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डॉ. डालिया शिफर, श्री एस. महालिंगम, हमारे वरिष्ठ मंत्री श्री वजुभाई वाला, हमारे मुख्य सचिव श्री जोती, भाइयों और बहनों..!

हम यहां एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार विमर्श करने के लिए इक्कठे हुए हैं - 21वीं सदी में हमारे युवाओं को ज्ञान तथा कौशल के साथ समर्थ बनाना, मेरी नजर में, यह वास्तव में हमारे देश की विकास गाथा के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। मैं यहाँ आप सब के बीच होने पर बहुत खुश हूँ।

भारत की 50% से ज्यादा जनसंख्या 25 वर्ष से कम की है। हम आज औसतन 24 वर्ष की आयु का लाभ ले रहे हैं, जबकि दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा अधिक उम्र की समस्या से जूझ रहा है। मैं भारत के युवाओं को एक बहुत बड़ी ताकत और बेशकीमती संसाधन के रूप में देखता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि भारत अपने टैलेंट पूल को मजबूत करने में सक्षम होता है, तो यहां के युवा एक दशक में, न सिर्फ भारत के लिए लेकिन पूरे विश्व के लिए, विकास का इंजन बन सकते हैं। यदि हम हमारे देश की युवा शक्ति को कुशल कार्यबल में परिवर्तित कर सकते हैं, तो हम पूरे विश्व की कार्यबल की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। युवा शक्ति पर इस दृढ़ विश्वास की तर्ज पर, गुजरात ने काफी समय और संसाधनों को उनके सर्वांगीण विकास को सुविधाजनक बनाने पर खर्च किया है। हमारा मानना है कि शिक्षा तथा कौशल विकास हमारे युवाओं को समर्थ बनाने के लिए सबसे प्रभावशाली साधन हैं। एक समग्र दृष्टिकोण के साथ हम शिक्षा और प्रशिक्षण की पहुंच को बढ़ा रहे हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इसकी गुणवत्ता को भी बढ़ा रहे हैं। और यह सब नए प्रयोगों को बढ़ावा देने तथा मानव संसाधन को विकसित करने की नवीनतम अंतरराष्ट्रीय प्रवृतियों के अनुरूप किया गया है। तथा इसके परिणाम सभी को दिखाई दे रहे हैं। गुजरात रोजगार देने में बेहतरीन तस्वीर प्रस्तुत करता है। भारत सरकार के हाल ही के एक सर्वे के अनुसार गुजरात में बेरोजगारी की दर सबसे कम है। गुजरात ने हार्ड स्किल तथा सॉफ्ट स्किल के विकास में भी बेहतरीन तस्वीर पेश करता है। हमारे बहुत से नवीन प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन कार्यप्रणालियों के रूप में पहचाना जा रहा है।

इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं :

  • हमारे ‘आई-क्रियेट’ की पहल को इसकी नवीनता के कारण सबके द्वारा सराहा जा रहा है।
  • ‘स्कोप’ के माध्यम से, हम गुजरात के युवाओं में अंग्रेजी भाषा में दक्षता का विकास कर रहे हैं।
  • हाल ही में, हमने हमारे युवाओं की आई.टी. तथा इलैक्ट्रोनिक्स के कौशल को विकसित करने के लिए ‘एम्पावर’ का प्रारंभ किया है।
  • इसके अतिरिक्त, सर्वांगीण विकास के लिए अनेक पहल जैसे वांचे गुजरात - वाचन के लिए एक अभियान, खेल महाकुंभ - विभिन्न खेलों को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय अभियान, अभिनव आयोग, विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली, इत्यादि।
विशेष तौर पर कौशल विकास के क्षेत्र में, गुजरात में हमारे युवाओं में आधुनिक तकनीकी तथा व्यवसायिक दक्षता विकसित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।

गुजरात स्किल डेवलपमेंट मिशन तथा गुजरात काउन्सिल ऑफ वोकेशनल ट्रेनिंग का लक्ष्य ही हर एक युवा को रोजगार योग्य बनाना है। हमारे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आई.टी.आई.) इसमें केन्द्रीय भूमिका अदा कर रहे हैं। पिछले एक दशक में आई.टी.आई. की संख्या पाँच गुना बढ़ गई है। हमारे आई.टी.आई. को नई इमारतों, नई मशीनरी तथा अत्याधुनिक बुनियादी सुविधाओं के साथ नवीनीकृत किया गया है। कोर्सेस में सुधार किया गया है तथा उनकी संख्या तथा विविधता को प्रभावशाली तरीके से बढ़ाया गया है। 20 बेहतरीन टेक्नोलॉजी सेन्टर (एस.टी.सी.) शुरू किए गए हैं - जो अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर विशेष प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। यह सभी उद्योगों की जरूरत तथा भविष्य की मानव संसाधन की मांग को ध्यान में रख कर किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर ऑटोमोबाइल सर्विसिंग तथा सोलर टेक्नोलॉजी से संबंधित एस.टी.सी.। हमने आई.टी.आई. के छात्रों के लिए आई.टी.आई. कोर्सेस के बाद डिप्लोमा तथा इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए अवसरों के दरवाजे खोल दिये हैं, ताकि उनके कैरियर को एक नया क्षितिज मिल सके।

इस बात का एक सबसे अच्छा भाग यह है कि हमारे प्रयासों में उद्योगों की भी साझेदारी रही है। 50% से अधिक आई.टी.आई. विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों तथा संस्थाओं की साझेदारी में पी.पी.पी. के आधार पर चल रहे हैं। नए कौशल विकास केन्द्रों की स्थापना के लिए आज जो एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं, इससे यह साझेदारी और अधिक मजबूत होने वाली है। गुजरात में मेरे अनुभवों ने मेरे विश्वास को और मजबूत किया है कि भारत को अपने प्रमुख एजेन्डे में युवाओं को ज्ञान तथा कौशल से सशक्त करने के कार्य को सबसे ऊपर रखना चाहिए। हम गुजरात में पहले से ही इन सबके लिए बीज बो रहे हैं। हम गुजरात के हर युवा मन को प्रेरणा, मेहनत तथा नए प्रयोगों का स्त्रोत में बदलने के लिए संकल्पबद्घ हैं।

कुछ बातें आज जो बाहर से समूह आए थे उनके लिए कहनी थी वो मैंने कह दी, लेकिन और भी कुछ बातें हैं जो मैं बताना चाहता हूँ। 21वीं सदी हिन्दुस्तान की सदी है, यह हम बहुत लंबे अर्से से सुन रहे हैं, लेकिन वह कौन सी ताकत है जिसके भरोसे यह हम कह रहे हैं..? तो तुरंत जवाब मिलता है कि हमारी यूवा शक्ति। लेकिन सिर्फ हाथ पैर हैं, उस युवा शक्ति के भरोसे देश, विश्व की ताकत नहीं बन सकता। हमारे पास योग्य युवा शक्ति होनी चाहिए। और योग्य युवा शक्ति का आधार होता है, उसकी क्षमता, उसकी योग्यता। और उस क्षमता और योग्यता की ओर हमने ध्यान नहीं दिया तो हम विश्व के सबसे युवा देश होते हुए भी, ना हम विश्व को कुछ कोन्ट्रीब्यूट कर पाएंगे, इतना ही नहीं, हम ही कहीं शायद अपने आप बोझ ना बन जाएं। और इसलिए बहुत दीर्घदृष्टि से हमें स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना चाहिए। और मेरा खुद का अनुभव यह है कि हम स्किल डेवलपमेंट पर थोड़ा सा भी ध्यान दें, तो हम बहुत बड़ी मात्रा में एम्पलोयमेंट का भी जनरेशन कर सकते हैं, सर्विस की क्वालिटी में भी इम्प्रूवमेंट कर सकते हैं और अल्टीमेटली इकोनॉमी जनरेट होने से क्वालिटी ऑफ लाइफ में भी बहुत बड़ा चेंज ला सकते हैं। और इसलिए इन चीजों पर बल देने की आवश्यकता रहती है।

अब मैं जिस क्षेत्र से आता हूँ, राजनैतिक क्षेत्र, दुर्भाग्य ऐसा है कि उस क्षेत्र में ट्रेनिंग की जरूरत ही नहीं है। और एक कवि सम्मेलन में एक कवि हमेशा कविता सुनाया करते थे कि “एक मंत्री जी ने ड्राइवर से कहा आज कार मैं चलाऊंगा, तो ड्राइवर ने कहा कि सर, मैं उतर जाऊंगा, क्योंकि ये कार है, सरकार नहीं जो कोई भी चला ले..!” इसलिए मैं उस फील्ड से आ रहा हूँ लेकिन वहाँ भी कभी ना कभी तो वक्त आएगा, धीरे-धीरे वहाँ भी लीडरशिप को लेकर काफी कुछ बहस वहाँ भी हो रही है। लेकिन मेरे अनुभव बताऊं, मैं जब मुख्यमंत्री के नाते काम करने लगा तो हर बार जब नई मंत्री परिषद मेरी बनती है, तो मंत्रियों का जो स्टाफ होता है, उनकी मैं वन वीक ट्रेनिंग करवाता हूँ, प्रोफेशनल लोगों से और उसके कारण प्रोडक्टिविटी में, बिहेविरयर में, एटीटयूट में इतना परिवर्तन आता है कि हर नागरिक को फील होता है कि यार कुछ बदल सा गया है। अब उसमें मोटिवेशन लेवल से ज्यादा महत्वपूर्ण थी, ट्रेनिंग। सिर्फ मोटिवेशनल लेवल से काम चल जाता ऐसा होता नहीं है, ट्रेनिंग बहुत बड़ा रोल प्ले करती है।

अब हमारे यहाँ डांग जिला है। हमारे ट्राइबल वहाँ बाम्बू का काम करते थे। और पहले भी करते थे, कोई मेरे मुख्यमंत्री बनने के बाद करने लगे हैं ऐसा नहीं था, करते थे। लेकिन क्वालिटेटिव चेंज लाना जरूरी था। तो हमने वहाँ से टीमों को नार्थ ईस्ट भेज दिया, जहाँ बाम्बू पर इतना काम होता है। इन लोगों ने वहाँ ट्रेनिंग ली, सीखा..! आज वह इतना बढिय़ा गुड्स बनाते हैं। अब जब वह बनाने लगे तो उनको ध्यान में आया कि हमारा बाम्बू, उसकी क्वालिटी, इस काम के लिए अनुकूल नहीं है। यानि जो कल तक जिस बाम्बू से काम कर रहा था, उसकी खुद की ट्रेनिंग इतनी हो गई कि वह बाम्बू में ही परिवर्तन ढूंढने लगा। तो हमें एक जेनेटिक काम करने वाली कैमिकल इन्डस्ट्री को कहना पड़ा कि हमारे बाम्बू की दो गांठ जो होती है, उसका डिसटेन्स थोड़ा ज्यादा हो, इस प्रकार के जैनेटिकली मोडिफिकेशन की हमें जरूरत है तो आप रिसर्च करो। उन्होंने किया और हमने उस प्रकार के बाम्बू बनाना शुरू किया ताकि उनको जिस प्रकार के बाम्बू पर काम करना था, वह बाम्बू उनको लोकली उपलब्ध हो। अच्छा, अब जब बाम्बू वहाँ हैं, ट्रेनिंग हो चुकी है, वह गुडस तैयार कर रहा है तो मार्केट भी मिलने लग गया।

मुझे याद है कि पहले हमारे यहाँ एयरपोर्ट जो था वह बस स्टेशन के जैसा था। अहमदाबाद का एयरपोर्ट यानि एक बस स्टाप पर आप आए हो ऐसा लगता था। अब एयर-ट्रैफिक पिछले पन्द्रह साल में काफी बढ़ा है, तो हमारा एयरपोर्ट भी बढ़ा। अब उनको नौजवानों की जरूरत थी, तो हमने कहा कि भाई, ठीक है, हम लोग मिल कर के कुछ काम करते हैं। तो हमने एयरपोर्ट के सराउन्डिंग फाइव किलोमीटर रेंज में जितने नौजवान थे उनको इन्वाइट किया। और कोई चार सौ नौजवानों की दस दिन की ट्रेनिंग की तो उनको एयरपोर्ट पर ही... अब वह साइकल पर आते हैं, अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं और अपने घर चले जाते हैं। और इसलिए हम उसका मैपिंग करें, किस क्षेत्र में किस प्रकार के लोगों की रिक्वायरमेंट है। मैपिंग करने के बाद यदि ठीक से ट्रेनिंग करें तो आज जो होता है ना कि भाई, एक फैक्ट्री से लोग उठते हैं और दूसरी फैक्ट्री में चले जाते हैं, वह भी तकलीफ कम होती है।

दूसरा, क्लस्टर डेवलपमेंट का बहुत बड़ा फायदा होता है। सरकार ने भी डेवलपमेंट के समय क्लस्टर एप्रोच को मद्दे नजर रखना चाहिए। जैसे हमारा मोरबी है, मोरबी एक सिरेमिक का क्लस्टर बन गया है। तो हमने हमारी वहाँ की जो आई.टी.आई. हैं उसके सिलेबस, वहाँ टर्नर-फिटर की मुझे जरूरत नहीं है, वहाँ वायर मैन की जरूरत नहीं है, वहाँ मेरी आई.टी.आई. है वे प्रीडोमिनेंटली सिरेमिक का पढ़ाए। अगर वहाँ प्रीडोमिनेंटली सिरेमिक का पढ़ाते हैं तो मेरे नौजवानों को वहीं रोजगार मिल जाता है और इसलिए ना घर छोडऩा पड़ता है, ना गांव छोडऩा पड़ता है। और इसलिए अगर हमने 200 स्कूल चालू कर दिए, 200 आई.टी.आई. चालू कर दिए, 50 ये चालू कर दिये... इससे परिणाम नहीं मिलता है। आज जो भारत सरकार ने भी गर्व के साथ ये रिपोर्ट किया है कि पूरे हिन्दुस्तान में नौकरी पाने योग्य युवकों में 4% बेरोजगार हैं लेकिन उन्होंने ये भी गर्व से कहा है अकेला गुजरात ऐसा है कि जहाँ कम से कम बेरोजगार हैं, कम से कम बेरोजगार हैं..! और इसलिए, हमें एम्प्लॉइमेन्ट भी बढ़ानी है और एम्प्लॉइबिलिटी भी बढ़ानी है। क्योंकि अगर हम हमारा एक्सपेंशन नहीं करते इन्डस्ट्रीज बेस का, इवन इन एग्रीकल्चर, तो हम एम्प्लॉइमेन्ट के लिए स्कोप जनरेट नही कर पाएंगे। एम्प्लॉइमेन्ट का स्कोप जनरेट किया, लेकिन एम्प्लॉइबिलिटी के लिए व्यक्तियों का विकास नही कर पाते हैं, उसकी प्रोपर ट्रेनिंग नहीं करते हैं... तो इसलिए इन सबका इन्टीग्रेटेड एप्रोच होना चाहिए। और सबका जब इन्टीग्रेटेड एप्रोच होता है तो हम इच्छित परिणाम ला सकते हैं।

उसी प्रकार से, आज दुनिया में चर्चा है कि चीन के साथ हमारी स्पर्धा है, चीन से स्पर्धा है, 21वीं सदी हमारी है, तो किन बातों पर बल देने से हम चीन के साथ मुकाबला कर सकते हैं..? एक तो मेरा मत है कि हमारा स्कोप बहुत वाइड करना चाहिए। आज अगर हम 200 प्रकार की ट्रेनिंग देते हैं तो वो 2000 प्रकार की ट्रेनिंग देना कैसे शुरू करें, 20,000 प्रकार की ट्रेनिंग देना कैसे शुरू करें..? हमारे स्कोप को बहुत वाइड करना चहिए। दूसरा, हमारा स्केल बढ़ाना पड़ेगा। तीसरा, हमें स्किल बढ़ानी पड़ेगी और चौथा, हमें स्पीड बढ़ानी पड़ेगी। अगर इन चारों को मिला कर हम काम करते हैं - स्कोप, स्केल, स्किल एंड स्पीड - इन चारों पर अगर हम बल देतें हैं तब जा कर के हम हमारी पूरी युवा शक्ति को इस निर्माण कार्य से हम जोड़ सकते हैं और तब जा कर के हम परिवर्तन ला सकते हैं।

अब हमारे यहाँ होटल मैनेजमेंट के इंस्टिट्यूट्स होते हैं। होटल मैनेजमेंट सरकारें चलाती हैं, लेकिन कभी सरकार को विचार नहीं आता है कि इस होटल मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट्स का हम भी कैसे फायदा उठाएं। हमने एक प्रयोग किया। हमारे जितने गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के स्टाफ हैं, क्लास फोर के जो एम्पलाई हैं, उन सबको मैंने सैटरडे-सन्डे गवर्नमेंट की जो हॉस्पिटालिटी कॉलेज है उसमें पढऩे के लिए भेजा। और मैंने कहा कि तुम गवर्नमेंट गैस्ट हाउस में चद्दर कैसे लगती है, पिलो कैसे लगते हैं, चाय कैसे देनी है... तुम सीख कर आओ ना..! उसको नौकरी कैसे मिली थी? कोई पहचान थी, किसी ने कह दिया कि बच्चा है, जरा रख देना, तो रख लिया गया था..! किसी ने ट्रेनिंग नहीं की। अब यह पूरे देश में स्थिति है। लेकिन अगर हमारे दृष्टिकोण में ट्रेनिंग है तो हम हर... अब मेरे दो फायदे हो गए। सैटरडे-सन्डे जो मेरी गवर्नमेंट कॉलेज है उसका भी उपयोग होने लग गया, ये नौजवान, दो दिन जा कर के आते हैं तो विश्वास उनका, कॉन्फिडेंस लेवल इतना बढ़ जाता है कि वे अपना सीखने लगते हैं..!

अब हमारे यहाँ गुजरात में एक समस्या रहती है, क्योंकि हमारे यहाँ ‘मगनभाई पांचवां’, ‘मगनभाई आठवां’, एक बहुत बड़ी चर्चा थी। दो लीडर थे, तो पांचवी से अंग्रेजी या आठवीं से अंग्रेजी, वही झगड़ा चला था हमारे यहाँ, कई वर्षों तक..! और उसके कारण बाय ऐन्ड लार्ज हम गुजराती भाषी गुजराती में ही बातचीत करते हैं तो अंग्रेजी भाषा का हमारा... अब धीरे-धीरे समय बदल गया तो हमने एक बहुत बड़ी मात्रा में गुजरात में मूवमेंट चलाया है, ‘स्कोप’ और उसके अंदर हमने उनको अंग्रेजी और सॉफ्ट स्किल सिखाने की बहुत कोशिश की। हमारा अनुभव ये आया कि 40-45-50 साल की गृहणी भी ये अंग्रेजी का ‘स्कोप’ सीखने गई। तो मेरे लिए ये सरप्राइज था, मैंने कहा भाई, ये झूठी बातें हो सकती हैं। ये फिगर बढ़ा रहे हो और पेमेंट लेने के लिए कुछ चल रहा है। क्योंकि कोई कारण नहीं, क्यों कोई 40-45 में जाएगा..! तो मैंने जांच करवाई। बड़ा सरप्राइज़िंग मुझे आन्सर मिला। उन माताओं ने कहा कि हमारे बच्चे मीडियम इंगिलश में पढ़ रहे हैं और घर आने के बाद हमारे और उनके कम्यूनिकेशन में गड़बड़ होती है। तो हमें ये जरूरी लगा कि हम भी थोडा बहुत बच्चों को खुश करने वाली दो-चार-दस बातें सीख लें और इसलिए हम हाउस वाइफ हैं लेकिन सीखना शुरू किया है।

कहने का तात्पर्य है कि अगर हम सुविधाएं उपलब्ध करवाएं तो सामान्य मानवी को भी सीखने की इच्छा होती है। वो अपने आप में परिवर्तन लाने को इच्छुक होता है। और इसलिए हमारे ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट्स के नेटवर्क को... और जरूरी नहीं है कि प्राइमरी ट्रेनिंग हो गई तो काम हो गया, ऊपर जरूरत नहीं है, ऐसा नहीं है। अब देखिए अस्पताल में, हम देखें तो एक अस्पताल के अंदर मोर दैन 600 टाइप की पैरा मेडिकल एक्टीविटी होती हैं, मोर दैन 600 टाइप्स..! अब आज क्या होता है? एक आदमी आता है, पाँच-छह दिन साथ रह कर के वो सिखता है कि इस मशीन को ऐसे ऊठाना, ऐसे रखना, फिर डॉक्टर को देना... लेकिन उसकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं होती है। आज कितना स्कोप है, सिर्फ हॉस्पिटल इन्डस्ट्री हम देख लें या हॉस्पिटल सर्विसेस हम देख लें...!

मैं मानता हूँ थाउज़न्ड्स ऑफ ट्रेनिंग कोर्सेस आर रिक्वायर्ड...! हमने एक बार, क्योंकि मैं काफी रूचि लेता हूँ इस विषय में, क्योंकि मैं मानता हूँ कि बदलाव इसी से आना है। तो मैंने एक बार हमारे अफसरों की मीटिंग की। तो वो सोच रहे थे कुछ् पचास कोर्स नए करेंगे, सत्तर कोर्स नए करेंगे... मैंने कहा ऐसा नहीं भाई, एक काम करो, जन्म से मृत्यु तक हर व्यक्ति को कितने प्रकार की सेवाओं की जरूरत पड़ती है, सूची बनाओ। जन्म से मृत्यु तक..! तो उन्होंने मोटी-मोटी सूची बनाई, ऐसे ही। करीब-करीब 976 प्रकार कि उन्होंने निकाली कि उसको झूला चाहिए, उसको खिलौना चाहिए, उसको गुलदस्ता चाहिए, उसको किताब चाहिए, उसको टेबल-कुर्सी चाहिए, उसको सोने के लिए खटिया चाहिए... करीब 976 प्रकार की चीजों की मनुष्य को जन्म से लेकर मृत्यु तक अनिवार्य रूप से जरूरत पड़ती है। अब ये तो उन्होंने सरसरी नजर से बनाया था, कोई अगर बैठेगा तो 9000 भी निकाल सकता है। मैंने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि 976 सर्विस प्रोवाइडर चाहिए। इसका मतलब हुआ कि उनकी ट्रेनिंग चाहिए। अब मान लिजीए, गुलदस्ते कि जरूरत है तो गुलदस्ता बनाने की ट्रेनिंग होनी चाहिए ना..! क्यों वो पिता के पास बेटा सीखा, बेटे के बाद उसका बेटा सीखा... तो क्वॉलिटेटिव चेंज नहीं आता है। और इसलिए अगर हम एक-एक चीज में बारीकी से देखें तो हमारे यहाँ क्वॉलिटी ऑफ लाइफ में अगर चेंज लाना है तो, हमारे प्रोडक्शन में चेंज लाना है तो, हमारे वर्क कल्चर में चेंज लाना है तो, हमें ग्लोबल मार्केट को कम्पीट करने के लिए हर प्रकार की सेवाओं में सुधार लाना है तो, हमारे नोलेज के साथ स्किल बहुत अनिवार्य है। और जहाँ स्किल डेवलपमेंट पर बल दिया जाएगा, हम बहुत...

अभी हमने हमारे यहाँ बिसेग, यहाँ गांधीनगर के पास इंस्टिट्यूट है। कभी आप लोगों को रूचि हो तो देखने जैसा है। सैटेलाइट के माध्यम से जो इंजीनियर्स हैं, उनको हम एम्प्लॉएबल बनाने के लिए छह महीने की ट्रेनिंग देते हैं, हर स्टूडेंट को देते हैं। वह अगर बाहर पढऩे जाता है तो उसकी फीस बीस हजार रुपया होती है। अब हर विद्यार्थी 20,000 रुपया खर्च करे यह संभव नहीं है। तो हमने लांग डिस्टेंस एज्यूकेशन शुरू किया और हमने कहा कि सिर्फ सौ रुपया, सिरीयसनेस आए तुम्हारी इसलिए तुम्हे भरना होगा। शाम के समय लांग डिस्टेंस से होता है। हमने माइक्रोसॉफ्ट के साथ पार्टनरशिप की और आज हमारे हजारों इंजीनियर्स, इंजीनियर की डिग्री प्राप्त करने के छह महीने पहले इन कंपनियों के लिए एम्प्लॉएबल हो सके उसकी ट्रेनिंग उनकी हो जाती है। यानि हम अगर इन चीजों पर बल दें, तो हम बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते है।

गुजरात ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को भी महत्व दिया है| और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के कारण हमारे यहाँ काफी बड़ी मात्रा में हम कुछ इनोवेशन भी कर रहे हैं। जैसे हमारे यहाँ परम्परागत रूप से कच्छ मांडवी यह जहाज बनाने का उद्यम करता था, आज से सौ साल पहले, दो सौ साल पहले, और बड़े जहाज बनाने का काम वह करते थे, लकड़ी के... अब धीरे-धीरे-धीरे कुछ ही परिवार बच गए हैं, तो हमने वहाँ स्पेश्यल आई.टी.आई. शुरू किया। उस आई.टी.आई. के सभी स्टूडेंट का यही काम है कि नाव बनाना, जहाज बनाना उसकी ही ट्रेनिंग हो। आज मांडवी का वह बंदर हमारा जो मरा पड़ा था, धीरे-धीरे-धीरे उनकी मांग बढऩे लगी, उनको काम मिलने लगा और वहीं के लोकल लोग जिनके पूर्वजों का वह व्यवसाय था और उनमें क्षमता थी, धीरे-धीरे वहाँ काम शुरू करने लगे और डेवलप होने लगा।

मेरे यहाँ उमरगांव से अंबाजी पूरा ट्राइबल बेल्ट है। ट्राइबल के वहाँ पर लोकल एम्प्लोयमेंट की वहाँ जरूरत... अब जैसे वहाँ केले में, केला पैदा करना तो परंपरागत रूप से किसान करता है, लेकिन केला पैदा होने के बाद वह जो वेस्ट रहता है उसको हटाने का पहले किसान को 15,000 रुपया खर्च होता था, एक एकर पर। आज उसमें हमने वैल्यू एडिशन किया है, ट्रेनिंग दी है किसानों को और उसमेंसे चीज़ें बनने लगी हैं तो आज वह एक एकडर में 20-25,000 रुपया कमाता है। तो ट्रेनिंग से हम इतना बदलाव ला सकते हैं और इकोनॉमी को इतना जनरेट कर सकते हैं और इसलिए स्किल डेवलपमेंट के मिशन को हम जितना बल दें, जितना साइंटिफिक बनाए उतना लाभ है। गुजरात ने अपने आप इस दिशा में काफी कुछ किया है। हम देश के लिए भी उपयोगी हो इस प्रकार के काम को कर रहे है।

मैं मानता हूँ कि यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का सेमिनार है, और जैसा आपने देखा कि करीब 26 डिस्ट्रिक्ट में एक-एक कंपनी टोकन, वैसे तो काफी हैं, अभी भी होने वाले हैं जैसा कि मुझे बताया और हम चाहते हैं कि हम जब वाइब्रेंट समिट करते हैं तो एक काम करते हैं। वाइब्रेंट समिट में जो एम.ओ.यू. करते हैं तो उनको हम उसी दिन कहते हैं कि भाई, तीन दिन के बाद एक सेमिनार होगा। आपको किस प्रकार का वर्कफोर्स चाहिए, उसका पूरा डिटेल लाओ। तुम्हारी इन्डस्ट्री को बनने में अगर दो साल, तीन साल कन्सट्रक्शन में लगते हैं तो जैसे ही तुम शुरू करोगे, उसके साथ तुम्हारे लिए जो रिक्वायर्ड वर्कफोर्स है, रिक्वायरमेंट है ह्यूमन रिसोर्स की, ट्रेनिंग की, हम अभी से करवा देते हैं। उसका बहुत बड़ा लाभ हो रहा है।

हमारे यहाँ एक ‘गिफ्ट सिटी’ बन रहा है। अब आज हमारे गुजरात में इतना टॉलेस्ट बिल्डिंग कोई है नहीं, उतने बड़े टॉलेस्ट बिल्डिंग बन रहे हैं। अब टॉलेस्ट बिल्डिंग बन रहे हैं तो पुरानी पद्घति से जो कन्सट्रक्शन का काम कर रहे हैं वह नहीं चलेगा। मुझे उसके लिए स्किल चाहिए, तो उस प्रकार का स्किल डेवलपमेंट इन्स्टीट्यूट चालू किया। और उसमें भी कोई ज्यादा खर्चा नहीं किया, हमने क्या किया..? हमारी अहमदाबाद में जो स्कूल है, उस स्कूल को हमने कहा कि तुम इवनिंग टाइम में स्किल डेवलपमेंट क्लासिस चलाओ, ताकि यह जो हमारे कन्सट्रक्शन वर्कर्स हैं उनको थोड़ी तीन-चार दिन की ट्रेनिंग हो जाती है तो उस काम को कर लेते है..! तो एक मूवमेंट के रूप में स्किल डेवलपमेंट को चलाना पड़ता है और उसका परिणाम सबको मिलता है।

अब हम नेक्सट लेवल पर जा रहे हैं। वी हैव क्रिएटेड एन इंस्टिट्यूट कॉल्ड ‘आई-क्रिएट’। ‘आई-क्रिएट’ हमारा गलोबल लेवल का इंस्टीट्यूशन बन रहा है, मिस्टर नारायण मूर्तिजी को मैंने रिक्वेस्ट किया था उसकी चेयरमैनशिप के लिए, उन्होंने उस बात को स्वीकार किया और आज उनके नेतृत्व में हम काम कर रहे हैं। जो भी इनोवेशन्स हैं, इतना स्पार्क कि एक आठवीं कक्षा के बच्चे में भी स्पार्क होता है। जिनके पास ऐसे इनोवेशन का स्कोप हैं उनके लिए ‘आई-क्रिएट’ में एक जगह है, जहाँ आप आएं, हम उसे पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर देंगे, उसके रहने-खाने की व्यवस्था देंगे। और जो भी उसके आइडियाज़ हैं, उस आइडियाज़ को धरती पर उतारें और कमर्शियल मॉडल कैसे तैयार हो उसके लिए जो भी उसको नो-हाऊ कि जरूरत है वह मिले, उसको फाइनेंशियल हैल्प मिले, वहाँ तक का काम करने वाली एक ‘आई-क्रिएट’ संस्था, वर्ल्ड क्लास इन्स्टीट्यूट हमारी, अन्डर प्रोसेस है, मिस्टर नारायण मूर्ति के नेतृत्व में काम चल रहा है, उसका भवन अभी बन रहा है। लेकिन अभी से हमने लोगों से कॉन्टेक्ट करना शुरू किया है, फैकल्टीज का, स्टूडेंटस का, और उसकी एक वैबसाइट भी है। उसके लिए काफी अच्छी मात्रा में नौजवान आगे आ रहे हैं और ग्लोबली शायद उसमें नौजवान मिलेंगे।

कहने का तात्पर्य है कि हर लेवल पर स्किल डेवलपमेंट के काम को बल देते हुए हम आगे बढऩा चाहते हैं, क्लस्टर अप्रोच के साथ चाहते हैं, स्कोप भी बढ़ाना चाहते हैं, स्किल भी बढ़ाना चाहते हैं, स्पीड भी बढ़ाना चाहते हैं और स्केल भी बढ़ाना चाहते हैं और हम और अधिक कैसे कर सकें उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि आज के इस दिवस भर का समारोह, हमारे नौजवानों के लिए नई आशा कि किरण बनेगा। हमारा नौजवान बेरोजगार रहे, ये सबसे बड़ा देश का नुकसान है। उसकी शक्ति राष्ट्र के निर्माण में काम आए।

एग्रीकल्चर सेक्टर में भी परंपरागत एग्रीकल्चर में बदलाव करके ट्रेन्ड मैनपावर लगाया तो बहुत वेस्टेज बच सकता है। हमारा अनुभव है कि पानी बचाने में ट्रेन्ड मैनपावर का हमें बहुत बल मिला है और इसलिए उन चीजों की ओर हम ध्यान देंगे तो बहुत-बहुत लाभ होगा।

मेरी इस समारोह को, इस सेमीनार को बहुत-बहुत शुभकामनाएं...!

धन्यवाद...!!

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मणिपुर का संगई महोत्सव मणिपुर के लोगों की भावना और उत्‍साह को दर्शाता है : पीएम मोदी
November 30, 2022
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Comments
"मणिपुर का संगई महोत्सव मणिपुर के लोगों की भावना और उत्‍साह को दर्शाता है"
"मणिपुर बिल्कुल एक सुंदर माला की तरह है जहाँ कोई मिनी भारत देख सकता है"
"संगई महोत्सव भारत की जैव विविधता का जश्न मनाता है"
"जब हम प्रकृति, जानवरों और पौधों को अपने त्योहारों और उत्सवों का हिस्सा बनाते हैं, तो सह-अस्तित्व हमारे जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है"

खुरम जरी । संगाई फेस्टिवल के सफल आयोजन के लिए मणिपुर के सभी लोगों को ढेर सारी बधाई।

कोरोना के चलते इस बार दो साल बाद संगाई फेस्टिवल का आयोजन हुआ। मुझे खुशी है कि, ये आयोजन पहले से और भी अधिक भव्य स्वरूप में सामने आया। ये मणिपुर के लोगों की स्पिरिट और जज्बे को दिखाता है। विशेष रूप से, मणिपुर सरकार ने जिस तरह से एक व्यापक विज़न के साथ इसका आयोजन किया, वो वाकई सराहनीय है। मैं मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह जी और पूरी सरकार की इसके लिए सराहना करता हूँ।

साथियों,

मणिपुर इतने प्राकृतिक सौन्दर्य, सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता से भरा राज्य है कि हर कोई यहाँ एक बार जरूर आना चाहता है। जैसे अलग-अलग मणियाँ एक सूत्र में एक सुंदर माला बनाती हैं, मणिपुर भी वैसा ही है। इसीलिए, मणिपुर में हमें मिनी इंडिया के दर्शन होते हैं। आज अमृतकाल में देश 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना के साथ बढ़ रहा है। ऐसे में ''Festival of One-ness'' की थीम पर संगाई फेस्टिवल का सफल आयोजन भविष्य के लिए हमें और ऊर्जा देगा, नई प्रेरणा देगा। संगाई, मणिपुर का स्टेट एनिमल तो है ही, साथ ही भारत की आस्था और मान्यताओं में भी इसका विशेष स्थान रहा है। इसलिए, संगाई फेस्टिवल भारत की जैविक विविधता को celebrate करने का एक उत्तम फेस्टिवल भी है। ये प्रकृति के साथ भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सम्बन्धों को भी celebrate करता है। और साथ ही, ये फेस्टिवल sustainable lifestyle के लिए जरूरी सामाजिक संवेदना की प्रेरणा भी देता है। जब हम प्रकृति को, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को भी अपने पर्वों और उल्लासों का हिस्सा बनाते हैं, तो co-existence हमारे जीवन का सहज अंग बन जाता है।

भाइयों बहनों,

मुझे बताया गया है कि ''Festival of One-ness'' की भावना को विस्तार देते हुए इस बार संगाई फेस्टिवल केवल राजधानी नहीं बल्कि पूरे राज्य में आयोजित हुआ। नागालैंड बार्डर से म्यांमार बार्डर तक, करीब 14 लोकेशन्स पर इस पर्व के अलग-अलग रंग दिखाई दिए। ये एक बहुत सराहनीय पहल रही। जब हम ऐसे आयोजनों को ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ जोड़ते हैं तभी इसका पूरा potential सामने आ पाता है।

साथियों,

हमारे देश में पर्वों, उत्सवों और मेलों की सदियों पुरानी परंपरा है। इनके जरिए हमारी संस्कृति तो समृद्ध होती ही है, साथ ही लोकल इकॉनमी को भी बहुत ताकत मिलती है। संगाई फेस्टिवल जैसे आयोजन, निवेशकों को, उद्योगों को भी आकर्षित करते हैं। मुझे पूरा विश्वास है, ये फेस्टिवल, भविष्य में भी, ऐसे ही उल्लास और राज्य के विकास का एक सशक्त माध्यम बनेगा।

इसी भावना के साथ, आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद!