले संसाधनों की मात्रा में आवश्‍यक बढ़ोतरी की है।

और, जब हमने अपने कोयले की नीलामी से ज्‍यादा राजस्‍व कमाना शुरू किया, तो हम उन राज्‍यों का खजाना भी भरा, जिनमें कोयले की खानें स्थित हैं।

मैं अपने मंत्रालयों से कह रहा हूं कि वे सम्‍मेलनों को दिल्‍ली से राज्‍यों की राजधानियों और अन्‍य शहरों में ले जाएं, ताकि उन्‍हें भी ऐसे आयोजनों का लाभ मिल सके।

हम सबसे बढ़कर राज्‍य सरकारों के साथ भागीदारी की भावना से और उनकी चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता से कार्य कर रहे हैं।

और, ऐसा करते हुए, हम किसी राज्‍य में सत्‍ता पर आसीन राजनीतिक पार्टी के चिन्‍ह की ओर नहीं देख रहे हैं।

इसलिए, जब मैंने राज्‍य सरकारों को इस आयोजन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, तो मैंने चीन के साथ उन राज्‍यों के संपर्क के बारे में तो  विचार किया ही, लेकिन उनके व्‍यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्‍व के बारे में भी विचार किया।

प्रत्‍येक राष्‍ट्र को प्रगति के लिए सशक्‍त अंतर्राष्‍ट्रीय भागीदारी की आवश्यकता होती है। एकीकृत विश्‍व में सम्‍पर्क बढ़ गये हैं।

व्‍यापार, निवेश, नवाचार,तकनीक, पर्यटन, शिक्षा, कौशल और स्‍वास्‍थ्‍य जैसे क्षेत्रों में अंतर्राष्‍ट्रीय भागीदारी बढ़ने के साथ ही , राज्‍य सरकारों का उनमें हित बढ़ गया है और उनकी कामयाबी में उत्‍तरदायित्‍व भी बढ़ गया है।

मैंने बाहर जाने वाले और भीतर आने वाले, दोनों तरह के राज्‍य प्रतिनिधिमंडलों से जाना है कि राज्‍य स्‍तरीय सम्‍पर्क अक्‍सर ज्‍यादा केंद्रित और उपयोगी होते हैं।

राज्‍य सरकारों द्वारा अनेक निर्णय जल्‍द लिये जा सकते हैं।

ये सम्पर्क राज्‍य सरकारों को और ज्‍यादा संवेदनशील और अंतर्राष्‍ट्रीय गतिविधियों और जरूरतों के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील और सजग बनाते हैं।

इसलिए मैं इस मंच को और बहुत महत्‍व प्रदान करता हूं।

भारत ने पहली बार किसी देश के साथ ऐसा मंच बनाया है।

और यह बहुत उचित है कि यह शुरुआत चीन के साथ की गई है।

हम दुनिया की दो बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाएं हैं साथ ही तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍थाओं में भी शामिल हैं। हमारे बीच वृहद आर्थिक सहयोग है।

हम समान चुनौतियों का सामना भी करते हैं। हमारे कुछ अनुभव भी समान हैं।

हम दोनों ने अपने देशों के विभिन्‍न हिस्‍सों में विकास की अलग-अलग गति देखी है।

हमारे आर्थिक संबंध तेजी से बढ़ रहे हैं।

पिछले वर्ष श्री शी की यात्रा के दौरान, हमने अपने आर्थिक संबंधों को नयी ऊंचाइयों तक ले जाने की एक महत्‍वाकांक्षी योजना निर्धारित की।

हमारे बीच सहमति बनी कि चीन महाराष्‍ट्र और गुजरात में दो औद्योगिक पार्क लगायेगा। हमें खुशी है कि दोनों राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री यहां मौजूद हैं। हमारे बीच भारत के रेलवे क्षेत्र के सुधार में सहयोग पर सहमति बनी है।

मैंने चीनी कम्‍पनियों को भारत के विनिर्माण क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित किया है। राष्‍ट्रपति शी ने अगले पांच वर्षों में 20 अरब (बिलियन) डॉलर के चीनी निवेश की बात कही है। कुछ कारोबारी समझौते कल शंघाई में होंगे।

मेरा मानना है कि अगर प्रांतीय और राज्‍य सरकारें निकट सम्‍पर्क में कार्य करें तो हमारे विजन को हकीकत में बदलना बेहद आसान हो जाए।

इससे हमारे अन्‍य हितों की भी पूर्ति होगी – विशेषकर जनता के बीच आपसी सम्‍पर्क को बढ़ावा देने में, जो सभी संबंधों का केंद्र है।  

भारत और चीन के बीच, गुजरात और गुआंगदोंग में पहले से ही संबंध (सिस्‍टर-स्‍टेट रिलेशनशिप्‍स) हैं। हमारे कई शहरों में भी ऐसे ही संबंध (सिस्‍टर-सिटी रिलेशंस)  हैं।

इस यात्रा के दौरान, हम कर्नाटक-सिचुआन संबंध और चार शहरों में सिस्‍टर-सिटी संबंधों की शुरुआत देखेंगे।

यह उस भावना के अनुरूप भी है, जिसकी शुरुआत राष्‍ट्रपति शी की भारत में अहमदाबाद की यात्रा के दौरान हुई थी और मैंने यह शुरुआत शिआन के दौरे से की है।

ये घटनाक्रम स्‍वागतयोग्‍य हैं। हम सही मायनों में अपने संबंधों को अपनी राष्‍ट्रीय राजधानियों की हद से बाहर राज्‍यों की राजधानियों और शहरों तक ले जा रहे हैं।

इसलिए, प्रधानमंत्री ली के साथ इस मंच की शुरुआत करना मेरे लिए बहुत हर्ष का विषय है। हम इसे पूर्ण समर्थन देंगे और मैं इसकी सफलता की कामना करता हूं।

धन्‍यवाद

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इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।

नमस्कार!

नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।

साथियों,

सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।

लेकिन साथियों,

बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।

साथियों,

जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।

साथियों,

दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?

साथियों,

एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।

साथियों,

जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।

साथियों,

अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।

साथियों,

AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।

साथियों,

कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।

साथियों,

मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।

साथियों,

देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।

साथियों,

लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।

साथियों,

कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।

और साथियों,

हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।

साथियों,

राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।

साथियों,

मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।

साथियों,

यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।

साथियों,

21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।