नई दिल्ली में पीएम मोदी का आधिकारिक आवास उस स्थान पर है जिसे पहले रेस कोर्स रोड कहा जाता था। 2016 में, इसे लोक कल्याण मार्ग अथवा "पीपुल्स वेलफेयर स्ट्रीट" नाम दिया गया, जो दो बार चुने गए उस नेता के लिए एकदम उपयुक्त है, जिसके झुकाव लोक-लाभकारी हैं और जो भारत के औपनिवेशिक अतीत को त्यागने का दमखम रखता है।

एयरपोर्ट जैसी सुरक्षा के घेरे से आगे बढ़ते हुए, हाल ही में पुनर्निर्मित परिसर (उनके स्टाफ द्वारा जिसे "7 LKM" कहा जाता है) में घूमते हुए मोर और सुंदर फूलों से सुसज्जित एक भीतरी प्रांगण है। अंदर, एक बैठक कक्ष में छत के भित्तिचित्रों पर चित्रित विश्व के नक्शे हैं, जबकि कैबिनेट रूम भारत के संविधान की प्रस्तावना की पंक्तियों से अंकित है।

यह वही स्थान है जहां से पीएम मोदी ने भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को संचालित किया है, लेकिन उनके कई घरेलू विरोधियों के नजरिए से, यह वह स्थान भी है, जहां उन्हें लगता है कि यहां से वे संविधान के लिए एक जोखिम भी पेश कर सकते हैं।

आगंतुकों का स्वागत करने के लिए एक बड़ी मेज से उठते हुए, पीएम मोदी उस साल के अंत में आत्मविश्वास से भरपूर दिखाई दिए, जब भारत लगातार वैश्विक चर्चा में रहा है। देश ने जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है और वर्ल्ड लीडर्स, बिजनेस कंसल्टेंट्स और बैंकों द्वारा इसे, बीजिंग के प्रति बढ़ते संदेह वाले विश्व में एक वैकल्पिक इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन के रूप में देखा जा रहा है।

भारत और दुनिया भर के कई नेता अब खुद को पीएम मोदी के एक और संभावित पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए तैयार कर रहे हैं। 73 वर्षीय नेता अगले साल की शुरुआत में होने वाले चुनावों में तीसरे कार्यकाल के लिए जनमत मांगेगे, जहां उनकी पार्टी को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। पीएम मोदी दावा करते हैं कि "आम आदमी के जीवन में ठोस बदलाव का रिकॉर्ड" होने के कारण उन्हें "जीत का पूरा विश्वास" है।

क्रीम रंग का कुर्ता और हल्के गेरुआ रंग की स्लीवलैस जैकेट पहने, पीएम मोदी गर्व के साथ कहते हैं, “आज भारत के लोगों की आकांक्षाएं दस साल पहले की अपेक्षा बहुत भिन्न हैं।”

“उन्हें लगता है कि हमारा देश ऊंची उड़ान भरने के लिए तैयार है।” पीएम ने कहा। “वे चाहते हैं कि देश यह उड़ान जल्द भरे, और उन्हें भरोसा है कि जिस पार्टी ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है, वही इस उड़ान को भी मंजिल तक पहुंचाएगी।"

फाइनेंशियल टाइम्स ने पीएम मोदी का इंटरव्यू उस समय लिया जब उनकी भारतीय जनता पार्टी पांच में से तीन राज्यों के चुनावों में जीत का उल्लास मना रही है। इन चुनावों को 2024 के अप्रैल और मई के बीच होने वाले आम चुनावों का सेमीफाइनल माना जा रहा है, जिसमें भारत के 94 करोड़ से अधिक पात्र मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

समर्थकों के लिए, पीएम मोदी का तीसरा कार्यकाल उनकी सरकार की सफलता का प्रमाण होगा। जिनका मानना है कि पीएम मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है, गरीबी को कम किया है, और देश की वैश्विक प्रतिष्ठा में सुधार किया है। वे यह भी मानते हैं कि उन्होंने हिंदू धर्म को देश के सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

मोदी विरोधी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राहुल गांधी जैसे सांसदों के नेतृत्व में "आई.एन.डी.आई.ए." नामक गठबंधन के तहत एकजुट हो गए हैं। उनका वादा है कि वे देश के संस्थापकों के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर कथित हमले के खिलाफ "लोकतंत्र और संविधान की रक्षा" करेंगे। मोदी सरकार के लगभग 10 साल के कार्यकाल के दौरान, आलोचकों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने विरोधियों पर सख्त कार्रवाई की है, सिविल सोसाइटी को कमजोर किया है और देश के बड़े अल्पसंख्यक वर्ग मुसलमानों के साथ भेदभाव किया है।

पीएम मोदी के विरोधियों को चिंता है कि तीसरे कार्यकाल में, अगर भाजपा को बड़ा बहुमत मिलता है, तो वह धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को स्थायी रूप से नष्ट कर सकते हैं। कुछ का भय है कि वह संविधान में संशोधन कर भारत को स्पष्ट रूप से हिंदू गणराज्य बना सकते हैं।

मोदी सरकार पर लोकतंत्र में गिरावट के आरोप - जिन्हें भाजपा खारिज करती है - ने भारत और विदेश के कुछ पर्यवेक्षकों को चिंतित कर दिया है। यह चिंता ऐसे समय में उभरी है जब दुनिया के कई नेता भारत को भू-राजनीतिक और आर्थिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं और उस पर दांव लगा रहे हैं।

एक दुर्लभ साक्षात्कार और अतिरिक्त लिखित जवाबों में, प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ तीखे सवालों का जवाब दिया, जिनमें भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों की स्थिति, न्यायेतर हत्याओं की कथित साजिशों के कारण अमेरिका और कनाडा के साथ तनाव और संवैधानिक संशोधन जैसे विषय शामिल थे। हालांकि, उन्होंने अपनी सरकार के आर्थिक और लोकतांत्रिक रिकॉर्ड की आलोचनाओं को खारिज कर दिया।

पीएम मोदी और उनके समर्थकों के लिए, इस तरह की चिंताओं का कोई विशेष अर्थ नहीं है। उन्हें यह सिर्फ कुछ बुद्धिजीवियों की निरर्थक बहस लगती है, जो उस भारत से बेखबर हैं जो मोदी बना रहे हैं, एक ऐसा भारत जो मैजोरिटी की जरूरतों को पूरा करता है, जिसके बारे में उनका दावा है कि उसे भारतीय राजनीति में लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया।

"हमारे आलोचकों को अपनी राय और उसे व्यक्त करने की स्वतंत्रता का अधिकार है। हालांकि, भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर चिंताओं के संदर्भ में ऐसे आरोपों के साथ एक बुनियादी समस्या है, जो अक्सर आलोचनाओं के रूप में सामने आते हैं," पीएम मोदी कहते हैं। "ये दावे न केवल भारतीय जनता की समझ का अपमान करते हैं, बल्कि विविधता और लोकतंत्र जैसे मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को भी कम आंकते हैं।"

पीएम मोदी कहते हैं, “संविधान में संशोधन की कोई भी बात अर्थहीन है।”

अपने शासनकाल के "सबसे बड़े बदलावकारी कदम", जिसमें देशव्यापी "स्वच्छ भारत" मुहिम में शौचालय निर्माण से लेकर एक अत्याधुनिक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए करीब 100 करोड़ लोगों को ऑनलाइन प्रक्रियाओं के अंतर्गत लाना शामिल है, पीएम मोदी कहते हैं, "यह सब लक्ष्य संविधान में संशोधन के बिना बल्कि जन भागीदारी के माध्यम से प्राप्त किए गए हैं।"

मिक्स एंड मैच फॉरेन पॉलिसी

अगस्त 2023 में, भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास अपना मानवरहित यान चंद्रयान-3 उतारा। कुछ ही दिनों बाद, उसने दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं की मेजबानी के लिए G20 समिट का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य देश की और प्रधानमंत्री मोदी की स्थिति को ऊपर उठाना था। जब विश्व नेता नई दिल्ली पहुंचे, तब पीएम मोदी के पोस्टर राजधानी नई दिल्ली में छाए हुए थे।

भारत ने हर क्षेत्र में खुद को "विश्वगुरु" अथवा दुनिया के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया, चाहे वह डिजिटल समावेशन की पहल हो या जलवायु-अनुकूल मोटे अनाज के उत्पादन को बढ़ावा देने वाला अभियान हो।

भारत ने अपनी वैश्विक भूमिका को आगे बढ़ाते हुए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। सितंबर में उसने "वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ" समिट की मेजबानी की और अफ्रीकन यूनियन को G20 में स्थायी सदस्यता दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। पीएम मोदी ने दशकों पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति के तहत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए, जून में अमेरिका की राजकीय यात्रा के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ अभूतपूर्व मजबूत संबंध स्थापित किए। दोनों देशों ने जेट इंजन से लेकर क्वांटम कंप्यूटिंग तक विभिन्न क्षेत्रों में कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

"दुनिया परस्पर जुड़ी हुई है और साथ ही साथ पारस्परिक निर्भर भी है," पीएम मोदी भारत की मिक्स-एंड-मैच फॉरेन पॉलिसी को रेखांकित करते हुए कहते हैं। (एक अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, फाइनेंशियल टाइम्स से गुमनाम रूप से बात करते हुए, बहुध्रुवी और बहुपक्षीय दुनिया में भारत की वर्तमान स्थिति को "स्वीट स्पॉट" बताते हैं।)

"विदेश मामलों में हमारा सबसे महत्वपूर्ण गाइडिंग प्रिंसिपल हमारा राष्ट्रीय हित है," पीएम मोदी कहते हैं। "यह रुख हमें विभिन्न देशों के साथ इस तरह से जुड़ने की अनुमति देता है जो परस्पर हितों का सम्मान करता है और समकालीन भू-राजनीति की जटिलताओं को स्वीकार करता है।"

पिछले महीने फेडरल प्रोसेक्यूटर्स द्वारा लगाए गए आरोपों के बावजूद कि एक भारतीय सरकारी अधिकारी ने अमेरिकी धरती पर एक प्रमुख अमेरिकी सिख अलगाववादी नेता की हत्या के षड्यंत्र का निर्देश दिया था और अमेरिका के साथ संबंधों को 'अलायंस' कहने के दबाव के जवाब में पीएम मोदी कहते हैं, "दोनों देशों के संबंध निरंतर बेहतरी की राह पर हैं।"

"इस संबंध का वर्णन करने के लिए सही शब्द क्या हैं, वो मैं आप पर छोड़ता हूं," पीएम मोदी एक मुस्कान के साथ कहते हैं। "आज भारत-अमेरिका का रिश्ता पहले से कहीं ज्यादा व्यापक जुड़ाव, गहन समझ और गर्मजोशी का अनुभव कर रहा है।"

पीएम मोदी अमेरिका-चीन के बीच हाल के तनाव कम होने के बारे में सवाल पर कहते हैं, "इसका बेहतर जवाब अमेरिका और चीन की जनता तथा वहां की सरकारें देंगी।"

इज़राइल-हमास संघर्ष पर, जहां उनकी सरकार ने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार की आलोचना करने से ज्यादातर परहेज किया है - एक प्रमुख भागीदार है, जिसके साथ वह टेक्नोलॉजी शेयर करती है और एक दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी विश्व दृष्टिकोण रखती है – पीएम मोदी ने कहा कि टू-स्टेट समाधान के लिए अपना समर्थन दोहराते हुए भारत ने गाजा को मानवीय सहायता देने का समर्थन किया है। भारत, जो लंबे समय से फिलिस्तीनी मुद्दे का कट्टर समर्थक रहा है, वह इजराइल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री, मोदी के नेतृत्व में इसके करीब गया है।

"मैं इस क्षेत्र के नेताओं के साथ लगातार संपर्क में हूं," पीएम मोदी कहते हैं। "अगर शांति की दिशा में भारत कुछ भी कर सकता है, तो हम जरूर करेंगे।"

चीन का विकल्प

दुनिया के सबसे बड़े विकासशील देश के लिए आर्थिक रूप से उभरते भारत का विचार अपने आप में नया नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय में यह नैरेटिव इतना ताकतवर क्यों हो गया है? इसका एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री मोदी का लगातार इस पर जोर देना है। 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और ‘अमृत काल’ के आगमन की उनकी बातें इसे मजबूत करती हैं।

यह इसलिए भी है क्योंकि वाशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव ने पश्चिमी लोकतंत्रों को चीन के विकल्प के रूप में कारोबार और कूटनीतिक साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

पिछले अगस्त में स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, पीएम मोदी ने 2047 में भारत की स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ तक इसे एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प व्यक्त किया, हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने यह बताया है कि इसके लिए वर्तमान 6-7% की वार्षिक वृद्धि दर से कहीं अधिक तेजी से ग्रोथ की आवश्यकता होगी। जबकि कुछ भारतीय इस विचार से उत्साहित हैं, वहीं कुछ को आशंका है कि यह सिर्फ एक शिगूफा हो सकता है, क्योंकि उनके मुताबिक यह देश अक्सर अपने वादों को पूरा करने में नाकाम रहा है।

पीएम मोदी इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत "फ्रेजाइल फाइव" (2013 में एक मॉर्गन स्टैनली रिसर्चर द्वारा चिह्नित टर्म, उसी साल जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, ऐसे अर्थव्यवस्थाओं का वर्णन करता है जो अपने चालू खाता घाटे की भरपाई के लिए विदेशी निवेश पर अत्यधिक निर्भर हैं) में एक से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। उनके कार्यकाल के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण तेजी से हुआ है, जहां एक दशक के भीतर हवाई अड्डों की संख्या 74 से दोगुनी होकर 149; मेट्रो लाइनों की क्षमता 248 किलोमीटर से 905 किलोमीटर और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 706 हो गई है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जिनमें एपल और उसकी सप्लायर फॉक्सकॉन शामिल हैं, दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब से हटकर "चाइना प्लस वन" डायवर्सिफिकेशन मुहिम के तहत भारत में अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। कुछ तो यहां तक भविष्यवाणी कर चुके हैं कि यह दशकों पहले चीन के उभार को दोहरा सकता है, जहां तीव्र आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन तथा अन्य क्षेत्रों में रोजगार सृजन के मेल ने देश और उसके लोगों के जीवन को बदल दिया था।

पीएम मोदी खुद के एक सक्षम प्रशासक होने पर गर्व करते हैं, जो देश की विशाल नौकरशाही को दरकिनार करके काम करवाने में माहिर हैं - चाहे बड़े आर्थिक सुधार हों या उन लाखों भारतीयों के लिए वेलफेयर डिलीवरी में सुधार करना हो जो कैश ट्रांसफर और मुफ्त भोजन जैसी सेवाओं पर निर्भर हैं।

लेकिन बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, भारत पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा है, जो भाजपा के लिए एक कमजोर कड़ी है क्योंकि वह राष्ट्रीय चुनाव के फेज में प्रवेश कर रही है। हालांकि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत का बेरोजगारी डेटा अपर्याप्त है, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी द्वारा रिपोर्ट किए गए एक व्यापक रूप से उद्धृत उपाय के अनुसार, बेरोजगारी दर लगभग 9 प्रतिशत है। कांग्रेस के नेतृत्व में मोदी के विरोधियों ने हाल के राज्य चुनावों में इस मुद्दे पर भाजपा पर जोरदार हमला किया है और साथ ही सत्ताधारी पार्टी पर असमानता के मुद्दे पर भी प्रहार किया है।

लेकिन पीएम मोदी इसके बजाय पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के द्वारा इकट्ठा किए गए बेरोजगारी के आंकड़ों का हवाला देते हैं, जिसके बारे में वे कहते हैं कि वह "बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट" को दर्शाता है। “जब उत्पादकता और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार जैसे विभिन्न परफॉरमेंस पैरामीटर्स का मूल्यांकन किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एक विशाल और युवा राष्ट्र भारत में रोजगार सृजन, वास्तव में तेज हुआ है,” पीएम मोदी कहते हैं।

भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अड़चनें और युवाओं में स्किल गैप; कारोबार के लिए के कुछ ऐसी बाधाएं हैं, जिनके बारे में भारतीय और विदेशी कंपनियां शिकायत करती हैं - और जिन पर कुछ लोगों का मानना है कि ये बाधाएं, देश को चीन के मैन्युफैक्चरिंग-आधारित आर्थिक उत्थान को दोहराने से रोक सकती हैं।

“जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो पीएम मोदी कहते हैं, “आपने चीन के साथ तुलना की है, लेकिन भारत की तुलना अन्य लोकतंत्रों से करना अधिक उपयुक्त हो सकता है।”

"यह समझना महत्वपूर्ण है कि अगर आपने जिन मुद्दों को उजागर किया है, वे उतने ही व्यापक होते, तो भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल नहीं कर पाता।" पीएम मोदी कहते हैं, "अक्सर, ये चिंताएं धारणाओं से उपजी होती हैं, और धारणाओं को बदलने में कभी-कभी समय लगता है।"

मोदी स्किल गैप के तर्क के विरुद्ध गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी शीर्ष कंपनियों में भारतीय मूल के सीईओ की उपस्थिति को इंगित करते हैं - हालांकि कुछ विश्लेषकों ने इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि इतने कुशल भारतीय विदेश जाते हैं, यह इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए स्वदेश वापसी के लिए बहुत कम अवसर हैं।

पीएम मोदी से जब पूछा गया कि क्या भारत को ऐसी प्रतिभाओं को, अपने देश लौटने के लिए आकर्षित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, तो वे कहते हैं, “यह उन्हें वापस लाने की आवश्यकता का विषय नहीं है।' बल्कि, हमारा लक्ष्य भारत में ऐसा वातावरण बनाना है कि लोगों को स्वाभाविक रूप से भारत में, देश की प्रगति का हिस्सा बनने का अवसर हासिल हो।”

वह आगे कहते हैं, "हम ऐसी परिस्थितियां बनाने की आकांक्षा रखते हैं जहां हर कोई भारत में निवेश करने और यहां अपने कार्यों का विस्तार करने में वैल्यू देखे।"

मोदी सरकार के कुछ अधिकारियों ने निजी तौर पर सुधारों के बारे में बात की है, जैसे कि श्रम कानूनों का उदारीकरण, अगर प्रधानमंत्री तीसरा कार्यकाल जीतते हैं।

हम एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना करते हैं जहां दुनिया भर से कोई भी भारत में घर जैसा अनुभव करे, जहां हमारे प्रोसेस और स्टैंडर्ड्स परिचित और स्वागतयोग्य हों," वे कहते हैं। "यही वह समावेशी, वैश्विक स्तर की प्रणाली है जिसे हम बनाने की आकांक्षा रखते हैं।"

लोकतंत्र के लिए खतरा?

पीएम मोदी के सबसे मुखर विरोधी, गांधी के नेतृत्व में - भाजपा के मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी - ने सवाल किया है कि क्या भारत का लोकतंत्र तीसरे मोदी कार्यकाल में बच जाएगा। मोदी सरकार ने सिविल सोसाइटी ग्रुप्स पर एक दबाव डाला है, जो अपनी फंडिंग पर सख्त अंकुश का सामना कर रहे हैं, और - वॉचडॉग ग्रुप्स जैसे रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार - दुनिया के सबसे बड़े मीडिया जगतों में से एक में पत्रकार, बढ़ते राजनीतिक और वित्तीय दबाव का सामना कर रहे हैं।

गांधी उन सांसदों में से एक हैं जिन्होंने इस साल अदानी समूह के बारे में एक शॉर्ट सेलर की रिपोर्ट के बाद पीएम मोदी की आलोचना की है, उन्होंने प्रधानमंत्री के राज्य गुजरात से आने वाले एक कारोबारी समूह के बारे में सवाल उठाए हैं। अदानी समूह के इर्दगिर्द का विवाद, भारत की अर्थव्यवस्था के आसपास कुछ बड़े बिजनेस फैमिली ग्रुप्स के जुटान के बारे में व्यापक चिंताओं को उजागर करता है।

पार्टी के आलोचकों का कहना है कि भाजपा सरकार में मुस्लिम विरोधी घृणास्पद भाषणों का प्रसार हुआ है, और भाजपा के पास कोई भी सेवारत सांसद या वरिष्ठ सरकारी मंत्री नहीं हैं जो मुस्लिम हों।

भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों का भविष्य क्या है, यह पूछे जाने पर, पीएम मोदी इसके बजाय भारत के पारसी लोगों की आर्थिक सफलता की ओर इशारा करते हैं, जिन्हें वे "भारत में रहने वाली एक रिलीजियस मैक्रो-माइनॉरिटी" कहते हैं।

पीएम मोदी कहते हैं, ''दुनिया भर में उत्पीड़न का सामना करने के बावजूद, उन्हें भारत में एक सुरक्षित ठिकाना मिल गया है, वे खुशी से और समृद्ध होकर रह रहे हैं।'' इस जवाब में देश के लगभग 20 करोड़ मुसलमानों का कोई सीधा संदर्भ नहीं है। "इससे पता चलता है कि भारतीय समाज में किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक के प्रति भेदभाव की कोई भावना नहीं है।"

मोदी सरकार द्वारा अपने आलोचकों पर कथित तौर पर किए गए दमन के बारे में एक सवाल सुनकर वह एक लम्बा और जोरदार ठहाका लगाते हैं।

"हमारे देश में उपलब्ध स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके एक पूरा इकोसिस्टम हर रोज़ अखबारी लेखों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, वीडियो, ट्वीट्स के ज़रिए ये आरोप हमारे ऊपर लगाता है," पीएम मोदी कहते हैं। "उन्हें ये करने का अधिकार है। लेकिन दूसरों को भी तथ्यों के साथ जवाब देने का उतना ही अधिकार है।"

भारत को कम आंकने के सदियों पुराने इतिहास की ओर इशारा करते हुए, पीएम मोदी कहते हैं कि 'बाहरी लोग' अक्सर यही गलती करते हैं।

"1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, ब्रिटिश शासकों ने भारत के भविष्य के बारे में बहुत ही नकारात्मक भविष्यवाणियां की थीं। लेकिन हमने देखा है कि वे भविष्यवाणियां और पूर्वाग्रह सभी गलत साबित हुए हैं।"

पीएम मोदी आगे कहते हैं, जो लोग आज भी उनकी सरकार पर संदेह करते हैं, "वे भी गलत साबित होंगे।"

Source: फाइनेंशियल टाइम्स

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Text of PM’s remarks in the Rajya Sabha
April 17, 2026

आदरणीय सभापति जी,

सदन की ओर से, मेरी तरफ से, मैं श्रीमान हरिवंश जी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं और शुभकामनाएं भी देता हूं। राज्यसभा उपसभापति के रूप में लगातार तीसरी बार निर्वाचित होना, यह अपने आप में इस सदन का आपके प्रति जो गहरा विश्वास है और बीते हुए कालखंड में आपके अनुभव का जो सदन को लाभ मिला है, सबको साथ लेकर चलने का आपका जो प्रयास रहा है, उसको एक प्रकार से सदन ने आज एक मोहर लगा दी है और यह अपने आप में यह एक अनुभव का सम्मान है, एक सहज कार्य शैली का सम्मान है और एक सहज कार्य शैली की स्वीकृति भी है। हमने सबने हरिवंश जी के नेतृत्व में सदन की शक्ति को और अधिक प्रभावी होते हुए भी देखा है और मैं कह सकता हूं कि केवल सदन की कार्यवाही का संचालन ही नहीं, वह अपने जीवन के जो भूतकाल के अनुभव हैं, उसको भी बहुत ही सटीक तरीके से सदन को समृद्ध करने में उपयोग लाते हैं। उनका यह अनुभव पूरी कार्यवाही को, संचालन को और सदन के माहौल को और अधिक परिपक्व को बनाता है। मुझे विश्वास है, उपसभापति जी का नया कार्यकाल उसी भावना, संतुलन और समर्पण के साथ आगे बढ़ेगा और हम सबके प्रयासों से सदन की गरिमा को नई ऊंचाई प्राप्त होगी।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी का जन्म यूपी के गांव में हुआ और सहज रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण उन्हें अपने गांव के विकास में विद्यार्थी काल से भी कुछ ना कुछ करते रहे। उनकी शिक्षा-दीक्षा काशी में हुई और इन सारे विषयों पर मुझे भूतकाल में बोलने का अवसर मिला, तो मैं काफी कुछ कह चुका हूं। इसलिए मैं आज इसको दोहराता नहीं हूं। एक बात का उल्लेख आज जरूर मैं करूंगा, आज 17 अप्रैल है और 17 अप्रैल 1927, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती भी है और विशेषता यह है कि आज 17 अप्रैल को आप जब तीसरी बार इस दायित्व को संभालने जा रहे हैं और वह भी चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर और चंद्रशेखर जी के साथ आपका जुड़ाव, उनके प्रति आपका लगाव और एक प्रकार से आप उनके सहयात्री रहे, उनके पूरे कार्यकाल में, तो यह एक अपने आप में एक बहुत ही बड़ा सुयोग है। अपने चंद्रशेखर जी के जीवन पर किताबें भी लिखी हैं और चंद्रशेखर जी के एक वृहद जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बहुत बड़ा काम भी आपने किया है और इसलिए आपके लिए एक बहुत बड़ा विशेष अवसर बन जाता है कि चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर आपके तीसरा कार्यकाल का प्रारंभ हो रहा है। हरिवंश जी का सार्वजनिक जीवन केवल संसदीय कामों तक सीमित नहीं रहा है। पत्रकारिता के उच्च मानदंड, यह आज भी आदर्श के रूप में रेखांकित किए जाते हैं। लंबा जीवन पत्रकारिता का रहा है, लेकिन पत्रकारिता में भी उन्होंने उच्च मानदंड को हमेशा आधार माना। हम सब जानते हैं, उनके लेखनी में धार है, लेकिन उनकी वाणी में और व्यवहार में सौम्‍यता और शिष्‍टता भरी-भरी रहती है, यह अपने आप में और मैं जब गुजरात में था, तब भी मैं उनकी लेखों को पढ़ने की मेरी आदत रही थी और मैं देखता था कि वह अपना पक्ष बड़ी दृढ़ता के साथ रखते थे और मैं अनुभव करता था कि उसमें काफी अध्ययन के बाद उसका निचोड़ उसमें प्रकट होता था। पत्रकारिता में भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का उनका निरंतर प्रयास रहा और एक सफल प्रयास भी रहा और हम देखते हैं, सदन में भी चाहे पॉलिसी हो या प्रोसेस हो, उन बातों का कहीं ना कहीं छाया हमें हमेशा नजर आती है और यह हम सबके लिए सुखद अनुभव है। वह समाज की वास्तविकताओं के साथ गहरे जुड़ाव के साथ काम करने वाले व्यक्ति रहे हैं। मैं तो कहूंगा, जो चाहे लोकसभा हो या राज्यसभा हो, जो नए सांसद आते हैं, जो हरिवंश जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं, बहुत कुछ बातें करके उनसे जान सकते हैं, क्योंकि जब वह पत्रकारिता में थे, तो उनकी कॉलम चलती थी, हमारा सांसद कैसा हो, हमारा पार्लियामेंट मेंबर कैसा हो, तब उनको शायद पता नहीं होगा, कभी उनको ही बैठना पड़ेगा। लेकिन वह लिखते थे और वह बातों में बहुत व्यापकता रहती थी। सदन की गरिमा और बैठने वाले सदस्य का दायित्व, अब उसके आचार विचार को लेकर भी बहुत गहरा उनका अध्ययन रहता था और उन बातों का उपयोग आज हमारे सदन के साथी, उनके साथ बैठकर के बहुत कुछ जान सकते हैं, सीख सकते हैं। समय की पाबंदी एक डिसिप्लिन लाइफ में और अपने कर्तव्‍यों के प्रति गंभीरता, यह आपकी विशेषता रही है और शायद इसी के कारण आप सर्व स्वीकृत व्‍यक्‍तित्‍व आपका विकसित हुआ है। हमने देखा होगा जब से वह राज्यसभा के सदस्य बने हैं, मैं कह सकता हूं कि पूर्ण समय वह सदन में होते हैं। सभापति जी की अनुपस्थिति में सदन को संभालने का काम तो करते ही हैं, लेकिन बाकी समय भी यहां कमेटी का कोई भी व्यक्ति बैठा हो, तो भी वह सदन में हमेशा अपनी मौजूदगी रहती है। हर बात को सुनते हैं, उस समय सदन का जो संचालन करते हैं, उनके कार्य को भी देखते हैं और यह इसके पीछे उनको अपना जो दायित्व है, उसके प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता है, उसके कारण यह संभव होता है और यह हम सबके लिए सीखने जैसा है और मैंने देखा है कि वह पूरा समय इन चीजों के लिए वह खपा देते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

उपसभापति के तौर पर सदन को कैसे चलाया, सदन में सदस्य के तौर पर क्या योगदान दिया, इस बारे में हम स्वाभाविक रूप से एक सकारात्मक चर्चा करते रहते हैं। लेकिन सदन के बाहर, जनता के बीच वह कैसे अपने लोकतांत्रिक और सामाजिक दायित्‍वों को निभाते हैं, यह भी हम सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके लिए सचमुच में ध्यान आकर्षित करने वाले विषय हैं और हमें उसको देखना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि काम सराहनीय तो है ही हैं, अनुकरणीय भी हैं। हमारा देश युवा देश है और मैंने देखा है कि हरिवंश जी ने अपने समय का उपयोग सबसे ज्यादा युवाओं के बीच में बिताना पसंद किया है। युवाओं में लगातार गंभीर विषयों पर जागरूकता बने, एक प्रकार से लोक शिक्षा का काम निरंतर चलता रहे, यह अपने आप में वह लगातार करते रहते हैं, तो देश भर में उनका भ्रमण रहता है। वह मीडिया की नजरों में बहुत ज्यादा रहने का उनका शौक नहीं है, लेकिन भ्रमण और कार्यक्रमों की संख्या उनकी लगातार चलती रहती है। 2018 में, जब उन्होंने राज्यसभा के उपसभापति की भूमिका निभानी शुरू की, उसके बाद जो मेरी जानकारी है, कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज में 350 कार्यक्रम किए हैं। यह एक बहुत बड़ा काम है। देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजेस में 350 से अधिक कार्यक्रम, जाना-आना, उनके साथ बैठना, बातें करना, उसके लिए विषयों की तैयारी करना, यह अपने आप में बहुत बड़ा, एक प्रकार से आपने बृहतस्य के रूप में इस काम को किया है और युवाओं से ही जुड़ने के लक्ष्य को आपने जरा भी ओझल नहीं होने दिया है। और विकसित भारत का सपना युवाओं के लिए भी क्यों होना चाहिए, इस मूल विषय को अलग-अलग तरीके से जिस प्रकार से विद्यार्थियों का मूड हों, वह बताते रहते हैं। विद्यार्थियों में, युवा पीढ़ी में एक आत्मविश्वास कैसे पैदा हो, निराशा से वह हमेशा-हमेशा बाहर रहें, इन सारे विषयों की चर्चा वह करते हैं। उनके कुछ ऐतिहासिक रेफरेंस के साथ बात करते हैं कि हम ऐसे क्या कारण हैं कि हम जितनी तेजी से जाना चाहिए था, आगे नहीं जा पाए, अब अवसर क्या आया है, सारी बातें हो और देश इतनी बड़ी छलांग लगा सकता है, उसका आत्मविश्वास भरने का काम उनके द्वारा होता है। आजकल देश में लिटरेचर फेस्टिवल, एक बड़ा सिलसिला चला है और अब तो वह टीयर-2, टीयर-3 सिटीज़ तक भी वह सिलसिला चला है। लिटरेचर फेस्टिवल्स में भी हरिवंश जी का अक्सर जाना होता है और उस समाज का, उस तबके को भी वह अपने विचारों से प्रभावित करते रहते हैं, प्रेरित करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

मैंने उनके जीवन का एक प्रसंग जो सुना है, शायद हो सकता है, सार्वजनिक तौर में मेरी जानकारी सटीक ना भी हो। मैंने सुना है कि 1994 में हरिवंश जी पहली बार विदेश यात्रा की और वह अमेरिका गए। जब अमेरिका गए, तो अपने सारे कार्यक्रमों के अलावा उनसे पूछा गया कि आप कहीं और जाना चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं। तो उन्होंने आग्रह से कहा कि मैं जरूर यह विकसित देश है, तो मैं उसकी यूनिवर्सिटी को देखना-समझना चाहता हूं और वहाँ की ऐसी कौन सी शिक्षा और कल्चर है, जिसके कारण यह देश इतना आगे बढ़ रहा है और उन्होंने काफी समय अपने निर्धारित कार्यक्रमों के सिवाय वह पहली अमेरिका की यात्रा में सिर्फ और सिर्फ यूनिवर्सिटीज में बिताया, उसका अध्ययन करने का काम किया। यानी यह जो ललक थी उनके मन में, यह अगर यह विकसित देश की यूनिवर्सिटी से जो निकलता है, तो हिंदुस्तान की यूनिवर्सिटीज़ भी ऐसी हों, ताकि विकसित भारत का सपना वहीं से रेखांकित किया जा सके।

आदरणीय सभापति जी,

MPs को MPLAD फंड के संबंध में तो काफी चर्चा रहती है और एक बड़ा प्रसंगी का विषय भी रहता है MPs में और कभी-कभी तो यह भी संघर्ष रहता है कि MPLAD फंड इतना है और वहां उधर एमएलए फंड ज्यादा है, उसकी चर्चा रहती है। लेकिन एमपी फंड का उपयोग कैसे हो, MPLAD जो फंड की बातें हैं, उसमें हरिवंश जी के विचारों को तो मैंने स्वयं भी सुना है, मैं प्रभावित हूं इससे, लेकिन हमारी भी कुछ मजबूरी रही है। शायद हम उनकी अपेक्षा के अनुसार उसको कर नहीं पाए हैं, क्योंकि सबको ऐसे विषय में साथ लेना जरा कठिन होता है। लेकिन उन्होंने खुद की उस जिम्मेदारी को कैसे निभाया है, मैं समझता हूं वह भी हम लोगों ने, उन्होंने यह MPLAD फंड था, जो अपने जो विचार हैं, उसके विचार को भी नीचे धरातल पर उतारने के लिए उपयोग किया, शिक्षा क्षेत्र और युवा पीढ़ी, यह उसके सारे केंद्र में रहा, MPLAD फंड उन्होंने इस्तेमाल करने के लिए एक मिसाल पेश की है। उन्होंने विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थानों में ऐसे अध्ययन केंद्र स्थापित किया और उसका प्रभाव लंबे अरसे तक रहने वाला है और उसमें भी उन्होंने प्रोजेक्ट ओरिएंटेड, समस्या के समाधान को केंद्र में रखा। जैसे लुप्त होती जा रही भारतीय भाषाओं, उनके संरक्षण के लिए उन्होंने आईआईटी पटना में एक अध्ययन केंद्र के लिए MPLAD फंड का उपयोग किया, तो उस काम को वह लगातार वहां हो रहा है। एक और उन्होंने काम किया, जो बिहार में कुछ क्षेत्र हैं, जहां भयावह भूकंप की घटनाएं रोज घटती रहती हैं, नेपाल में भी एक छोटा सा भूकंप आ जाए, तो भी उस क्षेत्र का प्रभावित करता है। इस काम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से सेंटर फॉर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग के रूप में एक स्टडी सेंटर रिसर्च के लिए खुलवाया है। यानी वह स्टडी का काम करना, रिसर्च करना, उस पर लगातार काम कर रहा है। हम जानते हैं कि जैसा मैंने कहा है, जय प्रकाश जी का गांव सिताब दियारा हरिवंश जी वहीं हैं और वहां गंगा और घाघरा दो नदी के बीच में एक गांव है, तो हमेशा ही जल के कारण जो कटाव की समस्या रहती है, वो गांव परेशान रहता है और नदी धारा भी बदलती रहती है, तो विनाश भी बहुत होता रहता है। उसको भी ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उन्होंने पटना की आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी में एक नदी अध्ययन केंद्र खुलवाया है। पटना के ही चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्था में वो बिजनेस इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर बनवा रहे हैं। एआई के इस दौर में मगध विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर बनाया है। यानी MPLAD फंड का एक निर्धारित दिशा में काम कैसे किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण आपने प्रस्तुत किया है।

आदरणीय सभापति जी,

हम सभी ने अनुभव किया है कि लोग जब अपने गांव से स्थानांतरण करते हैं, एक दूसरे शहर में जाते हैं, तो जीवन में एक प्रकार से गांव से कट जाते हैं। हरिवंश जी का जीवन आज भी गांव से जुड़ा रहता है, अपने गांव से जुड़ा रहता है। वह लगातार वहां के सुख दुख के साथी बन करके वह अपना जो भी कंट्रीब्यूशन कर सकते हैं, वह करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

जिस संसद की नई इमारत में बैठे हैं, उसका जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब मुझे उनके साथ निकट से काम करने का अवसर आया। और मैं अनुभव कर रहा था कि जो विचार मेरे मन में आते थे, मैं हरिवंश जी से कहता था, हम ऐसा करें तो कैसा होगा, दो दिन में वो बराबर परफेक्ट उसको लेकर आते थे, कहीं नामकरण करना है, उसके पहचान इस सदन की कैसे बने, तो काफी कुछ कंट्रीब्यूशन सदन के निर्माण में, उसकी आर्ट गैलरी में, विभिन्न द्वार के नाम रखने हों, यानी हर प्रकार से मेरे एक साथी के रूप में हम दोनों को और मुझे बड़ा आनंददायक रहा वो अनुभव काम का।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी के सदन को चलाने की कुशलता को तो हम भली भांति देखे हैं, लेकिन साथ-साथ उन्होंने राज्यों की विधानसभाएं, विधान परिषदें और वहां जो प्रीसाइडिंग ऑफिसर्स हैं, उनको भी कैसे मदद रूप होना, उनके लिए किस प्रकार से आवश्यक उनके ट्रेनिंग के लिए काम किया जाना, उसके लिए भी काफी समय दिया और उन्होंने लगातार उनके लिए समय दिखाया। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन में भी उन्होंने भारत की डेमोक्रेटिक व्यवस्था की छाप छोड़ने में बहुत बड़ी सक्रिय भूमिका निभाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि 21वीं सदी का यह दूसरा क्वार्टर यह सदन को बहुत कुछ कंट्रीब्यूट करना है। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने में, विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में, मुझे विश्वास है कि सदन के द्वारा बहुत कुछ होगा और उसके कारण पीठाधीश सबका दायित्व बहुत बड़ा होता है। हम सबका बड़े विश्वास से मैं कह सकता हूं कि सभी साथी आप जो चाहते होंगे, उसको पूरा करने के लिए सहयोग करते रहेंगे और आपके काम को कठिनाइयों में ना परिवर्तित करें इसके लिए ताकि आप ज्यादा आउटकम दे सकते हैं और मुझे विश्वास है सब लोग इसको करेंगे और मैंने पहले भी कहा था कि हरि कृपा पर है सब कुछ और हरि तो यहां के भी है, हरि वहां के भी है और हरि यही बैठेंगे। तो हरि कृपा बनी रहे। इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!