मुख्यमंत्री का स्वागत ऑनलाइन जनशिकायत निवारण कार्यक्रम

आम जनता की शिकायतों का संतोषजनक एवं न्यायी निराकरण

गांधीनगर, गुरुवार: मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को गांधीनगर में स्वागत ऑनलाइन जनशिकायत निवारण कक्ष में आम जनता की शिकायतों को सुनते हुए शिकायतकर्ताओं को उचित न्याय मिले इस दिशा में संतोषजनक निराकरण लाने के लिए जिला प्रशासन को दिशा निर्देश  दिए।

स्वागत ऑनलाइन कार्यक्रम के तहत आम नागरिकों की ओर से प्रस्तुत शिकायतों के संबंध में तहसील एवं जिला प्रशासन तंत्र के अधिकारियों और संबंधित विभाग के सचिव सहित राज्यस्तरीय अधिकारियों की मौजूदगी में प्रति माह चौथे गुरूवार को मुख्यमंत्री जनशिकायतों का निबटारा करते  हैं। इस कार्यक्रम में अब तक करीबन 2.5 लाख जनशिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं। जिनमें से 91 फीसदी से ज्यादा का निराकरण स्थल पर ही फरियादी की उपस्थिति में किया जा चुका है।

स्वागत ऑनलाइन कार्यक्रम उत्तम सार्वजनिक सेवा तथा जनशिकायतों के हल के लिए अत्यन्त फलदायी साबित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से इसे पब्लिक सर्विस का अवार्ड भी प्राप्त हुआ है। यह कार्यक्रम अब 26 जिलास्तर, 225 तहसीलस्तर और 18,000 ग्रामीणस्तर में भी जी-स्वान नेटवर्क के जरिए कार्यरत हुआ है

आज आयोजित हुए स्वागत ऑनलाइन कार्यक्रम में अतिरिक्त अग्र सचिव जी.सी. मुर्मु सहित मुख्यमंत्री के जनसंपर्क कक्ष के अधिकारी भी मौजूद थे।

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प्रधानमंत्री ने पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित करने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
March 10, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने संस्कृत में रचित सुभाषितम् को साझा किया, जिसमें पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है।

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”

सुभाषितम् का अर्थ है कि पृथ्वी, जो महासागरों के रूप में जल से परिपूर्ण है और बाहरी रूप से जल से घिरी है, जिसे विद्वानों ने अपने ज्ञान से जाना है और जिसका हृदय विशाल आकाश में शाश्वत सत्य से ओत-प्रोत है - वह पृथ्वी एक महान राष्ट्र के रूप में हमारी ऊर्जा और शक्ति को बनाए रखे।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर अपनी पोस्‍ट में लिखा;

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”