प्रिय मित्रों,

कुछ सप्ताह पहले मैं अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट पर अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव के शुभारम्भ पर गया था। अद्भुत साबरमती नदी के किनारे हमने सांस्कृतिक वैविध्यता का अनुभव किया और विभिन्न देशों के प्रतियोगियों को आमंत्रित किया था। हालांकि कुछ वर्ष पूर्व यह नजारा कुछ अलग ही था। रिवरफ्रंट के दौरे से मैं पुरानी यादों में खो गया। उस समय साबरमती नदी के तट में पानी के सिवाय सबकुछ था। यहां युवा क्रिकेट खेला करते थे और सर्कस लगते थे।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान साबरमती नदी और उसके आसपास के क्षेत्रों में भारी बदलाव आया है। आज नदी पूरे साल पानी से भरी रहती है और इसके आसपास सृजित होने वाले मनोरंजक और जीवंत माहौल के कारण लोग इस क्षेत्र की ओर खिंचे चले आते हैं।

आज, रिवरफ्रंट के निर्माण की वजह से यहां जल का स्तर बढ़ा है और बरसात की वजह से होने वाले रोगों का प्रमाण उल्लेखनीय स्तर पर घटा है। जलस्तर में बढ़ोतरी की वजह से बिजली की खपत घटी है। रिवरफ्रंट के श्रेष्ठ कामकाज के लिए कई अंतराष्ट्रीय पर्यटकों ने गुजरात सरकार को शुभकामनाएं देते पत्र मुझे लिखे हैं। उल्लेखनीय है कि रिवरफ्रंट को सबसे नवीनतम प्रोजेक्ट्स में स्थान मिला है।

शहरों में वैश्विक स्तर की सुविधाएं उपलब्ध करवाने की दिशा में अपना गुजरात

रिवरफ्रंट गुजरात के शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध करवाने की हमारी प्रतिबद्धता की एक पहचान है। हकीकत यह है कि बेहतर ढांचागत सुविधाओं के कारण शहरीकरण बढ़ा है और लोग यहां स्थायी हो रहे हैं। भारी संख्या में लोग अहमदाबाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं। भारत में गुजरात सबसे ज्यादा अर्बनाइज्ड राज्य है। राज्य की 42 प्रतिशत जनता नगर और शहरों में बसती है और हमारी शहरी आबादी की एक दशक की वृद्धि दर 35.8 प्रतिशत रही है।

हमें पता है कि तीव्र शहरीकरण के साथ- साथ कई चुनौतियां भी पैदा हो रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे नगर और शहरों के ढांचों की भारी परीक्षा हो रही है। जनसंख्या और यातायात की समस्याओं सहित कई बड़ी चुनौतियां पैदा हो रही हैं। हालांकि अगर हम शहरीकरण को समस्या के रूप में देखेंगे तो हम कभी इन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकेंगे। हमें शहरीकरण की चुनौती का हल करना है, ना कि उसके खिलाफ लड़ना है। ऐसा करने से ही हम चुनौतियों का सामना कर सकेंगे।

गुजरात ने जो किया है यह विस्तारपूर्वक आपको बतलाते हुए मुझे खुशी हो रही है। शहरीकरण की समस्या का हल करने के लिए गुजरात के प्रयासों के बारे में मैं विश्वास और गर्व से कह सकूंगा कि सिर्फ थोड़े से लोगों को ही विकास का फल नहीं मिलेगा बल्कि प्रत्येक व्यक्ति तक विकास के फल पहुंचेंगे। नवीनीकरण और ढांचागत तथा संस्थागत प्रणालियां अपनाकर हमने शहरीकरण की विशाल चुनौतियों को लोगों के लिए अर्थपूर्ण अवसर में तब्दील कर दिया है। मुझे याद है कि जब मैने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी तब शहरी विकास के लिए सिर्फ 200 करोड़ से भी कम रकम खर्च की जाती थी।

आज बजट आयोजन में शहरी विकास के लिए 5670 करोड़ की व्यवस्था की गई है जो 25 गुना ज्यादा है। संकलित अभिगम के साथ राज्य सरकार ने वर्ष 2009 में स्वर्णिम जयंति मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना (SJMMSVY) पेश की थी। उल्लेखनीय है कि यह पहल गुजरात के 8 शहरों और 159 नगरपालिकाओं के विकास की आवश्यकताएं पूर्ण करती हैं और बड़े शहरों में उपलब्ध सेवाओं को उनके घर पर उपलब्ध करवाती हैं। राज्य सरकार द्वारा इस योजना के लिए सम्पूर्ण बजट उपलब्ध करवाया जाता है। प्रारम्भ में 7000 करोड़ के बजट के साथ प्रारम्भ की गई इस योजना के लिए धन की व्यवस्था उल्लेखनीय तौर पर बढ़ाकर 15,000 करोड़ की गई है।

परिवहन और शहरी गतिविधियों के तमाम पहलुओं का मजबूतीकरण

शहरी जीवन में हम रोजाना सड़क का उपयोग करते हैं। कई बार हमारे मन में शहर की पहली छवि उसकी सड़क की गुणवत्ता और यातायात जैसे परिबलों से उभर आती है। आबादी और वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ ही रोड काफी बेहतर गुणवत्तापूर्ण तैयार किए गए हैं। ट्राफिक जाम होने की समस्या के बारे में शिकायत करना बहुत ही आसान है परंतु इस समस्या का हल करने के बारे में हम में से कितने लोगों ने सोचा है ? आर्थिक विकास के लिए शहरी परिवहन काफी महत्वपूर्ण माध्यम है और सरकार ने शहरी आबादी में निरंतर बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए अच्छी सड़कों को प्राथमिकता दी है।

गुजरात में हमने कई फ्लाईओवर्स का निर्माण किया है, जिनके कारण हमारे शहरों के भीड़भरे क्षेत्रों में यातायात आसान हुआ है। सूरत ने फ्लाईओवर सिटी ऑफ गुजरात के तौर पर पहचान अंकित की है क्योंकि यहां की ट्राफिक समस्या वाले क्षेत्रों में फ्लाईओवर के निर्माण से समस्या का हल हुआ है। अहमदाबाद में कई फ्लाईओवर और अन्डरपास की वजह से ट्राफिक समस्या की स्थिति में हम काफी सुधार ला सके हैं।

उपरोक्त प्रयासों के साथ ही शहरी परिवहन ढांचे को मजबूत बनाने में हमने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। जब आप अहमदाबाद में सफर करेंगे तो काफी प्रशंसा हासिल करने वाले जनमार्ग- बीआरटीएस को आप अवश्य सराहेंगे।सूरत और राजकोट में वर्तमान में यह प्रोजेक्ट कार्यरत हैं। हमने मल्टी मॉडल अफोर्डेबल ट्रांसपोर्ट अथोरिटी (एमएटीए) का गठन किया है ताकि सुरक्षित, मितव्ययी, सुविधापूर्ण और विश्वसनीय शहरी परिवहन को प्रोत्साहन देने के लिए रोडमेप तैयार किया जा सके।

गुजरात के शहरों में नवीन रिक्षा सेवा !

बड़े शहरों में आपने रेडियो टेक्सी, कॉल अ केब के बारे में सुना होगा परंतु कभी आपने इसकी टाई रिक्षा सर्विस के बारे में सुना है ? गुजरात में एक फाउंडेशन की पहल पर रिक्षा ड्राइवर्स का एक समूह एक छत के नीचे आया है और जी- ऑटो का गठन किया गया है जो 24 घंटे विश्वसनीय रिक्षा सेवा उपलब्ध करवाता है।यह जी- ऑटो की सेवा काफी अद्भुत है। जब आप रिक्षा में बैठेंगे तब ड्राइवर आपको पानी की बोतल और समाचार पत्र ऑफर करेगा। वर्तमान में यह सेवा अहमदाबाद, वडोदरा और गांधीनगर में उपलब्ध है और आगामी वर्षों में इसे राज्य के अन्य हिस्सों में विस्तृत किया जाएगा। इस प्रकार की पहल सुविधायुक्त सेवाएं उपलब्ध करवाने के साथ ही मैत्रिपूर्ण परिवहन का विकल्प उपलब्ध करवाती है।

पर्याप्त शहरी आवास की चुनौतियों का मुकाबला करना

भारी संख्या में लोग शहरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं ऐसे में आवास की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध करवाना और एक चुनौती है। सरकार के तौर पर हमारा यह दायित्व है कि लोगों के सिर पर छ्त हो। घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता बल्कि यह ऐसा स्थल हो जहां रहा जा सके। राज्यभर में शहरी आवास की सुविधाओं को मजबूत बनाने के लिए हमने अनेक कदम उठाए हैं।

गुजरात को झोंपड़पट्टी मुक्त बनाने के लिए हमने 25 लाख जितने कच्चे मकानों को पक्का बनाने के लिए सर्वे पहले से ही पूर्ण कर लिया है। पूर्व की सरकारों ने 40 साल में 10 लाख मकानों का निर्माण किया था और उसकी तुलना में हमने सिर्फ एक ही दशक में 22 लाख मकानों का निर्माण किया है , गुजरात में गरीबों को इसका लाभ मिला है। आगामी वर्षों में हम शहरी आवास की चुनौतियों का सामना करने की प्रतिबद्धता तय करेंगे।

1+1 ट्वीन सिटी मॉडल को प्रोत्साहन देने के लिए गुजरात के प्रयास

हम अहमदाबाद को चमकता देखना चाहते हैं परंतु अहमदाबाद के साथ ही गांधीनगर भी चमके यह भी हमारी इच्छा है। एकदूजे के नजदीक स्थित दो शहरों को विकास का समान अवसर क्यों ना मिले ? इसलिए हमने ट्वीन सिटी मॉडल पेश किया है। गुजरात सक्रिय रूप से अहमदाबाद-गांधीनगर, सुरेन्द्रनगर- वढवाण, सूरत- नवसारी, वडोदरा- हालोल, भरूच- अंकलेश्वर और मोरबी-वांकानेर ट्वीन सिटी पर काम कर रहा है।श्रेष्ठ शहरों का निर्माण करने की दिशा में गुजरात की पहल को ट्वीन सिटी से अवश्य लाभ मिलेगा।

ट्वीन सिटी के साथ ही हम सेटेलाइट टाउन भी विकसित करने जा रहे हैं और वैश्विक स्तर के शहरों का निर्माण गुजरात को वाइब्रेंट भविष्य की ओर ले जाएगा। दिल्ली जैसे शहरों को विकास करने में काफी लम्बा समय लगा। मगर धोलेरा दिल्ली से दो गुना और शंघाई से 6 गुना बड़ा होगा और आधुनिक ढांचागत सुविधाओं के मामले में काफी आगे होगा। कांकरिया लेक डवलपमेंट प्रोजेक्ट और सूरत में साइंस सेंटर जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स से शहरी जनता को लाभ मिलेगा।

आपको जानकर आनन्द होगा कि शहरी विकास के विभिन्न प्रयासों के चलते गुजरात ने पिछले कई वर्षों के दौरान 50 से ज्यादा अवार्ड जीते हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार से प्राप्त जानकारियों के मुताबिक जवाहरलाल नेहरु नेशनल अर्बन रिन्युअल मिशन (JNURM) प्रोजेक्ट को पूर्ण करने में गुजरात प्रथम क्रम पर है।

रुर्बनाइजेशन- आत्मा गांव की, सुविधाएं शहर की

हमने शहरों पर ध्यान केन्द्रित किया है परंतु यहां रुकेंगे नहीं। छोटे नगरों और गांवों में बेहतर ढांचागत सुविधाएं और सेवाएं उपलब्ध करवाने की आवश्यकता खड़ी हुई है। रुर्बनाइजेशन के हमारे मंत्र से गांवों की अनोखी सांस्कृतिक पहचान बरकरार रहेगी।इसके साथ ही शहर जैसी सुविधाएं भी उन्हें उपलब्ध होंगी (आत्मा गांव की, सुविधा शहर की)। इस साल की वाइब्रेंट समिट में शहरीकरण केन्द्रस्थान पर रहा। समिट के दौरान मैं रुर्बनाइजेशन की चर्चा में मौजूद था।

समिट पूर्ण होने के बाद मैं प्रोफेसर पॉल रोमर से मिला जो युएसए में एनयु के स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनस में शहरीकरण के प्रोजेक्ट में मार्गदर्शन देते हैं। प्रोफेसर रोमर ने शहरी विकासकी दिशा में गुजरात के कदमों की सराहना की थी। राजनैतिक इछाशक्ति, अधिकारियों की श्रेष्ठ टीम और लोगों के सहयोग से गुजरात सरकार अर्बन रिजनरेशन के लिए तैयार है, जो नये वैश्विक स्तर के शहरों का निर्माण करेगी और गांवों में श्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएंगी जिससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्र भव्य और दिव्य गुजरात के हमारे प्रयासों में असरदार रूप से योगदान दे सकें।

नरेन्द्र मोदी

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भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन
July 06, 2026

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।