प्रिय मित्रों,

आज हम अपने ६५ वें गणतंत्र दिवस का उत्सव मना रहे हैं. आज से ६४ वर्ष पूर्व अपने संविधान को अंगीकृत कर हम औपचारिक रूप से एक गणतंत्र बने थे. आज का दिन राष्ट्रीय शौर्य और आत्म-विश्वास के प्रदर्शन का है.

गणतंत्र दिवस हम सभी को कई भावनाओं और ज़ज्बों से सराबोर करता है. सारी दुनिया के समक्ष अपने पूर्ण वैभव के साथ संचलन करती भारतीय सैन्य शक्ति के प्रदर्शन की छवियों को यह हमारे मस्तिष्क में उकेरता है. यह हमें एक बार फिर अपने वर्दीधारी महिलाओं और पुरुषों की निस्वार्थ देशभक्ति को सलाम करने की प्रेरणा देता है. साथ ही यह हमें वीरता पुरस्कार प्राप्त जाँबाज सैनिकों के साहसिक कृत्य और पराक्रम की गाथाओं से प्रेरित करता है.

आज का दिन पीछे मुड़कर देखने और अपने गौरवशाली अतीत को स्मरण करने और उसे संजोने का भी है! आज के दिन उन महान क्रांतिकारियों- महिलाओं और पुरुषों, को याद कीजिये जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में अपने जीवन को उत्सर्ग कर दिया. संविधान सभा के उन सम्मानित सदस्यों को याद कीजिए जिन्होंने हमें अपने संविधान के जरिये एक ऐसा बुनियादी बल प्रदान किया, जिस पर हमें बहुत गर्व कर सकते हैं. आज का दिन इस पवित्र दस्तावेज़ के प्रति अपने विश्वास और प्रतिबद्धता को दोहराने का भी दिन है जिसने आज के भारत का निर्माण किया है. हम आदरणीय बाबासाहब अम्बेडकर को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं जिनकी (संविधान निर्माण में) महती भूमिका को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है.

महत्वपूर्ण रूप से आज का दिन आत्मनिरीक्षण का दिन भी है. भारतीय गणतंत्र का अर्थ क्या है? हमारे लिए इसके मायने क्या हैं? पिछले सात दशक के दौरान यह किस दिशा में आगे बढ़ा है? और आने वाले वर्षों में एक गणतंत्र के रूप में हमें क्या करने की आवश्यकता है?

एक वाक्यांश जिसने हाल में पर्याप्त ध्यान खींचा है वो है ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ यानि ‘भारत की अवधारणा’. इस पर जारी सार्वजनिक और अकादमिक संभाषण को कुछ चुनिंदा लोगों ने हथिया लिया है और इस अवधारणा पर अपना एकाकी आधिपत्य कायम करने के लिए वो इसे एक औज़ार के तौर पर इस्तेमाल कर रहें है. कई लोग मुझसे लंबे संपादकीय विचारों और सोशल मीडिया पर पूछते रहते हैं, "मोदी जी बाकी तो सब ठीक है लेकिन भारत को लेकर आपकी अवधारणा क्या है?” कुछ लोग जो हम पर कम मेहरबान हैं, वो इस ‘भारत की अवधारणा’ के बजाय इस के लिए मेरी पार्टी की योग्यता और उपयुक्तता पर बहस करना ज्यादा पसंद करते हैं.

हालांकि, सभी को यह समझना चाहिए कि कोई भी एक व्यक्ति या संस्था ‘भारत की अवधारणा’ पर अपना एकाधिकार स्थापित नहीं कर सकती है. पिछले सप्ताह हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में मुझे मेरी 'भारत की अवधारणा' के लेकर कुछ संक्षिप्त विचारों को साझा करने का अवसर मिला.

'भारत की अवधारणा' को लेकर मेरी समझ की पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बुनियादी रूप से भारत की अवधारणा की वैचारिक परिकल्पना पर आधिपत्य को खारिज करती है. ऋग्वेद हमें शिक्षा देता है: 'आ नो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः’. इसका अर्थ है 'हमारी तरफ सब ओर से शुभ विचार आयें’! यह महज एक मंत्र नहीं है बल्कि हमारे संविधान का केन्द्रीय सिद्धान्त भी है. हमारा रास्ता सहिष्णुता का और विविधता के उत्सव का है जहां प्रत्येक भारतीय महज कल्पना ही नहीं करता है, बल्कि अपने सपनों के भारत के निर्माण की दिशा में काम करता है.

मेरी ‘भारत की अवधारणा’ न केवल सहिष्णुता पर आधारित है बल्कि यह विचारों की विविधता का प्रसन्नता पूर्वक समावेश करती है. मेरे ‘भारत के अवधारणा’ में प्रत्येक व्यक्ति की संवेदना का सम्मान किया जाता है.

‘भारत की अवधारणा’ के केन्द्रीय सिद्धान्त का सृजन सत्य, शांति और अहिंसा से होता है! हमारे शास्त्र 'सत्यमेवजयते' की शिक्षा देते हैं, जिसका अर्थ है कि विजय सत्य की ही होती है. मैं एक ऐसे भारत के लिए प्रतिबद्ध हूं जहां न्याय का चक्र वर्ग, जाति या पंथ से प्रभावित हुए बिना भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए तेजी से और समान रूप से घूमता हो. एक ऐसा भारत जहां अन्याय के लिए किसी भी तरह की कानूनी या नैतिक वैधता न हो.

अहिंसा एक ऐसा अन्य गुण है, जो हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्रतिष्ठित रहा है और जिसने हमें सदैव दिशा दिखाई है. यह गौतम बुद्ध, महावीर, गुरू नानक और महात्मा गांधी की धरती हैं. हमारे शास्त्रों में लिखा है "अहिंसा परमो धर्म:"- अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है- यह विचार हमारे शास्त्रों में गहनता से समाहित है. इसीलिए 'भारत की अवधारणा' में किसी भी तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है.

वास्तव में 'भारत की अवधारणा' 'वसुधैव कुटुम्बकम्' - या संपूर्ण संसार एक परिवार है- के सिद्धान्त को ग्रहण कर बंधुत्व और मित्रता की इस लोकनीति को भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं करती है. २१वीं सदी एक बार फिर दुनिया के मार्गदर्शन में भारत की भूमिका के लिए उसका आह्वान कर रही है. 'भारत की अवधारणा' स्वामी विवेकानंद के 'जगदगुरु भारत' के सपने को साकार करने की मांग करती है, एक ऐसे आत्मविश्वासपूर्ण और आश्वस्त भारत की जो अपनी शर्तों और सिद्धान्तों के आधार पर वैश्विक समुदाय के साथ संबद्ध हो.

'भारत की अवधारणा' में जो भारत है वो अवसरों और आकांक्षाओं का भारत है. एक ऐसा भारत जहां : ‘सर्वेभवन्तुसुखिन:,सर्वेसन्तुनिरामया:'- अर्थात् जहाँ सभी समृद्ध और खुशहाल हों, सभी रोगों से मुक्त हों. दुर्भाग्यवश, दशकों से चुनिंदा लोगों के वोट बैंक को बढ़ाने के लिए जानबूझ कर गरीबी और निराशा को बनाए रखा गया है. हमारे लोगों के सपनों और आकांक्षाओं को दब्बूपन और लाचारी में बदल दिया गया. इस मकसद के तहत भारत के एक गरीब राष्ट्र होने की अविश्वसनीय कहानी गढ़ी गई है.

पर अब इस झूठ की कलई खोलने की आवश्यकता है. भारत एक गरीब देश नहीं है, इसे गरीब बनाया गया है! भारत को अकूत प्राकृतिक सम्पदा और अकल्पनीय मानवीय शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त है. कुछ और नहीं बल्कि यह भारत की अथाह, अकल्पनीय समृद्धि ही थी जो हर औपनिवेशिक शक्ति को भारत की ओर खिंची लाई. इस अवचेतन उर्जा को फिर से सजीव किया जा सकता है, आवश्यकता है तो सिर्फ अपने दृष्टिकोण को बदलने की. साथ ही आवश्यकता है की हम पर-निर्भरता छोड़ अपने सपनों का दोहन करें, उन्हें पूरा करने का प्रयास करें. हम भारतीयों में आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान का प्रगाढ़ भाव है. हम अपनी दम पर बने हुए (सेल्फ-मेड/ खुदमुख्तार) लोग हैं. हम सिर्फ न्यायोचित और बराबरी का अवसर चाहते हैं. इसीलिये ‘भारत की अवधारणा’ है की हर भारतीय को गरीबी के चंगुल से निकलने और सफलता और समृद्धि की कहानी लिखने का उचित और माकूल अवसर दिया जाए.

अब समय आ गया है की हम अपने देशवासियों को ऊंचे उठने का अवसर दें. उनको सपने देखने की शक्ति और प्रेरणा दें और साथ ही उन सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य दें. हमारी युवा-शक्ति उर्जावान है और न केवल इस देश को बल्कि सारी दुनिया को बदलने को तैयार है. यह हमारा उत्तरदायित्व है की हम उनकी कार्य-कुशलता बढ़ाएं और उन्हें रोज़गार के उचित अवसर प्रदान करें. यह भी आवश्यक है की हम अच्छी शिक्षा, उद्यमिता, नव-प्रवर्तन (इनोवेशन), शोध एवं तकनीकि की सहायता से अनवरत उनकी प्रतिभा का संवर्धन करें.

जब जब ज्ञान की प्रधानता हुयी है, भारत ने विश्व को रास्ता दिखाया है. आज जब २१ वीं सदी सूचना और ज्ञान की सदी में तब्दील हो रही है, सम्पूर्ण विश्व एक बार फिर भारत की ओर देख रहा है.

आने वाली सदी की सरंचना मिसाइलों की ताकत से नहीं बल्कि मानव की कुशाग्र बुद्धि से तय होगी. इसीलिए शिक्षा मेरी ‘भारत की अवधारणा’ के मूल में है. शिक्षा, जो हमें अज्ञान के अन्धकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाएगी. ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की अवधारणा भी यही है. मैं ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ जहाँ ज्ञान की रौशनी हर घर में फैली हो. मैं ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ जहाँ हर बच्चे को सर्वांगीण शिक्षा उपलब्ध हो जो उसके व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण कर सके.

किसी भी समाज का विकास महिला-सशक्तिकरण के बिना अधूरा है. पर महिला-सशक्तिकरण का स्वप्न तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक हम एक समाज के तौर पर महिला की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं करते हैं. महिलाओं पर अत्याचार करने से अधिक शर्मनाक शायद ही कुछ हो. अगर हम अपने देश को भारत माँ या ‘माँ भारती’ का दर्ज़ा देते हैं, अगर हमारे पूर्वज सदियों से नारी के ‘देवी’ रूप की पूजा करते रहे हैं तो हम महिलाओं के प्रति होने वाले किसी भी अपराध को क्यों सहन करते हैं? आइये हम सब मिलकर उन सभी के खिलाफ आवाज़ उठायें जो हमारी मातृशक्ति का अपमान करते हैं.

अभी तक महिला को सिर्फ गृहिणी समझा जाता रहा है पर अब आज यह आवश्यक है कि हम महिलाओं को राष्ट्र-निर्मात्री के तौर पर देखें जो हमारे भविष्य को मूलभूत रूप से परिभाषित कर सकती हैं.

भारत का विकास एक मज़बूत संघराज्य के बिना संभव नहीं है. हमारे संविधान निर्माताओं ने एक मज़बूत संघीय ढाँचे का सपना देखा था जहाँ सभी राज्य और केंद्र विकास की यात्रा में बराबर के सहभागी हों. जहाँ कोई बड़ा न हो, कोई छोटा न हो. हमें उस मनःस्थिति को बदलना होगा जहाँ राज्यों का अस्तित्व दिल्ली की दया पर निर्भर हो. हमें यह मानना होगा कि हमारे देश के खजाने में संचित धन पर देश के सभी नागरिकों का अधिकार है.

हम ऐसे भारत का सपना देखते हैं जहाँ देश का विकास सभी मुख्य-मंत्रियों, प्रधान-मंत्री, केंद्रीय मंत्रियों के साँझा प्रयास की परिणिति हो और जिसमे स्थानीय निकायों के अधिकारियों तक का योगदान सम्मिलित हो और यह सभी एक मजबूत, एकीकृत और संयुक्त ‘टीम इंडिया’ के तौर पर काम करें.

मित्रों, हम पर प्रभु की असीम अनुकम्पा है. हमारे पास अकल्पनीय प्राकृतिक और मानवीय सम्पदा है. हमारे पास सदियों से पूर्वजों द्वारा विकसित की गयी गौरवशाली परंपरा और संस्कृति की महान विरासत है. हमारी इकलौती सभ्यता है जो हमेशा समय की कसौटी पर खरी उतरी है. अन्य सभ्यताएं आयीं और गयीं, समाज-समुदाय पनपे और बिखर गए पर हमने हर चुनौती को पार किया और हम हर बार पहले से भी मजबूत हो कर उभरे हैं.

हाँ, यह सच है की विगत वर्षों में बहुत सी बाधाएँ आयीं हैं और हमें कई बड़ी और गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. यह भी सच है की हमें बहुत कुछ हासिल करना बाकी है. फिर भी ‘भारत की अवधारणा’ अक्षुण्ण है और संदेह से परे है. मुझे भारत की अन्तर्निहित शक्तियों और सामर्थ्य में पूरा विश्वास है. मेरा आपसे अनुरोध है की आप भी यह विश्वास रखें.

आइये हम अपने देश और देशवासियों में आस्था रखें और अपने महान नेताओं के निःस्वार्थ त्याग और बलिदान का समुचित सम्मान करते हुए उनके द्वारा दिखाए पथ पर आगे बढ़ें.

आइये हम अपने आप को राष्ट्र निर्माण के कार्य में ‘भारत सर्वोपरि’ के मन्त्र के साथ समर्पित करें और मिलकर ऐसे राष्ट्र का निर्माण करें जो फिर से मानवता की परिभाषा को सकारात्मक स्वरुप दे.

विकास की यात्रा में सदैव आपके साथ,

नरेन्द्र मोदी

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
Startup India recognises 2.07 lakh ventures, 21.9 lakh jobs created

Media Coverage

Startup India recognises 2.07 lakh ventures, 21.9 lakh jobs created
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
एक भारत, श्रेष्ठ भारत का जीवंत प्रतीक है काशी-तमिल संगमम
January 15, 2026

कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूं।

‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहां भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।

काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहां हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।

काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।

तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।

वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएं, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएं और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।

काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें....।

इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।

तेनकासी से काशी तक पहुंची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियां लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहां वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।

संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।

यहां मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहां सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।