मित्रों, 

आज ११ सितम्बर है. १८९३ में आज ही के दिन शिकागो में हुई विश्व धर्म परिषद में स्वामि विवेकान्द ने विश्व प्रसिद्ध व्याख्यान दिया था. हम इसे “दिग्विजय दिवस” के रूप में मना रहे है; आज के दिन स्वामि विवेकान्द ने अपने आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा विश्व विजय प्राप्त की थी, और वह भी उस समय जब भारत स्वतंत्र भी न था.

यह पहली बार हुआ था कि वैश्विक भाईचारे का संदेश तथा उसकी सही समझ पश्चिमी दुनिया को दी गई थी. हम सभी जानते हैं कि स्वामि विवेकान्द ने जब श्रोताओं का ‘अमरिका के भाईओ तथा बहनों’ कह कर संबोधन किया उन पर उसका आश्चर्यजनक असर हुआ था. क्योंकि यह संबोधन का मात्र एक तरीका ही नहीं था बल्कि उन शब्दों के पीछे भारत की महान आध्यात्मिक शक्ति थी, जिसने अपने ५००० वर्षों के लंबे इतिहास में हमेशा वैश्विक भाईचारे का एलान किया है और अपनाया है.

यदि विश्व ने वैश्विक भाईचारे के संदेश का अनुसरण किया होता तो, शायद, १०० सालों बाद उसे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों का घातक दिवस, सितम्बर ११, २००१, नहीं देखना पडता. परंतु विपरितता तो यह है कि इस तरह की अनोखी महान सोच, जो विश्व को आतंकवाद की समस्या सुलझाने के लिए रास्ता दिखा सकती है, उसे ही “केसरी आतंकवाद” ( “सेफ्रन टेररिझम”) करार दिया जा रहा है. वह भी कोई और नहीं परंतु स्वयं इस देश के गृह मंत्री द्वारा. ऐसा लगता है कि छोटी मोटी पक्षीय राजनीति की कार्यसूचि द्वारा सुझाए जाने पर एवं संतुष्टि के लिए, वे शांति एवं विकास की सभी संभावनाओं को जड से उखाड देना चाहते हैं. इस विकट परिस्थिति के समय में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह इस संदेश को समझे, अपने जीवन में उसको आत्मसात करे तथा इसे लोगों तक पहुंचाए.

स्वामि विवेकान्द ने सशक्त भारत के लिए सारी मानवता को मार्गदर्शन देने का कार्य किया. स्वामिजी ने अपने व्याख्यानों में वैश्विक भाईचारे के लिए आह्वान किया. उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर मानव बहुत समय से धर्मांध रहा है जो अपने धर्म के ही सत्य होने का प्रतिपादन करता है तथा अन्य धर्मों को असत्य बताते हुए कहता है कि उन्हें अस्तित्व का अधिकार नहीं है. उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि जब तक यह स्थिति रहेगी धर्म के नाम पर केवल रक्तपात होगा, भाईचारा, जिसे कि सही अर्थ में धर्म के प्रयोगों द्वारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए, संभव न होगा. सौ वर्षों बाद ११ सितम्बर की डब्ल्यु.टी.सी. घटना द्वारा वे कितने महान भविष्यवेदा साबित हुए थे !

परंतु कब तक मानवता इस धर्मांधता के रक्त में सनी रहेगी ? वर्तमान परिस्थिति में यह प्रतीत होता है कि धर्मांधता एवं आतंकवाद ने सारे विश्व को घेर रखा है, वास्तविकता में यह उस लौ की तरह है जो बुतने से पहले सबसे अधिक तेजी से टिमटिमाती है. स्वामि विवेकान्द ने कहा था, “सांप्रदायिकता, अभिप्रायों की अयोग्य अभिव्यक्ति तथा उसके आघातजनक परिणाम, धर्मांधता, ने इस सुन्दर संसार को लम्बे समय से जकडा हुआ है. उन्होंने इस पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, बार बार इसे मानव रक्त में भिगोया है, सभ्यताओं का नाश किया है और सारे देश को निराशा में धकेल दिया है. यदि यह दुष्टता संभव न होती तो मानव समाज जैसा आज है उससे कितना अधिक उन्नत होता ? पर अब उनका समय आ गया है...”

उन्होंने वैश्विक भाईचारे का केवल आह्वान ही नहीं किया था बल्कि यह भी सूचित किया था कि वैश्विक भाईचारा व्यापक अभिगम के बिना संभव नहीं होगा. आज मानवता कसौटी के तीन स्तरों का सामना कर रही है, मुख्य रूप से व्यापक अभिगम की कमी के कारण-

१.बहुविध विश्वास तथा सभ्यताओं का सह-अस्तित्व २.प्रकृति से सुसंगत रह कर विज्ञान एवं अर्थशास्त्र का स्थिर विकास ३.युद्धखोर एवं स्पर्धात्मक देशों में भूस्तरीय राजनैतिक सहिष्णुता

इन सभी कसौटीओं का एक ही हल है, अति समृद्ध सभ्यता के मूल्यों पर आधारित सशक्त भारत देश. हमारे ऋषियों द्वारा दिया गया तत्वज्ञान ‘सर्वे भवंतु सुखिनाः’ - सभी का भला हो - ही इसका एक रास्ता है. यह किसी भी युग में सनातन है. यह आज भी उतना ही संगत है जितना उनके समय में था, शायद उससे अधिक. परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या यह आज के संसार में संभव है?

इसे गुजरात में संभव करने का हम उत्तम प्रयास कर रहे हैं और मैं हमारे प्रयासों की सफलता से खुश हूँ.“गुजरात व्यापक विकास का नमूना” मूल रूप से सुसंगत विकास का भारतीय नमूना है. आज कोई भी देख सकता है कि सभी तरह की अडचनों के बीच भी इस नमूने का सतत रूप से अनुसरण करने के बाद उपरोक्त तीन कसौटीओं से लडने में गुजरात कितना सफल हुआ है.

द्वेषभाव भरे असत्यों के नीचे दबे सत्य को यदि कोई उघाड कर देखे तो स्पष्ट दिखाई देगा कि ‘केवल संतुष्टि प्रदान करने के बजाय सिद्धि हांसिल करने की’ गुजरात की नीति ने जाति, संप्रदाय एवं धर्म के भेदभाव बिना, विकास के लिए एक शांत वातावरण खडा किया है. गुजरात सही अर्थ में ‘सर्व धर्म समभाव’ के सिद्धांत से आसक्त है. न केवल बहुविध विश्वासों का सह अस्तित्व, परंतु जाति एवं संप्रदाय से परे समाज के सभी विभागों का सुसंगत विकास. जब बार बार गुजरात का व्यापक विकास का नमूना विविध लोगों द्वारा विविध मंचों पर सराहा जाता है तब थोडे मत इकठ्ठे करने के लिए गुजरात के विरुद्ध निंदा करने वालों के मुंह पर तमाचा पडता है. न्यायाधीश राजिन्दर सचर समिती की रिपोर्ट एक दस्तावेज है जो दर्शाता है किमुसलमान गुजरात में सबसे अधिक खुश हैं. 

जबकि लोग स्थिर विकास की सलाह देने में व्यस्त हैं, गुजरात की प्रतिबद्धता ने कुछ क्षेत्रों में परिणाम दिखाने शुरु कर दिए हैं – चाहे वह कृषि विकास हो या मानव विकास सूचि या जी.डी.पी. संसार के लिए जरूरी परिवर्तनो के लिएस्थिर विकास नवीनीकरण, सहकार और संकल्पशक्ति की मांग करता है.

गुजरात ने अपनी हर पहलवृत्ति में यह दिखाया है जैसे कि सभी शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पूरा दिन थ्री फेज़ बिजली प्रदान करना, पी.पी.पी मार्ग द्वारा संस्थाकीय डिलिवरीज़, नदीओं को जोडना, सूक्ष्म सिंचाई, बी.आर.टी.एस., रिवरफ्रंट, आबोहवा परिवर्तन पहल, संध्या अदालत एवं और अधिक. हमने गुजरात को ऐसा अर्थतंत्र एवं समाज बनाने का निश्चय किया है जहाँ निम्न कार्बन स्त्राव हो तथा एक समृद्ध एवं स्वस्थ भविष्य हो.

गुजरात ने समरस ग्राम जैसी पहल भी की है जहाँ एक गाँव को पुरस्कृत किया जाता है यदि वहाँ स्थानीय स्वायत्त सरकार सर्वसंमति से रचित की गई हो. राज्य के स्वर्णिम जयंति वर्ष के प्रथम दिवस पिछले ५० वर्षों के गुजरात के सभी भूतपूर्व तथा वर्तमान विधान सभा सदस्यों एवं संसद सदस्यों को आमंत्रित किया गया था तथा बिना किन्हीं राजनैतिक मतभेदों के स्वर्णिम जयंति मनाने का एक निश्चय किया गया था. अनिवार्य मतदान विधान का परिचय भी एक स्वस्थ प्रजातंत्र एवं स्पर्धात्मक राजनीति खडी करने का एक प्रयास है.

आज का भारत युवाओं की धरती है. तथा युवाओं में देश के लिए कुछ करने का हौसला एवं ताकत दौनों हैं. वें प्रगतिशील ज्ञान तथा तकनीकी से सशक्त हैं. अपना समय दान कार्यक्रम हो यामुख्यमंत्री साथीमंडल कार्यक्रम या हज़ारों ईमेल्स जो मुझे युवाओं द्वारा रोज़ मिलते हैं, उनमें ताज़ा उत्साह और जोश देखकर भारत के भविष्य की चिंता दूर होती है.स्वामिजी की १५०वीं जयंति आ रही है. अमरिका के एलीनोर स्टार्क ने अपनी पुस्तक “द गिफ्ट अनओपन्ड” मे स्वामिजी को मानवता के लिए एक अनोखी भेंट बताया है जो अभी तक नहीं खोली गई है. आओ इस अवसर पर मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम स्वामिजी के संदेश पर जीवन जी कर यह भेंट खोलेंगे .“दिग्विजय दिवस” मनाने के लिए हमें स्वामिजी के संदेश का पालन करना चाहिए. एक अच्छे भविष्य के लिए हमें इसका केवल शब्दों से ही नहीं परंतु कर्मों से पालन करना चाहिए. आओ इनके पदचिन्हों पर चलकर, उनके सशक्त भारत के सपने को साकार करने की कोशिश करके हम इन महापुरुष का सम्मान करें.

इसका उत्तम अंत स्वामि विवेकानन्द के ही शब्दों में किया जा सकता है, “जैसे सारा बोझ तुम्हारे ही कंधों पर हो यह सोचकर सभी इस पृथ्वी और सारे विश्व की मुक्ति का मार्ग निकालो. वेदों के प्रकाश और जीवन को हर दरवाज़े पर ले जाओ और हर आत्मा में छुपे देवत्व को जगाओ. तब, आपको जितनी भी सफलता मिले, आपको यह संतुष्टि रहेगी कि आप एक महान उद्देश्य के लिए जीए, काम किया और मरे. इस उद्देश्य की सफलता में, जो किसी भी तरह प्राप्त की गई हो, मानवता की मुक्ति निहित है; आज और हमेशा.”

जय जय गरवी गुजरात ! जय जय स्वर्णिम गुजरात ! वसुधैव कुटुम्बकम्! सारा संसार एक परिवार है.

आपका,

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भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन
July 06, 2026

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।