पीएम मोदी ने कई रूढ़ियों और मिथकों को तोड़ा है। उनका कार्यकाल हमारे राष्ट्र के हित के लिए कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता के माध्यम से धोखेबाजों को उजागर करने और अपने आलोचकों को चुप कराने का एक उदाहरण है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए स्वयंभू और आत्ममुग्ध विचारकों के एक वर्ग द्वारा पिछले दो दशकों से एक लगातार प्रयास किया जा रहा है। भारतीय और विदेशी मीडिया का एक वर्ग पीएम मोदी के प्रति अपने पूर्वाग्रह के लिए भी जाना जाता है। उन्हें व्यक्तिगत हमलों से लेकर बिना किसी तर्क के नीतिगत अपमान तक का सामना करना पड़ा लेकिन अपनी कार्यशैली के प्रति सच्चे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमेशा कड़ी मेहनत की है और फर्जी आरोपों को गलत साबित किया है।
त्रासदी यह रही है कि पहले की सरकारों के चहेते, इस वर्ग की पीएम मोदी के प्रति नापसंदगी का मतलब अक्सर भारत के दृष्टिकोण से ही नफरत करना होता है। यहां तक कि 'इंडिया' की जगह 'भारत' शब्द का इस्तेमाल करने पर भी उन्होंने पीएम मोदी पर इंडिया का नाम बदलने का आरोप लगाया। तर्क इन आलोचकों का मुंह बंद करता है क्योंकि भारत शब्द संविधान में वर्णित है।
हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने खिलाफ हर नकली या मनगढ़ंत नैटेरिव का तर्कपूर्ण जवाब दिया। हालांकि पिछले दो दशकों में ऐसी अनगिनत मनगढ़ंत कहानियां प्रचारित की गईं। आइए हम केवल पाँच मिथकों की पड़ताल करते हैं जिन मिथकों को पीएम मोदी ने तोड़ा है।
पहला यह कि पीएम मोदी एक जटिल दुनिया में जी20 लीडरशिप समिट की चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।
पुराने पर्यवेक्षकों का नवीनतम ऑब्सेशन G20 की विफलता की पूर्वकल्पित धारणा थी जैसे कि वे सरकार के लिए वैश्विक मंच पर विफल होने की दुआएं कर रहे थे।
उन्होंने सोचा कि ध्रुवीकृत दुनिया में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत कोई सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाएगा। शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की अनुपस्थिति से इस नैरेटिव को बल मिला। कुछ दिनों पहले तक गुप्त रूप से विफलताओं का आरोप लगाना और भारत की जी20 अध्यक्षता की सफलता पर आक्षेप लगाना उनका काम था।
एक ओर, द गार्जियन का निराशावाद, ग्लोबलाइजेशन के अंत का प्रचारित कर रहा था; वहीं दूसरी ओर, वाशिंगटन पोस्ट जी20 के लिए खराब माहौल की भविष्यवाणी कर रहा था। 'फ़्रांस 24' ने भी भारत की G20 प्रेसीडेंसी के लिए मुसीबतों का सागर होने की भविष्यवाणी की थी।
लेकिन G20 के परिणाम ने ऐसे सभी भविष्यवक्ताओं को चुप करा दिया है। नई दिल्ली लीडर्स समिट घोषणा को पीएम मोदी के नेतृत्व में एक उल्लेखनीय सफलता के रूप में अपनाया गया, क्योंकि जी20 के सभी सदस्य शिखर सम्मेलन के शुरुआती दिन ही एक आम सहमति पर पहुंच गए। 83 पैराग्राफ के नई दिल्ली डिक्लेरेशन को "टेक्स्ट में किसी भी फ़ुटनोट या टीका-टिप्पणी के बिना सभी विकासात्मक और भू-राजनीतिक मुद्दों पर 100% आम सहमति" के साथ अपनाया गया। बहुध्रुवीय विश्व के समय में यह एक बड़ी उपलब्धि थी कि "वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर" का संदेश सभी देशों में गूंज उठा।
इसी तरह, ग्लोबल साउथ के लिए भारत की प्रतिबद्धता के बारे में भी सवाल थे। फिर भी अफ्रीकन यूनियन को G20 में शामिल होने में मदद करके, भारत न केवल ग्लोबल साउथ के चैंपियन के रूप में उभरा है, बल्कि इसने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी मजबूत किया है।
लेकिन जी20 की ऐतिहासिक सफलता ही सिर्फ नहीं है। इसके साथ जुड़े, आइए दूसरे मिथक की भी पड़ताल करें कि पीएम मोदी आम तौर पर विदेश नीति में कुशल नहीं हैं और कठिन परिस्थिति का सामना करने पर लड़खड़ा जाते हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष में भारत ने संप्रभुता की रक्षा करने और वैश्विक मानदंडों को कायम रखने वाले समाधान की तलाश के लिए रचनात्मक बातचीत में शामिल सभी संबंधित पक्षों के महत्व पर लगातार जोर दिया। इस पूरे युद्ध के दौरान भारत ने रणनीतिक निर्णयों पर अपनी स्वायत्तता को दृढ़तापूर्वक बनाए रखा है। संभवतः भारत उन कुछ देशों में से एक है जिसकी बात रूस और यूक्रेन दोनों में सुनी जाती है। वास्तव में पीएम मोदी का बयान-"आज का युग युद्ध का नहीं है" वैश्विक चर्चा बन गया है।
इसी तरह, जिस तरह से पीएम मोदी ने मिडिल-ईस्ट की विदेश नीति को हैंडल किया, वह उल्लेखनीय से कम नहीं है। यह विदेश नीति का एक ऐसा क्षेत्र है जहां स्वघोषित विशेषज्ञों ने, जिन्होंने प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया था, एक असाध्य लक्ष्य मानकर इसे छोड़ दिया था। लेकिन जो ' इन विशेषज्ञों' के लिए असाध्य था, उसे पीएम मोदी ने संभव बना दिया है, जैसा कि हाल ही में संपन्न इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर इसका सबूत है।
यह न तो पहली और न ही आखिरी बार, जब पीएम मोदी ने खुद की लाइन को बड़ी लाइन में तब्दील किया है। उनके निर्णय लेने और लीडरशिप क्वालिटी जल्द ही बिजनेस स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल होंगे। वह कठिन परिस्थितियों को उल्लेखनीय अवसरों में बदलने में माहिर हैं। उनकी नीतियां, जिनकी शुरुआत में आलोचना की गई थी, भारत पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव डालने वाली साबित हुई हैं।
तीसरा- पीएम मोदी आर्थिक नीति को नहीं समझते हैं और इसलिए परिणाम देने में असमर्थ होंगे।
प्रधानमंत्री मोदी पर संदेह करने वालों का सबसे बड़ा उदाहरण तब है जब जन धन योजना शुरू की गई थी। कई लोगों ने वित्तीय समावेशन पहल की आलोचना की, प्रधानमंत्री की समझ पर सवाल उठाए।
लेकिन केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की अदूरदर्शी समझ ही ऐसे निष्कर्षों तक पहुंच सकती है। आज, जन-धन योजना की पॉलिसी इनिशिएटिव सभी के लिए वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करने में सहायक है। इस योजना ने उन लोगों को बैंकिंग प्रदान की है जिनके पास बैंकिंग सुविधा नहीं है, इस योजना ने भारत की वित्तीय समावेशन दर को 2008 में मात्र 25% से बढ़ाकर 2022 तक 80% से अधिक वयस्कों तक पहुंचा दिया है। यह इतनी उल्लेखनीय उपलब्धि है कि अब विश्व बैंक ने इसे अन्य देशों के लिए अनुकरणीय मॉडल के रूप में वकालत की है। आज तक, 50 करोड़ से अधिक जन-धन बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें से 27 करोड़ आर्थिक रूप से सशक्त महिलाएं हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत में एक व्यापक सामाजिक क्रांति आई है और पीएम मोदी की झोली में एक और उपलब्धि आई है।
लेकिन सोचिए कि हर गरीब के पास बैंक खाता होने के बाद पीएम मोदी ने जनधन योजना के साथ क्या किया। आधार एनरोलमेंट, प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान करता है, जो पहले कांग्रेस शासन के दौरान सरकारों के बीच लड़ाई में फंसा हुआ था, 2014 के बाद गति पकड़ी और इसे बैंक खातों से जोड़ा गया।
इससे बिचौलियों और भ्रष्टाचार को खत्म करके लीकेज से बचाकर लाभार्थियों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) सुनिश्चित किया गया। अब तक, डीबीटी के माध्यम से 31 लाख करोड़ रुपये से अधिक के डायरेक्ट ट्रांसफर से लगभग 2.3 लाख करोड़ रुपये की बचत सुनिश्चित की गई है। इसने कांग्रेस के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया, जिसमें माना गया था कि खर्च किए गए प्रत्येक 1 रुपये में से केवल 15 पैसे ही गरीबों तक पहुंच सकते हैं। अब कहावत है “एक रुपया खर्च; गरीबों के लिए एक रुपये का लाभ”।
जीएसटी के बारे में उपहास को कोई नहीं भूल सकता, लेकिन "वन नेशन, वन टैक्स " ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले की तरह औपचारिक बना दिया है और यह वास्तव में एक गेम चेंजर है।
चौथा, पीएम मोदी का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का विजन और उनका विश्वास है कि डिजिटल, गरीबों के जीवन को बदल सकता है।
कई तथाकथित विशेषज्ञों ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के पीएम मोदी के विजन का मजाक उड़ाया। गरीब सब्जी विक्रेता का उदाहरण देते हुए एक जाने-माने राजनेता ने डिजिटल और मोबाइल कनेक्टिविटी पर बैंकिंग करने की बुद्धिमत्ता पर भी सवाल उठाते हुए कहा, "न तो मोबाइल चार्ज करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ही गरीबों के लिए डिजिटल का उपयोग करने के लिए शिक्षा है"। अब जब जर्मनी के मंत्री एक सब्जी विक्रेता को भुगतान करने के लिए UPI का उपयोग करते हैं तो हमारा दिल गर्व से चौड़ा हो जाता है। पिछले 7 वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने में सफल रहा है जिसने भारत को डिजिटल भुगतान में विश्व में अग्रणी बना दिया है। दरअसल, भारत का DPI मॉडल दुनिया के लिए अनुकरणीय मॉडल बन गया है। डिजिटल एक ऐसा क्षेत्र है जहां पीएम मोदी एक परिवर्तनकारी दूरदर्शी रहे हैं।
पांचवां- पीएम मोदी की कोविड-19 महामारी से उत्पन्न जटिल चुनौती को संभालने की क्षमता - स्वास्थ्य के मोर्चे पर, साथ ही आर्थिक मोर्चे पर भी।
कोविड के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कई अफवाहें फैलाई गई। कुछ लोगों ने फिस्कल शेड्यूल को त्यागने का भी सुझाव दिया क्योंकि भारत में लॉकडाउन था। कई लोगों ने धन की आपूर्ति में बड़े पैमाने पर वृद्धि कर कोविड प्रभाव को हैडल करने पर जोर दिया, जिसका अनुसरण कई पश्चिमी देशों ने किया। लेकिन सरकार ने अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को पहचाना। कोविड आर्थिक संकट से निपटने के लिए अधिक कठिन लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए आसान रास्ते को नहीं चुना।
पीएम मोदी ने व्यावहारिक नीतियों और सक्रिय कार्यों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था न केवल कोविड के हमले से बची रहे, बल्कि 'विश्व का ब्राइट स्पॉट' भी बने। हम आज न केवल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती, बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, बल्कि मुद्रास्फीति को मध्यम स्तर पर रखने में भी कामयाब रहे हैं। कोई भी अन्य प्रमुख लोकतंत्र इस उपलब्धि को हासिल करने में सक्षम नहीं है।
पीएम मोदी ने कई रूढ़ियों और मिथकों को तोड़ा है। उनका कार्यकाल हमारे राष्ट्र के हित के प्रति अत्यधिक कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता के माध्यम से धोखेबाजों को उजागार करने और अपने आलोचकों को चुप कराने का एक उदाहरण है। वह भारत के प्रिय और सम्मानित प्रधान सेवक बने हुए हैं।


