पीएम मोदी ने कई रूढ़ियों और मिथकों को तोड़ा है। उनका कार्यकाल हमारे राष्ट्र के हित के लिए कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता के माध्यम से धोखेबाजों को उजागर करने और अपने आलोचकों को चुप कराने का एक उदाहरण है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए स्वयंभू और आत्ममुग्ध विचारकों के एक वर्ग द्वारा पिछले दो दशकों से एक लगातार प्रयास किया जा रहा है। भारतीय और विदेशी मीडिया का एक वर्ग पीएम मोदी के प्रति अपने पूर्वाग्रह के लिए भी जाना जाता है। उन्हें व्यक्तिगत हमलों से लेकर बिना किसी तर्क के नीतिगत अपमान तक का सामना करना पड़ा लेकिन अपनी कार्यशैली के प्रति सच्चे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमेशा कड़ी मेहनत की है और फर्जी आरोपों को गलत साबित किया है।

त्रासदी यह रही है कि पहले की सरकारों के चहेते, इस वर्ग की पीएम मोदी के प्रति नापसंदगी का मतलब अक्सर भारत के दृष्टिकोण से ही नफरत करना होता है। यहां तक कि 'इंडिया' की जगह 'भारत' शब्द का इस्तेमाल करने पर भी उन्होंने पीएम मोदी पर इंडिया का नाम बदलने का आरोप लगाया। तर्क इन आलोचकों का मुंह बंद करता है क्योंकि भारत शब्द संविधान में वर्णित है।

हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने खिलाफ हर नकली या मनगढ़ंत नैटेरिव का तर्कपूर्ण जवाब दिया। हालांकि पिछले दो दशकों में ऐसी अनगिनत मनगढ़ंत कहानियां प्रचारित की गईं। आइए हम केवल पाँच मिथकों की पड़ताल करते हैं जिन मिथकों को पीएम मोदी ने तोड़ा है।

पहला यह कि पीएम मोदी एक जटिल दुनिया में जी20 लीडरशिप समिट की चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।

पुराने पर्यवेक्षकों का नवीनतम ऑब्सेशन G20 की विफलता की पूर्वकल्पित धारणा थी जैसे कि वे सरकार के लिए वैश्विक मंच पर विफल होने की दुआएं कर रहे थे।

उन्होंने सोचा कि ध्रुवीकृत दुनिया में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत कोई सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाएगा। शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की अनुपस्थिति से इस नैरेटिव को बल मिला। कुछ दिनों पहले तक गुप्त रूप से विफलताओं का आरोप लगाना और भारत की जी20 अध्यक्षता की सफलता पर आक्षेप लगाना उनका काम था।

एक ओर, द गार्जियन का निराशावाद, ग्लोबलाइजेशन के अंत का प्रचारित कर रहा था; वहीं दूसरी ओर, वाशिंगटन पोस्ट जी20 के लिए खराब माहौल की भविष्यवाणी कर रहा था। 'फ़्रांस 24' ने भी भारत की G20 प्रेसीडेंसी के लिए मुसीबतों का सागर होने की भविष्यवाणी की थी।

लेकिन G20 के परिणाम ने ऐसे सभी भविष्यवक्ताओं को चुप करा दिया है। नई दिल्ली लीडर्स समिट घोषणा को पीएम मोदी के नेतृत्व में एक उल्लेखनीय सफलता के रूप में अपनाया गया, क्योंकि जी20 के सभी सदस्य शिखर सम्मेलन के शुरुआती दिन ही एक आम सहमति पर पहुंच गए। 83 पैराग्राफ के नई दिल्ली डिक्लेरेशन को "टेक्स्ट में किसी भी फ़ुटनोट या टीका-टिप्पणी के बिना सभी विकासात्मक और भू-राजनीतिक मुद्दों पर 100% आम सहमति" के साथ अपनाया गया। बहुध्रुवीय विश्व के समय में यह एक बड़ी उपलब्धि थी कि "वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर" का संदेश सभी देशों में गूंज उठा।

इसी तरह, ग्लोबल साउथ के लिए भारत की प्रतिबद्धता के बारे में भी सवाल थे। फिर भी अफ्रीकन यूनियन को G20 में शामिल होने में मदद करके, भारत न केवल ग्लोबल साउथ के चैंपियन के रूप में उभरा है, बल्कि इसने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी मजबूत किया है।

लेकिन जी20 की ऐतिहासिक सफलता ही सिर्फ नहीं है। इसके साथ जुड़े, आइए दूसरे मिथक की भी पड़ताल करें कि पीएम मोदी आम तौर पर विदेश नीति में कुशल नहीं हैं और कठिन परिस्थिति का सामना करने पर लड़खड़ा जाते हैं।

रूस-यूक्रेन संघर्ष में भारत ने संप्रभुता की रक्षा करने और वैश्विक मानदंडों को कायम रखने वाले समाधान की तलाश के लिए रचनात्मक बातचीत में शामिल सभी संबंधित पक्षों के महत्व पर लगातार जोर दिया। इस पूरे युद्ध के दौरान भारत ने रणनीतिक निर्णयों पर अपनी स्वायत्तता को दृढ़तापूर्वक बनाए रखा है। संभवतः भारत उन कुछ देशों में से एक है जिसकी बात रूस और यूक्रेन दोनों में सुनी जाती है। वास्तव में पीएम मोदी का बयान-"आज का युग युद्ध का नहीं है" वैश्विक चर्चा बन गया है।

इसी तरह, जिस तरह से पीएम मोदी ने मिडिल-ईस्ट की विदेश नीति को हैंडल किया, वह उल्लेखनीय से कम नहीं है। यह विदेश नीति का एक ऐसा क्षेत्र है जहां स्वघोषित विशेषज्ञों ने, जिन्होंने प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया था, एक असाध्य लक्ष्य मानकर इसे छोड़ दिया था। लेकिन जो ' इन विशेषज्ञों' के लिए असाध्य था, उसे पीएम मोदी ने संभव बना दिया है, जैसा कि हाल ही में संपन्न इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर इसका सबूत है।

यह न तो पहली और न ही आखिरी बार, जब पीएम मोदी ने खुद की लाइन को बड़ी लाइन में तब्दील किया है। उनके निर्णय लेने और लीडरशिप क्वालिटी जल्द ही बिजनेस स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल होंगे। वह कठिन परिस्थितियों को उल्लेखनीय अवसरों में बदलने में माहिर हैं। उनकी नीतियां, जिनकी शुरुआत में आलोचना की गई थी, भारत पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव डालने वाली साबित हुई हैं।

तीसरा- पीएम मोदी आर्थिक नीति को नहीं समझते हैं और इसलिए परिणाम देने में असमर्थ होंगे।

प्रधानमंत्री मोदी पर संदेह करने वालों का सबसे बड़ा उदाहरण तब है जब जन धन योजना शुरू की गई थी। कई लोगों ने वित्तीय समावेशन पहल की आलोचना की, प्रधानमंत्री की समझ पर सवाल उठाए।

लेकिन केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की अदूरदर्शी समझ ही ऐसे निष्कर्षों तक पहुंच सकती है। आज, जन-धन योजना की पॉलिसी इनिशिएटिव सभी के लिए वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करने में सहायक है। इस योजना ने उन लोगों को बैंकिंग प्रदान की है जिनके पास बैंकिंग सुविधा नहीं है, इस योजना ने भारत की वित्तीय समावेशन दर को 2008 में मात्र 25% से बढ़ाकर 2022 तक 80% से अधिक वयस्कों तक पहुंचा दिया है। यह इतनी उल्लेखनीय उपलब्धि है कि अब विश्व बैंक ने इसे अन्य देशों के लिए अनुकरणीय मॉडल के रूप में वकालत की है। आज तक, 50 करोड़ से अधिक जन-धन बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें से 27 करोड़ आर्थिक रूप से सशक्त महिलाएं हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत में एक व्यापक सामाजिक क्रांति आई है और पीएम मोदी की झोली में एक और उपलब्धि आई है।

लेकिन सोचिए कि हर गरीब के पास बैंक खाता होने के बाद पीएम मोदी ने जनधन योजना के साथ क्या किया। आधार एनरोलमेंट, प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान करता है, जो पहले कांग्रेस शासन के दौरान सरकारों के बीच लड़ाई में फंसा हुआ था, 2014 के बाद गति पकड़ी और इसे बैंक खातों से जोड़ा गया।
इससे बिचौलियों और भ्रष्टाचार को खत्म करके लीकेज से बचाकर लाभार्थियों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) सुनिश्चित किया गया। अब तक, डीबीटी के माध्यम से 31 लाख करोड़ रुपये से अधिक के डायरेक्ट ट्रांसफर से लगभग 2.3 लाख करोड़ रुपये की बचत सुनिश्चित की गई है। इसने कांग्रेस के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया, जिसमें माना गया था कि खर्च किए गए प्रत्येक 1 रुपये में से केवल 15 पैसे ही गरीबों तक पहुंच सकते हैं। अब कहावत है “एक रुपया खर्च; गरीबों के लिए एक रुपये का लाभ”।

जीएसटी के बारे में उपहास को कोई नहीं भूल सकता, लेकिन "वन नेशन, वन टैक्स " ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले की तरह औपचारिक बना दिया है और यह वास्तव में एक गेम चेंजर है।

चौथा, पीएम मोदी का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का विजन और उनका विश्वास है कि डिजिटल, गरीबों के जीवन को बदल सकता है।

कई तथाकथित विशेषज्ञों ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के पीएम मोदी के विजन का मजाक उड़ाया। गरीब सब्जी विक्रेता का उदाहरण देते हुए एक जाने-माने राजनेता ने डिजिटल और मोबाइल कनेक्टिविटी पर बैंकिंग करने की बुद्धिमत्ता पर भी सवाल उठाते हुए कहा, "न तो मोबाइल चार्ज करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ही गरीबों के लिए डिजिटल का उपयोग करने के लिए शिक्षा है"। अब जब जर्मनी के मंत्री एक सब्जी विक्रेता को भुगतान करने के लिए UPI का उपयोग करते हैं तो हमारा दिल गर्व से चौड़ा हो जाता है। पिछले 7 वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने में सफल रहा है जिसने भारत को डिजिटल भुगतान में विश्व में अग्रणी बना दिया है। दरअसल, भारत का DPI मॉडल दुनिया के लिए अनुकरणीय मॉडल बन गया है। डिजिटल एक ऐसा क्षेत्र है जहां पीएम मोदी एक परिवर्तनकारी दूरदर्शी रहे हैं।

पांचवां- पीएम मोदी की कोविड-19 महामारी से उत्पन्न जटिल चुनौती को संभालने की क्षमता - स्वास्थ्य के मोर्चे पर, साथ ही आर्थिक मोर्चे पर भी।

कोविड के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कई अफवाहें फैलाई गई। कुछ लोगों ने फिस्कल शेड्यूल को त्यागने का भी सुझाव दिया क्योंकि भारत में लॉकडाउन था। कई लोगों ने धन की आपूर्ति में बड़े पैमाने पर वृद्धि कर कोविड प्रभाव को हैडल करने पर जोर दिया, जिसका अनुसरण कई पश्चिमी देशों ने किया। लेकिन सरकार ने अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को पहचाना। कोविड आर्थिक संकट से निपटने के लिए अधिक कठिन लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए आसान रास्ते को नहीं चुना।

पीएम मोदी ने व्यावहारिक नीतियों और सक्रिय कार्यों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था न केवल कोविड के हमले से बची रहे, बल्कि 'विश्व का ब्राइट स्पॉट' भी बने। हम आज न केवल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती, बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, बल्कि मुद्रास्फीति को मध्यम स्तर पर रखने में भी कामयाब रहे हैं। कोई भी अन्य प्रमुख लोकतंत्र इस उपलब्धि को हासिल करने में सक्षम नहीं है।

पीएम मोदी ने कई रूढ़ियों और मिथकों को तोड़ा है। उनका कार्यकाल हमारे राष्ट्र के हित के प्रति अत्यधिक कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता के माध्यम से धोखेबाजों को उजागार करने और अपने आलोचकों को चुप कराने का एक उदाहरण है। वह भारत के प्रिय और सम्मानित प्रधान सेवक बने हुए हैं।

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भारत में नई चेतना का संचार करने वाले नेता: नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
June 14, 2026

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का साधारण पृष्ठभूमि से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व तक का सफर, अंततः उस व्यक्ति की कहानी है जिसने भारत का खुद पर, अपनी क्षमताओं पर और अपने भविष्य पर विश्वास फिर से जगाया।

किसी राष्ट्र की नियति उसके नेताओं की नियति से गहराई से जुड़ी होती है। मजबूत और निर्णायक नेतृत्व में राष्ट्र आगे बढ़ते हैं और समृद्ध होते हैं, जबकि कमजोर, अनिर्णायक और भ्रष्ट नेतृत्व के दौर में उनका क्षरण होने लगता है। जनता किसी राष्ट्र की जीवन-ऊर्जा होती है, लेकिन नेता वही होते हैं जो इस सामूहिक ऊर्जा को सही और उत्पादक दिशा देते हैं। अपने संस्थापकों और नेताओं के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। जब हम संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में सोचते हैं, तो थॉमस जेफरसन, जॉर्ज वॉशिंगटन, अब्राहम लिंकन, जॉन एफ. केनेडी और एफ.डी. रूजवेल्ट जैसे प्रमुख नेताओं के नाम हमारे मन में आते हैं। इसी तरह, भारतीय राष्ट्र का निर्माण भी महात्मा गांधी, बी.आर. आंबेडकर और वीर सावरकर जैसे महान संस्थापक पुरोधाओं के विजन पर हुआ है।

मजबूत नेतृत्व जनता के मनोबल को ऊंचा उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जबकि दूरदर्शी नेता राष्ट्र को समृद्धि और गौरव के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। नेतृत्व का महत्व किसी राष्ट्रीय संकट के समय सबसे अधिक होता है, ठीक वैसे ही जैसे भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार ने प्रलय के दौरान मनु महाराज के विशाल जहाज का मार्गदर्शन कर उसे सुरक्षित बचाया था। संकट की घड़ी में नेता ही राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं और उसे कठिनाइयों से बाहर निकालते हैं। श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भी भारतीय राजनीति में ऐसे ही एक संकटपूर्ण दौर के दौरान केंद्र में अपनी प्रमुख भूमिका स्थापित की।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसे समय राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे, जब भारतीय राजनीति गहरे संकट के दौर से गुजर रही थी और देश पर एक नाममात्र के प्रधानमंत्री को थोपे जाने की स्थिति बन गई थी। सरकार पॉलिसी पैरालिसिस से जूझ रही थी। भ्रष्टाचार राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में गहराई तक जड़ें जमा चुका था और कोलगेट, 2जी स्पेक्ट्रम तथा कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटाले बार-बार सामने आने वाली घटनाएं बन गए थे। मीडिया, कारोबारी जगत और राजनेताओं के बीच एक अपवित्र गठजोड़ बन गया था, जो बिना किसी भय के सार्वजनिक धन की लूट में लगा हुआ था। उद्यमी, उद्योग जगत और अकादमिक क्षेत्र निराशा के माहौल में डूब चुके थे तथा भारतीय राज्य व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर पड़ने लगा था। आम लोगों के मन में भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर गर्व की भावना क्षीण होती जा रही थी।

उस निर्णायक मोड़ पर श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी एक स्पष्ट, सशक्त और दूरदर्शी विजन के साथ राष्ट्रीय मंच पर उभरे। उन्होंने युवाओं, महिलाओं और अनुभवी पीढ़ी सहित समाज के विभिन्न वर्गों को नई प्रेरणा दी। पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेतृत्व और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में आशा, विश्वास और भरोसे को फिर से स्थापित किया। उन्होंने अर्थव्यवस्था की रफ्तार को नई ऊर्जा दी, उद्यमिता और उद्योग जगत को प्रोत्साहित किया तथा नौकरशाही में भी नई कार्यसंस्कृति और उत्साह का संचार किया। स्वयं साधारण पृष्ठभूमि से आने के कारण पीएम मोदी को भारतीय समाज की गहरी समझ थी और आरएसएस प्रचारक के रूप में उन्होंने भारतीय संस्कृति तथा उसकी मूल चेतना को भी निकटता से समझा था।

भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल, उनका प्रशासनिक और चुनावी रिकॉर्ड बेदाग रहा। पीएम मोदी अपने साथ "मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस" का मंत्र लेकर आए।

पीएम मोदी ने सरकारी सेवाओं के तेज डिजिटलीकरण के माध्यम से फाइनेंस में मौजूद जड़ता को कम किया और सरकार को आम नागरिकों की उंगलियों तक पहुंचा दिया। अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही उन्होंने गजेटेड अधिकारियों से दस्तावेजों के सत्यापन की अनिवार्यता को समाप्त कर आम नागरिकों के लिए सेल्फ-अटेस्टेशन की व्यवस्था लागू की। यह आम नागरिकों की प्रगति में बाधा बनने वाली नौकरशाही अड़चनों के प्रति उनकी सूक्ष्म समझ को दर्शाता है। उनके द्वारा शुरू किए गए सुधारात्मक उपायों के कारण अंतरराष्ट्रीय बिजनेस इंडिकेटर्स में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ। पीएम मोदी ने एक दक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह सरकार के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है। अब नियम और नीतियां बंद एसी कमरों में नहीं, बल्कि लोगों के बीच बनती हैं।

पीएम मोदी ने सत्ता संभालने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मैन्युफैक्चरिंग हब में बदलने और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए लगातार कार्य किया है। पीएम मोदी ने स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLI) जैसी पहलों की शुरुआत की। सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए पीएम मोदी ने ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और शिपिंग पोर्ट्स को मंजूरी दी, साथ ही ब्राउनफील्ड एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और स्टेशनों के निर्माण को भी गति दी। पीएम मोदी ने नए IIT और IIM स्थापित कर भारत के हायर एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया। पीएम मोदी ने "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास" के मंत्र के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों का भारतीय सरकार के प्रति विश्वास फिर से मजबूत किया। उनकी संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पारंपरिक चूल्हों के धुएं से माताओं और बहनों को होने वाली परेशानी को समझते हुए उन्होंने पीएम उज्ज्वला योजना की शुरुआत की।

पीएम मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से स्वच्छता और सैनिटेशन को जनचर्चा का हिस्सा बनाया। इस योजना के तहत बनाए गए शौचालयों के जरिए पीएम मोदी ने हमारी माताओं और बहनों को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने का प्रयास किया। पीएम नरेन्द्र मोदी के भागीरथ प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत की महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए नारीशक्ति वंदन अधिनियम पारित किया गया।

राष्ट्रवाद की भावना से ओत-प्रोत पीएम मोदी ने देश में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नेतृत्व किया। औपनिवेशिक विरासत के अवशेष रहे इंडियन पीनल कोड (IPC) और सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) को समाप्त कर भारतीय न्याय संहिता का मार्ग प्रशस्त किया गया। पीएम मोदी निरंतर हमारे पवित्र तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण और विकास में जुटे हुए हैं। उनके प्रयासों से अयोध्या और काशी जैसे हमारे सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक केंद्रों को नई पहचान और भव्य स्वरूप मिला। पीएम मोदी ने ब्रांड एंबेसडर की तरह आयुर्वेद के स्वदेशी ज्ञान को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दिया और आयुर्वेद को प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करने के लिए नीतियां तैयार कीं।

पीएम मोदी अपने उल्लेखनीय कार्यों, अटूट समर्पण और विकसित भारत के प्रति प्रतिबद्धता के माध्यम से हर भारतीय को 2047 तक विकसित भारत के अपने विजन में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

फिर भी, किसी नेता की वास्तविक पहचान केवल उसकी बनाई गई नीतियों या स्थापित संस्थाओं से नहीं होती, बल्कि उससे होती है कि वह अपने लोगों में कितना आत्मविश्वास पैदा करता है। पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया है—शासन-व्यवस्था में विश्वास, भारत की सभ्यतागत विरासत में विश्वास, सामान्य नागरिकों की क्षमताओं में विश्वास और राष्ट्र के भविष्य में विश्वास।

अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देने और गरीबों के सशक्तिकरण से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई देने तक, पीएम मोदी के नेतृत्व ने समकालीन भारत पर एक अमिट छाप छोड़ी है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने गवर्नेंस को एक राष्ट्रीय जनआंदोलन का स्वरूप दिया है, जिससे लाखों लोग देश की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदार बनने के लिए प्रेरित हुए हैं।

जैसे-जैसे भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है, विकसित भारत का विजन अब कोई दूर का सपना नहीं रह गया है; यह एक सामूहिक राष्ट्रीय मिशन बन चुका है। इतिहास उन नेताओं को याद रखता है जो तब आगे आते हैं जब उनके राष्ट्र को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, ऐसे नेता जो केवल अपने समय का नेतृत्व ही नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की नियति को भी आकार देते हैं।

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का साधारण पृष्ठभूमि से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व तक का सफर, अंततः उस व्यक्ति की कहानी है जिसने भारत का खुद पर, अपनी क्षमताओं पर और अपने भविष्य पर विश्वास फिर से जगाया। एक अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी और आकांक्षी भारत की नींव रखी जा चुकी है। अब राष्ट्र के सामने इस गति को आगे बढ़ाने और विकसित भारत के सपने को साकार करने का दायित्व है।

जब भारत और भी बड़ी संभावनाओं की दहलीज पर खड़ा है, तब रॉबर्ट फ्रॉस्ट के शब्द नए अर्थों और नई प्रासंगिकता के साथ गूंजते हैं,

"ये वन मनोहर हैं, गहरे हैं और रहस्यमय भी,

लेकिन मुझे अपने वादे निभाने हैं,

और विश्राम से पहले मुझे अभी मीलों चलना है,

और विश्राम से पहले मुझे अभी मीलों चलना है।"

भारत के लिए ये वादे उसके लोगों, उसकी सभ्यता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हैं। पिछले बारह वर्षों की उपलब्धियां उस यात्रा की मजबूत नींव हैं। यह यात्रा अभी जारी है और आगे का मार्ग अनिश्चितताओं से नहीं, बल्कि अवसरों, उद्देश्य और विकसित भारत के संकल्प से परिपूर्ण है।

(रेखा गुप्ता दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं।)