सामान्य रूप से ऐसे कार्यक्रम मुंबई में ही होते हैं, और इसके कारण इस प्रकार के कार्यक्रम को ऑर्गनाइज़ करने का भी मुम्बई का स्वभाव है और ऑडियंस को भी आदत होती है..! लेकिन मैं सुभाष जी का आभारी हूँ कि उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए गुजरात को चुना, अहमदाबाद को चुना..! अगर आप एक बार अहमदाबाद में सफल हो गए, तो फिर आपकी गाड़ी कहीं रूकती नहीं है..! हम अहमदाबियों की पहचान है, ‘सिंगल फेयर, डबल जर्नी’..! और ये आपका क्षेत्र ऐसा है जिसमें हर कोई अपने इन्वेस्टमेंट का कुछ ना कुछ रिवॉर्ड चाहता है और इसलिए रूपये की कीमत क्या होती है, रुपये का माहात्म्य क्या होता है, वो शायद अहमदाबादी से अधिक कोई नहीं जानता है..! और हमारे अहमदाबादियों के लिए इस प्रकार के काफी चुटकुले भी बने हुए हैं..! और उस शहर में फाइनेंशियल वर्ल्ड के लोगों का इस प्रकार से एकत्र आना और इस समारोह को यहाँ संपन्न करना, इसके लिए मैं फिर एक बार ज़ी ग्रुप के सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूँ और आभार व्यक्त करता हूँ..!

आप लोग इस विषय के काफी जानकार भी हैं और चिंतित भी हैं। अगर फाइनेंशियल मार्केट बहुत तेजी में होता, तो शायद आज के समारोह में तालियाँ भी ज्यादा बजती। लेकिन मैं देख रहा हूँ मुश्किल से तालियाँ बज रहीं हैं और उसका मूल कारण मार्केट की स्थिति है। अगर मार्केट की स्थिति अच्छी होती, तो शायद आप भी बड़े उमंग से भरे हुए होते, लेकिन मार्केट की स्थिति अच्छी नहीं है इसके लिए आप सुबह-शाम एनालिसिस करते होंगे। आप सोचते भी होंगे कि यार, कुछ भी हो, इस स्थिति से बाहर निकलें..! ये आपके सबके मन में चलता होगा। ये बात सही है कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। किसी भी देश के जीवन में उतार-चढाव तो आते हैं। कभी अच्छी स्थिति भी आती है, तो कभी बुरे दिन भी आते हैं। कभी हम टॉप पर भी होते हैं, तो कभी लो पर भी पहुंच जाते हैं..! लेकिन नीति निर्धारक जब आत्मविश्वास खो चुके होते हैं, इफ दे लूज़ देयर कॉन्फिडेंस, तो वो निर्णय नहीं कर सकते। उन्होंने निर्णय करने का सामर्थ्य खो दिया है। कभी-कभी देश में चर्चा होती है कि चुनाव बहुत जल्दी आ जाएंगे, समय पर चुनाव नहीं होंगे..! तो मुझ से कुछ लोगों ने बात की थी। मैंने कहा देखिए भाई, चुनाव जल्दी भी अगर लाने हैं तो सरकार को निर्णय करना पड़ता है। जो नौ साल में कोई निर्णय नहीं कर पाए, वो ये निर्णय कैसे कर सकेंगे..? तो आप मान कर चलिए कि मजबूरन स्थितियाँ जहाँ चाहेगी, वहाँ जाएगी। कोई ले जाने वाला नहीं है, कोई दिशा तय करने वाला नहीं है, कोई निर्णय करने वाला नहीं है..! और सवा सौ करोड़ का देश इस स्थिति में जब होता है, तब हर प्रकार के संकट अपने आप बढ़ते चले जाते हैं..!

अब आज देखिए आप, रूपये की कीमत जिस तेजी से गिर रही है..! और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच कम्पीटीशन चल रहा है। किसकी आबरू तेजी से गिरती चली जा रही है, कौन आगे जाएगा... इसकी कम्पीटीशन चल रही है..! देश जब आजाद हुआ तब एक डॉलर एक रूपये के बराबर था। एक रूपये में एक डॉलर बिकता था..! जब अटल जी की सरकार थी, अटल जी ने जब पहली बार सरकार बनाई तब तक मामला पहुंच गया था 42 रूपीज तक और अटल जी ने जब छोड़ा तब 44 पर पहुंचा था। चार प्रतिशत का फर्क आया था..! लेकिन इस सरकार के और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रूपये पर पहुंच गया है..! मित्रों, अगर थोड़ा इतिहास की ओर नजर करें, और आप तो इस आर्थिक जगत की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं..! हिन्दुस्तान 1200 साल की गुलामी के बाद 15 अगस्त, 1947 को जब आजाद हुआ, तो उस समय उसके पास ब्रिटिश गवर्नमेंट से वन थाउसेंड मिलियन पाउंड लेना उधार था। यानि हम लेनदार थे, ब्रिटिश गवर्नमेंट कर्जदार थी..! सैकेंड वर्ल्ड वॉर में भारत से जो कुछ भी गया था, वो कर्ज ब्रिटिशर को हिन्दुस्तान को चुकाना था। यानि 1200 साल की गुलामी के बाद भी आजादी का प्रारंभ आर्थिक संकट से नहीं हुआ, आर्थिक संपन्नता के साथ हुआ था..! इतना ही नहीं, विदेशों से कर्ज लेने का प्रारंभ पंडित नेहरू ने किया। आजादी के कुछ ही समय में फर्स्ट फाइव इयर प्लान आया, तो विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया। और तब वर्ल्ड बैंक का स्वतंत्र स्वरूप नहीं था, अमेरिका की गवर्नमेंट की इच्छा से चलता था। और उस समय पंडित नेहरू के जमाने में पहली बार कर्ज लिया गया। आज जरूरत है उस बात को समझने की, कि जब वो पहली बार कर्ज लिया गया, तो उसमें दो शर्त थी। आज डॉलर साठ रूपये पर क्यों बिकता है उसका जवाब वहाँ मिलता है। दो शर्त थी..! एक शर्त ये थी कि वो जो अमेरिका ने पैसे दिए हैं, उन पैसों का उपयोग हिन्दुस्तान के रिसर्च स्कॉलर को अमेरिका में पढ़ने भेजने के लिए स्कॉलरशिप के रूप में खर्च होंगे। देखिए, कितना बुद्घिमानी का काम अमेरिका ने किया..! अमेरिका जिसको चुने वो स्कॉलर, और वो स्कॉलर पढ़ेगे कहाँ..? अमेरिका में..! पैसे कौन से..? जो पैसे अमेरिका ने कर्ज में दिए, वो पैसे..! मतलब आजाद हिन्दुस्तान की पहली स्कॉलर पीढ़ी जो तैयार हो, वो अमेरिका की छाया वाली तैयार हो, ताकि वो गीत अमेरिका के गाएं, इस प्रकार का पहला प्रयास हुआ..! और दूसरा निर्णय किया था कि ये रूपये तब देंगे कि जब आप रूपये की कीमत कम करोगे..! और उस लोन लेने के कारण पंडित नेहरू के समय में पहली बार रूपये की ताकत कम हुई और वो सिलसिला चलता रहा..! मित्रों, कोई भी देश गलत नीतियों के कारण कहाँ जा कर के गिरता है, उसका हम अंदाज कर सकते हैं..!

मैं आज भी मानता हूँ कि भारत जैसा देश, सारी दुनिया की नजर हिन्दुस्तान पे अगर एक बाजार के तौर पर हो और ये देश अगर एक बाजार बन कर के रह जाए, तो ये देश कभी भी अर्थिक संपन्नता प्राप्त नहीं कर सकता..! पूरा विश्व अपना माल हिन्दुस्तान के अंदर जितनी बड़ी मात्रा में डम्प कर सकता है, करना चाहता है..! इतना बड़ा कंज्यूमर मार्केट अवेलेबल है, मित्रों..! अगर से सिलसिला चलता ही रहा और देश का इम्पोर्ट बढ़ता ही गया तो पता नहीं देश की आर्थिक स्थिति कहाँ जा कर के रूकेगी..! मित्रों, आज तेजी से इम्पोर्ट बढ़ रहा है और एक्सपोर्ट में हम पहले से भी नीचे आ गए हैं, यानि स्टेबल भी नहीं रहे, हम जहाँ थे उससे भी नीचे आ गए, और उसके कारण हमारी करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ती चली गई, जिसने पूरी आर्थिक स्थिति पर एक नया बोझ डाल दिया है..!

एफ.डी.आई. और एफ.आई.आई. दोनों के तराजू पर हम संतुलन नहीं कर पा रहे हैं और उसका मूल कारण है हमारी नीतियाँ..! लोग कहते हैं एफ.डी.आई. नहीं आया, फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट नहीं आया... क्यों नहीं आया? कोई भी व्यक्ति हिन्दुस्तान के अंदर धन तब लगाता है जब उसको अपनी पूंजी की सिक्योरिटी महसूस हो। उसको लगे कि हाँ, ये मैं इतना लगा रहा हूँ तो मुझे प्रॉफिट मिलेगा, मुझे गुड गवर्नेंस की अनुभूति हुई है तो मुझे एफिशियेंट गवर्नेंस मिलेगा, मुझे सिंगल विंडो क्लिीयरेंस मिलेगा, तो वो हिम्मत करेगा..! लेकिन अगर पॉलिसी पैरालिसिस है तो उसकी कितनी ही आवश्कयकता होगी, लेकिन वो हिन्दुस्तान की तरफ मुंह नहीं फेरेगा। अगर हमारे यहाँ फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट नहीं आता है और अगर हम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दुर्बल होते चले जाते हैं, तब जा कर के हम इम्पोर्ट करते हैं, एक्सपोर्ट करने के दरवाजे बंद होते चले जाते हैं और आर्थिक स्थिति और लुढकती चली जाती है..!

मित्रों, आप स्टॉक मार्केट की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं। सरकार अगर तीन चीजों को बैंलेस रूप से आगे ना बढ़ाए, तो मैं मानता हूँ कि किसी भी इन्वेस्टर का विश्वास कभी भी नहीं रहेगा..! अब आप देखिए कि आज हमारा ट्रांजेक्शन कितना होता है..? मैं समझता हूँ, मुझे जो बताया गया है कि वो 15 और 20 परसेंट के बीच में आ गया है। और उसमें भी फ्यूचरिस्टिक वाली संख्या ज्यादा है, रियल ट्रांजेक्शन की संख्या कम होती चली जा रही है..! रियल ट्रांजेक्शन इसलिए नहीं हो रहा है कि उसका कॉन्फिडेंस लेवल टूट चुका है। अगर ये स्थिति बनती है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हम कहाँ जा कर के खड़े रहेंगे..! और इसलिए स्टॉक मार्केट में भी एक रिटेल का क्षेत्र है, दूसरा इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट है और तीसरा एफ.आई.आई. का है, इन तीनों को इक्वल बैलेंस होना चाहिए। आज मित्रों, अगर एफ.आई.आई. का शेयर बढ़ गया और जस्ट बिकॉज दुनिया का कोई देश अपना इन्टरेस्ट रेट बढ़ा दें और अचानक एफ.आई.आई. की बहुत बड़ी अमाउंट चली जाए तो पूरा स्टॉक मार्केट नीचे गिर जाएगा और उसके कारण सामान्य मानवी को कोई भरोसा नहीं रहेगा..!

मित्रों, आज चिदम्बरम जी ये कहते हैं कि लोग सोना ना खरीदें..! लेकिन लोग सोना खरीदने के लिए मजबूर क्यों हुए..? मुझे मालूम है, हमारे यहाँ गुजरात में स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना, यानि एक पीओन होगा वो भी सुबह-शाम देखता है कि स्टॉक मार्केट का क्या हाल है..! हमारे यहाँ एक अखबार तो सिर्फ स्टॉक मार्केट के रेट के ऊपर ही चलता है, पूरा का पूरा अखबार... और लोग उसी को खरीदते हैं क्योंकि उनको उसी में इन्टरेस्ट होता है..! लेकिन आज उसका इन्टरेस्ट नहीं रहा, क्योंकि उसको भरोसा नहीं है कि उसको जो कुछ भी इनवेस्ट करना है, उसको वो वापस मिलेगा या नहीं मिलेगा..! तो फिर उसके बाद दो रास्ते बच जाते हैं, रियल एस्टेट में डालो या फिर गोल्ड में डालो। रियल एस्टेट में डालने के लिए मिडिल क्लास, लोअर मिडिल के पास उतनी अमाउंट नहीं होती, इसलिए उसमें डाल नहीं पाता है। तो क्या करेगा..? चलिए भाई, 10 ग्राम, 20 ग्राम, 50 ग्राम, 100 ग्राम गोल्ड ले लो, पैसा बढ़ जाएगा..! अकेले 2012 के वर्ष में 1 लाख करोड रूपयों का गोल्ड इस देश में इम्पोर्ट हुआ है, एक साल में..! और बताया जाता है कि आज हिन्दुस्तान में 18 लाख करोड़ रूपयों का गोल्ड पड़ा हुआ है। नॉन प्रॉडक्टिव ऐसेट है..! मित्रों, अगर ये स्थिति रही तो हमारी सारी आर्थिक व्यवस्था कैसे चलेगी..? और ये क्यों हो रहा है, क्योंकि व्यक्ति को एक ही जगह पर सिक्योरिटी लगती है कि यार, लेकर के रखो, ज्यादा पैसे मिले या ना मिले, लेकिन पैसे तो बच जाएंगे..! या तो उसको लगता है कि रियल एस्टेट..! मित्रों, रियल एस्टेट में भी जाने का कारण क्यों बना है..? हमारी इकॉनोमी पर ब्लेक मनी की इकॉनोमी डॉमिनेट करने लग गई है। और जब ब्लैक मनी की इकोनॉमी डॉमिनेट करती हो, पैरलल इकॉनोमी चलती हो, तो स्वाभाविक है कि लोगों को रियल एस्टेट में जाने का रास्ता ठीक लगता है। और जैन्यूइन आदमी अगर रीयल एस्टेट में जाना चाहता है, तो वो एंटर नहीं कर पा रहा है क्योंकि ब्लैक मनी नहीं है..! एक ऐसे विश्यस सर्कल को देश में चलाया गया है, जिसके कारण देश का पूरा अर्थतंत्र आज स्थितियों को बिगाड़ते चला जा रहा है..!

एशिया की एक विशेषता रही है, सदियों से कि एशियन कंट्रीज का कल्चरली एक-दूसरे पर काफी प्रभाव रहा है। सेविंग ये वैस्टर्न वर्ल्ड के नेचर में नहीं है, सेविंग ये एशियन कल्चर में है, और भारत उसमें लीड करता रहा है। हमारे यहाँ बचत करना, पैसे बचाना और उसमें महिलाओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। गरीब से गरीब महिला होगी, गरीब परिवार की होगी, लेकिन कुछ ना कुछ बचाने की कोशिश करेगी। मित्रों, ये सेविंग का जो स्वभाव है, तो वो पहले स्टॉक मार्केट के अंदर इन्वेस्ट करता था, और उसके कारण हमारी इकॉनोमी को बहुत बड़ा पुश मिलता था, ड्राइविंग फॉर्स बन जाता था। मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास जिसके पास सोना खरीदने की ताकत नहीं है, फ्लेट खरीदने की ताकत नहीं है, जमीन में पैसा नहीं लगा सकता है, वो पाँच-दस रूपये वाले दस-बीस शेयर लेने की केाशिश करता था, क्योंकि उसके पास उतने ही पैसे थे..! लेकिन मंहगाई के कारण मीडिल क्लास, लोअर मीडिल क्लास के लिए अपना घर चलाने में दिक्कत हो गई है, सेविंग खत्म हो चुका है और सेविंग खत्म होने के कारण स्टॉक मार्केट में उसकी एंट्री बंद हो गई है। अगर ये स्थिति बनी रही, तो हमारी पूरी फाइनेंशियल स्थिति और दुदर्शा की ओर चली जाएगी..!

आप देखिए, इम्पोर्ट..! ये तो हम समझ सकते हैं कि नेचुरल रिसोर्सिस में हमारी कुछ सीमाएं होंगी..! पेट्रोलियम, गैस और डीजल के इम्पोर्ट के लिए आज हमारे पास कोई रास्ता नहीं होगा, मजबूरन ही सही, लेकिन हमको लेना पड़ेगा..! लेकिन क्या कारण है कि इलेक्ट्रोनिक गुड्स, मोबाइल फोन, वगैरह में हमारा अरबों-खरबों रुपयों का इम्पोर्ट बढ़ता चला जा रहा है..! क्या हमारा देश मोबाइल फोन मैन्यूफैक्चरिंग में एक बहुत बड़ा जंप नहीं लगा सकता है..? हम हमारे इम्पोर्ट को कम करने का रास्ता नहीं खोज सकते हैं..? हमें मालूम है कि हिन्दुस्तान में इलेक्ट्रोनिक गुड्स का एक बहुत बड़ा मार्केट है। और इलेक्ट्रोनिक गुड्स के मैन्यूफैक्चरिंग के लिए कोई आसमान से बहुत बड़ा स्काय रॉकेट इंजीनियरिंग लाने की जरूरत नहीं है, वो बहुत सामान्य प्रकार की टैक्नोलॉजी है। लेकिन हमने उस पर बल नहीं दिया और उसके कारण आज हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा इम्पोर्ट करने वाले जो तीन सेक्टर हैं, उसमें से एक क्षेत्र है इलैक्ट्रोनिक गुड्स..! हाँ, यदि कोई मेडिकल इक्विपमेंट के लिए कोई बहुत बड़ी एक्स्ट्राऑर्डिनरी चीज आती है तो वन कैन अंडरस्टेंड, लेकिन रूटीन में हमारे यहाँ अपना कम्प्यूटर नहीं बन पा रहा है, हम यहाँ लाकर के एसेंबल करते हैं..! हम अगर हमारे देश में योजनाबद्घ तरीके से करें कि भाई, दस साल के अंदर इस सैक्टर के अंदर इम्पोर्ट करने की स्थिति से हम बाहर आ जाएंगे..! हम क्वालिटी मैटीरियल प्रोवाइड करेंगे, सफिशियेंट मटेरियल प्रोवाइड करेंगे, तो देश की स्थितियाँ नहीं बदलेगी..? लेकिन हमारी नीतियों की कमी के कारण ये हाल हुआ है। हमारा मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट इफेक्टिव नहीं हो रहा है। क्यों नहीं हो रहा है..? अगर हमें दुनिया के सामने टिकना है, तो उत्पादन के क्षेत्र में हमारे लोगों को जरूरत है कि वो कॉस्ट इफैक्टिव हो..! तो उसके लिए क्या चाहिए..? आज देखिए, हिन्दुस्तान में बीस हजार मैगावाट से ज्यादा के बिजली के कारखाने बंद पड़े हैं। कोई देश ऐसा देखा है आपने कि जिसके पास कोयले के खदान हैं, जो अंधेरे में जी रहा है, लोगों को बिजली चाहिए, बिजली के ग्राहक मौजूद हैं और जिसके पास बीस हजार मैगावाट से अधिक बिजली पैदा करने वाले कारखाने तैयार हो..! जस्ट, लीडरशिप नहीं है, पॉलिसी पैरालिसिस है और इसलिए कोयले के निर्णय हो नहीं रहे हैं, खदान में से कोयला निकल नहीं रहा है, कोयला बिजली के कारखाने तक पहुंच नहीं रहा है और देश अंधेरे में डूब रहा है। मैन्यूफैक्चरिंग सैक्टर को सफिशियेंट बिजली मिल नहीं रही है, फार्मर को सफिशियेंट बिजली नहीं मिल रही है और उसके कारण हमारा ग्रोथ कम हो रहा है, हमारे विकास की यात्रा कम हो रही है..!

मित्रों, छोटी-छोटी चीजें है, कोई बहुत बड़ी चीजों की कोई जरूरत नहीं है, सामान्य चीजें... अगर इन पर भी हमने बल दिया होता, तो मैं नहीं मानता हूँ कि देश आज इतने बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा होता..! और ऐसा नहीं है कि इसके रास्ते नहीं हैं। अटल जी के समय की एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल की अगर हम विगत देखे लें, तो सीना तान कर के कोई भी कह सकता है। मित्रों, उन दिनों तो भारत ने न्यूक्लीयर टैस्ट किया था। पूरे विश्व ने सैंक्शन्स लगा दिये थे, देश आर्थिक संकट में फंसा हुआ था..! ऐसे विकट काल में भी अटल जी के नेतृत्व में हिंदुस्तान में एन.डी.ए. की सरकार, वो भी 24 पार्टियां एक साथ सरकार चलाती थी, एक पार्टी की सरकार नहीं थी, उसके बाद भी ना मंहगाई बढ़ने दी थी, ना इम्पोर्ट बढ़ने दिया था, एक्सपॉर्ट में कटौती आने नहीं दी थी..! जब अटल जी की सरकार बनी तब हमारा सेविंग का रेशो 32% से ज्यादा था और आज वो 30% से भी कम हो गया है..! कोई भी पैरामीटर ले लीजिए। भारत की इकॉनोमी में 21वीं सदी की विकास यात्रा के सपनों की मजबूत नींव अटल जी ने अपने शासन काल में रखी थी। लेकिन देखते ही देखते पिछले नौ साल में जो रखा था वो भी खत्म हो गया और नया कुछ अर्जित नहीं हुआ, ऊपर से नए बोझ और नए संकट हमारे देश पर आते गए और उसी के कारण आज हम संकट से गुजर रहे हैं..! आपका तो पूरा मार्केट, पहले जो इन्वेस्टर था वो सुबह जब स्टॉक मार्केट खुलता था तो उसकी सांस ऊपर-नीचे होती थी। शेयर बाजार में जिसने बेचारे ने हजार-दो हजार रूपये लगाए होते थे, तो वो सोचता था कि यार आज कुछ मिला या नहीं मिला..! आज सांस आपकी ऊपर नींचे हो रही है। ये पहली बार हो रहा है..! और इसलिए इस चिंता की अवस्था में देश एक आत्मविश्वास के साथ कैसे आगे बढ़े, पॉलिसी पैरालिसिस में से देश बाहर कैसे आए..!

प्रधानमंत्री ने कहा था, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं..! प्रधानमंत्री जी, आपके अर्थशास्त्र में पैसे पेड़ पर उगते हों या ना उगते हों, हम गुजरातियों की समझ है और हम मानते हैं कि पैसे खेते में भी उगते हैं, पैसे कारखाने में भी उगते हैं, पैसे मजदूर के पसीने से भी उग सकते हैं, आवश्कता है सही नेतृत्व देकर के नीतियों को बनाने की..! हिन्दुस्तान का किसान खेत में काम करता है तो वो पैसे उगाता है, एक मजदूर फैक्ट्री में मेहनत करता है तो वो पैसे उगाता है और तभी तो देश की तिजोरी भरती है और तभी तो देश चलता है..! ये जो निराशा का माहौल है उससे देश को बाहर लाया जा सकता है। मित्रों, गुजरात एक्सपीरियंस से मैं कहता हूँ कि निराशा की गर्त में डूबे रहने का कोई कारण नहीं है। जब मैं पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में आया, तब मेरे यहाँ रेवेन्यू डेफिसिट सिक्स थाउजेंड सेवन हन्डरेड करोड़ रूपीज़ थी, आज हम रेवेन्यू सरप्लस है..! मित्रों, हो सकता है..! हमारी इलेक्ट्रिसिटी कंपनीज वार्षिक 2500 करोड़ रूपये का लॉस करती थी। आज मित्रों, वो प्राफिट करती है और हम 24 घंटे बिजली देते हैं और टेरिफ नहीं बढ़ाते हैं..! कहने का तात्पर्य ये है मित्रों, अगर सही दिशा में निर्णय किए जाए, देश के सामान्य मानवी की शक्ति पर भरोसा करके निर्णय किया जाए तो देश की स्थिति बहुत बदल सकती है। और मैं बहुत आशावादी इंसान हूँ..! इतना बड़ा देश, दुनिया के सामने सीना तान के खड़ा होने का सामर्थ्य है इस देश में, बारह सौ साल की गुलामी के बाद भी जो देश सरप्लस था वो देश आज कर्जदार क्यों बन गया, इसके जवाब हम खोज सकते हैं, इसके उपाय भी खोज सकते हैं, उस विश्वास को लेकर आगे बढ़ें..!

मैं फिर एक बार सुभाष जी का बहुत आभारी हूँ कि आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला। बहुत-बहुत धन्यवाद..!

 

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मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | ‘मन की बात’ में आपका फिर से स्वागत है, अभिनंदन है | कुछ ही दिनों में साल 2026 दस्तक देने वाला है, और आज, जब मैं आपसे बात कर रहा हूँ, तो मन में पूरे एक साल की यादें घूम रही हैं - कई तस्वीरें, कई चर्चाएं, कई उपलब्धियां, जिन्होंने देश को एक साथ जोड़ दिया | 2025 ने हमें ऐसे कई पल दिए जिन पर हर भारतीय को गर्व हुआ | देश की सुरक्षा से लेकर खेल के मैदान तक, विज्ञान की प्रयोगशालाओं से लेकर दुनिया के बड़े मंचों तक | भारत ने हर जगह अपनी मजबूत छाप छोड़ी | इस साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ हर भारतीय के लिए गर्व का प्रतीक बन गया | दुनिया ने साफ देखा आज का भारत अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता | ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान देश के कोने-कोने से माँ भारती के प्रति प्रेम और समर्पण की तस्वीरें सामने आई | लोगों ने अपने-अपने तरीके से अपने भाव व्यक्त किये |

साथियो, यही जज्बा तब भी देखने को मिला, जब ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे हुए | मैंने आपसे आग्रह किया था कि ‘#VandeMataram150’ के साथ अपने संदेश और सुझाव भेजें | देशवासियों ने इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया |

साथियो, 2025 खेल के लिहाज़ से भी एक यादगार साल रहा | हमारी पुरुष Cricket team ने ICC Champions Trophy जीती | महिला Cricket team ने पहली बार विश्व कप अपने नाम किया | भारत की बेटियों ने Women's Blind T20 World Cup जीतकर इतिहास रच दिया | एशिया कप T20 में भी तिरंगा शान से लहराया | पैरा एथलीटों ने विश्व Championship में कई पदक जीतकर ये साबित किया कि कोई बाधा हौंसलों को नहीं रोक सकती | विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई | शुभांशु शुक्ला पहले भारतीय बने, जो International Space Station तक पहुंचे | पर्यावरण संरक्षण और वन्य-जीवों की सुरक्षा से जुड़े कई प्रयास भी 2025 की पहचान बने | भारत में चीतों की संख्या भी अब 30 से ज्यादा हो गई है | 2025 में आस्था, संस्कृति और भारत की अद्वितीय विरासत सब एक साथ दिखाई दी | साल के शुरुआत में प्रयागराज महाकुंभ के आयोजन ने पूरी दुनिया को चकित किया | साल के अंत में अयोध्या में राम मंदिर पर ध्वजारोहण के कार्यक्रम ने हर भारतीय को गर्व से भर दिया | स्वदेशी को लेकर भी लोगों का उत्साह खूब दिखाई दिया | लोग वही सामान खरीद रहे हैं, जिसमें किसी भारतीय का पसीना लगा हो और जिसमें भारत की मिट्टी की सुगंध हो | आज हम गर्व से कह सकते हैं 2025 ने भारत को और अधिक आत्मविश्वास दिया है | ये बात भी सही है इस वर्ष प्राकृतिक आपदाएं हमें झेलनी पड़ी, अनेक क्षेत्रों में झेलनी पड़ी | अब देश 2026 में नई उम्मीदों, नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ने को तैयार है |

मेरे प्यारे देशवासियो, आज दुनिया भारत को बहुत आशा के साथ देख रही है | भारत से उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है, हमारी युवा शक्ति | विज्ञान के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां, नए-नए innovation, technology का विस्तार इनसे दुनियाभर के देश बहुत प्रभावित हैं |

साथियो, भारत के युवाओं में हमेशा कुछ नया करने का जुनून है और वो उतने ही जागरूक भी हैं | मेरे युवा साथी कई बार मुझसे यह पूछते हैं कि nation building में वो अपना योगदान और कैसे बढ़ाएं ? वो कैसे अपने ideas share कर सकते हैं | कई साथी पूछते हैं कि मेरे सामने वो अपने ideas का presentation कैसे दे सकते हैं ? हमारे युवा साथियों की इस जिज्ञासा का समाधान है ‘Viksit Bharat Young Leaders Dialogue’ | पिछले साल इसका पहला edition हुआ था, अब कुछ दिन बाद उसका दूसरा edition होने वाला है । अगले महीने की 12 तारीख को स्वामी विवेकानंद जी की जयंती के अवसर पर ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाया जाएगा | इसी दिन ‘Young Leaders Dialogue’ का भी आयोजन होगा और मैं भी इसमें जरूर शामिल होऊंगा | इसमें हमारे युवा Innovation, Fitness, Startup और Agriculture जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने ideas share करेंगे । मैं इस कार्यक्रम को लेकर बहुत ही उत्सुक हूँ |

साथियो, मुझे ये देखकर अच्छा लगा कि इस कार्यक्रम में हमारे युवाओं की भागीदारी बढ़ रही है | कुछ दिनों पहले ही इससे जुड़ा एक quiz competition हुआ | इसमें 50 लाख से अधिक युवा शामिल हुए। एक निबंध प्रतियोगिता भी हुई, जिसमें students ने विभिन्न विषयों पर अपनी बातें रखीं | इस प्रतियोगिता में तमिलनाडु पहले और उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा |

साथियो, आज देश के भीतर युवाओं को प्रतिभा दिखाने के नए- नए अवसर मिल रहे हैं | ऐसे बहुत से platforms विकसित हो रहे हैं, जहां युवा अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार talent दिखा सकते हैं | ऐसा ही एक platform है- ‘Smart India Hackathon’ एक और ऐसा माध्यम जहां ideas, action में बदलते हैं |

साथियो, ‘Smart India Hackathon 2025’ का समापन इसी महीने हुआ है | इस Hackathon के दौरान 80 से अधिक सरकारी विभागों की 270 से ज्यादा समस्याओं पर students ने काम किया | Students ने ऐसे solution दिए, जो real life challenges से जुड़े थे | जैसे traffic की समस्या है | इसे लेकर युवाओं ने ‘Smart Traffic Management’ से जुड़े बहुत ही interesting perspective share किए | Financial Frauds और Digital Arrests जैसी चुनौतियों के समाधान पर भी युवाओं ने अपने ideas सामने रखे | गाँवों में digital banking के लिए Cyber Security Framework पर सुझाव दिया | कई युवा agriculture sector की चुनौतियों के समाधान में जुटे रहे | साथियो, पिछले 7-8 साल में ‘Smart India Hackathon’ में, 13 लाख से ज्यादा students और 6 हजार से ज्यादा Institutes हिस्सा ले चुके हैं | युवाओं ने सैंकड़ों problems के सटीक solutions भी दिए हैं | इस तरह के Hackathons का आयोजन समय-समय पर होता रहता है | मेरा अपने युवा साथियों से आग्रह है कि वे इन Hackathons का हिस्सा जरूर बनें |

साथियो, आज का जीवन Tech-Driven होता जा रहा है और जो परिवर्तन सदियों में आते थे वो बदलाव हम कुछ बरसों में होते देख रहे हैं | कई बार तो कुछ लोग चिंता जताते हैं कि Robots कहीं मनुष्यों को ही न Replace कर दें | ऐसे बदलते समय में Human Development के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना बहुत जरूरी है | मुझे ये देखकर बहुत खुशी होती है कि हमारी अगली पीढ़ी अपनी संस्कृति की जड़ों को अच्छी तरह थाम रही है - नई सोच के साथ नए तरीकों के साथ |

साथियो, आपने Indian Institute of Science उसका नाम तो जरूर सुना होगा | Research और Innovation इस संस्थान की पहचान है | कुछ साल पहले वहाँ के कुछ छात्रों ने महसूस किया कि पढ़ाई और Research के बीच संगीत के लिए भी जगह होनी चाहिए | बस यहीं से एक छोटी-सी Music Class शुरू हुई | ना बड़ा मंच, ना कोई बड़ा बजट | धीरे-धीरे ये पहल बढ़ती गई और आज इसे हम ‘Geetanjali IISc’ के नाम से जानते हैं | यह अब सिर्फ एक Class नहीं, Campus का सांस्कृतिक केंद्र है | यहाँ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत है, लोक परंपराएँ हैं, शास्त्रीय विधाएं हैं, छात्र यहाँ साथ बैठकर रियाज़ करते हैं | Professor साथ बैठते हैं, उनके परिवार भी जुड़ते हैं | आज दो-सौ से ज्यादा लोग इससे जुड़े हैं | और खास बात ये कि जो विदेश चले गए, वो भी Online जुड़कर इस Group की डोर थामे हुए हैं |

साथियो, अपनी जड़ों से जुड़े रहने के ये प्रयास सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है | दुनिया के अलग-अलग कोनों और वहाँ बसे भारतीय भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं | एक और उदाहरण जो हमें देश से बाहर ले जाता है - ये जगह है ‘दुबई’ | वहाँ रहने वाले कन्नड़ा परिवारों ने खुद से एक जरूरी सवाल पूछा – हमारे बच्चे Tech-World में आगे तो बढ़ रहें हैं, लेकिन कहीं वो अपनी भाषा से दूर तो नहीं हो रहे हैं? यहीं से जन्म हुआ ‘कन्नड़ा पाठशाले’ का | एक ऐसा प्रयास, जहां बच्चों को ‘कन्नड़ा’ पढ़ाना, सीखना, लिखना और बोलना सिखाया जाता है | आज इससे एक हजार से ज्यादा बच्चे जुड़े हैं | वाकई, कन्नड़ा नाडु, नुडी नम्मा हेम्मे | कन्नड़ा की भूमि और भाषा, हमारा गर्व है |

साथियो, एक पुरानी कहावत है ‘जहां चाह, वहाँ राह’ | इस कहावत को फिर से सच कर दिखाया है मणिपुर के एक युवा मोइरांगथेम सेठ जी ने | उनकी उम्र 40 साल से भी कम है | श्रीमान् मोइरांगथेम जी मणिपुर के जिस दूर-सुदूर क्षेत्र में रहते थे वहाँ बिजली की बड़ी समस्या थी | इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने Local Solution पर जोर दिया और उन्हें ये Solution मिला Solar Power में | हमारे मणिपुर में वैसे भी Solar Energy पैदा करना आसान है | तो मोइरांगथेम जी ने Solar Panel लगाने का अभियान चलाया और इस अभियान की वजह से आज उनके क्षेत्र के सैकड़ों घरों में Solar Power पहुंच गई है | खास बात ये है कि उन्होंने Solar Power का उपयोग Health-Care और आजीविका को बेहतर बनाने के लिए किया है | आज उनके प्रयासों से मणिपुर में कई Health Centers को भी Solar Power मिल रही है | उनके इस काम से मणिपुर की नारी-शक्ति को भी बहुत लाभ मिला है | स्थानीय मछुआरों और कलाकारों को भी इससे मदद मिली है |

साथियो, आज सरकार ‘PM सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना’ के तहत हर लाभार्थी परिवार को Solar Panel लगाने के लिए करीब-करीब 75 से 80 हजार रुपए दे रही है | मोइरांगथेम जी के ये प्रयास यूं तो व्यक्तिगत प्रयास हैं, लेकिन Solar Power से जुड़े हर अभियान को नई गति दे रहे हैं | मैं ‘मन की बात’ के माध्यम से उन्हें अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ |

मेरे प्यारे देशवासियो, आइए अब जरा हम जम्मू-कश्मीर की तरफ चलते हैं | जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत, उसकी एक ऐसी गाथा साझा करना चाहता हूँ, जो आपको गर्व से भर देगी | जम्मू-कश्मीर के बारामूला में, जेहनपोरा नाम की एक जगह है | वहां लोग बरसों से कुछ ऊंचे-ऊंचे टीले देखते आ रहे थे | साधारण से टीले किसी को नहीं पता था कि ये क्या है? फिर एक दिन Archaeologist की नज़र इन पर पड़ी | जब उन्होंने इस इलाके को ध्यान से देखना शुरू किया, तो ये टीले कुछ अलग लगे | इसके बाद इन टीलों का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया | ड्रोन के ज़रिए ऊपर से तस्वीरें ली गईं, ज़मीन की Mapping की गई | और फिर कुछ हैरान करने वाली बातें सामने आने लगी | पता चला ये टीले प्राकृतिक नहीं हैं | ये इंसान द्वारा बनाई गई किसी बड़ी इमारत के अवशेष हैं | इसी दौरान एक और दिलचस्प कड़ी जुड़ी | कश्मीर से हजारों किलोमीटर दूर, फ़्रांस के एक Museum के Archives में एक पुराना, धुंधला सा चित्र मिला | बारामूला के उस चित्र में तीन बौद्ध स्तूप नजर आ रहे थे | यहीं से समय ने करवट ली और कश्मीर का एक गौरवशाली अतीत हमारे सामने आया | ये करीब दो हजार साल पुराना इतिहास है | कश्मीर के जेहनपोरा का ये बौद्ध परिसर हमें याद दिलाता है, कश्मीर का अतीत क्या था, उसकी पहचान कितनी समृद्ध थी |

मेरे प्यारे देशवासियो, अब मैं आपसे भारत से हजारों किलोमीटर दूर, एक ऐसे प्रयास की बात करना चाहता हूँ, जो दिल को छू लेने वाला है | Fiji में भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रसार के लिए एक सराहनीय पहल हो रही है | वहाँ की नई पीढ़ी को तमिल भाषा से जोड़ने के लिए कई स्तरों पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं | पिछले महीने Fiji के राकी-राकी इलाके में वहाँ के एक स्कूल में पहली बार तमिल दिवस मनाया गया | उस दिन बच्चों को एक ऐसा मंच मिला, जहां उन्होंने अपनी भाषा पर खुले दिल से गौरव व्यक्त किया | बच्चों ने तमिल में कविताएँ सुनाई, भाषण दिए और अपनी संस्कृति को पूरे आत्मविश्वास के साथ मंच पर उतारा | साथियो, देश के भीतर भी तमिल भाषा के प्रचार के लिए लगातार काम हो रहा है | कुछ दिन पहले ही मेरे संसदीय क्षेत्र काशी में चौथा ‘काशी तमिल संगमम’ हुआ | अब मैं आपको एक audio clip सुनाने जा रहा हूँ | आप सुनिए और अंदाज़ा लगाइए तमिल बोलने की कोशिश कर रहे ये बच्चे कहां के हैं?

साथियो, अगले महीने हम देश का 77वाँ गणतंत्र दिवस मनाएंगे | जब भी ऐसे अवसर आते हैं, तो हमारा मन स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं के प्रति कृतज्ञता के भाव से भर जाता है | हमारे देश ने आजादी पाने के लिए लंबा संघर्ष किया है | आजादी के आंदोलन में देश के हर हिस्से के लोगों ने अपना योगदान दिया है | लेकिन, दुर्भाग्य से आजादी के अनेकों नायक-नायिकाओं को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था | ऐसी ही एक स्वतंत्रता सेनानी हैं - ओडिशा की पार्वती गिरि जी | जनवरी 2026 में उनकी जन्म-शताब्दी मनाई जाएगी | उन्होंने 16 वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था | साथियो, आजादी के आंदोलन के बाद पार्वती गिरि जी ने अपना जीवन समाज सेवा और जनजातीय कल्याण को समर्पित कर दिया था | उन्होंने कई अनाथालयों की स्थापना की | उनका प्रेरक जीवन हर पीढ़ी का मार्गदर्शन करता रहेगा |

“मूँ पार्वती गिरि जिंकु श्रद्धांजलि अर्पण करुछी |”
(मैं पार्वती गिरी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ)

साथियो, ये हमारा दायित्व है कि हम अपनी विरासत को ना भूलें| हम आजादी दिलाने वाले नायक-नायिकाओं की महान गाथा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं | आपको याद होगा जब हमारी आजादी के 75 वर्ष हुए थे, तब सरकार ने एक विशेष website तैयार की थी | इसमें एक विभाग ‘Unsung Heroes’ को समर्पित किया गया था | आज भी आप इस website पर visit करके उन महान विभूतियों के बारे में जान सकते हैं जिनकी देश को आजादी दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका रही है |

मेरे प्यारे देशवासियो, ‘मन की बात’ के जरिए हमें समाज की भलाई से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने का एक बहुत अच्छा अवसर मिलता है | आज मैं एक ऐसे मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ, जो हम सभी के लिए चिंता का विषय बन गया है | ICMR यानि Indian Council of Medical Research ने हाल ही में एक report जारी की है | इसमें बताया गया है कि निमोनिया और UTI जैसी कई बीमारियों के खिलाफ antibiotic दवाएं कमजोर साबित हो रही हैं | हम सभी के लिए यह बहुत ही चिंताजनक है | report के मुताबिक इसका एक बड़ा कारण लोगों द्वारा बिना सोचे-समझे antibiotic दवाओं का सेवन है | antibiotic ऐसी दवाएं नहीं हैं, जिन्हें यूं ही ले लिया जाए | इनका इस्तेमाल Doctor की सलाह से ही करना चाहिए | आजकल लोग ये मानने लगे हैं कि बस एक गोली ले लो, हर तकलीफ दूर हो जाएगी | यही वजह है कि बीमारियाँ और संक्रमण इन antibiotic दवाओं पर भारी पड़ रहे हैं | मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि कृपया अपनी मनमर्जी से दवाओं का इस्तेमाल करने से बचें | Antibiotic दवाओं के मामले में तो इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है | मैं तो यही कहूँगा - Medicines के लिए Guidance और Antibiotics के लिए Doctors की जरूरत है | यह आदत आपकी सेहत को बेहतर बनाने में बहुत मददगार साबित होने वाली है |

मेरे प्यारे देशवासियो, हमारी पारंपरिक कलाएं समाज को सशक्त करने के साथ ही लोगों की आर्थिक प्रगति का भी बड़ा माध्यम बन रही हैं | आंध्र प्रदेश के नारसापुरम जिले की Lace Craft (लेस क्राफ्ट) की चर्चा अब पूरे देश में बढ़ रही है | ये Lace Craft (लेस क्राफ्ट) कई पीढ़ियों से महिलाओं के हाथों में रही है | बहुत धैर्य और बारीकी के साथ देश की नारी-शक्ति ने इसका संरक्षण किया है | आज इस परंपरा को एक नए रंग रूप के साथ आगे ले जाया जा रहा है | आंध्र प्रदेश सरकार और NABARD मिलकर कारीगरों को नए design सिखा रहे हैं, बेहतर skill training दे रहे हैं और नए बाजार से जोड़ रहे हैं | नारसापुरम Lace को GI Tag भी मिला है | आज इससे 500 से ज्यादा products बन रहे हैं और ढ़ाई-सौ से ज्यादा गांवों में करीब-करीब 1 लाख महिलाओं को इससे काम मिल रहा है |

साथियो ‘मन की बात’ ऐसे लोगों को सामने लाने का भी मंच है जो अपने परिश्रम से ना सिर्फ पारंपरिक कलाओं को आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि इससे स्थानीय लोगों को सशक्त भी कर रहे हैं | मणिपुर के चुराचांदपुर में Margaret Ramtharsiem जी उनके प्रयास ऐसे ही हैं | उन्होंने मणिपुर के पारंपरिक उत्पादों को, वहाँ के handicraft को, बांस और लकड़ी से बनी चीजों को, एक बड़े vision के साथ देखा और इसी vision के कारण, वो एक handicraft artist से लोगों के जीवन को बदलने का माध्यम बन गईं | आज Margaret जी की unit उसमें 50 से ज्यादा artist काम कर रहे हैं और उन्होंने अपनी मेहनत से दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में, अपने products का एक market भी develop किया है |

साथियो, मणिपुर से ही एक और उदाहरण सेनापति जिले की रहने वाली चोखोने क्रिचेना जी का है | उनका पूरा परिवार परंपरागत खेती से जुड़ा रहा है | क्रिचेना ने इस पारंपरिक अनुभव को एक और विस्तार दिया | उन्होंने फूलों की खेती को अपना passion बनाया | आज वो इस काम से अलग-अलग markets को जोड़ रहीं हैं और अपने इलाके की local communities को भी Empower कर रही हैं | साथियो, ये उदाहरण इस बात का पर्याय है कि अगर पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक vision के साथ आगे बढ़ाएं तो ये आर्थिक प्रगति का बड़ा माध्यम बन जाता है | आपके आसपास भी ऐसी success stories हों, तो मुझे जरूर share करिए |

साथियो, हमारे देश की सबसे खूबसूरत बात ये है कि सालभर हर समय देश के किसी-ना-किसी हिस्से में उत्सव का माहौल रहता है | अलग-अलग पर्व-त्योहार तो हैं ही, साथ ही विभिन्न राज्यों के स्थानीय उत्सव भी आयोजित होते रहते हैं | यानि, अगर आप घूमने का मन बनाएं, तो हर समय, देश का कोई-ना-कोई कोना अपने unique उत्सव के साथ तैयार मिलेगा | ऐसा ही एक उत्सव इन दिनों कच्छ के रण में चल रहा है | इस साल कच्छ रणोत्सव का ये आयोजन 23 नवंबर से शुरू हुआ है, जो 20 फरवरी तक चलेगा | यहाँ कच्छ की लोक संस्कृति, लोक संगीत, नृत्य और हस्तशिल्प की विविधता दिखाई देती है | कच्छ के सफेद रण की भव्यता देखना अपने आप में एक सुखद अनुभव है | रात के समय जब सफेद रण के ऊपर चाँदनी फैलती है, वहाँ का दृश्य अपने आप में मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है | रण उत्सव का Tent City बहुत लोकप्रिय है | मुझे जानकारी मिली है कि पिछले एक महीने में अब तक 2 लाख से ज्यादा लोग रणोत्सव का हिस्सा बन चुके हैं और देश के कोने-कोने से आए हैं, विदेश से भी लोग आए हैं | आपको जब भी अवसर मिले, तो ऐसे उत्सवों में जरूर शामिल हों और भारत की विविधता का आनद उठाएं |

साथियो, 2025 में ‘मन की बात’ का ये आखिरी episode है, अब हम साल 2026 में ऐसे ही उमंग और उत्साह के साथ, अपनेपन के साथ अपने ‘मन की बातों’ को करने के लिए ‘मन की बात’ के कार्यक्रम में जरूर जुड़ेंगे | नई ऊर्जा, नए विषय और प्रेरणा से भर देने वाली देशवासियों की अनगिनित गाथाओं ‘मन की बात’ में हम सबको जोड़ती है | हर महीने मुझे ऐसे अनेक संदेश मिलते हैं, जिसमें ‘विकसित भारत’ को लेकर लोग अपना vision साझा करते हैं | लोगों से मिलने वाले सुझाव और इस दिशा में उनके प्रयासों को देखकर ये विश्वास और मजबूत होता है और जब ये सब बातें मेरे तक पहुँचती हैं, तो ‘विकसित भारत’ का संकल्प जरूर सिद्ध होगा | ये विश्वास दिनों दिन मजबूत होता जाता है | साल 2026 इस संकल्प सिद्धि की यात्रा में एक अहम पड़ाव साबित हो, आपका और आपके परिवार का जीवन खुशहाल हो, इसी कामना के साथ इस episode में विदाई लेने से पहले मैं जरूर कहूँगा, ‘Fit India Movement’ आप को भी fit रहना है | ठंडी का ये मौसम व्यायाम के लिए बहुत उपयुक्त होता है, व्यायाम जरूर करें | आप सभी को 2026 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं | धन्यवाद | वंदे मातरम् |