सार्वजनिक जीवन में, कुछ मुलाकातें केवल क्षणों को जीवित नहीं रखती है, बल्कि वे आपकी दिशा ही बदल देती हैं। मेरी पहली मुलाकात श्री नरेन्द्र मोदी जी से 1996 में ऐसे ही एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हुई थी। तब में सीखने और योगदान करने की तीव्र इच्छा के साथ एक युवा कार्यकर्ता के रूप में संगठन में शामिल हुआ था। लेकिन जब मैं उनके नेतृत्व में कार्य करके बाहर निकला तो एक बदला हुआ व्यक्ति बनकर उभरा। मोदी जी ने मेरे जीवन में एक ऐसी रेखा खींची जिसने राजनीति को स्पष्टता, समयसीमा और अंतिम नागरिक तक जवाबदेही के साथ उद्देश्यपूर्ण कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

मोदी जी ने जो अनुशासन सिखाया,वह बहुत सरल था। उनका कहना है कि पूरी तरह सुनो, जल्दी फैसला लो, और लगातार काम करते रहो। मुझे एक बात जो उनकी बहुत अच्छी लगी वो ये है कि वे बहुत सहनशील हैं। वे हर बात ध्यान से सुनते हैं, कभी-कभी बोलने वाले से भी ज्यादा धैर्य रखते हैं। थोड़ी देर रुककर, वे जटिल बातों को बहुत सहजता से समझा देते हैं। उनके साथ बैठकें अधूरी उम्मीदों पर नहीं, बल्कि सही मापदंडों और समय सीमा के साथ खत्म होती हैं।

मोदी जी के साथ मेरी भूमिका स्पष्ट थी, तब से यही कार्यशैली रही कि ईमानदारी से काम करो, नियमित रूप से काम की रिपोर्ट दो एवं गलतियों को जल्द से जल्द सुधार करो और यही आदत मेरे कार्य का मूल सिद्धांत बन गई। इसका मतलब था दिखावे की जगह परिणामों को महत्व देना, बिना किसी नाटकीयता के कमियों को स्वीकार करना, और समस्याओं को तुरंत ठीक करना। ईमानदारी सिर्फ एक मूल्य नहीं थी, बल्कि सबसे प्रभावी और व्यावहारिक तरीका भी था काम करने का।

वे शुरुआती वर्ष मेरे लिए एक परीक्षा की तरह रहे। गुजरात में मुझे राजनीतिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई, जिनमें कच्छ की आधी सीटें शामिल थीं — ऐसे इलाके जहाँ दूरियाँ बहुत ज़्यादा थीं, लक्ष्य बेहद अस्पष्ट थे और समयसीमा बिल्कुल कठोर। इसके बाद वाराणसी में, मैंने एक विधानसभा क्षेत्र संभाला, जहाँ हर बूथ अपने आप में एक अलग संसार था।

मोदी जी के विश्वास से प्रेरित होकर मैंने जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी नई जिम्मेदारियाँ स्वीकार कीं। उस पूरे अनुभव से एक बात साफ़ थी की शांत निरंतरता, ऊँची बातों से ज्यादा असरदार होती है और आँकड़े, शोर से अधिक स्पष्टता से बोलते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ जुड़ा मेरा लगभग तीन दशकों का सफर सिर्फ एक सार्वजनिक जीवन की कहानी नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति के कायापलट की यात्रा भी है। यह रिश्ता केवल साझा खिचड़ी पर नहीं बना, बल्कि उस निरंतर कर्मभूमि पर खड़ा हुआ जहाँ हर काम का मूल्यांकन उसके प्रभाव से होता है — और जहाँ यह सुनिश्चित किया जाता है कि विकास की यात्रा में कोई पीछे न रह जाए।

जब मुझे हरियाणा की बागडोर सौंपी गई, तो यह सिर्फ एक पद नहीं था, बल्कि मोदी जी के विश्वास, मार्गदर्शन और मूल्यों की एक अमूल्य विरासत थी। में इस विश्वास के लिए कृतज्ञ था, अपनी जिम्मेदारी के प्रति पूर्णतः सजग था, और सेवा को ही अपना धर्म मानते हुए मोदी जी के सान्निध्य में आगे बढ़ने का संकल्प मेरे भीतर गूंज रहा था।

2014 में जब मोदी जी ने देश का सर्वोच्च पद संभाला, तब पूरे देश में परिणामों की एक व्याकुल प्रतीक्षा साफ महसूस होती थी। लेकिन मोदी जी ने इसका उत्तर सिर्फ नारों से नहीं दिया — उन्होंने एक व्यवस्थित, दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ जवाब दिया।

जन धन योजना और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने कल्याणकारी योजनाओं में हो रही लीपापोती को समाप्त कर दिया। डिजिटल इंडिया ने टेक्नोलॉजी को लक्जरी हाथों से निकालकर आम जनता के लिए सुलभ हो ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया। यूपीआई ने लेनदेन को हर हाथ तक पहुंचा दिया। जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था को एक सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बनाया जिसका उद्देश्य था कि संसाधन केवल कुछ लोगों के हाथ मे न रहें ये हर नागरिक के लिए सुलभ बनें।

आज शहरी विकास के क्षेत्र में मेरा कार्य इसी समग्र दृष्टिकोण को साकार होते हुए दर्शाता है। उदाहरण के लिए, आवास को ही लीजिए। प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी के अंतर्गत यह सुनिश्चित करने के लिए मिशन की अवधि दिसंबर 2025 तक बढ़ाई गई कि स्वीकृत घर, केवल कागज़ पर न रह जाएं, बल्कि पूर्ण रूप से तैयार होकर लोगों को वास्तव में मिलें।

अब तक शहरी क्षेत्रों में 1.19 करोड़ से अधिक घर स्वीकृत हो चुके हैं, जिनमें से 93 लाख से अधिक का निर्माण पूरा हो चुका है। लेकिन हर तैयार घर केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं है—वह एक ऐसी चाबी है जो उस दरवाज़े को खोलती है, जो पहले कभी था ही नहीं।

यही है “अंतिम पंक्ति के व्यक्ति” को गरिमा देने का सजीव उदाहरण — ज़मीनी स्तर पर आत्मसम्मान को साकार करने वाली सोच।

शहरों की अर्थव्यवस्था की नाजुक रीढ़—फुटपाथ विक्रेता—को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के माध्यम से सशक्त किया गया। इस योजना में माइक्रो-क्रेडिट को जमानत नहीं, बल्कि डिजिटल लेनदेन से जोड़ा गया। इससे छोटे-छोटे उद्यम भी एक भरोसेमंद आजीविका का आधार बन सके।

जुलाई 2025 तक 68 लाख से अधिक रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को 13,800 करोड़ रुपये की राशि के 96 लाख से अधिक ऋण प्रदान किए जा चुके हैं। इनमें से लाखों ने डिजिटल भुगतान को अपनाया—यह एक जीवंत प्रमाण है कि जब व्यवस्था समावेशी होती है, तो गरिमा भी व्यापक स्तर पर पहुँचती है।

शहरों का परिवर्तन केवल बड़ी इमारतों या चमक-धमक वाली परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। यह उन इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में भी है जो दिखते कम हैं, पर ज़िंदगी के लिए बेहद ज़रूरी हैं—जैसे पाइपलाइन, नालियाँ और स्ट्रीट लाइटें।

AMRUT और AMRUT 2.0 योजनाओं के तहत पिछले एक दशक में दो करोड़ से अधिक घरों तक नल कनेक्शन और करीब डेढ़ करोड़ सीवर कनेक्शन पहुँचाए गए। अब लगभग एक करोड़ एलईडी स्ट्रीट लाइटें हमारे शहरों को रोशन कर रही हैं—जो न केवल ऊर्जा की बचत करती हैं, बल्कि नगर निकायों के खर्च को भी कम करती हैं।

शहरी स्थानीय निकाय अब म्यूनिसिपल बॉन्ड्स के ज़रिए अपने भविष्य को स्वयं फाइनेंस कर रहे हैं—ये वे अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण सफलताएँ हैं जो हमारे शहरों को वास्तव में रहने योग्य बनाती हैं।

स्मार्ट सिटीज मिशन अब ज़मीन पर दिखाई देने लगा हैं। मई 2025 तक, इस मिशन के तहत शुरू की गई 8,000 से अधिक परियोजनाओं में से 94 प्रतिशत पूरी हो चुकी थीं, और शेष भी अंतिम चरण में थीं। यह दर्शाता है कि यदि नागरिक दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनें, तो संघीय योजनाएँ भी समयबद्ध रूप से सफल हो सकती हैं। शहरी प्रयासों को एकजुट करने के लिए नेशनल अर्बन डिजिटल मिशन एक साझा डिजिटल आधार तैयार कर रहा है—ऐसे साझा प्लेटफॉर्म, रियल-टाइम डैशबोर्ड और मॉड्यूलर सेवाएँ जो शहरों और नागरिकों के बीच की दूरी को कम कर रही हैं।

अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ हुए समझौतों के अंतर्गत हजारों शहरी निकाय इस प्रणाली से जुड़ चुके हैं। लाइसेंस, जन शिकायतों और स्वच्छता जैसे कार्यों के लिए तैयार किए गए डिजिटल मॉड्यूल एक साझा टेक्नोलॉजी स्टैक पर चल रहे हैं।

बिजली के क्षेत्र में भी इसी तरह की परिवर्तनकारी कहानी देखने को मिलती है। सौभाग्य योजना के तहत मार्च 2022 तक लगभग 2.86 करोड़ घरों में बिजली पहुँचाई गई, जिससे करोड़ों लोगों के जीवन से अंधकार मिट गया।

लेकिन केवल बिजली पहुँचाना पहला कदम नहीं था। इसके बाद विश्वसनीयता की बारी थी, जो पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना के तहत सुनिश्चित की गई हैं।

अब तक 20 करोड़ से अधिक स्मार्ट मीटर स्वीकृत किए जा चुके हैं, और 2.4 करोड़ से अधिक इंस्टॉल हो चुके हैं। इससे बिजली वितरण प्रणाली पारदर्शी से उत्तरदायी बनी है। स्मार्ट मीटर अब केवल तकनीकी उपकरण नहीं हैं, बल्कि सशक्त शासन का साधन बन चुके हैं।

रिन्यूएबल-एनर्जी उत्पादन में निर्णायक प्रगति हुई। अगस्त 2025 तक, भारत ने लगभग 1.92 लाख मेगावाट रिन्यूएबल-एनर्जी (बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को छोड़कर) स्थापित की — जिसमें लगभग 1.23 लाख मेगावाट सौर ऊर्जा और 52,000 मेगावाट से अधिक पवन ऊर्जा शामिल हैं। बात केवल आंकड़ों की नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर इसे सामान्य बनाने की है। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के माध्यम से रूफटॉप सोलर घर-घर तक पहुंचा, और स्व-उत्पादन को मुख्यधारा में लाने के लिए स्पष्ट समयसीमाएं तय की गईं। गांव की चौपालों से लेकर शहरों की छतों तक, सोलर पैनल अब एक परिचित छवि बन चुके हैं।

इन सभी क्षेत्रों से एक स्पष्ट पैटर्न उभरकर सामने आता है—आस्था, जो आंकड़ों से जुड़ी हो और महत्वाकांक्षा, जो समयसीमाओं से अनुशासित हो। प्रधानमंत्री मोदी खुद को देश का प्रधान सेवक कहते हैं—ये कोई सजावट या दिखावा नहीं, बल्कि उनके कार्यशैली का मूल मंत्र है। यह उनके साथ कार्य करने वालों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि विकास में ढिलाई को स्वीकार न करें, लोगों का सम्मान करें, पारदर्शिता से कार्य करें, और समय का सम्मान करें। यहाँ नेतृत्व का अर्थ श्रेय लेना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की संस्कृति को जीना है।

जब मोदी जी राष्ट्र सेवा के अपने 76वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, मैं करोड़ों लोगों के साथ उन्हें शक्ति और सफलता की शुभकामनाएँ देता हूँ। विश्व मंच पर वे एक अनुभवी राजनेता हैं, जो भारत के जहाज को वैश्विक अशांत समुद्रों में कुशलता से संचालित कर रहे हैं—साझेदारियाँ बना रहे हैं, हमारे हितों को आगे बढ़ा रहे हैं, ग्लोबल साउथ की आवाज उठा रहे हैं, और जब हालात कठिन होते हैं तब भी अपने सिद्धांतों पर अडिग बने हुए हैं।

आगे आने वाले वर्षों में वे स्पष्ट दृष्टि के साथ देश को ‘विकसित भारत’ के बड़े लक्ष्य की ओर ले जाएं। जहाँ सभी के लिए सामान अवसर हो और हमारे देश का क्षितिज व्यापक हो। जो लोग उनके मार्गदर्शन में सीखने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं। उनके लिए लक्ष्य निश्चित है। हम सभी को इसी उद्देश्य, गति और विश्वास को समाज के आखिरी व्यक्ति तक बनाए रखना है।

(मनोहर लाल खट्टर, केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। वे ट्विटर पर @mlkhattar के नाम से एक्टिव हैं।)

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
India aims for double-digit growth in .in, .bharat domain registrations

Media Coverage

India aims for double-digit growth in .in, .bharat domain registrations
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
परंपरागत ढर्रे से आगे बढ़कर काम करने वाले नेता हैं नरेन्द्र मोदी
February 28, 2026

शायद यह आदत थी, या फिर वह हल्की सी घबराहट जो 140 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री को कुछ देते समय होती है और मन में यही उम्मीद रहती है कि सब ठीक चले। मैंने अपने नोटपैड के कोने पर जल्दी से एक लाइन लिखी, यह देख लिया कि पेन ठीक चल रहा है, और फिर उसे उन्हें दे दिया।

उन्होंने पेन की ओर देखे बिना उसे ले लिया। वह मेरी तरफ देख रहे थे।

नरेन्द्र मोदी को करीब से देखकर मैंने सबसे पहले यही बात नोट की। उनकी आंखों का संपर्क। स्थिर, बिना जल्दबाजी का, ऐसा कि लगे यह मुलाकात तय समय की औपचारिकता नहीं है। उन्होंने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी, और जब उन्होंने हाथ मिलाया तो पकड़ मजबूत थी और आम तौर पर जितनी देर होती है उससे एक पल ज्यादा रही। सब कुछ सुनियोजित सा लगा, जैसे वह चाहते हों कि आपको महसूस हो कि वह सच में गंभीर हैं।

उन्होंने इंतजार के लिए माफी मांगी। किंग डेविड होटल के उनके सुइट के बाहर इजरायली सुरक्षा टीम ने मेरी जितनी जांच की, उसका ब्योरा देना भी मुश्किल है। एक वक्त तो मुझे सच में लगा कि खुद उनका निजी निमंत्रण होने के बावजूद मुझे अंदर जाने से रोक दिया जाएगा, जो एक दिलचस्प कॉलम तो बनाता, लेकिन दोपहर को काफी निराशाजनक बना देता।

मोदी को देरी की जानकारी मिल चुकी थी और उन्होंने सबसे पहले माफी मांगी। मैंने उनसे कहा कि दिक्कत उनकी टीम की नहीं, इजरायली पक्ष की वजह से हुई थी। वह मुस्कुराए और कमरे का माहौल थोड़ा हल्का हो गया।

इसके बाद उन्होंने हमारे द्वारा उनके दौरे के लिए प्रकाशित विशेष फ्रंट पेज उठाया, उसे कुछ पल देखा और खड़े खड़े, बिना बैठे और बिना किसी औपचारिकता के, हिंदी में दो लाइनें लिखीं: “मानवता सर्वोपरि रहेगी। लोकतंत्र अमर रहेगा।”

उन्होंने अपने नाम से साइन किया और 26 फरवरी, 2026 की तारीख लिखी। इस पूरे काम में शायद 45 सेकंड लगे। उन्होंने दोनों हाथों से पेज वापस कर दिया।

इस जॉब में रहते हुए मैंने बहुत से लोगों का इंटरव्यू लिया है। पॉलिटिशियन, प्रेसिडेंट, धार्मिक नेता, सेलिब्रिटी। एक तरह के पब्लिक फ़िगर होते हैं जिन्हें इतने सालों तक देखा गया है कि वे जो कुछ भी करते हैं वह एक तरह का परफ़ॉर्मेंस बन जाता है। हाथ मिलाना, रुकना, प्रैक्टिस की हुई ईमानदारी। मोदी वैसे नहीं थे। वह उस सुइट में जो कुछ भी कर रहे थे, वह बस वहीं थे, पूरी तरह से, एक ऐसे तरीके से जो सुनने में जितना मुश्किल लगता है, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है।

दुभाषिए के जरिए भी उनकी सोच की लय साफ सुनाई देती थी। पूरे और स्पष्ट विचार। ऐसे ठहराव जो समय निकालने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए हों क्योंकि वह सच में आपकी बात पर विचार कर रहे हों।हैं।
एक बार, मैंने उनसे कहा कि उनका क्नेसेट भाषण, जो एक दिन पहले दिया गया था, इज़राइल की पार्लियामेंट में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला भाषण ऐतिहासिक लगा। उन्होंने इसे बिना किसी घुमाव या बढ़ा-चढ़ाकर बताए, आसानी से लिया, और फिर कुछ ऐसा कहा जो मेरे दिमाग में रह गया: “हमारे देश और धर्म लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा मिलते-जुलते हैं।”

उन्होंने पिछला दिन ठीक यही बात कही थी। डिप्लोमैटिक शिष्टाचार के तौर पर नहीं। एक फिलॉसॉफिकल तर्क के तौर पर।

ज्यादातर नेता जब यरूशलम आते हैं तो सुरक्षा, व्यापार और तकनीक की बात करते हैं। मोदी ने भी यह सब कहा, लेकिन इसके बाद वह बिल्कुल अलग दिशा में चले गए। उन्होंने ऐसा भाषण दिया जिसे मैं सभ्यताओं से जुड़ा भाषण कहूंगा, जिसमें उन्होंने एक सच में दिलचस्प सवाल उठाया: जब दुनिया की दो सबसे प्राचीन जीवित संस्कृतियां एक दूसरे को ध्यान से देखती हैं और कुछ अपना सा पहचानती हैं, तो क्या होता है?

‘टिक्कुन ओलाम’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’

उनका जवाब एक ऐसी तुलना पर आधारित था जो सुनने में सरल लगती है, लेकिन गहराई से सोचें तो काफी अर्थ रखती है। उन्होंने टिक्कुन ओलाम, यानी दुनिया को सुधारने और बेहतर बनाने की यहूदी अवधारणा, को वसुधैव कुटुंबकम के साथ रखा, जो प्राचीन संस्कृत का यह संदेश है कि पूरा विश्व एक परिवार है। उन्होंने हलाखा, यानी यहूदी कानून जो रोजमर्रा के नैतिक आचरण का जीवंत ढांचा है, की तुलना धर्म से की, जो हिंदू परंपरा में नैतिक व्यवस्था और व्यक्तिगत कर्तव्य का सिद्धांत है।

वह जिस बात की ओर इशारा कर रहे थे, वह यह थी कि दोनों सभ्यताओं ने एक ही समस्या का समाधान हैरान करने वाली समानता के साथ किया। सवाल यह है कि ऐसा समाज कैसे बनाया जाए जहां नैतिकता सिर्फ किसी पवित्र दिन दिया जाने वाला उपदेश न हो, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के ताने बाने में शामिल एक व्यवहार हो? यहूदी और हिंदू दोनों परंपराओं ने इसका जवाब दिया: कानून के जरिए, कर्तव्य के जरिए और दिन भर में लिए जाने वाले हजारों छोटे छोटे फैसलों के जरिए।

यह कोई ऐसा संयोग नहीं है जो कूटनीतिक शिखर बैठकों में अचानक सामने आ जाए। यह सदियों पुरानी एक गहरी संरचनात्मक समानता है।

हस्सिदिक विचारधारा के पाठक के लिए यह बात खास असर डालती है। हस्सिदिज्म, जिसे हस्सिदुत यानी हस्सिदिक शिक्षाएं और दर्शन भी कहा जाता है, इसे अवोदाह कहता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है काम, यानी भीतर की आध्यात्मिक भावना जो व्यवहारिक कर्मों के जरिए व्यक्त होती है।

18वीं सदी में हस्सिदुत के संस्थापक बाल शेम टोव ने सिखाया कि ईश्वरीय तत्व दुनिया से दूर हटने में नहीं, बल्कि उसके साथ पूरी तरह जुड़ने में मिलता है, बाजार में, भोजन की मेज पर और आपके सामने खड़े व्यक्ति के साथ आपके व्यवहार में। मोदी ने वही शब्द नहीं इस्तेमाल किए, लेकिन वह उसी परंपरा का सम्मान कर रहे थे और यह बता रहे थे कि भारत ने भी अपनी सभ्यता की नींव इसी आधार पर रखी।
उन्होंने हनुक्का और दिवाली को जोड़ा, जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का हिंदू पर्व है, और यह तुलना सिर्फ काव्यात्मक नहीं है।

दोनों पर्व अंधेरे के सामने निष्क्रिय रहने की सोच को ठुकराते हैं। हनुक्का की कथा में रब्बियों ने एक खास फैसला लिया: धार्मिक आदेश यह नहीं है कि एक बड़ा अलाव जलाया जाए, बल्कि हर रात एक छोटी मोमबत्ती जोड़ी जाए, धीरे धीरे, खुले तौर पर और लगातार। यह इतिहास में सक्रिय भूमिका निभाने की एक सोच है। अंधेरा एक ही बार में खत्म नहीं होता, उसे रोशनी के छोटे छोटे और लगातार किए गए प्रयासों से पीछे धकेला जाता है।

दिवाली भी यही संदेश देती है, करोड़ों घरों में जलते दीयों की कतारें, जहां हर छोटा सा दीपक एक अलग प्रयास है जो मिलकर बड़ी रोशनी बनाता है।

उन्होंने पुरीम की तुलना होली से की, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का हिंदू वसंत पर्व है, और यहां भी यह बौद्धिक जुड़ाव और गहरा है। दोनों त्योहार उस अनुभव पर आधारित हैं जब छिपी हुई सच्चाई अचानक सामने आ जाती है।

पुरीम की कहानी में एस्तेर की पुस्तक में ईश्वर का नाम कहीं नहीं आता। चमत्कार सामान्य महल की राजनीति और इंसानी फैसलों के भीतर छिपा रहता है। हस्सिदिक विचारधारा इसे सबसे गहरी सच्चाई के रूप में देखती है कि ईश्वरीय मार्गदर्शन, यानी हशगाचा प्रतित, जो व्यक्ति के जीवन की बारीकियों में काम करता है, बाहर से अक्सर संयोग या इतिहास जैसा दिखता है। पैटर्न तभी दिखता है जब आप उसे देखने के लिए तैयार हों।

मोदी ने भारत और इजराइल के बीच प्राचीन संबंधों पर जोर दिया। उन्होंने पुराने व्यापार मार्गों, साझा धार्मिक ग्रंथों और फारसी रानी एस्तेर का जिक्र किया, जिनके हिब्रू नाम का मतलब “छिपा हुआ” से जुड़ता है। उनका कहना था कि कुछ रिश्ते इतिहास में बहुत पहले से लिखे होते हैं, कूटनीतिक समझौते तो बाद में होते हैं।

उन्होंने आतंकवाद पर बिना लाग-लपेट के साफ बात की। उन्होंने 7 अक्टूबर के नरसंहार को मुंबई हमलों से जोड़ा, जो भारत का अपना घाव है और आज भी महसूस होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी कारण से निर्दोष लोगों की हत्या सही नहीं ठहराई जा सकती। उन्होंने कहा कि कहीं भी आतंकवाद होगा तो वह हर जगह शांति के लिए खतरा है। उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे कोई लंबे समय से जिस सच को मानता आया हो, उसे दोहराने की जरूरत ही न हो।

फिर उन्होंने ऐसा काम किया जिसने औपचारिक घोषणाओं से ज्यादा लोगों को भावुक कर दिया। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल में मौजूद भारतीय कामगारों और देखभाल करने वालों का खास जिक्र किया। वे लोग जो डटे रहे। जिन्होंने मदद की। जो भागे नहीं। उन्होंने तलमूद की यह बात दोहराई: जो एक जान बचाता है, वह पूरी दुनिया बचाता है।

हसीदुत की नजर से देखें तो यह भाषण का सबसे अहम पल था। इस परंपरा में उस छोटे से दिखने वाले काम को बहुत महत्व दिया जाता है, जिसका असर बहुत बड़ा होता है। सामान्य से काम में छिपी पवित्र चिंगारी, जिसे सही इरादे से किया गया कर्म ऊंचा उठा देता है।

उन्होंने युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे विदेशी कामगारों को दो देशों के रिश्ते का नैतिक केंद्र बना दिया। यह सिर्फ भाषण नहीं था। यह सोच का वह तरीका था, जो जानता है कि असली मायने कहां तलाशने हैं।

उन्होंने एक और बात कही, जिसे इजराइल के दोस्त हमेशा खुलकर नहीं कहते। उन्होंने क्नेसेट से कहा कि यहूदी समुदाय सदियों तक भारत में बिना उत्पीड़न, बिना डर और अपनी उजागर पहचान के साथ रहे। उन्होंने अपना धर्म भी बचाए रखा और समाज में पूरी तरह भागीदारी भी की। उन्होंने इसे भारत के लिए गर्व की बात बताया।

उन्होंने इसे गर्व कहकर सही कहा। और 2026 में यरूशलम में यह बात कहना भी सही था, जब दुनिया में यह सवाल पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है कि यहूदी जीवन आखिर कहां खुले तौर पर और सुरक्षित तरीके से जिया जा सकता है।

सुइट में लौटने पर बातचीत गर्मजोशी भरी रही। उनमें यह खासियत है कि औपचारिक मुलाकात भी असली बातचीत जैसी लगने लगती है। जब मैंने उनसे कहा कि क्नेसेट में दिया गया भाषण ऐतिहासिक लगा, तो उन्होंने वही बात दोहराई जिससे शुरुआत की थी कि दोनों सभ्यताएं जितनी लोग समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा एक जैसी हैं। उन्होंने यह ऐसे कहा जैसे यह निष्कर्ष वे बहुत पहले निकाल चुके थे और अब उन्हें इसे कहने के लिए सही जगह मिल गई हो।

हमारा बुधवार का कवर मेरे उस सुइट में पहुंचने से पहले ही सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा था। मोदी ने इसे एक्स या ट्विटर पर अपने बड़े फॉलोअर समूह के साथ साझा किया। भारतीय मीडिया ने भी इसे उठाया। आजकल पहला पन्ना इस तरह खुद ही दूर तक पहुंच जाता है, कई बार उसके नीचे लिखी बातों से भी तेज।

वे दो हाथ से लिखी पंक्तियां कुछ अलग ही हैं। वे कागज पर दर्ज हैं, यरूशलम के एक होटल के कमरे में, खड़े होकर लिखी गईं, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे कुछ लिखने की जरूरत नहीं थी, फिर भी उसने वही लिखना चुना। मानवता पहले। लोकतंत्र स्थायी है। हनुक्का की एक मोमबत्ती और एक दीया; रात का वही अंधेरा है और उसमें एक-एक कर सावधानी से रोशनी जोड़ते जाने का वही जज़्बा भी एक जैसा ही है

मैंने उन्हें पेन देने से पहले खुद जांच लिया था कि वह ठीक से चल रहा है।

लेकिन बाद में समझ आया, उन्हें मेरी मदद की कोई जरूरत नहीं थी।

(श्री ज्विका क्लेन, यरूशलम पोस्ट के एडिटर-इन-चीफ हैं। यहां व्यक्त किये गए विचार उनके निजी हैं।)

स्रोत: द यरूशलम पोस्ट