दि. २१-११-२०११

महात्मा मंदिर, गांधीनगर

ई बार अनेक लोगों के मन में प्रश्न उठते होंगे और हमारे समाज की एक स्थिति ऐसी है कि जो छोटी इकाइयाँ हैं उनके प्रति देखने का भाव कुछ अलग होता है। अब कोई सामान्य नौकरी कर रहे हों, गुज़ारा चल जाए इतना संतोषजनक कमा रहे हों फिर भी कई लोगों को ऐसा लगता है कि इससे अच्छा तो हम बैंक में चपरासी की नौकरी करते होते तो ज़्यादा रोब होता..! कारण? समाज में एक विचित्र प्रकार की मानसिकता है। कोई ऑटोरिक्शा चलाता हो, अपने घर की तीन ऑटोरिक्शा हो, किसी भी नौकरी से ज्यादा कमाता हो लेकिन ऑटोरिक्शा चलाता है इसलिए उसकी तरफ़ देखने का द्रष्टिकोण अलग होता है। यह जो समाज-जीवन की मन:स्थिति है जब तक हम उसे नहीं बदलें तब तक देश के विकास के लिए गौरवपूर्ण, स्वाभिमान-पूर्वक भाव जागना मुश्किल बनता है। और इसलिए जरूरत है कि हर एक क्षेत्र में डिग्निटी कैसे आए? इसको प्रतिष्ठा कैसे मिले? और एक बार डिग्निटी मिले, इसकी सहज प्रतिष्ठा बने तो समाज में अपने आप स्वीकृति मिलती है।

क समय था कि हमारे यहाँ आंगनबाड़ी अर्थात? उसका कोई महत्व ही नहीं था, उन्हें तो
आया बहन, झूलाघर वाली बहन कहा जाता था... घर से अपने बच्चों को ले जाए, लाए... हमें मालूम भी न हो कि इस बहन का नाम क्या है, काम क्या करती है। कारण? एक ऐसा माहौल बन गया है कि आंगनबाड़ी चलाने वाले अर्थात सामान्य लोग। इस सरकार ने समग्र आंगनबाड़ी क्षेत्र को महत्त्व भी दिया, इसकी डिग्निटी स्थापित की और आंगनबाड़ी में उत्तम काम करने वाली जो बहनें हो उन्हें ‘माता यशोदा एवॉर्ड’ भी दिये और हमने दुनिया को समझाया कि सबसे पहली आंगनबाड़ी माता यशोदा ने शुरु की थी। देवकी के पुत्र कृष्ण को माता यशोदा ने ही पाला था और ऐसे महापुरुष का निर्माण हुआ जिन्हें आज हजारों वर्षों बाद तक याद करते हैं और इसी लिए माता यशोदा का महत्व है। आपकी संतान को इस आंगनबाड़ी की बहनें जिस तरह से पालती हैं, संस्कारित करती है, बड़ा करती है वह माता यशोदा जैसा काम करती है। उनके लिए यूनिफॉर्म बनाये, एक डिग्निटी पैदा की। मित्रों, इसी प्रकार आई.टी.आई. यानि जैसे कुछ है ही नहीं..! पाँच-पंद्रह दोस्त कहीं घूमने गये हों और कोई पूछे कि क्या पढ़ते हो? आई.टी.आई., तो ऐसे दूरी बना लेते हैं, आई.टी.आई..! मुझे इस स्थिति को बदलना है। मुझे इसकी डिग्निटी खडी करनी है। ‘श्रम एव जयते’ ऐसा हम सब कहते हैं। श्रम की प्रतिष्ठा न हो? श्रम करके समाज का निर्माण करने वाले जो लोग हैं वे तो ब्रह्मा के अवतार हैं। सृष्टि के निर्माण में जो रोल ब्रह्मा का था वही आई.टी.आई. वालों का है। चाहे वह छोटे पैमाने पर होगा, ब्रह्मा ने तो विशाल, विश्व फलक पर काम किया था। आई.टी.आई. में दाखिल हुए कुछ तो ऐसे होते हैं जो छोटे होंगे तब घर पर आए मेहमान को मम्मी-पापा ने उनका परिचय दिया होगा कि यह बेटा है इसे डॉक्टर बनाना है, यह बेटी है इसे इंजीनियर बनाना है या तो ऐसा कहा होगा कि यह बेटा है इसे इंजीनियर बनाना है, बेटी है इसे डॉक्टर बनाना है। सब के घर में आपने यह सुना ही होगा। आप सब भी बड़े हुए, आपको भी किसी न किसी ने कहा होगा कि इसे डॉक्टर बनाना है। अब नहीं बन सके, गाड़ी आठवीँ से आगे गई ही नहीं । फिर मम्मी-पापा ने कह दिया होगा कि शिक्षक ही ऐसे थे..! अलग-अलग कारण ढूँढ निकाले होंगे लेकिन अपनी गाड़ी तो रूक ही गई और फिर मुश्किल से कहीं आई.टी.आई. में मेल खाया हो। हमें भी ऐसा लगता रहता है कि मुझे तो इंजीनियर बनना था, आई.टी.आई. करना पड़ा। मुझे तो फलां बनना था, आई.टी.आई. करना पड़ा। जिसके कारण अपना ही मन न लगे। और जो शिक्षक हों वे इंजीनीयरिंग पढ़कर आये हों, डिप्लोमा करके आये हों तो उनको भी ऐसा लगता है कि ठीक है अब..! मैं अच्छी तरह से पहचानता हूँ न आप सबको? आपके सारे प्रॉब्लेम मुझे पता है न? मित्रों, यह जो खाई है न, मुझे इस खाई को ख़त्म करना है और इसकी शुरुआत की है हमने। पहला काम किया, आई.टी.आई. मॉडल कैसे बने? उत्कृष्ट प्रकार की आई.टी.आई. की रचना कैसे हो? उसकी इमारतों में सुधार कैसे हो? उसके पाठ्यक्रमों में आधुनिकरण कैसे आये? डिसिप्लिन कैसे आये? यूनिफॉर्म कैसे हों? उसमें टॅक्नोलॉजी का उपयोग कैसे हो..? यानि ये सब शुरूआत की हमने। और मुझे स्मरण है कि कुछ पाँच साल पहले भारत सरकार के इस विषय के सारे सेक्रेटरी यहाँ गुजरात आये थे। गुजरात में अभ्यास करने आये कि आपने आई.टी.आई. के रुप-रंग बदले यानि क्या किया है? कैसे किया है? कहाँ तक ले गये हो? और उनको आश्चर्य हुआ कि इस राज्य में आई.टी.आई. के लिए यह सरकार इतना परिश्रम करती है! उसे तो कोई कुछ गिनता ही नहीं था। मित्रों, उसके बाद स्थिति यह बनी कि गुजरात ने जो प्रयोग किए उनके आधार पर भारत सरकार ने योजना बनाई कि आई.टी.आई. को कैसे अपग्रेड करना, आई.टी.आई. को कैसे मॉडल बनाना और गुजरात के मॉडल को आगे कैसे बढ़ाना इसका विचार भारत सरकार ने किया। हम उसी दिशा में थे। पहले स्थिति ऐसी थी कि आठवीँ कक्षा के बाद जिसने आई.टी.आई. किया हो, उसे आठवीँ पास ही माना जाता था। दसवीँ कक्षा तक पढ़ने के बाद दो साल आई.टी.आई. में लगाए हों तो भी उसे आठवीँ पास ही माना जाता था। दसवीँ कक्षा पास की हो, मुश्किल से पैंतीस प्रतिशत आए हों तो भी वह आई.टी.आई. वालों को चिढ़ाता था कि तुम तो आठवीँ वाले हो, तुम तो आठवीँ वाले हो..! बारहवीँ कक्षा में दो प्रयत्नों के बाद जैसे-तैसे इम्तिहान पास किया हो, अंग्रेज़ी-गणित लिए ही न हों फिर भी आई.टी.आई. वाला मिले तो बोलता था कि जाने दे यार, मैं तो बारहवीँ पास हूँ..! ऐसा ही होता था न? हमने यह स्थिति बदली। हमने तय किया, निर्णय किया कि आठवीँ कक्षा के बाद दो साल जो आई.टी.आई. करता है उसे दसवीँ कक्षा पास गिनना, दसवीँ के बाद जिन्हों ने दो साल किए हैं उनको बारहवीँ कक्षा पास गिनना। मित्रों, ये मेहनत इसलिए की है क्योंकि मुझे इसकी एक डिग्निटी पैदा करनी है।

पने देखा होगा कि सेना का एक सिपाही, सामान्य छोटा कर्मचारी, वह जब सेना में काम करता होता है तब कई बार वहाँ माली का काम करता हो, या तो वहाँ गड्ढा खोदने का काम करता हो... लेकिन यूनिफॉर्म, परेड इन सब मामलों में समानता होती है और इसलिए वह जब घर से निकलता तो रौबदार लगता है। उसका कॉन्फिडन्स लेवल बढ़ जाता है। सामान्य सिपाही हो, आर्मी में बिलकुल ही छोटा, हमारे वहाँ प्यून जो काम करता है शायद उससे भी छोटा काम करता हो, लेकिन उसकी एक डिग्निटी पैदा हो गई, इन्स्टिटूशन में और समाज में भी। वो कहीं भी जाए तो उसे एक डिग्निटी से देखा जाता है। भाइयों-बहनों, यदि हमारी इन्स्टिट्युशन का कोई साधारण चपरासी हो तो उसे चपरासी की नजर से देखा जाता है, लेकिन इन्स्टिटूशनल अरेन्जमेन्ट ऐसी है कि आर्मी में वही काम करनेवाला आदमी समाज के लोगों से जब मिलता है तब उसे डिग्निटी से देखा जाता है। वह जा रहा हो तो हमें भी हाथ मिलाने का मन करता है कि वाह..! प्लेटफॉर्म पर खड़े हों तो मन में आता है कि चलो उसके साथ एक फोटो खींचवा लें। ऐसा होता है। कारण? उसे एक तरह की ट्रेनींग मिली है। उसके यूनिफॉर्म में, उसके पहनावे में, खड़े रहने में, बोलने में, चलने में एक बदलाव आया है और इसके कारण उसे यह सिद्धि मिली है। भाइयों-बहनों, मेरी कोशिश यही है। आनेवाले दिनों में आई.टी.आई. में आप कोई भी कोर्स करो, आप टर्नर हो, फिटर हो, वेल्डर हो, कुछ भी हो, वायरमैन का काम करते हो, ऑटोमोबाइल का काम करते हो लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप इस मन:स्थिति को भंग करें कि इस देश को आपकी ज़रूरत नहीं थी और आप बेकार हो गये हैं। आप यहाँ अनिच्छा से बिल्कुल न आएँ। मुझे यह करना है और इसलिए मैं आई.टी.आई. क्षेत्र के हमारे सभी अधिकारी जो काम कर रहे हैं उनसे आग्रह करता हूँ कि आनेवाले दिनों में इन्हें जिस प्रकार का भी टॅक्निकल नॉलेज मिले, उसके साथ-साथ सॉफ्ट स्किल के भी पन्द्रह दिन, महिने के कोर्स को जोड़ दें। किसी को मिलें तो कैसे हाथ मिलाना? कैसे बात करनी? बॉस के साथ बात करनी हो तो कैसे बात करें? सहकर्मी के साथ कैसे बात करें... एक कॉन्फिडन्स लेवल आए। और यही काम, सॉफ्ट स्किल का, उतना ही महत्वपूर्ण है। आपकी बातचीत, आपका व्यवहार... आप टॅक्निकली कितने ही साउन्ड क्यूँ न हों, लेकिन आपको कम्यूनिकेट करना नहीं आता हो, अपनी बात एक्सप्रेस करना नहीं आता हो तो आपका मूल्य कौड़ी का हो जाता है। इसलिए यदि आपके पास योग्यता है तो आपको यह भी आ सकता है। आपको सुव्यवस्थित कैसे रहना, पाँच-पन्द्रह अंग्रेज़ी वाक्य बोलने हों तो कैसे बोलना, कुछ हिन्दी के वाक्य कैसे बोलने, मैनर कैसे दिखाना, टेलीफोन में कैसे बात करनी... ये सारी चीज़ें ट्रेनींग से आ सकती है। और एक बार हमारे आई.टी.आई. की पूरी कैडर में टेक्नोलोजी प्लस इस क्वॉलिटी की पूर्ति करें तो मैं निश्चित रूप से कहता हूँ मित्रों, मुझे इसे जिस डिग्निटी की ओर ले जाना है, उस डिग्निटी में ये सारी बातें महत्वपूर्ण सीढ़ियाँ बनेंगी और आप सभी के जीवन की एक ताकत बनेंगी। आपने देखा होगा कि किसी सेठ की दुकान हो, किराने की दुकान हो या प्रोविज़न स्टोर हो जिसमें पांच-पचास चीज़ें एक साथ बिकती हो वहाँ एक सहायक काम करता है। वह सहायक काम करता है और वह सेठ कहता है अरे, ये ला, वो ला... अरे, कहाँ गया था? देखता नहीं है ग्राहक आया हुआ है? ऐसा ही होता है न? लेकिन जब आप किसी बड़े मॉल में जाते हैं तब वहाँ अच्छा सा कोट-पैंट-टाइ पहेने, जैकेट पहने, अप-टू-डेट कपड़े पहने कोई लड़का या लड़की खड़ी होती है। वो आपको क्या देती है? वही देती है न? ये चीज़, वो चीज़... वो भी तो सहायक ही है न? ये मॉल का सहायक है, वो दुकान का सहायक है। लेकिन मॉल में काम करता है इसलिए उसके पहनावे, उसकी सॉफ्ट स्किल से उसकी एक डिग्निटी बनती है और हमें भी वह महत्वपूर्ण व्यक्ति लगता है। वास्तव में तो प्रोविज़न स्टोर में एक सहायक जो काम करता है वही काम ये करते हैं। काम में कोई फ़र्क नहीं है लेकिन मॉल कल्चर के तहत एक डिग्निटी पैदा हुई है। ये जो बदलाव आता है वह बदलाव इंसान में कॉन्फिडन्स पैदा करता है और मैं मानता हूँ कि हमारी विकास यात्रा के तहत इस बात के महत्व को जोड़ना आवश्यक बन गया है।

मित्रों, इक्कीसवीं सदी हिंदुस्तान की सदी है। हम सब सुनते हैं, तैयारी की है? यह समाप्त भी होने को आएगी! जैसे हम जन्मदिन मनाते हैं वैसे ही इक्कीसवीं सदी भी निकल जाएगी। जो तैयारी बीसवीँ सदी में करनी चाहिये थी वो तो हुई या न हुई लेकिन अब देर करना उचित नहीं है। यदि भारत ऐसा चाहता हो कि इक्कीसवीं सदी हिंदुस्तान की सदी बने तो हमें हमारा ध्यान हमारी युवाशक्ति पर केंद्रित करना होगा। हिंदुस्तान दुनिया का सबसे युवा देश है, यह दुनिया का एक देश है जहाँ ६५% से ज़्यादा जनसंख्या युवा है... आप में से किसी को शायद यूरोप जाने का सौभाग्य न मिला हो, लेकिन आप टी.वी. पर कभी बी.बी.सी. या और कुछ देखते हों तो आप देखते होंगे कि आपको जो लोग दिखेंगे वे ज़्यादातर बूढ़े लोग ही दिखेंगे। हाथ में वॉकिंग स्टिक हो, धीरे-धीरे चलते हों... ऐसे पचास-सौ लोग गुज़रें तब जाकर मुश्किल से एकाध नौजवान दिखता है। पूरे यूरोप में ऐसी स्थिति है। हमारे यहाँ इतनी सारी युवाशक्ति ऐसे ही रास्ते पर भटकती फिर रही हैं। कैसे इस युवाशक्ति को इस देश के निर्माण कार्य में लगाएँ? और यदि इसे काम लगाना हो तो तीन चीज़ों पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। और मित्रों, ये सारी चीज़ें आपके लिए भी उपयोगी हैं। इक्कीसवीं सदी यदि ज्ञान की सदी है तो हमारा युवक ज्ञान का उपासक बने। मित्रों, ज्ञान के कोई दरवाज़े नहीं होते, ज्ञान को कोई फुल स्टॉप नहीं होता है। आठवीँ कक्षा तक पढ़ाई के बाद उठ गये इसका मतलब सब कुछ खत्म हो गया ऐसा नहीं होता। मित्रों, मैंने एक काम करवाया था हमारी सरकार में, कुछ चार साल पहले। मैंने उन लोगों से कहा कि एक काम करो, जो विद्यार्थी आई.टी.आई. करके गये हैं, जिनके जीवन के कैरियर की शुरुआत आई.टी.आई. से हुई और
स्वप्रयत्नों
 से वे खुद जो कुछ सीखे थे उसके आधार पर स्वयं बड़े उद्योगपति बन गये हैं उनकी सूचि बनाओ। और हमने एक पुस्तक प्रसिद्ध की तो ध्यान में आया कि गुजरात में अनेक ऐसे आई.टी.आई. के विद्यार्थी थे जिनके यहाँ पचास-पचास सौ-सौ आई.टी.आई. के लड़के नौकरी करते थे। और इसकी एक पुस्तक मैंने प्रसिद्ध की है, वह शायद आपकी आई.टी.आई. इन्स्टिटूट की सभी लाइब्रेरी में होंगी ही। यह क्यों किया? एक डिग्निटी पैदा करने के लिए, एक कॉन्फिडन्स पैदा करने के लिए कि आई.टी.आई. में आए हैं तो जिंदगी यहाँ खत्म नहीं होती है, आई.टी.आई. से भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

भाइयों-बहनों, यह पूरा इन्स्टिट्युशन... मैंने जैसे कहा कि यह ज्ञान की ओर का आकर्षण रहना चाहिए, नया-नया जानने का... आज आपके मोबाइल फोन में सब कुछ आपको आता है, मोबाइल फोन कैसे इस्तेमाल करना ये आप सबको आता है। और अभी पिछले दिनों मैं कपराडा नामक वलसाड जिले का एक इन्टीरीअर गाँव है वहाँ डेरी के एक चिलिंग सेन्टर का उद्घाटन करने गया था। वह आदिवासी इलाका है, आदिवासी बहनें दूध इकट्ठा करती हैं। एक छोटा सा चिलिंग सेन्टर बना था जहाँ आदिवासी बहनें दूध भर कर जाती है। मेरे लिए आश्चर्य की बात यह थी कि दूध भरने आने वाली जो बहनें थीं, उन लोगों ने आस-पास के गाँवों में से सौ-एक बहनों को इकट्ठा किया था, वे आदिवासी बहनें थीं और हम जब उद्घाटन की रस्म कर रहे थे तब सभी आदिवासी बहनें अपने मोबाइल फोन से हमारे फ़ोटो खींच रही थी। आदिवासी बहनें, जो सिर्फ़ पशुपालन करती है, दूध भरने आयी थी, ऐसी बहनें मोबाइल से फ़ोटो खींच रही थी..! इसलिए मैं उनके पास गया, मैंने कहा कि इस मोबाइल में फ़ोटो खींचकर क्या करेंगी? तो उनका जवाब था, आदिवासी बहनों का जवाब था कि वो तो हम डाउनलोड करवा लेंगे..! इसका अर्थ यह हुआ कि आपको यह टॅक्नोलॉजी सहज रूप से हस्तगत है। और यदि आप मोबाइल टॅक्नोलॉजी जानते हो तो वही कम्प्यूटर टॅक्नोलॉजी है। यदि सहज रूप से आप कम्प्यूटर सैवी बनो, आपकी एडिशनल क्वॉलिफिकेशन..! क्योंकि जैसे मैंने कहा है कि आई.टी.आई. में भी आगामी दिनों में एक टर्नर को जॉब-वर्क ई-मेल से ही आनेवाला है। वह काम करेगा तो उसको जॉब-वर्क ई-मेल से ही आने वाला है और जॉब-वर्क पूरा करने की सारी सूचनाएँ ई-मेल से ही आनेवाली हैं। तो जैसे उसके लिए सॉफ्ट स्किल की ज़रूरत है वैसे ही उसे आई.टी. सैवी भी बनना चाहिए, उसे टेक्नॉ सैवी भी बनना चाहिए, उसे कम्प्यूटर सैवी भी बनना चाहिए। और यह व्यवस्था यदि हम तैयार करें तो हमारा विद्यार्थी ज्ञान के मामले में भी समृद्ध हो सकता है।

दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है स्किल, कौशल्य। मित्रों, वेल्यू एडिशन करना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने आप में वेल्यू एडिशन करता है वह स्थितियों को बदल सकता है। वेल्यू एडिशन कैसे होता है? मेरा गाँव, मेरा वतन वडनगर। मैं एक बार रेल्वे से महेसाणा जा रहा था। तो हमारे डिब्बे में एक बूटपॉलिश वाला लड़का चढ़ गया। वह अपंग था, उसे गुजराती भाषा आती नहीं थी। मुझे आज भी याद है मेरे बचपन की वो घटना। वह कर्णाटक का था, कन्नड भाषा जानता था। अपाहिज होने के कारण मेरे मन में उसके लिए थोड़ी संवेदना जागी। तो मैं उसे पूछने लगा। अब गुजराती तो उसे आती नहीं थी,
टूटी
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फूटी अंग्रेज़ी में बोल रहा था सब। मैंने कहा तुम वहाँ सब कुछ छोडकर यहाँ किसलिये आये? यह तो ऐसा इलाक़ा है कि यहाँ जूते तो खरीदे हों लेकिन जूते को पोलिश-बोलिश नहीं करते हैं, यहाँ तुमको क्या काम मिलेगा? वह मुझसे बोला कि साहब, मुझे ज़्यादा कुछ तो पता नहीं है, जिस गाड़ी में चढ़ गया मतलब चढ़ गया। मुझसे बोला साहब, आप मेरे पास पॉलिश करवाओगे? उस समय तो चार आने में होती थी। मैंने कहा कि हाँ, जरूर कराऊँगा। तो उसने क्या किया? उसने अपने थैले में से उस दिन का ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ निकाला और मेरे हाथ में रखा। ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ के उपर उसने लिखा था कि ‘आपका दिन अच्छा हो’। उसने मुझे कहा कि साहब, मैं बूटपॉलिश करुँ तब तक आप अख़बार पढ़ो। अब यह उसने वेल्यू एडिशन की। पॉलिश करता था लेकिन मुझे उसने अख़बार पढ़ने को दिया लिहाज़ा मुझमें स्वाभाविक ही लालच जागे कि बग़ैर पैसे के मुझे तो अख़बार पढ़ने मिल गया। हम तो ‘गुजराती’ हैं, ‘सिंगल फेर, डबल जर्नी’..! लेकिन आज भी उसकी छबि वैसे की वैसी मेरे मन में पड़ी है कि उसे पता था कि ग्राहक के संतोष लिए क्या क्या किया जा सकता है। तो मुझे सिर्फ़ जूते अच्छी पॉलिश कर के दे इसके बदले उसने प्रोफेशनल स्किल इतनी डेवलप की थी कि उसने मुझे अपना
‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ पढ़ने दिया। दूसरे ग्राहक के पास गया, पॉलिश करते हुए फिर से उसने वही ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ उसे दिया। वह पॉलिश करे तब तक आप हेडलाइन्स पढ़ लें। एक छोटा सा सुधार एक बूटपॉलिश वाले को भी आता हो..! मित्रों, ये सारी वेल्यू एडिशन स्किल हमारा महत्व बढ़ाती हैं। स्किल के मामले में कोई भी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं हो सकता। आपके पास कितना अच्छा हुनर है, किस प्रकार का हुनर है ज़िंदगी जीने का आनन्द इसके उपर निर्भर करता है।

तीसरी चीज़ ज़रूरी है, ‘कैपेसिटी’। आपकी क्षमता देखें। ज्ञान का भंडार पडा हो, कौशल्य हो, लेकिन डिलिवर करने की क्षमता न हो। घर में गैस हो, कुकर हो, चूल्हा हो, आटा, पानी, लकड़ी सब कुछ हो लेकिन रसोई बनाने की क्षमता ही न हो तो लड्डु कहाँ से बने, भाई? और इसलिए कैपेसिटी होनी बहुत ज़रूरी है। तो ज्ञान, कौशल्य और क्षमता, इन तीनों दिशाओं में यदि हम काम करें तो मुझे विश्वास है मित्रों कि हम अपने आप को तैयार कर सकते हैं। और दूसरी चीज़, मित्रों जब सपने देखते हों तब..., मैं यहाँ सारे ही विद्यार्थी मित्रों को कहता हूँ, नौजवान मित्रों को कहता हूँ कि आई.टी.आई. पढ़ने के बाद भी आपके जीवन में कहीं भी पूर्ण विराम नहीं है, आप बहुत सी नई ऊँचाईयों को पार कर सकते हो। अब तो मित्रों, कवि भी इन्कम टैक्स भरने लगे हैं..! नहीं समझ आया? यह कौशल्य जिसके पास हो, तो पहले प्रश्न उठता था कि उसकी रोजी-रोटी का क्या? कवि हो, लेखक हो, तो मुश्किल से बेचारे का गुजारा चलता था। आज कवि, लेखक भी इन्कम टैक्स भरते हैं। तो टॅक्नोलॉजी वालों के पास तो कितनी सारी ताकत होती है? टॅक्नोलॉजी वाले तो कितना नया कर सकते हैं? मित्रों, कई बार बड़ा आदमी इनोवेशन करे उसकी तुलना में टॅक्नोलॉजी फिल्ड का छोटा आदमी बहुत ज़्यादा इनोवेशन कर सकता है। मैं जानता हूँ कि राजकोट में एक भाई घड़ी की रिपेरिंग का काम करते हैं। आज भी मुझे याद है। मैं जानता हूँ उसे ऐसा शौख है कि दुनिया की कोई भी बेहतरीन घड़ी हो और यदि रिपेर करने मिले तो उसे अच्छा लगता है। एक बार कोई स्विस-मेड घड़ी रिपेरिंग के लिए आई। उसने रिपेर तो की लेकिन उसने स्विस कंपनी के साथ कॉरस्पोन्डन्स किया और उसने कहा कि आपकी इस घड़ी में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है, आपकी डिज़ाइन में ही डिफेक्ट है इसलिए आपको यह समस्या हमेशा आती रहेगी। और उसका सोल्यूशन भी दिया, उसका डायाग्राम बना कर उसने स्विस कंपनी के साथ पत्रव्यवहार भी किया और मुझे आज भी पता है कि उस स्विस कंपनी ने... अन्यथा तो वो उस घड़ी को रिपेर करके पैसे ले लेता और बात खत्म हो गई होती। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने उसमें रुचि ली और स्विस कंपनी ने स्वीकार किया कि आपने हमें बहुत अच्छा सोल्यूशन दिया है और हमारी नई प्रोडक्ट जो आयेगी वह नई प्रोडक्ट हम यह डिफेक्ट ठीक करके ही बनायेंगे और उसको इनाम भेजा, उसका अप्रीशीऐशन किया। आज भी उस घडी की दुकान में उसका अप्रीशीऐशन लेटर वैसे का वैसा पडा हुआ है। इसका अर्थ यह हुआ कि मित्रों, यदि इनोवेटिव नेचर हो तो छोटा काम भी कितना परिवर्तन ला सकता है, कितनी प्रतिष्ठा खड़ी कर सकता है। और टेक्निकल फील्ड का आदमी, आप टेक्निकल लोग, आपके माँ-बाप आपका वर्णन करते होंगे तब कहते होंगे कि ये जब छोटा था तब इसे कोई भी खिलौना लाकर दो शाम तक तो उसने तोड़ ही डालता था और फिर खुद ही उसे दोबारा फिट भी कर देता था। यह आपकी प्रकृति में ही होगा, मित्रों। आपके स्वभाव में ही होगा। यह जो ताकत ईश्वर ने आपको दी है वह अकल्पनीय ताकत है, मित्रों। आप भाग्यशाली हो कि ईश्वर ने आपको यह शक्ति दी है। इस शक्ति का उपयोग आपके विकास में ऊर्जा के रूप में काम कर सकता है, एक पावर जनरेटर के रूप में काम कर सकता है। यह वृत्ति है इस वृत्ति को आपको पहचानना है। और इस वृत्ति को आप जानो, इस वृत्ति को क्षमता में कनवर्ट कर दो तो आपके जीवन में अनेक द्वार खुल सकेंगे, ऐसी बहुत सी संभावनाएँ पडी हैं। और इसका विचार विद्यार्थियों और टेक्निकल फील्ड के लोगों को करना है।

दूसरी चीज़ है, गुजरात जिस प्रकार से विकास कर रहा है, गुजरात में जिस प्रकार से औद्योगिक विकास हो रहा है... औद्योगिक विकास की सबसे पहली ज़रूरत होती है टेक्निकली स्किल्ड मैन-पावर। मैन-पावर जितनी ज़्यादा मात्रा में हो उतनी ही मात्रा में औद्योगिक विकास की संभावना बढ़ती है। हम २००३ से गुजरात में जो ‘वाइब्रन्ट समिट’ करते हैं। ’०३ में किया, ’०७ में किया, ’०९ में किया, ’११ में किया... इसका परिणाम यह है कि गुजरात में मैक्सिमम रोजगार मिल रहा है। भारत सरकार के आँकड़े भी कहते हैं कि पूरे हिंदुस्तान में जितना रोजगार मिलता है उसमें सर्वाधिक रोजगार यदि कहीं मिलता है तो वह गुजरात में मिलता है। और इसकी वजह है यह टेक्निकल वर्क। लेकिन हम इसमें कुछ ऐसा करेंगे कि जो ये नई-नई कंपनीयाँ आ रही हैं उनकी ज़रूरतों और हमारी आई.टी.आई. संस्थाओं, हमारी इंजीनीयरिंग कॉलेजों, टेक्निकल यूनिवर्सिटीयों, अन्य यूनिवर्सिटीयों के बीच तालमेल बनाएंगे... ‘वाइब्रन्ट समिट’ के बाद हम मीटिंग करते हैं और उनको पूछते हैं कि आप जिस प्रकार का उद्योग लाने वाले हैं उस उद्योग में आपको किस प्रकार के स्किल्ड मैन-पावर की ज़रूरत है यदि आप अभी से बताएँ तो हम उसके अनुसार स्किल्ड मैन-पावर तैयार करने के लिए सिलेबस शुरु करें। और गुजरात में नीड बॅज़्ड सिलेबसों के लिए आग्रह रखने की वजह यही है कि जैसे ही बालक पढ़कर निकले, उसे काम मिल जाए... मोरबी हो तो उस तरफ सिरैमिक का पढ़ाओ, मांडवी हो, मुंद्रा हो तो पॉर्ट संबन्धित पढ़ाओ, शिपिंग का पढ़ाओ, अंकलेश्वर की ओर हो तो केमिकल का पढ़ाओ... तो नीड बॅस्ड पढ़ाना शुरु किया ताकि लोकल बच्चों को तुरंत ही रोजगार मिल जाए। हमने ऐसा आयोजन किया है और इतने बड़े स्केल पर किया है। और मित्रों, गुजरात जो प्रगति करना चाहता है उसके तीन मुख्य आधार हैं। तीन आधार पर गुजरात आगे बढ़ना चाहता है, जहाँ तक युवा शक्ति का सवाल है उसके संदर्भ में। एक, स्केल। बहुत बड़ा स्केल तैयार किया है। और इस महात्मा मंदिर को देखकर आपको ऐसा लगा होगा कि हाँ, इसे बड़ा स्केल कहते हैं। वरना तो पहले दस बाइ दस का रूम बनाते थे... बड़े स्केल पर, हर चीज़ बड़े स्केल पर। दूसरा, स्किल। मल्टिपल स्किल के साथ गुजरात का यूथ पावर कैसे तैयार हो? एक यूथ को कितनी सारी चीज़ें आती हों, टेक्निक्ली कितना साउन्ड हो..! स्केल, स्किल और तीसरी महत्वपूर्ण चीज़ है, स्पीड। इन ‘थ्री एस’, को पकड़कर हम गुजरात को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

भाइयों-बहनों, आज लगभग २६०० से भी ज्यादा नौजवानों को नौकरी के ऑर्डर्स मिल रहे हैं। पिछले दस वर्षों में इस सरकार ने ढाई लाख लोगों को रोजगार दिया है, ढाई लाख लोगों को..! और इस साल साठ हजार नये लोगों को रोजगार देने की प्रॉसेस चल रही है। पहले क्या होता था? विज्ञापन प्रसिद्ध हो, फिर अर्जियाँ आएँ, अर्जी आए और सरकार की ओर से कुछ पत्र आए, दो महीने, छ: महीने या बारह महीने का टाइम हो तो जिसने अर्जी की हो वो क्या करे? एक चैनल ढूँढ़े, जैक ढूँढ़े और बीच में कोई मिल भी जाए और कहे कि अच्छा, तुमने अर्जी दी है? लाओ, बैठा देंगे, मगर देखो, मुझे इतना देना पडेगा..! बीच में टाइम-टेबल बने, सब कुछ बिठाना हो न..! फिर इन्टरव्यू के लिए कॉल आए, इसमें भी दो महीने का अन्तराल हो। इन्टरव्यू लेटर लेकर वो नाचता हो कि वाह, मेरा इन्टरव्यू लेटर आया है। फिर ढूँढ़ता है, कोई खादी के कुर्ते वाला मिल जाए तो उसका कुर्ता पकड लूँ। इन्टरव्यू है साहब, कुछ कर दो न..! उससे आगे का वो कुछ पक्का कर दे, उसके साथ भी कुछ पक्का हुआ हो। वो बेचारा गरीब का लड़का हो, विधवा माँ का बेटा हो, माँ के पास एकाध छोटा गहना हो तो उसे गिरवी रखकर या बेचकर कुछ बंदोबस्त करे बेचारा..! तब जा कर मुश्किल से इन्टरव्यू तक पहुँचे। इन्टरव्यू में पहुँचने के बाद फिर अगली सीढ़ी चढ़ने के लिए और तीन महीने। उस तीन महीने में तीसरे, ऊपरी कैडर के लोग जमाने आएँ। सारी व्यवस्था हो..! मैंने ये सब निकाल दिया, एक ही झटके में सब साफ..! अनेक विधवा माताएँ हैं जिन्हें अपने बेटे को नौकरी मिलेगी कि नहीं इसकी चिंता होंगी, आज उसका बेटा हाथ में नौकरी का पत्र लेकर घर जायेगा तब जाकर के माँ को चैन मिलेगा। एक कौड़ी के भ्रष्टाचार के बगैर, एक पाई के भ्रष्टाचार के बगैर क्या इस देश के नौजवानों को रोजगार नहीं मिल सकता? रोजगार के लिए उसे छटपटाना क्यूँ पडे? क्यूँ उसे किसी की पगचंपी करनी पडे? भाइयों-बहनों, यह मुझे मंज़ूर नहीं है। सम्‍‍मानपूर्वक, इस राज्य का युवक सम्‍‍मानपूर्वक जिए, आँखों में आँखें डालकर बात करे, अन्याय सुनकर खड़े होने की उसकी तैयारी हो। ऑन-लाइन, तमाम प्रोसीजर ट्रैन्स्पेरन्ट, ऑन-लाइन।

६०० से भी ज़्यादा लोगों को आज नौकरी मिल जाएगी। लेकिन जिनको नौकरी मिली है उनको मुझे कुछ कहना है और जिनको भविष्य में नौकरी मिलनेवाली है उन्हें भी। मित्रों, आपको नौकरी सिर्फ इसलिए नहीं मिली, आपको यह तनख्वाह इसलिए नहीं मिलती कि आपने कोई डिप्लोमा की डिग्री धारण की है या कोई डिग्री कोर्स खत्म किया है, आपके पास इंजीनीयरिंग के कुछ विशेष सर्टिफिकेट्स हैं... सिर्फ इतना काफ़ी नहीं है? काफ़ी है, लेकिन इससे ज़्यादा आप जो कुछ भी हो उसमें समाज का बहुत बड़ा ऋण है, मित्रों। आप दो सौ, पाँच सौ, हजार रुपये की फीस में पढ़े होंगे। मित्रों, अगर चाय पीने की आदत हो तो एक महीने का उसका बिल इस से ज़्यादा हो, उससे भी कम पैसों में आप पढ़े हैं। सरकार यानि समाज। अनेक लोगों के योगदान की वजह से आपको यह शिक्षा मिली है। अनेक लोगों ने योगदान दिया है तब आपने यह प्राप्त किया है। इस समाज को कुछ वापस करने के बारे में कभी न भूलें। आज एक नौजवान ने, अभी तो उसकी नौकरी का आज पहला दिन शुरु होने वाला है, लेकिन उसने पाँच हजार रुपये ‘कन्या केलवणी’ में दिए। मेरे लिए तो वे यदि इक्यावन रुपये होते तो भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। कारण? क्योंकि मन में विचार आया कि भाई, मैं जो हूँ वह इस समाज के कारण हूँ। मुझे ईश्वर ने ऐसा मौका दिया है तो मुझे समाज को वापस अदा करना चाहिए। क्योंकि मैं जो कुछ भी सीखा हूँ, जो कुछ भी हूँ मित्रों, वह इस समाज के कारण हूँ। इस समाज का ऋण चुकाना कभी भी चूकें नहीं। और आज अत्यंत ट्रैन्स्पेरन्ट पद्धति से, ऑन-लाइन इक्ज़ाम लेकर इतने कम समय में... वरना फिर नौकरी का तो ऐसा है कि पन्द्रह तो कॉर्ट कैस चले, एक दूसरी दुकान चले..! किसी न किसी ने तो पी.आई.एल. ठोक ही दी हो। भरती ही बंद हो जाए। उस बेचारे के घर ऑर्डर आया हो लेकिन नियुक्त न कर सकें। सौभाग्यवश इस ट्रैन्स्पेरन्सी की वजह से कॉर्ट में कोई वाद-विवाद नहीं हुए, आज निर्विघ्नता से इन नौजवानों को नौकरी मिल गई है।

मित्रों, आपके जीवन का सपना हो, जिनको नौकरी मिल रही है, कि आपके हाथों तले तैयार होने वाले जो नौजवान हैं, बहन-बेटीयाँ हैं वे उनके जीवन में नई-नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करें वही आपके जीवन का संतोष हो और राष्ट्र की सेवा करने का वही मार्ग हो ऐसी भूमिका के साथ आप सब मित्र खूब प्रगति करो, खूब विकास करो और उमंग-उत्साह के साथ आगे बढ़ो। मित्रों, इस राज्य में अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जैसे, ऑटोमोबाइल इन्डस्ट्री, आप कल्पना करो भाई, पहले तो कोई ऑटोमोबाइल का सीखता था तो बस गैरेज में नौकरी करता। यही दिन थे न? “ओय नूर, पडखा खोल दे..” ऐसा ही था न? वो स्कूटर रिपेरिंग वाला ऐसे कहता था, “ओय नूरीये, जरा पडखा खोल दे..!” ऐसे ही जिंदगी जाती थी न, भाई? पूरी टर्मिनालोजी ही अलग। इस ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में हर एक स्पेरपार्ट के कुछ अलग ही नाम होते हैं। फ़लां निकाल, फलां निकाल... मित्रों, आज गुजरात पूरे एशिया का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल हब बन रहा है। टेक्निकल लोगों की बहुत जरूरत पड़ने वाली है। आने वाले दिनों में गुजरात शिपिंग इन्डस्ट्री में जाना चाहता है। समुद्री जहाज़ बनाना। समुद्री जहाज़ बनाने में वेल्डर का काम सबसे बड़ा होता है और वहाँ का वेल्डिंग यानि परफेक्ट वेल्डिंग होना चाहिए क्योंकि उसे पचास साल तक समुद्र के अंदर पानी में ज़िंदगी गुज़ारनी होती है और उसमें वेल्डिंग में त्रुटि हो तो सब खत्म..! आप सोचो वेल्डर जैसा काम जिसकी सबसे बड़ी प्रतिष्ठा जब शिप बनेगा तब होने वाली है।

मित्रों, गुजरात में विकास के बहुत सारे क्षेत्र पडे हैं, आप जितनी ज़्यादा स्किल जानोगे, आपके लिए आसमान की ऊँचाइयाँ पार करना बाँये हाथ का खेल होगा, मित्रों। आप सब को अंत:करण पूर्वक बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ। और मुझे विश्वास है कि आपको जीवन के सपने पूरे करने के लिए नई दिशा मिली है। इसमें भी वही मुख्य काम करने हैं। कौशल्य की प्रतिष्ठा। हुनर; इसकी ओर पूरा साल गुजरात काम करने वाला है। आप कल्पना कर सकते हो कि आपके लिए कितना बड़ा अवकाश है। पूरी ताकत से मेरे साथ बोलो,

 

भारत माता की जय..!

 

थॅंक यू, दोस्तों..!

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हरिवंश जी देश को प्रगति की राह पर बड़ी छलांग लगाने का भरोसा दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं: राज्यसभा में पीएम मोदी
April 17, 2026
PM Congratulates Shri Harivansh on Historic Third Term as Rajya Sabha Deputy Chairman

आदरणीय सभापति जी,

सदन की ओर से, मेरी तरफ से, मैं श्रीमान हरिवंश जी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं और शुभकामनाएं भी देता हूं। राज्यसभा उपसभापति के रूप में लगातार तीसरी बार निर्वाचित होना, यह अपने आप में इस सदन का आपके प्रति जो गहरा विश्वास है और बीते हुए कालखंड में आपके अनुभव का जो सदन को लाभ मिला है, सबको साथ लेकर चलने का आपका जो प्रयास रहा है, उसको एक प्रकार से सदन ने आज एक मोहर लगा दी है और यह अपने आप में यह एक अनुभव का सम्मान है, एक सहज कार्य शैली का सम्मान है और एक सहज कार्य शैली की स्वीकृति भी है। हमने सबने हरिवंश जी के नेतृत्व में सदन की शक्ति को और अधिक प्रभावी होते हुए भी देखा है और मैं कह सकता हूं कि केवल सदन की कार्यवाही का संचालन ही नहीं, वह अपने जीवन के जो भूतकाल के अनुभव हैं, उसको भी बहुत ही सटीक तरीके से सदन को समृद्ध करने में उपयोग लाते हैं। उनका यह अनुभव पूरी कार्यवाही को, संचालन को और सदन के माहौल को और अधिक परिपक्व को बनाता है। मुझे विश्वास है, उपसभापति जी का नया कार्यकाल उसी भावना, संतुलन और समर्पण के साथ आगे बढ़ेगा और हम सबके प्रयासों से सदन की गरिमा को नई ऊंचाई प्राप्त होगी।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी का जन्म यूपी के गांव में हुआ और सहज रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण उन्हें अपने गांव के विकास में विद्यार्थी काल से भी कुछ ना कुछ करते रहे। उनकी शिक्षा-दीक्षा काशी में हुई और इन सारे विषयों पर मुझे भूतकाल में बोलने का अवसर मिला, तो मैं काफी कुछ कह चुका हूं। इसलिए मैं आज इसको दोहराता नहीं हूं। एक बात का उल्लेख आज जरूर मैं करूंगा, आज 17 अप्रैल है और 17 अप्रैल 1927, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती भी है और विशेषता यह है कि आज 17 अप्रैल को आप जब तीसरी बार इस दायित्व को संभालने जा रहे हैं और वह भी चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर और चंद्रशेखर जी के साथ आपका जुड़ाव, उनके प्रति आपका लगाव और एक प्रकार से आप उनके सहयात्री रहे, उनके पूरे कार्यकाल में, तो यह एक अपने आप में एक बहुत ही बड़ा सुयोग है। अपने चंद्रशेखर जी के जीवन पर किताबें भी लिखी हैं और चंद्रशेखर जी के एक वृहद जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बहुत बड़ा काम भी आपने किया है और इसलिए आपके लिए एक बहुत बड़ा विशेष अवसर बन जाता है कि चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर आपके तीसरा कार्यकाल का प्रारंभ हो रहा है। हरिवंश जी का सार्वजनिक जीवन केवल संसदीय कामों तक सीमित नहीं रहा है। पत्रकारिता के उच्च मानदंड, यह आज भी आदर्श के रूप में रेखांकित किए जाते हैं। लंबा जीवन पत्रकारिता का रहा है, लेकिन पत्रकारिता में भी उन्होंने उच्च मानदंड को हमेशा आधार माना। हम सब जानते हैं, उनके लेखनी में धार है, लेकिन उनकी वाणी में और व्यवहार में सौम्‍यता और शिष्‍टता भरी-भरी रहती है, यह अपने आप में और मैं जब गुजरात में था, तब भी मैं उनकी लेखों को पढ़ने की मेरी आदत रही थी और मैं देखता था कि वह अपना पक्ष बड़ी दृढ़ता के साथ रखते थे और मैं अनुभव करता था कि उसमें काफी अध्ययन के बाद उसका निचोड़ उसमें प्रकट होता था। पत्रकारिता में भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का उनका निरंतर प्रयास रहा और एक सफल प्रयास भी रहा और हम देखते हैं, सदन में भी चाहे पॉलिसी हो या प्रोसेस हो, उन बातों का कहीं ना कहीं छाया हमें हमेशा नजर आती है और यह हम सबके लिए सुखद अनुभव है। वह समाज की वास्तविकताओं के साथ गहरे जुड़ाव के साथ काम करने वाले व्यक्ति रहे हैं। मैं तो कहूंगा, जो चाहे लोकसभा हो या राज्यसभा हो, जो नए सांसद आते हैं, जो हरिवंश जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं, बहुत कुछ बातें करके उनसे जान सकते हैं, क्योंकि जब वह पत्रकारिता में थे, तो उनकी कॉलम चलती थी, हमारा सांसद कैसा हो, हमारा पार्लियामेंट मेंबर कैसा हो, तब उनको शायद पता नहीं होगा, कभी उनको ही बैठना पड़ेगा। लेकिन वह लिखते थे और वह बातों में बहुत व्यापकता रहती थी। सदन की गरिमा और बैठने वाले सदस्य का दायित्व, अब उसके आचार विचार को लेकर भी बहुत गहरा उनका अध्ययन रहता था और उन बातों का उपयोग आज हमारे सदन के साथी, उनके साथ बैठकर के बहुत कुछ जान सकते हैं, सीख सकते हैं। समय की पाबंदी एक डिसिप्लिन लाइफ में और अपने कर्तव्‍यों के प्रति गंभीरता, यह आपकी विशेषता रही है और शायद इसी के कारण आप सर्व स्वीकृत व्‍यक्‍तित्‍व आपका विकसित हुआ है। हमने देखा होगा जब से वह राज्यसभा के सदस्य बने हैं, मैं कह सकता हूं कि पूर्ण समय वह सदन में होते हैं। सभापति जी की अनुपस्थिति में सदन को संभालने का काम तो करते ही हैं, लेकिन बाकी समय भी यहां कमेटी का कोई भी व्यक्ति बैठा हो, तो भी वह सदन में हमेशा अपनी मौजूदगी रहती है। हर बात को सुनते हैं, उस समय सदन का जो संचालन करते हैं, उनके कार्य को भी देखते हैं और यह इसके पीछे उनको अपना जो दायित्व है, उसके प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता है, उसके कारण यह संभव होता है और यह हम सबके लिए सीखने जैसा है और मैंने देखा है कि वह पूरा समय इन चीजों के लिए वह खपा देते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

उपसभापति के तौर पर सदन को कैसे चलाया, सदन में सदस्य के तौर पर क्या योगदान दिया, इस बारे में हम स्वाभाविक रूप से एक सकारात्मक चर्चा करते रहते हैं। लेकिन सदन के बाहर, जनता के बीच वह कैसे अपने लोकतांत्रिक और सामाजिक दायित्‍वों को निभाते हैं, यह भी हम सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके लिए सचमुच में ध्यान आकर्षित करने वाले विषय हैं और हमें उसको देखना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि काम सराहनीय तो है ही हैं, अनुकरणीय भी हैं। हमारा देश युवा देश है और मैंने देखा है कि हरिवंश जी ने अपने समय का उपयोग सबसे ज्यादा युवाओं के बीच में बिताना पसंद किया है। युवाओं में लगातार गंभीर विषयों पर जागरूकता बने, एक प्रकार से लोक शिक्षा का काम निरंतर चलता रहे, यह अपने आप में वह लगातार करते रहते हैं, तो देश भर में उनका भ्रमण रहता है। वह मीडिया की नजरों में बहुत ज्यादा रहने का उनका शौक नहीं है, लेकिन भ्रमण और कार्यक्रमों की संख्या उनकी लगातार चलती रहती है। 2018 में, जब उन्होंने राज्यसभा के उपसभापति की भूमिका निभानी शुरू की, उसके बाद जो मेरी जानकारी है, कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज में 350 कार्यक्रम किए हैं। यह एक बहुत बड़ा काम है। देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजेस में 350 से अधिक कार्यक्रम, जाना-आना, उनके साथ बैठना, बातें करना, उसके लिए विषयों की तैयारी करना, यह अपने आप में बहुत बड़ा, एक प्रकार से आपने बृहतस्य के रूप में इस काम को किया है और युवाओं से ही जुड़ने के लक्ष्य को आपने जरा भी ओझल नहीं होने दिया है। और विकसित भारत का सपना युवाओं के लिए भी क्यों होना चाहिए, इस मूल विषय को अलग-अलग तरीके से जिस प्रकार से विद्यार्थियों का मूड हों, वह बताते रहते हैं। विद्यार्थियों में, युवा पीढ़ी में एक आत्मविश्वास कैसे पैदा हो, निराशा से वह हमेशा-हमेशा बाहर रहें, इन सारे विषयों की चर्चा वह करते हैं। उनके कुछ ऐतिहासिक रेफरेंस के साथ बात करते हैं कि हम ऐसे क्या कारण हैं कि हम जितनी तेजी से जाना चाहिए था, आगे नहीं जा पाए, अब अवसर क्या आया है, सारी बातें हो और देश इतनी बड़ी छलांग लगा सकता है, उसका आत्मविश्वास भरने का काम उनके द्वारा होता है। आजकल देश में लिटरेचर फेस्टिवल, एक बड़ा सिलसिला चला है और अब तो वह टीयर-2, टीयर-3 सिटीज़ तक भी वह सिलसिला चला है। लिटरेचर फेस्टिवल्स में भी हरिवंश जी का अक्सर जाना होता है और उस समाज का, उस तबके को भी वह अपने विचारों से प्रभावित करते रहते हैं, प्रेरित करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

मैंने उनके जीवन का एक प्रसंग जो सुना है, शायद हो सकता है, सार्वजनिक तौर में मेरी जानकारी सटीक ना भी हो। मैंने सुना है कि 1994 में हरिवंश जी पहली बार विदेश यात्रा की और वह अमेरिका गए। जब अमेरिका गए, तो अपने सारे कार्यक्रमों के अलावा उनसे पूछा गया कि आप कहीं और जाना चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं। तो उन्होंने आग्रह से कहा कि मैं जरूर यह विकसित देश है, तो मैं उसकी यूनिवर्सिटी को देखना-समझना चाहता हूं और वहाँ की ऐसी कौन सी शिक्षा और कल्चर है, जिसके कारण यह देश इतना आगे बढ़ रहा है और उन्होंने काफी समय अपने निर्धारित कार्यक्रमों के सिवाय वह पहली अमेरिका की यात्रा में सिर्फ और सिर्फ यूनिवर्सिटीज में बिताया, उसका अध्ययन करने का काम किया। यानी यह जो ललक थी उनके मन में, यह अगर यह विकसित देश की यूनिवर्सिटी से जो निकलता है, तो हिंदुस्तान की यूनिवर्सिटीज़ भी ऐसी हों, ताकि विकसित भारत का सपना वहीं से रेखांकित किया जा सके।

आदरणीय सभापति जी,

MPs को MPLAD फंड के संबंध में तो काफी चर्चा रहती है और एक बड़ा प्रसंगी का विषय भी रहता है MPs में और कभी-कभी तो यह भी संघर्ष रहता है कि MPLAD फंड इतना है और वहां उधर एमएलए फंड ज्यादा है, उसकी चर्चा रहती है। लेकिन एमपी फंड का उपयोग कैसे हो, MPLAD जो फंड की बातें हैं, उसमें हरिवंश जी के विचारों को तो मैंने स्वयं भी सुना है, मैं प्रभावित हूं इससे, लेकिन हमारी भी कुछ मजबूरी रही है। शायद हम उनकी अपेक्षा के अनुसार उसको कर नहीं पाए हैं, क्योंकि सबको ऐसे विषय में साथ लेना जरा कठिन होता है। लेकिन उन्होंने खुद की उस जिम्मेदारी को कैसे निभाया है, मैं समझता हूं वह भी हम लोगों ने, उन्होंने यह MPLAD फंड था, जो अपने जो विचार हैं, उसके विचार को भी नीचे धरातल पर उतारने के लिए उपयोग किया, शिक्षा क्षेत्र और युवा पीढ़ी, यह उसके सारे केंद्र में रहा, MPLAD फंड उन्होंने इस्तेमाल करने के लिए एक मिसाल पेश की है। उन्होंने विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थानों में ऐसे अध्ययन केंद्र स्थापित किया और उसका प्रभाव लंबे अरसे तक रहने वाला है और उसमें भी उन्होंने प्रोजेक्ट ओरिएंटेड, समस्या के समाधान को केंद्र में रखा। जैसे लुप्त होती जा रही भारतीय भाषाओं, उनके संरक्षण के लिए उन्होंने आईआईटी पटना में एक अध्ययन केंद्र के लिए MPLAD फंड का उपयोग किया, तो उस काम को वह लगातार वहां हो रहा है। एक और उन्होंने काम किया, जो बिहार में कुछ क्षेत्र हैं, जहां भयावह भूकंप की घटनाएं रोज घटती रहती हैं, नेपाल में भी एक छोटा सा भूकंप आ जाए, तो भी उस क्षेत्र का प्रभावित करता है। इस काम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से सेंटर फॉर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग के रूप में एक स्टडी सेंटर रिसर्च के लिए खुलवाया है। यानी वह स्टडी का काम करना, रिसर्च करना, उस पर लगातार काम कर रहा है। हम जानते हैं कि जैसा मैंने कहा है, जय प्रकाश जी का गांव सिताब दियारा हरिवंश जी वहीं हैं और वहां गंगा और घाघरा दो नदी के बीच में एक गांव है, तो हमेशा ही जल के कारण जो कटाव की समस्या रहती है, वो गांव परेशान रहता है और नदी धारा भी बदलती रहती है, तो विनाश भी बहुत होता रहता है। उसको भी ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उन्होंने पटना की आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी में एक नदी अध्ययन केंद्र खुलवाया है। पटना के ही चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्था में वो बिजनेस इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर बनवा रहे हैं। एआई के इस दौर में मगध विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर बनाया है। यानी MPLAD फंड का एक निर्धारित दिशा में काम कैसे किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण आपने प्रस्तुत किया है।

आदरणीय सभापति जी,

हम सभी ने अनुभव किया है कि लोग जब अपने गांव से स्थानांतरण करते हैं, एक दूसरे शहर में जाते हैं, तो जीवन में एक प्रकार से गांव से कट जाते हैं। हरिवंश जी का जीवन आज भी गांव से जुड़ा रहता है, अपने गांव से जुड़ा रहता है। वह लगातार वहां के सुख दुख के साथी बन करके वह अपना जो भी कंट्रीब्यूशन कर सकते हैं, वह करते रहते हैं।

आदरणीय सभापति जी,

जिस संसद की नई इमारत में बैठे हैं, उसका जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब मुझे उनके साथ निकट से काम करने का अवसर आया। और मैं अनुभव कर रहा था कि जो विचार मेरे मन में आते थे, मैं हरिवंश जी से कहता था, हम ऐसा करें तो कैसा होगा, दो दिन में वो बराबर परफेक्ट उसको लेकर आते थे, कहीं नामकरण करना है, उसके पहचान इस सदन की कैसे बने, तो काफी कुछ कंट्रीब्यूशन सदन के निर्माण में, उसकी आर्ट गैलरी में, विभिन्न द्वार के नाम रखने हों, यानी हर प्रकार से मेरे एक साथी के रूप में हम दोनों को और मुझे बड़ा आनंददायक रहा वो अनुभव काम का।

आदरणीय सभापति जी,

हरिवंश जी के सदन को चलाने की कुशलता को तो हम भली भांति देखे हैं, लेकिन साथ-साथ उन्होंने राज्यों की विधानसभाएं, विधान परिषदें और वहां जो प्रीसाइडिंग ऑफिसर्स हैं, उनको भी कैसे मदद रूप होना, उनके लिए किस प्रकार से आवश्यक उनके ट्रेनिंग के लिए काम किया जाना, उसके लिए भी काफी समय दिया और उन्होंने लगातार उनके लिए समय दिखाया। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन में भी उन्होंने भारत की डेमोक्रेटिक व्यवस्था की छाप छोड़ने में बहुत बड़ी सक्रिय भूमिका निभाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि 21वीं सदी का यह दूसरा क्वार्टर यह सदन को बहुत कुछ कंट्रीब्यूट करना है। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने में, विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में, मुझे विश्वास है कि सदन के द्वारा बहुत कुछ होगा और उसके कारण पीठाधीश सबका दायित्व बहुत बड़ा होता है। हम सबका बड़े विश्वास से मैं कह सकता हूं कि सभी साथी आप जो चाहते होंगे, उसको पूरा करने के लिए सहयोग करते रहेंगे और आपके काम को कठिनाइयों में ना परिवर्तित करें इसके लिए ताकि आप ज्यादा आउटकम दे सकते हैं और मुझे विश्वास है सब लोग इसको करेंगे और मैंने पहले भी कहा था कि हरि कृपा पर है सब कुछ और हरि तो यहां के भी है, हरि वहां के भी है और हरि यही बैठेंगे। तो हरि कृपा बनी रहे। इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!