Hon. CM's speech at Zee Business' Best Market Analyst Awards

Published By : Admin | July 24, 2013 | 15:15 IST

सामान्य रूप से ऐसे कार्यक्रम मुंबई में ही होते हैं, और इसके कारण इस प्रकार के कार्यक्रम को ऑर्गनाइज़ करने का भी मुम्बई का स्वभाव है और ऑडियंस को भी आदत होती है..! लेकिन मैं सुभाष जी का आभारी हूँ कि उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए गुजरात को चुना, अहमदाबाद को चुना..! अगर आप एक बार अहमदाबाद में सफल हो गए, तो फिर आपकी गाड़ी कहीं रूकती नहीं है..! हम अहमदाबियों की पहचान है, ‘सिंगल फेयर, डबल जर्नी’..! और ये आपका क्षेत्र ऐसा है जिसमें हर कोई अपने इन्वेस्टमेंट का कुछ ना कुछ रिवॉर्ड चाहता है और इसलिए रूपये की कीमत क्या होती है, रुपये का माहात्म्य क्या होता है, वो शायद अहमदाबादी से अधिक कोई नहीं जानता है..! और हमारे अहमदाबादियों के लिए इस प्रकार के काफी चुटकुले भी बने हुए हैं..! और उस शहर में फाइनेंशियल वर्ल्ड के लोगों का इस प्रकार से एकत्र आना और इस समारोह को यहाँ संपन्न करना, इसके लिए मैं फिर एक बार ज़ी ग्रुप के सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूँ और आभार व्यक्त करता हूँ..!

आप लोग इस विषय के काफी जानकार भी हैं और चिंतित भी हैं। अगर फाइनेंशियल मार्केट बहुत तेजी में होता, तो शायद आज के समारोह में तालियाँ भी ज्यादा बजती। लेकिन मैं देख रहा हूँ मुश्किल से तालियाँ बज रहीं हैं और उसका मूल कारण मार्केट की स्थिति है। अगर मार्केट की स्थिति अच्छी होती, तो शायद आप भी बड़े उमंग से भरे हुए होते, लेकिन मार्केट की स्थिति अच्छी नहीं है इसके लिए आप सुबह-शाम एनालिसिस करते होंगे। आप सोचते भी होंगे कि यार, कुछ भी हो, इस स्थिति से बाहर निकलें..! ये आपके सबके मन में चलता होगा। ये बात सही है कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। किसी भी देश के जीवन में उतार-चढाव तो आते हैं। कभी अच्छी स्थिति भी आती है, तो कभी बुरे दिन भी आते हैं। कभी हम टॉप पर भी होते हैं, तो कभी लो पर भी पहुंच जाते हैं..! लेकिन नीति निर्धारक जब आत्मविश्वास खो चुके होते हैं, इफ दे लूज़ देयर कॉन्फिडेंस, तो वो निर्णय नहीं कर सकते। उन्होंने निर्णय करने का सामर्थ्य खो दिया है। कभी-कभी देश में चर्चा होती है कि चुनाव बहुत जल्दी आ जाएंगे, समय पर चुनाव नहीं होंगे..! तो मुझ से कुछ लोगों ने बात की थी। मैंने कहा देखिए भाई, चुनाव जल्दी भी अगर लाने हैं तो सरकार को निर्णय करना पड़ता है। जो नौ साल में कोई निर्णय नहीं कर पाए, वो ये निर्णय कैसे कर सकेंगे..? तो आप मान कर चलिए कि मजबूरन स्थितियाँ जहाँ चाहेगी, वहाँ जाएगी। कोई ले जाने वाला नहीं है, कोई दिशा तय करने वाला नहीं है, कोई निर्णय करने वाला नहीं है..! और सवा सौ करोड़ का देश इस स्थिति में जब होता है, तब हर प्रकार के संकट अपने आप बढ़ते चले जाते हैं..!

अब आज देखिए आप, रूपये की कीमत जिस तेजी से गिर रही है..! और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच कम्पीटीशन चल रहा है। किसकी आबरू तेजी से गिरती चली जा रही है, कौन आगे जाएगा... इसकी कम्पीटीशन चल रही है..! देश जब आजाद हुआ तब एक डॉलर एक रूपये के बराबर था। एक रूपये में एक डॉलर बिकता था..! जब अटल जी की सरकार थी, अटल जी ने जब पहली बार सरकार बनाई तब तक मामला पहुंच गया था 42 रूपीज तक और अटल जी ने जब छोड़ा तब 44 पर पहुंचा था। चार प्रतिशत का फर्क आया था..! लेकिन इस सरकार के और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रूपये पर पहुंच गया है..! मित्रों, अगर थोड़ा इतिहास की ओर नजर करें, और आप तो इस आर्थिक जगत की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं..! हिन्दुस्तान 1200 साल की गुलामी के बाद 15 अगस्त, 1947 को जब आजाद हुआ, तो उस समय उसके पास ब्रिटिश गवर्नमेंट से वन थाउसेंड मिलियन पाउंड लेना उधार था। यानि हम लेनदार थे, ब्रिटिश गवर्नमेंट कर्जदार थी..! सैकेंड वर्ल्ड वॉर में भारत से जो कुछ भी गया था, वो कर्ज ब्रिटिशर को हिन्दुस्तान को चुकाना था। यानि 1200 साल की गुलामी के बाद भी आजादी का प्रारंभ आर्थिक संकट से नहीं हुआ, आर्थिक संपन्नता के साथ हुआ था..! इतना ही नहीं, विदेशों से कर्ज लेने का प्रारंभ पंडित नेहरू ने किया। आजादी के कुछ ही समय में फर्स्ट फाइव इयर प्लान आया, तो विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया। और तब वर्ल्ड बैंक का स्वतंत्र स्वरूप नहीं था, अमेरिका की गवर्नमेंट की इच्छा से चलता था। और उस समय पंडित नेहरू के जमाने में पहली बार कर्ज लिया गया। आज जरूरत है उस बात को समझने की, कि जब वो पहली बार कर्ज लिया गया, तो उसमें दो शर्त थी। आज डॉलर साठ रूपये पर क्यों बिकता है उसका जवाब वहाँ मिलता है। दो शर्त थी..! एक शर्त ये थी कि वो जो अमेरिका ने पैसे दिए हैं, उन पैसों का उपयोग हिन्दुस्तान के रिसर्च स्कॉलर को अमेरिका में पढ़ने भेजने के लिए स्कॉलरशिप के रूप में खर्च होंगे। देखिए, कितना बुद्घिमानी का काम अमेरिका ने किया..! अमेरिका जिसको चुने वो स्कॉलर, और वो स्कॉलर पढ़ेगे कहाँ..? अमेरिका में..! पैसे कौन से..? जो पैसे अमेरिका ने कर्ज में दिए, वो पैसे..! मतलब आजाद हिन्दुस्तान की पहली स्कॉलर पीढ़ी जो तैयार हो, वो अमेरिका की छाया वाली तैयार हो, ताकि वो गीत अमेरिका के गाएं, इस प्रकार का पहला प्रयास हुआ..! और दूसरा निर्णय किया था कि ये रूपये तब देंगे कि जब आप रूपये की कीमत कम करोगे..! और उस लोन लेने के कारण पंडित नेहरू के समय में पहली बार रूपये की ताकत कम हुई और वो सिलसिला चलता रहा..! मित्रों, कोई भी देश गलत नीतियों के कारण कहाँ जा कर के गिरता है, उसका हम अंदाज कर सकते हैं..!

मैं आज भी मानता हूँ कि भारत जैसा देश, सारी दुनिया की नजर हिन्दुस्तान पे अगर एक बाजार के तौर पर हो और ये देश अगर एक बाजार बन कर के रह जाए, तो ये देश कभी भी अर्थिक संपन्नता प्राप्त नहीं कर सकता..! पूरा विश्व अपना माल हिन्दुस्तान के अंदर जितनी बड़ी मात्रा में डम्प कर सकता है, करना चाहता है..! इतना बड़ा कंज्यूमर मार्केट अवेलेबल है, मित्रों..! अगर से सिलसिला चलता ही रहा और देश का इम्पोर्ट बढ़ता ही गया तो पता नहीं देश की आर्थिक स्थिति कहाँ जा कर के रूकेगी..! मित्रों, आज तेजी से इम्पोर्ट बढ़ रहा है और एक्सपोर्ट में हम पहले से भी नीचे आ गए हैं, यानि स्टेबल भी नहीं रहे, हम जहाँ थे उससे भी नीचे आ गए, और उसके कारण हमारी करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ती चली गई, जिसने पूरी आर्थिक स्थिति पर एक नया बोझ डाल दिया है..!

एफ.डी.आई. और एफ.आई.आई. दोनों के तराजू पर हम संतुलन नहीं कर पा रहे हैं और उसका मूल कारण है हमारी नीतियाँ..! लोग कहते हैं एफ.डी.आई. नहीं आया, फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट नहीं आया... क्यों नहीं आया? कोई भी व्यक्ति हिन्दुस्तान के अंदर धन तब लगाता है जब उसको अपनी पूंजी की सिक्योरिटी महसूस हो। उसको लगे कि हाँ, ये मैं इतना लगा रहा हूँ तो मुझे प्रॉफिट मिलेगा, मुझे गुड गवर्नेंस की अनुभूति हुई है तो मुझे एफिशियेंट गवर्नेंस मिलेगा, मुझे सिंगल विंडो क्लिीयरेंस मिलेगा, तो वो हिम्मत करेगा..! लेकिन अगर पॉलिसी पैरालिसिस है तो उसकी कितनी ही आवश्कयकता होगी, लेकिन वो हिन्दुस्तान की तरफ मुंह नहीं फेरेगा। अगर हमारे यहाँ फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट नहीं आता है और अगर हम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दुर्बल होते चले जाते हैं, तब जा कर के हम इम्पोर्ट करते हैं, एक्सपोर्ट करने के दरवाजे बंद होते चले जाते हैं और आर्थिक स्थिति और लुढकती चली जाती है..!

मित्रों, आप स्टॉक मार्केट की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं। सरकार अगर तीन चीजों को बैंलेस रूप से आगे ना बढ़ाए, तो मैं मानता हूँ कि किसी भी इन्वेस्टर का विश्वास कभी भी नहीं रहेगा..! अब आप देखिए कि आज हमारा ट्रांजेक्शन कितना होता है..? मैं समझता हूँ, मुझे जो बताया गया है कि वो 15 और 20 परसेंट के बीच में आ गया है। और उसमें भी फ्यूचरिस्टिक वाली संख्या ज्यादा है, रियल ट्रांजेक्शन की संख्या कम होती चली जा रही है..! रियल ट्रांजेक्शन इसलिए नहीं हो रहा है कि उसका कॉन्फिडेंस लेवल टूट चुका है। अगर ये स्थिति बनती है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हम कहाँ जा कर के खड़े रहेंगे..! और इसलिए स्टॉक मार्केट में भी एक रिटेल का क्षेत्र है, दूसरा इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट है और तीसरा एफ.आई.आई. का है, इन तीनों को इक्वल बैलेंस होना चाहिए। आज मित्रों, अगर एफ.आई.आई. का शेयर बढ़ गया और जस्ट बिकॉज दुनिया का कोई देश अपना इन्टरेस्ट रेट बढ़ा दें और अचानक एफ.आई.आई. की बहुत बड़ी अमाउंट चली जाए तो पूरा स्टॉक मार्केट नीचे गिर जाएगा और उसके कारण सामान्य मानवी को कोई भरोसा नहीं रहेगा..!

मित्रों, आज चिदम्बरम जी ये कहते हैं कि लोग सोना ना खरीदें..! लेकिन लोग सोना खरीदने के लिए मजबूर क्यों हुए..? मुझे मालूम है, हमारे यहाँ गुजरात में स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना, यानि एक पीओन होगा वो भी सुबह-शाम देखता है कि स्टॉक मार्केट का क्या हाल है..! हमारे यहाँ एक अखबार तो सिर्फ स्टॉक मार्केट के रेट के ऊपर ही चलता है, पूरा का पूरा अखबार... और लोग उसी को खरीदते हैं क्योंकि उनको उसी में इन्टरेस्ट होता है..! लेकिन आज उसका इन्टरेस्ट नहीं रहा, क्योंकि उसको भरोसा नहीं है कि उसको जो कुछ भी इनवेस्ट करना है, उसको वो वापस मिलेगा या नहीं मिलेगा..! तो फिर उसके बाद दो रास्ते बच जाते हैं, रियल एस्टेट में डालो या फिर गोल्ड में डालो। रियल एस्टेट में डालने के लिए मिडिल क्लास, लोअर मिडिल के पास उतनी अमाउंट नहीं होती, इसलिए उसमें डाल नहीं पाता है। तो क्या करेगा..? चलिए भाई, 10 ग्राम, 20 ग्राम, 50 ग्राम, 100 ग्राम गोल्ड ले लो, पैसा बढ़ जाएगा..! अकेले 2012 के वर्ष में 1 लाख करोड रूपयों का गोल्ड इस देश में इम्पोर्ट हुआ है, एक साल में..! और बताया जाता है कि आज हिन्दुस्तान में 18 लाख करोड़ रूपयों का गोल्ड पड़ा हुआ है। नॉन प्रॉडक्टिव ऐसेट है..! मित्रों, अगर ये स्थिति रही तो हमारी सारी आर्थिक व्यवस्था कैसे चलेगी..? और ये क्यों हो रहा है, क्योंकि व्यक्ति को एक ही जगह पर सिक्योरिटी लगती है कि यार, लेकर के रखो, ज्यादा पैसे मिले या ना मिले, लेकिन पैसे तो बच जाएंगे..! या तो उसको लगता है कि रियल एस्टेट..! मित्रों, रियल एस्टेट में भी जाने का कारण क्यों बना है..? हमारी इकॉनोमी पर ब्लेक मनी की इकॉनोमी डॉमिनेट करने लग गई है। और जब ब्लैक मनी की इकोनॉमी डॉमिनेट करती हो, पैरलल इकॉनोमी चलती हो, तो स्वाभाविक है कि लोगों को रियल एस्टेट में जाने का रास्ता ठीक लगता है। और जैन्यूइन आदमी अगर रीयल एस्टेट में जाना चाहता है, तो वो एंटर नहीं कर पा रहा है क्योंकि ब्लैक मनी नहीं है..! एक ऐसे विश्यस सर्कल को देश में चलाया गया है, जिसके कारण देश का पूरा अर्थतंत्र आज स्थितियों को बिगाड़ते चला जा रहा है..!

एशिया की एक विशेषता रही है, सदियों से कि एशियन कंट्रीज का कल्चरली एक-दूसरे पर काफी प्रभाव रहा है। सेविंग ये वैस्टर्न वर्ल्ड के नेचर में नहीं है, सेविंग ये एशियन कल्चर में है, और भारत उसमें लीड करता रहा है। हमारे यहाँ बचत करना, पैसे बचाना और उसमें महिलाओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। गरीब से गरीब महिला होगी, गरीब परिवार की होगी, लेकिन कुछ ना कुछ बचाने की कोशिश करेगी। मित्रों, ये सेविंग का जो स्वभाव है, तो वो पहले स्टॉक मार्केट के अंदर इन्वेस्ट करता था, और उसके कारण हमारी इकॉनोमी को बहुत बड़ा पुश मिलता था, ड्राइविंग फॉर्स बन जाता था। मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास जिसके पास सोना खरीदने की ताकत नहीं है, फ्लेट खरीदने की ताकत नहीं है, जमीन में पैसा नहीं लगा सकता है, वो पाँच-दस रूपये वाले दस-बीस शेयर लेने की केाशिश करता था, क्योंकि उसके पास उतने ही पैसे थे..! लेकिन मंहगाई के कारण मीडिल क्लास, लोअर मीडिल क्लास के लिए अपना घर चलाने में दिक्कत हो गई है, सेविंग खत्म हो चुका है और सेविंग खत्म होने के कारण स्टॉक मार्केट में उसकी एंट्री बंद हो गई है। अगर ये स्थिति बनी रही, तो हमारी पूरी फाइनेंशियल स्थिति और दुदर्शा की ओर चली जाएगी..!

आप देखिए, इम्पोर्ट..! ये तो हम समझ सकते हैं कि नेचुरल रिसोर्सिस में हमारी कुछ सीमाएं होंगी..! पेट्रोलियम, गैस और डीजल के इम्पोर्ट के लिए आज हमारे पास कोई रास्ता नहीं होगा, मजबूरन ही सही, लेकिन हमको लेना पड़ेगा..! लेकिन क्या कारण है कि इलेक्ट्रोनिक गुड्स, मोबाइल फोन, वगैरह में हमारा अरबों-खरबों रुपयों का इम्पोर्ट बढ़ता चला जा रहा है..! क्या हमारा देश मोबाइल फोन मैन्यूफैक्चरिंग में एक बहुत बड़ा जंप नहीं लगा सकता है..? हम हमारे इम्पोर्ट को कम करने का रास्ता नहीं खोज सकते हैं..? हमें मालूम है कि हिन्दुस्तान में इलेक्ट्रोनिक गुड्स का एक बहुत बड़ा मार्केट है। और इलेक्ट्रोनिक गुड्स के मैन्यूफैक्चरिंग के लिए कोई आसमान से बहुत बड़ा स्काय रॉकेट इंजीनियरिंग लाने की जरूरत नहीं है, वो बहुत सामान्य प्रकार की टैक्नोलॉजी है। लेकिन हमने उस पर बल नहीं दिया और उसके कारण आज हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा इम्पोर्ट करने वाले जो तीन सेक्टर हैं, उसमें से एक क्षेत्र है इलैक्ट्रोनिक गुड्स..! हाँ, यदि कोई मेडिकल इक्विपमेंट के लिए कोई बहुत बड़ी एक्स्ट्राऑर्डिनरी चीज आती है तो वन कैन अंडरस्टेंड, लेकिन रूटीन में हमारे यहाँ अपना कम्प्यूटर नहीं बन पा रहा है, हम यहाँ लाकर के एसेंबल करते हैं..! हम अगर हमारे देश में योजनाबद्घ तरीके से करें कि भाई, दस साल के अंदर इस सैक्टर के अंदर इम्पोर्ट करने की स्थिति से हम बाहर आ जाएंगे..! हम क्वालिटी मैटीरियल प्रोवाइड करेंगे, सफिशियेंट मटेरियल प्रोवाइड करेंगे, तो देश की स्थितियाँ नहीं बदलेगी..? लेकिन हमारी नीतियों की कमी के कारण ये हाल हुआ है। हमारा मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट इफेक्टिव नहीं हो रहा है। क्यों नहीं हो रहा है..? अगर हमें दुनिया के सामने टिकना है, तो उत्पादन के क्षेत्र में हमारे लोगों को जरूरत है कि वो कॉस्ट इफैक्टिव हो..! तो उसके लिए क्या चाहिए..? आज देखिए, हिन्दुस्तान में बीस हजार मैगावाट से ज्यादा के बिजली के कारखाने बंद पड़े हैं। कोई देश ऐसा देखा है आपने कि जिसके पास कोयले के खदान हैं, जो अंधेरे में जी रहा है, लोगों को बिजली चाहिए, बिजली के ग्राहक मौजूद हैं और जिसके पास बीस हजार मैगावाट से अधिक बिजली पैदा करने वाले कारखाने तैयार हो..! जस्ट, लीडरशिप नहीं है, पॉलिसी पैरालिसिस है और इसलिए कोयले के निर्णय हो नहीं रहे हैं, खदान में से कोयला निकल नहीं रहा है, कोयला बिजली के कारखाने तक पहुंच नहीं रहा है और देश अंधेरे में डूब रहा है। मैन्यूफैक्चरिंग सैक्टर को सफिशियेंट बिजली मिल नहीं रही है, फार्मर को सफिशियेंट बिजली नहीं मिल रही है और उसके कारण हमारा ग्रोथ कम हो रहा है, हमारे विकास की यात्रा कम हो रही है..!

मित्रों, छोटी-छोटी चीजें है, कोई बहुत बड़ी चीजों की कोई जरूरत नहीं है, सामान्य चीजें... अगर इन पर भी हमने बल दिया होता, तो मैं नहीं मानता हूँ कि देश आज इतने बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा होता..! और ऐसा नहीं है कि इसके रास्ते नहीं हैं। अटल जी के समय की एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल की अगर हम विगत देखे लें, तो सीना तान कर के कोई भी कह सकता है। मित्रों, उन दिनों तो भारत ने न्यूक्लीयर टैस्ट किया था। पूरे विश्व ने सैंक्शन्स लगा दिये थे, देश आर्थिक संकट में फंसा हुआ था..! ऐसे विकट काल में भी अटल जी के नेतृत्व में हिंदुस्तान में एन.डी.ए. की सरकार, वो भी 24 पार्टियां एक साथ सरकार चलाती थी, एक पार्टी की सरकार नहीं थी, उसके बाद भी ना मंहगाई बढ़ने दी थी, ना इम्पोर्ट बढ़ने दिया था, एक्सपॉर्ट में कटौती आने नहीं दी थी..! जब अटल जी की सरकार बनी तब हमारा सेविंग का रेशो 32% से ज्यादा था और आज वो 30% से भी कम हो गया है..! कोई भी पैरामीटर ले लीजिए। भारत की इकॉनोमी में 21वीं सदी की विकास यात्रा के सपनों की मजबूत नींव अटल जी ने अपने शासन काल में रखी थी। लेकिन देखते ही देखते पिछले नौ साल में जो रखा था वो भी खत्म हो गया और नया कुछ अर्जित नहीं हुआ, ऊपर से नए बोझ और नए संकट हमारे देश पर आते गए और उसी के कारण आज हम संकट से गुजर रहे हैं..! आपका तो पूरा मार्केट, पहले जो इन्वेस्टर था वो सुबह जब स्टॉक मार्केट खुलता था तो उसकी सांस ऊपर-नीचे होती थी। शेयर बाजार में जिसने बेचारे ने हजार-दो हजार रूपये लगाए होते थे, तो वो सोचता था कि यार आज कुछ मिला या नहीं मिला..! आज सांस आपकी ऊपर नींचे हो रही है। ये पहली बार हो रहा है..! और इसलिए इस चिंता की अवस्था में देश एक आत्मविश्वास के साथ कैसे आगे बढ़े, पॉलिसी पैरालिसिस में से देश बाहर कैसे आए..!

प्रधानमंत्री ने कहा था, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं..! प्रधानमंत्री जी, आपके अर्थशास्त्र में पैसे पेड़ पर उगते हों या ना उगते हों, हम गुजरातियों की समझ है और हम मानते हैं कि पैसे खेते में भी उगते हैं, पैसे कारखाने में भी उगते हैं, पैसे मजदूर के पसीने से भी उग सकते हैं, आवश्कता है सही नेतृत्व देकर के नीतियों को बनाने की..! हिन्दुस्तान का किसान खेत में काम करता है तो वो पैसे उगाता है, एक मजदूर फैक्ट्री में मेहनत करता है तो वो पैसे उगाता है और तभी तो देश की तिजोरी भरती है और तभी तो देश चलता है..! ये जो निराशा का माहौल है उससे देश को बाहर लाया जा सकता है। मित्रों, गुजरात एक्सपीरियंस से मैं कहता हूँ कि निराशा की गर्त में डूबे रहने का कोई कारण नहीं है। जब मैं पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में आया, तब मेरे यहाँ रेवेन्यू डेफिसिट सिक्स थाउजेंड सेवन हन्डरेड करोड़ रूपीज़ थी, आज हम रेवेन्यू सरप्लस है..! मित्रों, हो सकता है..! हमारी इलेक्ट्रिसिटी कंपनीज वार्षिक 2500 करोड़ रूपये का लॉस करती थी। आज मित्रों, वो प्राफिट करती है और हम 24 घंटे बिजली देते हैं और टेरिफ नहीं बढ़ाते हैं..! कहने का तात्पर्य ये है मित्रों, अगर सही दिशा में निर्णय किए जाए, देश के सामान्य मानवी की शक्ति पर भरोसा करके निर्णय किया जाए तो देश की स्थिति बहुत बदल सकती है। और मैं बहुत आशावादी इंसान हूँ..! इतना बड़ा देश, दुनिया के सामने सीना तान के खड़ा होने का सामर्थ्य है इस देश में, बारह सौ साल की गुलामी के बाद भी जो देश सरप्लस था वो देश आज कर्जदार क्यों बन गया, इसके जवाब हम खोज सकते हैं, इसके उपाय भी खोज सकते हैं, उस विश्वास को लेकर आगे बढ़ें..!

मैं फिर एक बार सुभाष जी का बहुत आभारी हूँ कि आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला। बहुत-बहुत धन्यवाद..!

 

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“Role of newspapers is very important in the journey to Viksit Bharat in the next 25 years”
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“INS has not only been a witness to the ups and downs of India’s journey but also lived it and communicated it to the people”
“A country’s global image directly affects its economy. Indian publications should enhance their global presence”

महाराष्ट्र के गवर्नर श्रीमान रमेश बैस जी, मुख्यमंत्री श्रीमान एकनाथ शिंदे जी, उप मुख्यमंत्री भाई देवेंद्र फडणवीस जी, अजित दादा पवार जी, इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के प्रेसिडेंट भाई राकेश शर्मा जी, सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

सबले पहले मैं इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आज आप सभी को मुंबई में एक विशाल और आधुनिक भवन मिला है। मैं आशा करता हूँ, इस नए भवन से आपके कामकाज का जो विस्तार होगा, आपकी जो Ease of Working बढ़ेगी, उससे हमारे लोकतंत्र को भी और मजबूती मिलेगी। इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी तो आज़ादी के पहले से अस्तित्व में आने वाली संस्‍थाओं में से एक है और इसलिए आप सबने देश की यात्रा के हर उतार-चढ़ाव को भी बहुत बारीकी से देखा है, उसे जिया भी है, और जन-सामान्‍य को बताया भी है। इसलिए, एक संगठन के रूप में आपका काम जितना प्रभावी बनेगा, देश को उसका उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा।

साथियों,

मीडिया केवल देश के हालातों का मूकदर्शक भर नहीं होता। मीडिया के आप सभी लोग, हालातों को बदलने में, देश को दिशा देने में एक अहम रोल निभाते हैं। आज भारत एक ऐसे कालखंड में है, जब उसकी अगले 25 वर्षों की यात्रा बहुत अहम है। इन 25 वर्षों में भारत विकसित बने, इसके लिए पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका भी उतनी ही बड़ी है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को जागरूक करता है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को उनके अधिकार याद दिलाता रहता है। और यही मीडिया है, जो देश के लोगों को ये एहसास दिलाता है कि उनका सामर्थ्य क्या है। आप भी देख रहे हैं, जिस देश के नागरिकों में अपने सामर्थ्य को लेकर आत्मविश्वास आ जाता है, वो सफलता की नई ऊंचाई प्राप्त करने लगते हैं। भारत में भी आज यही हो रहा है। मैं एक छोटा सा उदाहरण देता हूं आपको। एक समय था, जब कुछ नेता खुलेआम कहते थे कि डिजिटल ट्रांजेक्शन भारत के लोगों के बस की बात नहीं है। ये लोग सोचते थे कि आधुनिक टेक्नोलॉजी वाली चीजें इस देश में नहीं चल पाएंगी। लेकिन भारत की जनता की सूझबूझ और उनका सामर्थ्य दुनिया देख रही है। आज भारत डिजिटल ट्रांजेक्शन में दुनिया में बड़े-बड़े रिकॉर्ड तोड़ रहा है। आज भारत के UPI की वजह से आधुनिक Digital Public Infrastructure की वजह से लोगों की Ease of Living बढ़ी है, लोगों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैसे भेजना आसान हुआ है। आज दुनियाभर में हमारे जो देशवासी रहते हैं, खासकर के गल्‍फ के देशों में, वो सबसे ज्यादा रेमिटेंस भेज रहे हैं और उनको जो पहले खर्च होता था, उसमें से बहुत कमी आ गई है और इसके पीछे एक वजह ये डिजिटल रेवेल्यूशन भी है। दुनिया के बड़े-बड़े देश हमसे टेक्नोलॉजी और हमारे implementation model को जानना-समझने को प्रयास कर रहे हैं। ये इतनी बड़ी सफलता सिर्फ सरकार की है, ऐसा नहीं है। इस सफलता में आप सभी मीडिया के लोगों की भी सहभागिता है औऱ इसलिए ही आप सब बधाई के भी पात्र हैं।

साथियों,

मीडिया की स्वाभाविक भूमिका होती है, discourse create करना, गंभीर विषयों पर चर्चाओं को बल देना। लेकिन, मीडिया के discourse की दिशा भी कई बार सरकार की नीतियों की दिशा पर निर्भर होती है। आप जानते हैं, सरकारों में हमेशा हर कामकाज के अच्छा है, बुरा है, लेकिन वोट का गुणा-भाग, उसकी आदत लगी ही रहती है। हमने आकर के इस सोच को बदला है। आपको याद होगा, हमारे देश में दशकों पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। लेकिन, उसके बाद की सच्चाई ये थी कि 2014 तक देश में 40-50 करोड़ गरीब ऐसे थे, जिनका बैंक अकाउंट तक नहीं था। अब जब राष्ट्रीयकरण हुआ तब जो बातें कही गई और 2014 में जो देखा गया, यानी आधा देश बैंकिंग सिस्टम से बाहर था। क्या कभी हमारे देश में ये मुद्दा बना? लेकिन, हमने जनधन योजना को एक मूवमेंट के तौर पर लिया। हमने करीब 50 करोड़ लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा। डिजिटल इंडिया और भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों में यही काम हमारा सबसे बड़ा माध्यम बना है। इसी तरह, स्वच्छता अभियान, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे अभियानों को अगर हम देखेंगे! ये वोट बैंक पॉलिटिक्स में कहीं फिट नहीं होते थे। लेकिन, बदलते हुए भारत में, देश के मीडिया ने इन्हें देश के नेशनल discourse का हिस्सा बनाया। जो स्टार्ट-अप शब्द 2014 के पहले ज्यादातर लोग जानते भी नहीं थे, उन्हें मीडिया की चर्चाओं ने ही घर-घर तक पहुंचा दिया है।

साथियों,

आप मीडिया के दिग्गज हैं, बहुत अनुभवी हैं। आपके निर्णय देश के मीडिया को भी दिशा देते हैं। इसलिए आज के इस कार्यक्रम में मेरे आपसे कुछ आग्रह भी हैं।

साथियों,

किसी कार्यक्रम को अगर सरकार शुरू करती है तो ये जरूरी नहीं है कि वो सरकारी कार्यक्रम है। सरकार किसी विचार पर बल देती है तो जरूरी नहीं है कि वो सिर्फ सरकार का ही विचार है। जैसे कि देश ने अमृत महोत्सव मनाया, देश ने हर घर तिरंगा अभियान चलाया, सरकार ने इसकी शुरुआत जरूर की, लेकिन इसको पूरे देश ने अपनाया और आगे बढ़ाया। इसी तरह, आज देश पर्यावरण पर इतना ज़ोर दे रहा है। ये राजनीति से हटकर मानवता के भविष्य का विषय है। जैसे कि, अभी ‘एक पेड़ मां के नाम’, ये अभियान शुरू हुआ है। भारत के इस अभियान की दुनिया में भी चर्चा शुरू हो गई है। मैं अभी जी7 में गया था जब मैंने इस विषय को रखा तो उनके लिए बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि हर एक को अपनी मां के प्रति लगाव रहता है कि उसको लगता है कि ये बहुत क्लिक कर जाएगा, हर कोई कह रहा था। देश के ज्यादा से ज्यादा मीडिया हाउस इससे जुड़ेंगे तो आने वाली पीढ़ियों का बहुत भला होगा। मेरा आग्रह है, ऐसे हर प्रयास को आप देश का प्रयास मानकर उसे आगे बढ़ाएं। ये सरकार का प्रयास नहीं है, ये देश का है। इस साल हम संविधान का 75वां वर्ष भी मना रहे हैं। संविधान के प्रति नागरिकों में कर्तव्य बोध बढ़े, उनमें जागरूकता बढ़े, इसमें आप सभी की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।

साथियों,

एक विषय है टूरिज्म से जुड़ा हुआ भी। टूरिज्म सिर्फ सरकार की नीतियों से ही नहीं बढ़ता है। जब हम सब मिलकर देश की ब्रांडिंग और मार्केटिंग करते हैं तो, देश के सम्मान के साथ-साथ देश का टूरिज़्म भी बढ़ता है। देश में टूरिज्म बढ़ाने के लिए आप लोग अपने तरीके निकाल सकते हैं। अब जैसे मान लीजिए, महाराष्ट्र के सभी अखबार मिलकर के तय करें कि भई हम सितम्बर महीने में बंगाल के टूरिज्म को प्रमोट करेंगे अपनी तरफ से, तो जब महाराष्ट्र के लोग चारों तरफ जब बंगाल-बंगाल देखें तो उनको करें कि यार इस बार बंगाल जाने का कार्यक्रम बनाएं, तो बंगाल का टूरिज्‍म बढ़ेगा। मान लीजिए आप तीन महीने के बाद तय करें कि भई हम तमिलनाडु की सारी चीजों पर सब मिलकर के, एक ये करें के एक दूसरा करें ऐसा नहीं, तमिलनाडु फोकस करेंगे। आप देखिए एक दम से महाराष्ट्र के लोग टूरिज्‍म में जाने वाले होंगे, तो तमिलनाडु की तरफ जाएंगे। देश के टूरिज्म को बढ़ाने का एक तरीका हो और जब आप ऐसा करेंगे तो उन राज्यों में भी महाराष्ट्र के लिए ऐसे ही कैम्पेन शुरू होंगे, जिसका लाभ महाराष्‍ट्र को मिलेगा। इससे राज्यों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, जिज्ञासा बढ़ेगी और आखिरकार इसका फायदा जिस राज्य में आप ये इनिशिएटिव ले रहे हें और बिना कोई एक्‍स्‍ट्रा प्रयास किए बिना आराम से होने वाला काम है।

साथियों,

आप सभी से मेरा आग्रह अपनी ग्लोबल प्रेजेंस बढ़ाने को लेकर भी है। हमें सोचना होगा, दुनिया में हम नहीं है। As far as media is concerned हम 140 करोड़ लोगों के देश हैं। इतना बड़ा देश, इतना सामर्थ्य और संभावनाएं और बहुत ही कम समय में हम भारत को third largest economy होते देखने वाले हैं। अगर भारत की सफलताएं, दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का दायित्व भी आप बहुत बखूबी ही निभा सकते हैं। आप जानते हैं कि विदेशों में राष्ट्र की छवि का प्रभाव सीधे उसकी इकोनॉमी और ग्रोथ पर पड़ता है। आज आप देखिए, विदेशों में भारतीय मूल के लोगों का कद बढ़ा है, विश्वसनीयता बढ़ी है, सम्मान बढ़ा है। क्योंकि, विश्व में भारत की साख बढ़ी है। भारत भी वैश्विक प्रगति में कहीं ज्यादा योगदान दे पा रहा है। हमारा मीडिया इस दृष्टिकोण से जितना काम करेगा, देश को उतना ही फायदा होगा और इसलिए मैं तो चाहूंगा कि जितनी भी UN लैंग्वेज हैं, उनमें भी आपके पब्लिकेशंस का विस्तार हो। आपकी माइक्रोसाइट्स, सोशल मीडिया accounts इन भाषाओं में भी हो सकते हैं और आजकल तो AI का जमाना है। ये सब काम आपके लिए अब बहुत आसान हो गए हैं।

साथियों,

मैंने इतने सारे सुझाव आप सबको दे डाले हैं। मुझे मालूम है, आपके अखबार में, पत्र पत्रिकाओं में, बहुत लिमिटेड स्पेस रहती है। लेकिन, आजकल हर अखबार पर और हर एक के पास एक publication के डिजिटल editions भी पब्लिश हो रहे हैं। वहाँ न स्पेस की limitation है और न ही distribution की कोई समस्या है। मुझे भरोसा है, आप सब इन सुझावों पर विचार करके, नए experiments करेंगे, और लोकतंत्र को मजबूत बनाएँगे। और मैं पक्‍का मानता हूं कि आपके लिए एक, भले ही दो पेज की छोटी एडिशन जो दुनिया की UN की कम से कम languages हों, दुनिया का अधिकतम वर्ग उसको देखता है, पढ़ता है… embassies उसको देखती हैं और भारत की बात पहुंचाने की एक बहुत बड़ा source आपके ये जो डिजिटल एडिशंस हैं, उसमें बन सकता है। आप जितना सशक्त होकर काम करेंगे, देश उतना ही आगे बढ़ेगा। इसी विश्वास के साथ, आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! और आप सबसे मिलने का मुझे अवसर भी मिल गया। मेरी आपको बहुत शुभकामनाएं हैं! धन्‍यवाद!