Development of Uttarakhand Is a Priority for the BJP: PM Modi

Published By : Admin | February 10, 2017 | 15:35 IST
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भारत माता की जय। भारत माता की जय।

मंच पर विराजमान केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्री जेपी नड्डा जी, श्री धर्मेंद्र प्रधान जी, यहां के जनप्रिय सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल जी निशंक, ज्वालापुर से भाजपा के उम्मीदवार श्रीमान सुरेश राठौर जी, हरिद्वार से उम्मीदवार श्री मदन कौशिक जी, हरिद्वार ग्रामीण से उम्मीदवार स्वामी  यतीश्वरानंद जी, रानीपुर से उम्मीदवार श्री आदेश चौहान जी, लक्सर से श्री संजय गुप्ता जी, रूड़की से प्रदीप बत्रा जी, खानपुर से कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन जी, ऋषिकेश से उम्मीदवार प्रेमचंद्र अग्रवाल जी, भगवानपुर से सुबोध राकेश जी, जबरदा से देशराज करनवाल जी, मंगलोर से रुचिपाल बालियान जी, पीरन से जय भगवान सैनी जी, मंच पर विराजमान सभी वरिष्ठ साथी और विशाल संख्या में पधारे हुए प्यारे भाइयों और बहनों। मेरे साथ जोर बोलिये। भारत माता की जय। भारत माता की जय।

आप सब इतनी बड़ी संख्या में हमें आशीर्वाद देने के लिए आए। मैं नमन करते हुए आपका धन्यवाद करता हूं, आपका अभिनंदन करता हूं। मैं नहीं जानता हूं कि दूर-दूर जो छत पर खड़े हैं, उनको सुनाई भी देता होगा कि नहीं देता होगा? उसके बावजूद जहां भी मेरी नजर जाती है,  लोग ही लोग नजर आ रहे हैं।

भाइयों बहनों।

आज के युग में ये जनसैलाब, ये आशीर्वाद, ये अनोखी घटना मैं मानता हूं। चुनाव हमने भी बहुत लड़े हैं जी। कभी मैं भी उत्तराखंड में चुनाव अभियान के लिए आया करता था, लेकिन ऐसा उमंग, उत्साह, ये केसरिया सागर और इतनी बड़ी संख्या में माताएं बहनें।

भाइयों बहनों।

सदियों से हमारे देश में जब भी हरिद्वार की चर्चा होती है, इस देवभूमि का नाम लिया जाता है। देवभूमि कहते ही कश्मीर से कन्याकुमारी, हिंदुस्तान के किसी भी कोने में, कोई भी हिंदुस्तानी होगा देव भूमि कहते ही उसको हरिद्वार, गंगाजी, मठ-मंदिर, ये बर्फीली चोटियां, ये हरी-भरी दुनिया, योग, ऋषि-मुनि, यही सबसे पहले याद आता है। देवभूमि को याद करते ही एक पवित्रता का भाव मन में उमड़ के आता है।

...लेकिन भाइयों बहनों।

आज वो वक्त बदल चुका है। अब वो दिन नहीं रहे। आज देवभूमि बोलते ही दागी सरकार दिखाई देती है, दागी सरकार। इस दागी सरकार की छाया ने, हजारों वर्षों की तपस्या से बनी हमारी भूमि को दाग लगा दिया है, दाग लगा दिया।

भाइयों बहनों।

आप मुझे बताइये कि देवभूमि की पुन: प्रतिष्ठा होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए ...। पूरी ताकत से बताइए। देवभूमि की पुन: प्रतिष्ठा होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए। देवभूमि से दागी सरकार का साया हटना चाहिए कि नहीं हटना चाहिए ...। ये देवभूमि की पवित्रता का हर हिंदुस्तानी का हक है कि नहीं है ...। देवभूमि के लोग भी इस पवित्रता को दुनिया को बांटना चाहते हैं कि नहीं ...। लेकिन एक दागी सरकार, एक दागी सरकार इसने इस देवभूमि की तपस्या को कलंकित करके रखा है। दाग का साया उस पर सवार है।

... और इसलिए भाइयों-बहनों।

सवाल राजनीति का नहीं है, सवाल दल का नहीं है, सवाल उम्मीदवार का नहीं है। मुद्दा इस बात का है कि पूरा हिंदुस्तान देवभूमि के लिए गर्व करे, ऐसा देवभूमि बनाना हम सबका दायित्व है। आज पूरे हिंदुस्तान में देवभूमि के भ्रष्टाचार के लिए कोई सबूत की जरूरत है क्या ...? कोई सबूत की जरूरत है क्या ...? कोई कोर्ट कचहरी की जरूरत है क्या ...? सारे हिंदुस्तान ने टीवी पर देखा है कि नहीं देखा है ...? क्या ऐसा भ्रष्टाचार जहां पनपा है, ...और दुख तो इस बात की है कि इस सरकार के मुखिया को इसकी जरा सी भी चिंता नहीं है। उनके बोलचाल से, उनके चाल- चलन से, उनके आचरण से ऐसा लग रहा है कि ऐसी चीजों को वो पचा गए हैं।

भाइयों बहनों।

अगर किसी की गलती हो भी जाए, तो भी उसकी आत्मा उसको कोसती है। ...और पकड़ा जाए तो उसे शर्मिंदगी महसूस होती है। मैंने ऐसा कोई राजनेता नहीं देखा जो देवभूमि पर बैठा हुआ है, जिसको इसकी कोई परवाह नहीं, कोई शर्म नहीं, कोई चिंता नहीं। ये तो चलता रहता है। ये चलने देना है क्या ...? ये चलने देना है क्या ...? ये चलने देना है क्या ...? उनकी चलती होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए ...? ये जानें चाहिए कि नहीं जाने चाहिए ...? निकालोगे ...? पक्का निकालोगे ...?

भाइयों बहनों।

हम परिवार के जो लोग होंगे, उन्होंने देखा होगा। बालक घर में पैदा होता है, उठता है, बैठता है, कहीं गीला कर देता है, कहीं गंदा कर देता है, हर मां बाप मानता है कि भई चलता है, चलो भाई। बच्चा 12-13 साल का होता है, तब तक एक अलग नजरिये से देखा जाता है। लेकिन जैसे ही घर में बेटा या बेटी 16 साल के हो जाते हैं तो मां बाप जागरूक हो जाते हैं। 16 से 21 साल की उम्र, हरेक व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण होती है। 16 से 21 साल बालक कैसा बनेगा? किस दिशा में जाएगा? उसके दोस्त कैसे हैं? वो कहां जाता है? किससे मिलता है? क्या करता है? क्या पढ़ता है? कहां बैठता है? हर मां-बाप बारिकी से नजर रखता है कि नहीं रखता है ...? रखता है कि नहीं रखता है ...? बेटी 16 साल की हो जाए, बेटा 16 साल का हो जाए, मां-बाप, पूरा परिवार उस पांच साल को महत्वपूर्ण मानते हैं कि नहीं मानते हैं ...? उसकी जिंदगी किस दिशा में जाएगी? उसका फैसला 16 साल की उम्र में होता है कि नहीं होता है ...?

भाइयों बहनों।

जैसा एक बालक के जीवन में हैं, वैसा ही उत्तराखंड के लिए भी ये पांच साल, 16 से 21 वाले हैं। अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन ये 16 से 21 साल की उत्तराखंड की उम्र ऐसी है, अगर ठीक से संभाल लिया, ठीक से संवार लिया, तो 21 साल के बाद, ये उत्तराखंड पूरे हिंदुस्तान को संभाल लेगा। ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूं।

बड़ा महत्वपूर्ण समय है भाइयों बहनों।

घर में बच्चे के लिए 16 से 21 साल के पांच साल, जितनी जागरूकता से हम सोचते हैं, उत्तराखंड के लिए भी ये 16 से 21 साल की उम्र बड़ा मह्वपूर्ण हैं। इसलिए ये चुनाव उत्तराखंड 16 से 21 में किस करवट जाएगा? कौन सी ताकत से खड़ा होगा? उसकी कद काठी कैसी बनेगी? ये समय तय करने का है। ...और इसलिए पहले जो हुआ सो हुआ। अब उत्तराखंड को रत्ती भर भी, ये पांच साल गंवाने नहीं चाहिए।

भाइयों बहनों।

अटल बिहारी वाजपेयी, उन्होंने तीन राज्य बनाए। छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड को भी अटल जी के आशीर्वाद रहे।

भाइयों बहनों।

जिस सपने के साथ अटलजी ने उत्तराखंड के भाग्य को बदलने के लिए काम किया। बाद में दिल्ली में ऐसी सरकारें आईं जिसने सारी गाड़ी पटरी पर से उतार दिये। अटल जी के सपने को पूरा करने का मैंने बीड़ा उठाया है भाइयों बहनों। जो वादे अटल जी ने किए हैं, वो वादे भी मैं पूरे करना चाहता हूं। इसलिए मुझे उत्तराखंड का आशीर्वाद चाहिए।

भाइयों बहनों।

आप मुझे ये बताइये कि हर हिंदुस्तानी यहां आना चाहता है कि नहीं चाहता है ...? चाहता है कि नहीं चाहता है ...? लेकिन एक बार आने के बाद, वो यही तय करता है कि इस जन्म का तो हो गया। अब अगले जन्म में देखेंगे। क्यों? न रास्तों का ठिकाना, न रहने का ठिकाना, न बिजली का ठिकाना, न पानी का ठिकाना, बीमार हो गया तो न दवाई का ठिकाना, कुछ नहीं। ऐसे ही चला रखा है।

भाइयों बहनों।

ये केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि जहां हिंदुस्तान चारों धाम की यात्रा करना चाहता है, सुख चैन से यात्रा करके वह घर लौट सके, समय पर लौट सके और इसलिए 12 हजार करोड़ रुपया लगाकरके, चारों धाम को आधुनिक रास्तों से जोड़ने के काम का हमने बीड़ा उठाया है।

भाइयों बहनों।

यहां का पानी, यहां की जवानी, यहां के खेत-खलिहान, यहां की ऊंची-ऊंची पहाड़ियां, यहां के तीर्थ क्षेत्र, यहां की ऋषि परंपरा, पूरे विश्व के आकर्षण का केंद्र, ये हमारी देवभूमि बननी चाहिए। लेकिन किसी ने सोचा नहीं। हम वो सपना लेकरके आए हैं, आपके पास।

...और इसलिए भाइयों बहनों।

उत्तराखंड में ऐसी सरकार आपको बनानी चाहिए। आज देखिए। पिछले पांच साल में, उत्तराखंड का जो हाल हुआ है, कोई मामूली व्यक्ति, इस बुरे हाल में से उत्तराखंड को नहीं निकाल नहीं सकता है। प्रदेश को ऐसे गड्ढे में डाल दिया है, ऐसे गड्ढे में डाल दिया है। उसको बाहर निकालने के लिए डबल इंजन की जरूरत है, डबल इंजन। छोटा इंजन उत्तराखंड की भाजपा की सरकार और बड़ा इंजन दिल्ली में भाजपा की केंद्र सरकार। ये दो इंजन लग जाएंगे, उत्तराखंड का कल्याण हो जाएगा। ये मैं आपको कहने आया हूं।

उत्तराखंड में कोई गांव ऐसा नहीं है, जहां की वीर माताओं ने ऐसे बेटे पैदा न किए हों, जो मां भारती के लिए जीने मरने के लिए हर पल तैयार नहीं रहता हो। मैं उत्तराखंड की उन माताओं को प्रणाम करता हूं, जिन माताओं ने ऐसे वीर बालकों को जन्म दिया, जो आज तक मां भारती की रक्षा करते आए हैं, सदियों से करते हैं। आज भी कहीं सीमा के किसी दुर्गम जगह जाएं, कोई न कोई जवान उत्तराखंड का मिल जाएगा, आपको। वो डटा हुआ है, खड़ा हुआ है।

इसलिए भाइयों बहनों।

ये वीरों की भूमि है, वीर माताओं की भूमि है। ये त्याग, बलिदान की भूमि है और ऐसी भूमि को पूरा हिंदुस्तान नमन करता है भाइयों बहनों। लेकिन मैं तो हैरान हूं। इतने बड़े नेता, पहले केंद्र सरकार में मंत्री थे, तो मंत्री रहते हुए उत्तराखंड का भला करने का टाइम नहीं था। लेकिन उत्तराखंड की सरकार की कुर्सी छीनने के लिए भरपूर टाइम था। वो दिल्ली में रहते थे, लेकिन 24 घंटे यही काम करते रहते थे। आपकी इतनी ताकत थी, अगर आपने एक काम किया होता, एक काम। जिस प्रदेश ने देश को सबसे ज्यादा फौजी दिए हों, जिस प्रदेश ने सबसे ज्यादा रणबांकुरे दिए हों, जिस प्रदेश के लोगों ने देश की हिफाजत के लिए शहादत की हो, कम से कम वन रैंक वन पेंशन, इतना काम तो करवा लेते। दिल्ली सरकार में बैठे थे आप। वन रैंक वन पेंशन के लिए कभी सरकार के सामने, उन्होंने अपन प्रस्ताव तक नहीं रखा। हमने 2014 चुनाव कहा था, यहीं पर जनसभा में मैंने कहा था। हमारी केंद्र में सरकार बनेगी। हम वन रैंक वन पेंशन लागू करेंगे। 30-40 साल से लटका हुआ था मामला। देशभक्ति की बातें करने वाली दिल्ली की कांग्रेस की सरकार हिंदुस्तान की सेना के जवान, निवृत सेना के जवान, सेवारत सेना के जवान, सेना के अफसर, भारत सरकार को लिख-लिखकर थक गए। लेकिन दिल्ली में बैठी हुई कांग्रेस की केंद्र की सरकार, ये मानकर बैठी हुई थी, ये तो डिसीप्लीन फोर्स है, देशभक्ति से भरे हुए लोग हैं, चुनाव आएंगे तो दो भाषण कर देंगे, काम चल जाएगा। 30-40 साल तक यही किया है भाइयों। आपके साथ ठगी की गई। मैंने वादा किया था, आपसे सर झुकाकर के नम्रता के साथ मेरे देश के फौजियों को कहता हूं कि हमने उस काम को पूरा कर दिया है। ये लोग ऐसे थे कि इनको अंदाज भी नहीं था कि वन रैंक वन पेंशन क्या होता है? लागू होता है तो क्या होता है? क्या नियम होते हैं? कितना धन लगता है? कोई हिसाब नहीं था। कोई हिसाब नहीं था। क्योंकि, इन्होंने कभी भी इस मुद्दे के महत्व को समझा ही नहीं। ...और नासमझी का सबूत है। नासमझी का सबूत है कि जब मैंने 2014 के चुनाव में, सितंबर महीने में, रेवाड़ी में, हरियाणा में पूर्व सैनिकों के सम्मेलन में घोषणा की थी। सितंबर 2013 में, जब मैंने घोषणा जब की हमारी सरकार जब आएगी तो वन रैंक वन पेंशन लागू करेगी। ...तो सोई हुई कांग्रेस जागी। उनको लगा अगर ये फौजी सारे मोदी के साथ चले गए तो कांग्रेस का कुछ बचेगा नहीं। ...तो फौजियों की आंख में धूल झोंकने के लिए, कोई स्टडी किए बिना, इश्यू क्या है, समझे बिना, इस समस्या के समाधान के लिए कितना धन चाहिए, इसका विचार किए बिना, उन्होंने एक टुकड़ा फेंक दिया। उन्होंने बजट में कह दिया कि ओआरओपी के लिए 500 करोड़ रुपया दे देंगे। इसके बाद उनके नेता फौजियों का सम्मेलन करने लग गए। 5-15 लोग को बुलाते थे, फोटो निकालते थे और बताते थे ओआरओपी के लिए 500 करोड़ लगा दिया। 500 करोड़ लगा दिया। जब मैं आया तो मैंने एक कमिटी बिठाई। मैंने कहा कि मुझे ये वादा पूरा करना है भाई, लाओ डिटेल। मैं हैरान था। कोई होमवर्क नहीं था। ...और जब हिसाब लगाया तो 500 करोड़ से बात बनने वाली नहीं थी। जब हमने हिसाब लगाया तो मामला पहुंचा 12,000 करोड़ रुपया, 12 हजार। फौजियों के घरों में 12 हजार करोड़ रुपया देना था। कहां 500 करोड़ के झूठे वादे और कहां 12 हजार करोड़ की जिम्मेदारी। मैंने फौज के लोगों को बुलाया। उनसे कहा देखो भाई मेरे दिल में आपके लिए एक विशेष स्थान है। मुझे आपके लिए कुछ करना है। लेकिन आपने मेरी मदद करनी पड़ेगी। फौजी लोग थे। वे अपनी परवाह ज्यादा करते नहीं हैं, वे देश की परवाह ज्यादा करते हैं। औरों की परवाह करते हैं। मेरा वाक्य पूरा होने से पहले, फौज के लोगों ने मुझे कह दिया, मोदी जी। आप ऐसा कहके हमें शर्मिंदा मत कीजिए। आप कहिए जान की बाजी लगाने के लिए तैयार हैं। मैंने कहा, जान की बाजी लगाने के लिए नहीं बुलाया है। इसके लिए किसी के आदेश जरूरत नहीं है। वो तो जिस दिन आपने मां का दूध पिया है, उसी दिन देश के लिए जीने का संकल्प लेकर आप चल पड़े हैं। इस कार्य में मोदी कुछ नहीं, जरूरत नहीं है मोदी की। आप तो वीर हैं। मैंने कहा, मदद कुछ और चाहिए। मैंने कहा, कांग्रेस के लोगों ने तो आपको धोखा दिया है। आपको मूर्ख बनाया। 500 करोड़ की बातें करते थे, कोई कहता था 1000 करोड़ होगा, 12 सौ करोड़ होगा, लेकिन हिसाब लगाया तो 12 हजार करोड़ हो रहा है। अब सरकार में, मैं नया-नया आया हूं। अभी तो पुराने गड्ढे भरने में लगा हूं। अचानक 12 हजार करोड़ निकालूंगा तो मेरे देश के गरीबों के लिए मुझे जो करना है, वो नहीं कर पाउंगा। इसे करने में थोड़ा विलंब हो जाएगा। तो उन्होंने कहा, बताइये मोदी जी क्या करें। मैंने कहा, मुझे एक मदद कीजिए। ये बारह हजार करोड़ एकमुश्त देने के बजाय मैं उसको तीन हिस्से में दूंगा। एक हिस्सा अभी दूंगा, एक छह-आठ महीने बाद दूंगा और तीसरा हिस्सा एक साल के बाद दूंगा।

भाइयों बहनों।

मैं सेना के जवानों के सामने सर झुकाता हूं। एक मिनट नहीं लगाया, एक मिनट नहीं लगाया। मेरी बात मान ली। ...और आज 12 हजार करोड़ में छह हजार करोड़ उनके घर पहुंचा दिया और छह हजार करोड़ आने वाले दिनों में पहुंचा दिया जाएगा। ये काम होता है। वादा करते हैं तो ऐसे करते हैं।

भाइयों बहनों।

आप मुझे बताइए। अगर जंगल कट जाएंगे तो ये मेरा देवभूमि बचेगी क्या ...? आप मुझे बताइए। ये देवभूमि बचेगी क्या ...? बचेगी क्या ...? यहां का हर पेड़ एक-एक ऋषि है कि नहीं है ...? लेकिन आप जानते हैं कि यहां की सरकारों में बैठे हुए लोगों की जंगल काटने वालों के बीच मिलीभगत कैसी है?

भाइयों बहनों।

11 मार्च को चुनाव का नतीजा आएगा। उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनेगी। ये लूट चलाने वाले, ये जंगलों को बेचने वाले, मैं आपको विश्वास देता हूं, भाजपा की उत्तराखंड की नई सरकार एक-एक का हिसाब पूरा करेगी। कानून, कानून का काम करके रहेगा। कोई भी कितना बड़ा क्यों न होगा, उसको कानून के दायरे को स्वीकार करना पड़ेगा। ये हमारी सरकार करके रहेगी।

भाइयों बहनों।

इनको न देश की सुरक्षा की परवाह है, न इनको देश की सेना के त्याग-तपस्या की चिंता है। हमारे देश की सेना पराक्रमी है, पुरुषार्थी है, जब सर्जिकल स्ट्राइक हुआ। सीमा पार करके, उनके घर में जाकर के, अंधेरी रात में, मेरे देश के फौजियों ने उनको दिन में तारे दिखा दिए। पूरे विश्व में जो मिलिट्री ऑपरेशन की स्टडी कर रहे हैं, विश्व के सभी देशों के लिए एक अजूबा था और हिंदुस्तान के फौजियों के किए हुए सर्जिकल स्ट्राइक दुनिया भर के लिए एक महान पराक्रमी घटना के रूप में अंकित हो गई। लेकिन इनको पीड़ा इस बात की रही। ये हुआ कैसे? पता क्यों नहीं चला? हम तो चिल्ला रहे थे कि मोदी कुछ करता नहीं है।

भाइयों बहनों।

मुझे बताइए। सर्जिकल स्ट्राइक करने से पहले मुझे मीटिंग बुलानी चाहिए क्या ...? ऑल पार्टी कॉन्फ्रेंस करनी चाहिए थी क्या ...? इनको मुझे पूछना चाहिए कि बांयी ओर जाऊं या दायीं ओर जाऊं।

भाइयों बहनों।

ऐसे निर्णय, ऐसे नहीं होते हैं। फौज पर भरोसा रखना होता है। उनको इतना ही कहना होता है - आप हैं, हिंदुस्तान है, दुश्मनों का मैदान है, जज्बा है, खेल आपके हाथ में है। ...और वो करके दिखाते हैं। कहना नहीं पड़ता है जी। सिर्फ रोक हटानी पड़ती है। मुझे खुशी है कि 100 में से 100 मार्क्स के साथ, हमारी फौज ने कमाल कर के दिखाया। दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये। आतंकवादियों के कैंप नष्ट-पस्त कर दिए। दूसरे दिन इंडियन एक्स्प्रेस नाम के अखबार ने छापा था कि सुबह-सुबह पाकिस्तान की ट्रकें आई और ट्रकों में भर-भर करके डेथ बॉडी ले गए। मैं हैरान हूं। मेरे देश की सेना ने इतना बड़ा पराक्रम किया, लेकिन 24 घंटे राजनीति करने वाले लोग, राष्ट्रनीति को समझ नहीं पाते हैं। सुबह जैसे ही, उनको पता चला, फौज के बड़े अफसर ने घोषणा की कि हमने ऐसा-ऐसा किया तो इनके पेट में चूहे दौड़ने लगे। परेशान हो गए सर्जिकल स्ट्राइक। उनका पहला सवाल क्या था? हिंदुस्तान के कितने जवान मरे। आपको शर्म आनी चाहिए। ये हमारे जिंदादिल जवान हैं। मारकर के आना कोई गुनाह नहीं होता, गर्व होता है। फिर कहने लगे पाकिस्तान, अब पाकिस्तान ये कहेगा कि कोई आया था, मुझे मारकर गया। कोई मुझे बता दे। ऐसा कहेगा क्या? वो तो यही कहेगा न। यहां के लोग कहने लगे कि पाकिस्तान तो मना कर रहा है। आप कैसे कह रहे हैं? बताओ भाई। क्या पाकिस्तान के स्पोक्समैन यहां बैठे हैं क्या? देश के जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक किया और आपने उस पर सवालिया निशान लगाया। आपने देश के फौजियों का अपमान किया है। देश के सेना का अपमान किया है। आपने उन वीर माताओं का अपमान किया है, जिन्होंने ऐसे वीर जवानों को जन्म दिया है। उन वीर माताओं का अपमान किया है।

भाइयों बहनों।

इन लोगों को ..., आप मुझे बताइए। जब उत्तराखंड में बाढ़ आई। गुजरात से जो कर सकता था, मैंने किया। मैं गुजरात का सीएम था, दौड़कर आया था। ...और मुझे खुशी है कि उत्तराखंड के दूर से आए परिवार वाले भी कहते थे कि हमें ये सामान नहीं चाहिए। गुजरात से आया है ना, वो चाहिए। ये लोग कहते थे। जब ईमानदारी हो, सेवा का भाव हो तो कैसा परिणाम आता है, क्योंकि मुझे सेवा करने का सौभाग्य मिला था। अभी चार दिन पहले भूकंप आया।

भाइयो बहनों।

रात एक बजे तक पीएमओ के मेरे अफसर हर किसी से बात कर रहे हैं, हर इलाके में बात करते रहे। रातों रात इस प्रकार के राहत के काम करने वाली टुकड़ियों को हमने रवाना कर दिया।

भाइयों बहनों।



कभी भी हमारे देश में संकट होता है तो इतनी तेजी से कोई दौड़ता नहीं है। और उत्तराखंड में जब केदारनाथ की घटना हुई थी तो तब कांग्रेस के नेता विदेशों में मौज कर रहे थे। ये प्रदेश भूल नहीं सकता है और सवाल हमें पूछ रहे हो। अभी भी, मैं कांग्रेस के लोगों को कहता हूं। जबान संभाल के रखो वर्ना मेरे पास आपकी पूरी जन्मपत्री पड़ी हुई है। मैं विवेक और मर्यादाओं को छोड़ना नहीं चाहता हूं। लेकिन अगर आप विवेक मर्यादाएं छोड़कर के अनाप-शनाप बातें करोगे तो आपको। आपको अपना इतिहास कभी छोड़ेगा नहीं। आपके कुकर्म आपको छोड़ेंगे नहीं। आपके पाप आपको छोड़ेंगे नहीं।

भाइयों बहनों।

उत्तराखंड का विकास, यहां की पानी, यहां की बिजली, हिंदुस्तान की प्यास भी बुझा सकती है, हिंदुस्तान का अंधेरा भी मिटा सकती है। ये ताकत मेरे उत्तराखंड में है। जो राज्य हिंदुस्तान का अंधेरा मिटा सकता है, उस राज्य को अंधेरे में आपने डूबो कर रखा हुआ है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?

...इसलिए मेरे भाइयों बहनों।

हम विकास के लिए वोट चाहते हैं। विनाश का रास्ता बंद होना चाहिए। विकास के मार्ग पर चलना होगा जी। आप स्थिर और मजबूत सरकार दीजिये। भारतीय जनता पार्टी की सरकार दीजिये। मैं केंद्र में बैठा हूं। ये 16 से 21 साल की आपकी उम्र, ये देवभूमि की 16 से 21 साल, ये सरकार का ऐसा तबका है, नया बना हुआ उत्तराखंड है। 16 से 21 साल की उमर है, उत्तराखंड के लिए नजाकत भरा समय है। उसके सही परवरिश का समय है। उस परवरिश का दायित्व लेने के लिए आया हूं। ऐसी टीम बिठाउंगा जो उत्तराखंड को उसके सपनों के अनुरूप बनाकर रहेगा और मेरी पूरी निगरानी रहेगी। ये मैं आपको वादा करने आया हूं।

भाइयों बहनों।

आज दुनिया में टूरिज्म, सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाला उद्योग है। दुनिया भर से टूरिस्ट हमें मिलें। कुछ लोगों ने ऐसा झूठ चलाया, ऐसा झूठ चलाया, आठ नवंबर को रात आठ बजे, जब मोदी कह रहा था मेरे प्यारे देशवासियो। अभी भी कुछ लोग हैं, जो सो नहीं पाए हैं। बहुत परेशान हैं। क्योंकि उनका सारा काला कारोबार, अब कागज की लकीरों में फिट हो चुका है। बैंकों में अंकित हो चुका है। कहां से आया? कौन लाया? कैसे आया? ये सब कैमरे के सामने आ चुका है। इसलिये ऐसे लोगों को नींद नहीं आती है।

भाइयों बहनों।

इस देश को 70 साल तक लूटा गया है। क्या इस बात से कोई इनकार कर सकता है क्या? लूटा गया है कि नहीं लूटा गया है ...? जिसको जहां पद मिला, उसने पाने की कोशिश की है कि नहीं की है ...। जुल्म करने की कोशिश की है कि नहीं की है ...। किसी दारोगा ने भी मौका मिला है तो छोड़ा है क्या ...?

स्कूल वाले ने भी एडमिशन लेने में किसी को छोड़ा है क्या ...?

भाइयों बहनों।

काले कारोबार की आदत लग गई थी। जरूरतमंद लोगों को लूटने की आदत हो गई थी। मेरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है। मेरी कालेधन के खिलाफ लड़ाई है।

...और भाइयों बहनों।

जिन्होंने गरीबों का लूटा है वो मुझे गरीबों को लौटाना है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि छोटे-छोटे व्यापारी चोरी करते हैं।

भाइयों बहनों।

हो सकता है कोई छोटा व्यापारी पांच पैसे मुनाफा के बजाय सात पैसे मुनाफा ले लिया होगा। हो सकता है किसी व्यापारी ने सरकार में तीन रुपया देना चाहिए ढाई रुपया दिया होगा। लेकिन उसने अपने पद का उपयोग करते हुए जरूरतमंद का गला घोंटने का काम नहीं किया। लेकिन जो सत्ता में बैठे हैं, कुर्सी पर बैठे हैं, सेवा के लिए आए हैं। उन्होंने गरीब से गरीब को लूटने से बाकी नहीं रखा है। बाबुओं ने, अफसरों ने, सरकारी कुर्सी मिल गई। बस मौका मिला है मारो, ले लो। मेरी लड़ाई उनके खिलाफ है। जिन्होंने पद पर बैठकर के लूटा है, उनके खिलाफ मेरी लड़ाई है। छोटे-छोटे व्यापारियों से मेरी लड़ाई नहीं है। छोटे व्यापारी कानून का पालन करना जानते हैं और कानून का पालन करते भी हैं। ...और गलती हो जाती है तो ठीक करने को भी तैयार होते हैं। लेकिन ये जो पैसे दबोच कर बैठे हैं, उनके पैसे भ्रष्टाचार के पैसे जो काले धन में परिणत हुए हैं। ये भ्रष्टाचार कालेधन की जुगलबंदी को मुझे खत्म करना है। अभी भी परेशान हैं। मोदी ने नोटबंदी की, ...नोटबंदी की। अरे नोटबंदी की है इसलिए कि सत्तर साल से जिन्होंने लूटा है, वो नोट मुझे निकालनी है। और वो मैं निकालकर रहूंगा। मुझे गरीबों के लिए घर बनाने हैं। मुझे किसान के खेत तक पानी पहुंचानी है। मुझे नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने हैं। मुझे माताओं बहनों की शिक्षा की चिंता करनी है।

...और इसलिए भाइयों बहनों।

कड़वे से कड़वे निर्णय मैं करता हूं। अपने लिये नहीं करता हूं, सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिये करता हूं। ...और इसलिए मैं उत्तराखंड की जनता से आज आशीर्वाद मांगने आया हूं। देवभूमि से मैं आशीर्वाद मांगने आया हूं कि भ्रष्टाचार और कालेधन की लड़ाई, उसको खत्म करने का मेरा जो सपना है, सवा सौ करोड़ मेरे देशवासी, जो हर पल मेरे साथ रहे हैं। आगे भी मेरे साथ रहेंगे, ये विश्वास लेकर चला हूं।

भाइयों बहनों।

आप हमें बताइये। हमारे यहां धर्मेंद्र जी प्रधान बैठे हैं। वे हमारे पेट्रोलियम क्षेत्र के मंत्री हैं। आपको याद है। आपको पहले घर में गैस का चूल्हा, गैस का कनेक्शन चाहिए। आपको लगता था कि मिलेगा ...? किसी की पहचान लगती थी कि नहीं लगती थी ...। कालाबाजारी करनी पड़ती थी कि नहीं पड़ती थी ...। बड़े-बड़े लोगों का कुर्ता पकड़कर दौड़ना पड़ता था कि नहीं दौड़ना पड़ता था ...।

भाइयों बहनों।

ऐसा क्या हुआ भाई। 2014 में हमारी सरकार बनी, उससे पहले गैस पाने के लिए तड़पते थे। और हमारी सरकार बनने के बाद, घर-घर जाकरके गरीबों को ढूंढ-ढूंढ करके गैस देना कैसे शुरू हुआ। इतने कम समय में पौने दो करोड़ से ज्यादा लोगों के, गरीबों के घर में गैस का कनेक्शन, गैस का चूल्हा पहुंच गया। अब लकड़ी काटने के लिए जाना नहीं पड़ रहा है। अब जंगल कटते नहीं है। चार सौ सिगरेट का धुआं जो मां के शरीर में जाता था, खाना पकाते समय जाता नहीं  है। मां भी तंदुरुस्त हो रही है। बच्चे भी तंदुरूस्त हो रहे हैं। तेजी से खाना पक रहा है। गरीब का पेट भर रहा है। ऐसे काम होता है। प्रधानमंत्री जनधन अकाउंट, हमने गरीब से गरीब का खाता खोल दिया। अब इनको समझ में आ रहा है कि मोदी दो साल पहले खाते क्यों खुलवा रहा था। अरे मोदी दो साल पहले खाते इसलिए खुलवा रहा था कि बड़े-बड़ों के खातों का हिसाब लेना था और गरीबों के खातों को भरना था।

इसलिए भाइयों बहनों।

अब ढाई साल हो गए तो समझ रहे हैं। कि ये मोदी तो गरीबों के लिए जीता है। ये मोदी गरीबों के लिए जूझता है। ये मोदी गरीबों को ताकतवर बनाने के लिए मैदान में आया है।

भाइयों बहनों।

ये कोई मैं उपकार नहीं कर रहा हूं। मैंने गरीबी देखी है। मैं गरीबी में पैदा हुआ हूं। मैंने गरीबी को जीया है। मैं जानता हूं कि गरीबी क्या होती है। गरीबी के कारण जिंदगी कितनी मुश्किल होती है, वो मैं जीकरके आया हूं। इसलिए ये जिंदगी भी, ये सरकार भी, गरीबों के लिए आहूत करने निकला हूं । मुझे गरीबों का कल्याण करना है।

भाइयों बहनों।

उत्तराखंड में एक मजबूत सरकार बनाइये। उत्तराखंड का भाग्य बदलना है। और उसके लिए मुझे एक साफ सरकार चाहिए। विकास की नई उंचाइयां गढ़नी है। नौजवानों को रोजगार के लिए उत्तराखंड छोड़ना न पड़े, ऐसा उत्तराखंड उद्योगों से भरा-भरा उत्तराखंड मुझे बनाना है। ये काम मुझे करना है। ...और मुझे विश्वास है कि जब देवभूमि से आशीर्वाद मिल गए हैं और इतनी बड़ी तादाद में आप आशीर्वाद देने आए हैं तो मेरा विश्वास है कि उत्तराखंड का भाग्य 11 मार्च के बाद उत्तराखंड की जनता लिख देगी, ये मेरा विश्वास है। और हम आपके साथ होंगे। आपके सपनों को पूरा करूंगा। मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। दोनों मुट्ठी बंद करके पूरी ताकत से बोलिये। भारत माता की जय। भारत माता की जय। भारत माता की जय। बहुत बहुत धन्यवाद।

‘মন কী বাত’ৰ বাবে আপোনাৰ ধাৰণা আৰু পৰামৰ্শ এতিয়াই শ্বেয়াৰ কৰক!
'পৰীক্ষা পে চৰ্চা, ২০২২' ত অংশগ্ৰহণৰ আমন্ত্ৰণ প্ৰধানমন্ত্ৰীৰ
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Kashi Vishwanath Dham is a symbol of the Sanatan culture of India: PM Modi

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Text of PM’s unveils the hologram statue of Netaji at India Gate
January 23, 2022
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Also confers Subhas Chandra Bose Aapda Prabandhan Puraskars
Gujarat was the first state to enact disaster related law in 2003
“In disaster management, emphasis is on Reform along with stress on Relief, Rescue and Rehabilitation”
“Disaster management is no longer just a government job but it has become a model of 'Sabka Prayas'”
“We have a goal to fulfil the dreams of independent India. We have the goal of building a new India before the hundredth year of independence”
“It is unfortunate that after Independence, along with the culture and traditions of the country, the contribution of many great personalities was also tried to be erased”
“The freedom struggle involved ‘tapasya’ of lakhs of countrymen, but attempts were made to confine their history as well. But today the country is boldly correcting those mistakes”
“We have to move ahead taking inspiration from Netaji Subhash's 'Can Do, Will Do' spirit”

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में उपस्थित मंत्रीपरिषद के मेरे साथी श्री अमित शाह, श्री हरदीप पूरी जी, मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य, INA के सभी ट्रस्टी, NDMA के सभी सदस्यगण, jury मेम्बर्स, NDRF, कोस्ट गॉर्ड्स और IMD के डाइरेक्टर जनरल्स, आपदा प्रबंधन पुरस्कारों के सभी विजेता साथी, अन्य सभी महानुभाव, भाइयों एवं बहनों!

भारत मां के वीर सपूत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जन्मजयंती पर पूरे देश की तरफ से मैं आज कोटि-कोटि नमन करता हूं। ये दिन ऐतिहासिक है, ये कालखंड भी ऐतिहासिक है और ये स्थान, जहां हम सभी एकत्रित हैं, वो भी ऐतिहासिक है। भारत के लोकतंत्र की प्रतीक हमारी संसद पास में है, हमारी क्रियाशीलता और लोकनिष्ठा के प्रतीक अनेक भवन भी हमारे साथ पास में नजर आ रहे हैं, हमारे वीर शहीदों को समर्पित नेशनल वॉर मेमोरियल भी पास है। इन सबके आलोक में आज हम इंडिया गेट पर अमृत महोत्सव मना रहे हैं और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि दे रहे हैं। नेताजी सुभाष, जिन्होंने हमें स्वाधीन और संप्रभु भारत का विश्वास दिलाया था, जिन्होंने बड़े गर्व के साथ, बड़े आत्मविश्वास के साथ, बड़े साहस के साथ अंग्रेजी सत्ता के सामने कहा था- “मैं स्वतंत्रता की भीख नहीं लूंगा, मैं इसे हासिल करूंगा"। जिन्होंने भारत की धरती पर पहली आज़ाद सरकार को स्थापित किया था, हमारे उन नेताजी की भव्य प्रतिमा आज डिजिटल स्वरूप में इंडिया गेट के समीप स्थापित हो रही है। जल्द ही इस होलोग्राम प्रतिमा के स्थान पर ग्रेनाइट की विशाल प्रतिमा भी लगेगी। ये प्रतिमा आज़ादी के महानायक को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि है। नेताजी सुभाष की ये प्रतिमा हमारी लोकतान्त्रिक संस्थाओं को, हमारी पीढ़ियों को राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराएगी, आने वाली पीढ़ियों को, वर्तमान पीढ़ी को निरंतर प्रेरणा देती रहेगी।

साथियों,

पिछले साल से देश ने नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाना शुरू किया है। आज पराक्रम दिवस के अवसर पर सुभाषचंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार भी दिए गए हैं। नेताजी के जीवन से प्रेरणा लेकर ही इन पुरस्कारों को देने की घोषणा की गई थी। साल 2019 से 2022 तक, उस समय के सभी विजेताओं, सभी व्यक्तियों, सभी संस्थाओं को जिने आज सम्मान का अवसर मिला है। उन सबको भी मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

हमारे देश में आपदा प्रबंधन को लेकर जिस तरह का रवैया रहा था, उस पर एक कहावत बहुत सटीक बैठती है- जब प्यास लगी तो कुआं खोदना। और जिस मैं काशी क्षेत्र से आता हूं वहां तो एक और भी कहावत है। वो कहते हैं - भोज घड़ी कोहड़ा रोपे। यानि जब भोज का समय आ गया तो कोहड़े की सब्जी उगाने लगना। यानि जब आपदा सिर पर आ जाती थी तो उससे बचने के उपाय खोजे जाते थे। इतना ही नहीं, एक और हैरान करने वाली व्यवस्था थी जिसके बारे में कम ही लोगों को पता है। हमारे देश में वर्षों तक आपदा का विषय एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के पास रहा था। इसका मूल कारण ये था कि बाढ़, अतिवृष्टि, ओले गिरना, ऐसी जो स्थितियों पैदा होती थी। उससे निपटने का जिम्मा, उसका संबंध कृषि मंत्रालय से आता था। देश में आपदा प्रबंधन ऐसे ही चलता रहता था। लेकिन 2001 में गुजरात में भूकंप आने के बाद जो कुछ हुआ, देश को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया। अब उसने आपदा प्रबंधन के मायने बदल दिए। हमने तमाम विभागों और मंत्रालयों को राहत और बचाव के काम में झोंक दिया। उस समय के जो अनुभव थे, उनसे सीखते हुए ही 2003 में Gujarat State Disaster Management Act बनाया गया। आपदा से निपटने के लिए गुजरात इस तरह का कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बना। बाद में केंद्र सरकार ने, गुजरात के कानून से सबक लेते हुए, 2005 में पूरे देश के लिए ऐसा ही Disaster Management Act बनाया। इस कानून के बाद ही National Disaster Management Authority उसके गठन का रास्ता साफ हुआ। इसी कानून ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में भी देश की बहुत मदद की।

साथियों,

डिजास्टर मैनैजमेंट को प्रभावी बनाने के लिए 2014 के बाद से हमारी सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर चौतरफा काम किया है। हमने Relief, Rescue, Rehabilitation उस पर जोर देने के साथ-साथ ही Reform पर भी बल दिया है। हमने NDRF को मजबूत किया, उसका आधुनिकीकरण किया, देश भर में उसका विस्तार किया। स्पेस टेक्नालजी से लेकर प्लानिंग और मैनेजमेंट तक, best possible practices को अपनाया। हमारे NDRF के साथी, सभी राज्यों के SDRFs, और सुरक्षा बलों के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर, एक-एक जीवन को बचाते हैं। इसलिए, आज ये पल इस प्रकार से जान की बाजी लगाने वाले, औरों की जिंदगी बचाने के लिए खुद की जिंदगी का दांव लगाने वाले चाहे वो NDRF के लोग हों, चाहे SDRF के लोग हों, हमारे सुरक्षाबलों के साथी हों, ये सब के सब उनके प्रति आज आभार व्यक्त करने का, उनको salute करने का ये वक्त है।

साथियों,

अगर हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते चलें, तो आपदा से निपटने की क्षमता दिनों-दिन बढ़ती चली जाती है। मैं इसी कोरोना काल के एक-दो वर्षों की बात करूं तो इस महामारी के बीच भी देश के सामने नई आपदाएँ आकर खड़ी हो गईं। एक तरफ कोरोना से तो लड़ाई लड़ ही रहे थे। अनेक जगहों पर भूकंप आए, कितने ही क्षेत्रों में बाढ़ आई। ओड़िशा, पश्चिम बंगाल समेत पूर्वी तटों पर cyclones आए, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी तटों पर cyclones आए, पहले, एक-एक साइक्लोन में सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। देश ने हर चुनौती का जवाब एक नई ताकत से दिया। इसी वजह से इन आपदाओं में हम ज्यादा से ज्यादा जीवन बचाने में सफल रहे। आज बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां, भारत के इस सामर्थ्य, भारत में आए इस बदलाव की सराहना कर रही हैं। आज देश में एक ऐसा end-to-end cyclone response system है जिसमें केंद्र, राज्य, स्थानीय प्रशासन और सभी एजेंसियां एक साथ मिलकर के काम करती हैं। बाढ़, सूखा, cyclone, इन सभी आपदाओं के लिए वार्निंग सिस्टम में सुधार किया गया है। Disaster risk analysis के लिए एडवांस्ड टूल्स बनाए गए हैं, राज्यों की मदद से अलग अलग क्षेत्रों के लिए Disaster risk maps बनाए गए हैं। इसका लाभ सभी राज्यों को, सभी स्टेक होल्डर्स को मिल रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, डिजास्टर मैनेजमेंट - आपदा प्रबंधन, आज देश में जनभागीदारी और जन-विश्वास का विषय बन गया है। मुझे बताया गया है कि NDMA की ‘आपदा मित्र’ जैसी स्कीम्स से युवा आगे आ रहे हैं। आपदा मित्र के रूप में जिम्मेवारियां उठा रहे हैं। यानी जन भागीदारी बढ़ रही है। कहीं कोई आपदा आती है तो लोग विक्टिम्स नहीं रहते, वो वॉलंटियर्स बनकर आपदा का मुकाबला करते हैं। यानी, आपदा प्रबंधन अब एक सरकारी काम भर नहीं है, बल्कि ये ‘सबका प्रयास’ का एक मॉडल बन गया है।

और साथियों,

जब मैं सबका प्रयास की बात करता हूँ, तो इसमें हर क्षेत्र में हो रहा प्रयास, एक holistic approach भी शामिल है। आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देते हुए, हमने अपने एजुकेशन सिस्टम में भी कई सारे बदलाव किए हैं। जो सिविल इंजीनियरिंग के कोर्सेस होते हैं, आर्किटेक्चर से जुड़े कोर्सेस होते हैं, उसके पाठ्यक्रम में डिजास्टर मैनेजमेंट से जोड़ा, इन्फ्रासट्रक्चर की रचना कैसी हो उसपर विषयों को जोड़ना, ये सारे काम प्रयासरत हैं। सरकार ने Dam Failure की स्थिति से निपटने के लिए, डैम सेफ्टी कानून भी बनाया है।

साथियों,

दुनिया में जब भी कोई आपदा आती है तो उसमें लोगों की दुखद मृत्यु की चर्चा होती है, कि इतने लोगों की मृत्यु हो गई, इतना ये हो गया, इतने लोगों को हटाया गया, आर्थिक नुकसान भी बहुत होता है। उसकी भी चर्चा की जाती है। लेकिन आपदा में जो इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान होता है, वो कल्पना से परे होता है। इसलिए ये बहुत आवश्यक है कि आज के समय में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण ऐसा हो जो आपदा में भी टिक सके, उसका सामना कर सके। भारत आज इस दिशा में भी तेजी से काम कर रहा है। जिन क्षेत्रों में भूकंप, बाढ़ या साइक्लोन का खतरा ज्यादा रहता है, वहां पर पीएम आवास योजना के तहत बन रहे घरों में भी इसका ध्यान रखा जाता है। उत्तराखंड में जो चार धाम महा-परियोजना का काम चल रहा है, उसमें भी आपदा प्रबंधन का ध्यान रखा गया है। उत्तर प्रदेश में जो नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, उनमें भी आपदा प्रबंधन से जुड़ी बारीकियों को प्राथमिकता दी गई है। आपात स्थिति में ये एक्सप्रेसवे, विमान उतारने के काम आ सकें, इसका भी प्रावधान किया गया है। यही नए भारत का विज़न है, नए भारत के सोचने का तरीका है।

साथियों,

Disaster Resilient Infrastructure की इसी सोच के साथ भारत ने दुनिया को भी एक बहुत बड़ी संस्था का विचार दिया है, उपहार दिया है। ये संस्था है- CDRI - Coalition for Disaster Resilient Infrastructure. भारत की इस पहल में ब्रिटेन हमारा प्रमुख साथी बना है और आज दुनिया के 35 देश इससे जुड़ चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच में, सेनाओं के बीच में हमने Joint Military Exercise बहुत देखी है। पुरानी परंपरा है उसकी चर्चा भी होती है। लेकिन भारत ने पहली बार डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए Joint ड्रिल की परंपरा शुरू की है। कई देशों में मुश्किल समय में हमारी डिजास्टर मैनेजमेंट से जुड़ी एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ दी हैं, मानवता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है। जब नेपाल में भूकंप आया, इतनी बड़ी तबाही मची, तो भारत एक मित्र देश के रूप में उस दुख को बाटने के लिए जरा भी देरी नहीं की थी। हमारे NDRF के जवान वहां तुरंत पहुंच गए थे। डिजास्टर मैनेजमेंट का भारत का अनुभव सिर्फ हमारे लिए नहीं बल्कि पुरी मानवता के लिए आप सभी को याद होगा 2017 में भारत ने साउथ एशिया जियो-स्टेशनरी communication satellite को लान्च किया। weather और communication के क्षेत्र में उसका लाभ हमारे दक्षिण एशिया के मित्र देश को मिल रहा है।

साथियों,

परिस्थितियां कैसी भी हों, अगर हममे हौंसला है तो हम आपदा को भी अवसर में बदल सकते हैं। यही संदेश नेताजी ने हमे आजादी की लड़ाई के दौरान दिया था। नेताजी कहते थे कभी भी स्वतंत्र भारत के सपने का विश्वास मत खोना। दुनिया की कोई ताकत नहीं है जो भारत को झकझोर सके"। आज हमारे सामने आज़ाद भारत के सपनों को पूरा करने का लक्ष्य है। हमारे सामने आज़ादी के सौंवे साल से पहले, 2047 के पहले नए भारत के निर्माण का लक्ष्य है। और नेताजी को देश पर जो विश्वास था, जो भाव नेताजी के दिल में उभरते थे। और उनके ही इन भावों के कारण मैं कह सकता हूँ कि, दुनिया की कोई ताकत नहीं है जो भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने से रोक सके। हमारी सफलताएँ हमारी संकल्पशक्ति का सबूत हैं। लेकिन, ये यात्रा अभी लंबी है। हमें अभी कई शिखर और पार करने हैं। इसके लिए जरूरी है, हमें देश के इतिहास का, हजारों सालों की यात्रा में इसे आकार देने वाले तप, त्याग और बलिदानों का बोध रहे।

भाइयों और बहनों,

आज़ादी के अमृत महोत्सव का संकल्प है कि भारत अपनी पहचान और प्रेरणाओं को पुनर्जीवित करेगा। ये दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद देश की संस्कृति और संस्कारों के साथ ही अनेक महान व्यक्तित्वों के योगदान को मिटाने का काम किया गया। स्वाधीनता संग्राम में लाखों-लाख देशवासियों की तपस्या शामिल थी लेकिन उनके इतिहास को भी सीमित करने की कोशिशें हुईं। लेकिन आज आजादी के दशकों बाद देश उन गलतियों को डंके की चोट पर सुधार रहा है, ठीक कर रहा है। आप देखिए, बाबा साहब आंबेडकर से जुड़े पंचतीर्थों को देश उनकी गरिमा के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेचू ऑफ यूनिटी आज पूरी दुनिया में सरदार वल्लभ भाई पटेल के यशगान की तीर्थ बन गई है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत भी हम सबने कर दी है। आदिवासी समाज के योगदान और इतिहास को सामने लाने के लिए अलग-अलग राज्यों में आदिवासी म्यूज़ियम्स बनाए जा रहे हैं। और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन से जुड़ी हर विरासत को भी देश पूरे गौरव से संजो रहा है। नेताजी द्वारा अंडमान में तिरंगा लहराने की 75वीं वर्षगांठ पर अंडमान के एक द्वीप का नाम उनके नाम पर रखा गया है। अभी दिसम्बर में ही, अंडमान में एक विशेष ‘संकल्प स्मारक’ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए समर्पित की गई है। ये स्मारक नेताजी के साथ साथ इंडियन नेशनल आर्मी के उन जवानों के लिए भी एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। ये मेरा सौभाग्य है कि पिछले वर्ष, आज के ही दिन मुझे कोलकाता में नेताजी के पैतृक आवास भी जाने का अवसर मिला था। जिस प्रकार से वो कोलकाता से निकले थे, जिस कमरे में बैठकर वो पढ़ते थे, उनके घर की सीढ़ियां, उनके घर की दीवारें, उनके दर्शन करना, वो अनुभव, शब्दों से परे है।

साथियों,

मैं 21 अक्टूबर 2018 का वो दिन भी नहीं भूल सकता जब आजाद हिंद सरकार के 75 वर्ष हुए थे। लाल किले में हुए विशेष समारोह में मैंने आजाद हिंद फौज की कैप पहनकर तिरंगा फहराया था। वो पल अद्भुत है, वो पल अविस्मरणीय है। मुझे खुशी है कि लाल किले में ही आजाद हिंद फौज से जुड़े एक स्मारक पर भी काम किया जा रहा है। 2019 में, 26 जनवरी की परेड में आजाद हिंद फौज के पूर्व सैनिकों को देखकर मन जितना प्रफुल्लित हुआ, वो भी मेरी अनमोल स्मृति है। और इसे भी मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि हमारी सरकार को नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने का अवसर मिला।

साथियों,

नेताजी सुभाष कुछ ठान लेते थे तो फिर उन्हें कोई ताकत रोक नहीं सकती थी। हमें नेताजी सुभाष की ‘Can Do, Will Do’ स्पिरिट से प्रेरणा लेते हुए आगे बढ़ना है। वो ये जानते थे तभी ये बात हमेशा कहते थे भारत में राष्ट्रवाद ने ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अंदर सोई पड़ी थी। हमें राष्ट्रवाद भी जिंदा रखना है। हमें सृजन भी करना है। और राष्ट्र चेतना को जागृत भी रखना है। मुझे विश्वास है कि, हम मिलकर, भारत को नेताजी सुभाष के सपनों का भारत बनाने में सफल होंगे। आप सभी को एक बार फिर पराक्रम दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूं और मैं आज एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के लोगों को भी विशेष रूप से बधाई देता हूं। क्योंकि बहुत छोटे कालखंड में उन्होंने अपनी पहचान बना दी है। आज कहीं पर भी आपदा हो या आपदा के संबंधित संभावनाओं की खबरें हों, साईक्लोन जैसी। और जब एनडीआरएफ के जवान यूनिफार्म में दिखते हैं। सामान्य मानवीय को एक भरोसा हो जाता है। कि अब मदद पहुंच गई। इतने कम समय में किसी संस्था और इसकी यूनिफार्म की पहचान बनना, यानि जैसे हमारे देश में कोई तकलीफ हो और सेना के जवान आ जाएं तो सामान्य मानवीय को संतोष हो जाता है, भई बस अब ये लोग आ गये। वैसा ही आज एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवानों ने अपने पराक्रम से ये करके दिखाया है। मै पराक्रम दिवस पर नेताजी का स्मरण करते हुए, मैं एनडीआरएफ के जवानों को, एसडीआरएफ के जवानों को, उन्होंने जिस काम को जिस करुणा और संवेदनशीलता के साथ उठाया है। बहुत – बहुत बधाई देता हूं। उनका अभिनंदन करता हूं। मैं जानता हूं इस आपदा प्रबंधन के काम में, इस क्षेत्र में काम करने वाले कईयों ने अपने जीवन भी बलिदान दिए हैं। मैं आज ऐसे जवानों को भी श्रद्धांजलि देता हूं जिन्होंने किसी की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। ऐसे सबको में आदरपूवर्क नमन करते हुए मैं आप सबको भी आज पराक्रम दिवस की अनेक – अनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद !