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जापान आकर के मुझे बहुत ही प्रसन्‍नता हुई है। 

प्रधानमंत्री बनने के बाद मैंने निर्णय लिया था कि अपने पड़ोस के बाहर सबसे पहली बाईलेटरल विजिट जापान की होगी। यह मेरा सौभाग्‍य है कि प्रधानमंत्री आबे ने मुझे यहां प्रधानमंत्री बनने के 100 दिन के भीतर जापान आने का अवसर दिया और हमारी बहुत पुरानी जो दोस्‍ती है, उसको और अधिक मजबूत बनाया। 

यह इस बात का प्रमाण है कि भारत जापान को सबसे घनिष्‍ठ और विश्‍वसनीय मित्रों में समझता है और हमारी विदेश नीति में जापान की ऊंची प्राथमिकता है, क्‍योंकि भारत के विकास में जापान की महत्‍वपूर्ण भूमिका है और हम दो शांतिप्रिय लोकतांत्रिक देशों की साझेदारी, आने वाले समय में इस क्षेत्र और विश्‍व के लिए प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है। 

जिस प्रकार से प्रधानमंत्री आबे ने क्‍योटो और टोक्‍यो में हमारा स्‍वागत किया है, सम्‍मान किया है और अपना अमूल्‍य समय दिया है, इसके लिए मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं। यह उनके भारत के प्रति प्रेम और विश्‍वास का प्रतीक है। यहां हर क्षेत्र के लोगों से मिलकर उनका भारत के प्रति प्रेम और आदर देखकर मुझे अत्‍यंत खुशी हुई। 

क्‍योटो में भेंट और एक शिखर सम्‍मेलन से मैं केवल संतुष्‍ट ही नहीं हूं, बल्कि मुझमें इस भारत और जापान की साझेदारी का विश्‍वास और गहरा हो गया है और मुझमें एक नया विश्‍वास और नई उम्‍मीदें जगी हैं। 

मेरे मित्र प्रधानमंत्री आबे ने हमारी चर्चा के बारे में काफी उल्‍लेख किया है और आपके सामने ज्‍वाइंट स्‍टेटमेंट और फैक्‍ट शीट भी है। इसलिए मैं, उन बातों को दुहराना नहीं चाहता हूं। मैं इस संबंध में शिखर सम्‍मेलन को किस दृष्टिकोण से देखता हूं, उस विषय पर कुछ शब्‍द कहना चाहता हूं। आज सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि हमने स्‍ट्रेटेजिक एंड ग्‍लोबल पार्टनरशिप को अब स्‍पे‍शल स्‍ट्रेटेजिक एंड ग्‍लोबल पार्टनरशिप का दर्जा देने का निर्णय लिया है। 

भारत और जापान की स्पिरिचुअल पार्टनरशिप कालातीत है। वह समय के बंधनों से बंधी हुई नहीं है। लेकिन आज शासकीय दायरे में ये स्‍पेशल स्‍ट्रेटेजिक एवं ग्‍लोबल पार्टनरशिप के रूप में आप सबके सामने हम खड़े हैं। मेरी दृष्टि से यह सिर्फ शब्‍द नहीं है। ये एक कोई एक कैटेगरी से दूसरी कैटेगरी में जाना, इतना ही नहीं है, हम दोनों देश इस विषय में अत्‍यंत गंभीर हैं और मुझे विश्‍वास है कि हमारे यह संबंध का नया रूप अधिक परिणामकारी और अधिक दायित्‍वपूर्ण रहेगा। 

ये स्‍पेशल स्‍ट्रेटेजिक इसलिए है कि भारत के विकास और परिवर्तन में जापान की आने वाले दिनों में और अधिक महत्‍वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। आज प्रधानममंत्री आबे ने आश्‍वासन दिया है, एक प्रकार से शपथ ली है, कि भारत के इंस्‍क्‍लूसिव डेवलपमेंट में वह जापान का नए स्‍तर से सहयोग को और साझेदारी देंगे। 

हम लोग भली-भांति समझ सकते हैं कि आज प्रधानमंत्री आबे ने 3.5 ट्रिलियन येन, यानी कि अगर मैं भारत के रुपये के संदर्भ में कहूं तो 2 लाख 10 हजार करोड़ यानी कि 35 बिलियन डालर के पब्लिक और प्राइवेट इंवेस्‍टमेंट और फाइनेन्सिंग अगले पांच सालों में भारत में करने का लक्ष्‍य रखा है। मैं उनके इस महत्‍वपूर्ण निर्णय का हृदय से स्‍वागत करता हूं। 

यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। प्रधानमंत्री जी ने मेरे विजन को समझते हुए हर क्षेत्र में सहयेाग देने का आश्‍वासन दिया है। आज मैं आपसे जब गंगा शुद्धीकरण की बात कर रहा था तो तुरंत उन्‍होंने कहा कि आप तय कीजिए कि आपको क्‍या मदद चाहिए। एक‍ विकसित और तेज गति से बढ़ता भारत न केवल एक विशाल आर्थिक अवसर रहेगा, जिससे जापान को भी बहुत लाभ मिलेगा, बल्कि वह दुनिया में लोकतांत्रिक शक्ति को मजबूत करेगा और स्थिरता बढ़ाने में एक बहुत बड़ा कारण रहेगा। मैं समझता हूं कि इसमें दोनों देशों का लाभ है और भी एक बात है कि हमारे संबंध सिर्फ आर्थिक रूप में नहीं हैं, बल्कि इस संबंध में और भी कई आयाम जुड़े हुए हैं। 

हम राजनीतिक संवाद और सहयोग को एक नए स्‍तर पर, एक नई ऊंचाई पर ले जाने के पक्ष में हैं। हमने हमारे रक्षा क्षेत्र क्षेत्र के संबंधों को भी एक दिशा देने का निर्णय लिया है। न केवल आपसी बातचीत और अभ्‍यास को बढ़ाने का, और मित्र देशों के साथ इन अभ्‍यास को करने का बल्कि टेक्नोलॉजी और इक्विपमेंट के क्षेत्र में भी साझेदारी बढ़ाएंगे। दोनों देशों का भविष्‍य सामुद्रिक सुरक्षा के साथ भली भांति जुड़ा हुआ है। 

कई और क्षेत्रों में जैसे एडवांस टेक्‍नोलॉजी, रसायन, शिक्षा, टेक्‍नोलॉजी, अनुसंधान और विकास ऐसे क्षेत्र में भी दोनों देशों के लाभ के लिए हम काम कर रहे हैं। समाज की चुनौती का समाधान ढूंढने के लिए हम भरसक प्रयास कर रहे हैं। 

विकसित भारत और सफल जापान, दोनों देशों के लिए यह लाभप्रद है। परंतु उससे अधिक महत्‍वपूर्ण यह है कि एशिया और विश्‍व में शांति, स्थिरता और स्‍मृद्धि बढ़ाने में बड़ा योगदान देंगे। 

ग्‍लोबल दृष्टिकोण से इसका यह अर्थ है कि भारत और जापान, एशिया के दो सबसे महत्‍वपूर्ण लोकतांत्रिक देश हैं और एशिया की तीन सबसे बड़ी इकोनोमी में शामिल हैं और हमारे संबंध इस पूरे क्षेत्र पर तो प्रभाव करेंगे ही, परंतु सारे विश्‍व पर भी इसका प्रभाव अनेक प्रकार से होने की संभावना, मैं देखता हूं। 

पूरा विश्‍व एक बात को मानता है भलीभांति और कनविंस है कि 21वीं सदी एशिया की सदी और पूरे विश्‍व में 21वीं सदी एशिया की सदी है, इसमें कोई कनफ्यूजन नहीं है। लेकिन 21वीं सदी कैसे हो, यह उस बात पर निर्भर करता है कि भारत और जापान मिल करके किस प्रकार की व्‍यूह रचना को अपनाते है, किस प्रकार की रणनीति आगे बढ़ते हैं, और कितनी घनिष्‍टता के साथ आगे बढ़ते हैं। 

यह काम हम भगवान बुद्ध के शांति और संवाद के रास्‍ते पर चलकर इस क्षेत्र में सभी देशों के साथ मिलकर इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने का प्रयास करेंगे। 

दूसरा, इससे, दुनिया में कई विषयों पर जैसे नॉन पोलिप्रिफरेशन, स्‍पेस सिक्‍युरिटी, साइबर सिक्‍युरिटी, यू एन रिफार्मस और इस क्षेत्र के रीजनल फोरम्‍स में साथ मिलकर के हमारे जुड़े हुए हितों को आगे बढ़ा सकते हैं। 

तीसरा, हमारी साझेदारी अन्‍य क्षेत्र और विभिन्‍न देशों को लाभ पहुंचा सकती है, जहां हम साथ मिलकर काम कर सकते हैं, चाहे एशिया में हो या और क्षेत्रों में, आने वाले दिनों में हम इसे प्राथमि‍कता देने वाले हैं। 

स्‍ट्रेटेजिक पार्टनरशिप को जब हम स्‍पेशल स्‍ट्रेटेजिक पार्टनरशिप कहते हैं, तब इसका मतलब है कि पहले दोनों देशों के लिए इस संबंधों का महत्‍व बहुत बढ़ गया है। दोनों देशों की विदेश नीति में इस संबंध की प्राथमिकता नया रूप लेगी और हम दोनों देशों ने निर्णय लिया है कि इस संबंध को बढ़़ाने के लिए विशेष बल दिया जाएगा। 

हमारे सहयोग के अवसर की कोई सीमा नहीं है, ना ही दोनो तरफ इरादे और इच्‍छा की कोई कमी है। अगर हमारे पोटेंशियल को हासिल करना है तो स्‍पेशल तरीके से काम करना होगा, इसलिए मैने ‘जापान फास्ट ट्रैक चैनल’ बनाने का भी निर्णय लिया है 

दूसरा, हमने आज जो निर्णय लिये हैं, उससे हमारा गहरा आपसी विश्‍वास एक नए स्‍तर तक पहुंचा है। पिछले कुछ महीने में हमने सिविल न्‍यूकिलियर इनर्जी क्षेत्र में प्रगति की है। आज हमने इस विषय पर विस्‍तार से चर्चा भी की है और हम इससे आपसी समझ बढ़ाने में भी सफल हुए हैं। हमने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इस काम को जल्‍द समाप्‍त करें ताकि हमारी स्‍ट्रेटेजिक पार्टनरशिप और मजबूत हो। 

उसी प्रकार जापान ने एक महत्‍वपूर्ण निर्णय लिया है कि हमारी कुछ कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों को हटायेंगे। यह भी नए आपसी विश्‍वास का प्रमाण है। रक्षा के क्षेत्र में एमओयू साइन किया है और टेक्‍नोलोजी इंप्‍लीमेंट पर सहयोग का निर्णय लिया है। इन सबसे स्‍पष्‍ट होता है कि हमारे संबंध वास्‍तविक रूप में एक नए स्‍तर पर पहुंचे हैं। 

उसी प्रकार आर्थिक संबंधों को कई गुना बढ़ाने का जो हमने संकल्‍प किया है और जिस मात्रा में जापान ने सहायता करने का वचन और आश्‍वासन दिया है, वह भी विशेष संबंध का प्रमाण है। 

इस संबंध की विशेषता हमारे संबंध की प्राचीन नींव और दोनों देशों के लोगों में अटूट प्रेम और आदर भी अंतर्निहित हैं। 

हमने ऐसे निर्णय लिये हैं जिनसे भविष्‍य में संबंध और मजबूत होंगे। विशेष रूप से यूथ एक्‍सचेंज, लैंग्‍वेज ट्रेनिंग, हिंदी और जापानी भाषा में प्रशिक्षण, कल्‍चरल एक्‍सचेंज, अनुसंधान और विकास में साथ काम करना। 

इतना ही नहीं, इमने जो पांच और एग्रीमेंट साइन किये हैं- स्‍वास्‍थ्‍य, क्‍लीन एवं रिन्‍यूएबल इनर्जी, वीमेंस डेवलपमेंट, रोड्स एवं क्‍योटो-वाराणसी के बीच समझौता, वह दिखाते हैं कि हमारे संबंध हर क्षेत्र में उभर रहे हैं और लोगों के हितों से जुड़े हुए हैं। 

मैं प्रधानमंत्री आबे का पुन: आभार प्रकट करता हूं। मुझे विश्‍वास है कि हमारे संबंधों की यह एक नई सुबह है और नए विश्‍वास और ऊर्जा के साथ हम आगे बढ़ेंगे और हम जो नए स्‍तर की बात करते हैं, उसको हम जल्‍द ही वास्‍तविकता में बदल देंगे। मैं फिर एक बार प्रधानमंत्री जी का और मेरे परम मित्र का हृदय से बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं। जापान के नागरिकों का भी हृदय से आभार व्‍यक्‍त करता हूं। 

थैंक यू। 

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Text of Prime Minister Narendra Modi's speech at farewell ceremony of Vice President Shri Venkaiah Naidu in Parliament House
August 08, 2022
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“Venkaiah ji’s quality of always staying active and engaged will keep him connected to public life for a long time to come”
“We should always try to fulfil the expectations that he has from all the Parliamentarians”
​​​​​​​“Initiatives like ‘Bhashini’ and annual compendium of new words emerging from Parliamentary debates will carry forward Venkaiah ji’s legacy of love for the mother tongue”

आदरणीय उपराष्‍ट्रपति जी, मंचस्‍थ सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, उपस्थित सभी गणमान्‍य सांसदगण, अन्‍य सभी महानुभाव।

जितना मैं वैंकेया जी को जानता हूं, मुझे नहीं लगता है कि विदाई संभव है। 11 तारीख के बाद आप जरूर अनुभव करेंगे कि किसी न किसी काम से आप के पास फोन आएगा, आपके विषय में कोई जानकारी लेनी होगी, सुख-दुख की बात होगी तो तुरंत पूछेंगे। यानी एक प्रकार से वो हल पल सक्रिय रहते हैं, हर पल हर किसी के बीच होते हैं और ये उनकी बड़ी विशेषता रही है। उनके जीवन की भी क्षमता को अगर हम देखें, मैं जब पार्टी संगठन का काम करता था और उस समय अटलजी की सरकार बनी। मंत्रीपरिषद की रचना हो रही थी, मैं संगठन का काम करता था तो मेरा और वैंकेया जी के बीच संवाद जरा अधिक रहता था। उन्‍होंने मुझे कहा कि वैसे तो ये प्रधानमंत्री का ही अंतिम निर्णय होता है कि कौन मंत्री बनेगा, किस मंत्री को क्‍या काम मिलेगा, कौन सा डिपार्टमेंट रहेगा और ये भी तय था कि साउथ में से वैंकेया जी जैसे वरिष्‍ठ नेता का मंत्री होना तय था। लेकिन वो चाहते थे कि बहुत बड़ा तामझाम वाला जरा ग्लैमरस, ऐसा कोई डिपार्टमेंट से मुझे बचाइए और बोले अगर प्रधानमंत्री जी को बुरा न लगे तो मेरी इच्‍छा है कि मेरे मन का काम अगर है वो ग्रामीण विकास है, अगर ग्रामीण विकास का काम मुझे मिले तो मैं करना चाहता हूं। यानी ये passion, ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है।

अटलजी को वैंकेया जी की और भी जरूरतें थीं, लेकिन चूंकि उनका मन ये था तो अटलजी ने उस प्रकार से निर्णय भी किया और उस काम को बखूबी वैंकेया जी ने निभाया। अब और एक विशेषता देखिए, वैंकेया जी शायद एक ऐसे व्‍यक्ति हैं कि जिन्‍होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय तो देखा ही देखा, शहरी विकास भी देखा। यानी एक प्रकार से विकास के जो दोनों प्रमुख पहलु कहें, उसमें उन्‍होंने अपनी महारत दिखाई।

वे पहले ऐसे उपराष्‍ट्रपति थे, राज्‍यसभा के पहले सभापति थे, जो राज्‍यसभा के मेंबर रहे। बाकी ये सौभाग्‍य बहुत कम लोगों को मिला, शायद अकेले वैंकेया जी को मिला। अब जो स्‍वयं लंबे समय तक राज्‍यसभा में रहे हों, जो पार्लियामेंटरी अफेयर्स के रूप में कार्यभार देख चुके हों, इसका मतलब है कि उनको सदन में क्‍या-क्‍या चलता है, परदे के पीछे क्‍या-क्‍या चलता है, कौन सा दल क्‍या करेगा, ट्रेजरी बेंच की तरफ से क्‍या होगा, सामने से क्‍या होगा, वो उठकर उसके पास गया मतलब ये खुराफत कुछ चल रही है, इन सारी बातों का उनको भलीभांति अंदाज था और इसलिए सभापति के रूप में दोनों तरफ उनको पता रहता था आज ये करेंगे। और ये उनका जो अनुभव था वो ट्रेजरी बेंच के लिए उपयोगी होता था तो विपक्ष के मित्रों के लिए परेशानी का भी कारण बनता था कि पता चल जाता था। लेकिन उन्‍होंने सदन को और अधिक सक्षम बनाना, सांसद का बेस्‍ट देश को कैसे मिले, ये उसकी चिंता है। पार्लियामेंटरी कमिटीज अधिक productive हो, आउटकम ओरिएंटेड हो और वैल्‍यू एडीशन करने वाली हो। शायद वैंकेया जी पहले ऐसे सभापति रहे होंगे जिन्‍होंने पार्लियामेंटरी कमीटीज के फंक्‍शन के संबंध में भी इतनी चिंता की होगी और राजी-नाराज़गी व्‍यक्‍त करते हुए उसमें सुधार लाने का एक निरंतर प्रयास किया।

मैं आशा करता हूं कि आज जब हम वैंकेया जी के कार्यों की सराहना करते हैं तो साथ-साथ हम संकल्‍प भी करें कि सभापति के रूप में एक सांसद के नाते हम लोगों से उनकी जो अपेक्षाएं रही हैं उन अपेक्षाओं को परिपूर्ण करके सच्‍चे अर्थ में उनकी सलाह को हम जीवन में यादगार बनाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत बड़ी सेवा होगी।

वैंकेया जी समय का सर्वाधिक उपयोग कैसे हो उनके व्‍यक्तिगत जीवन में बहुत यात्रा करना, स्‍थान-स्‍थान पर खुद जाना तो उनके पिछले पांच दशक की जिंदगी रही। लेकिन जब कोरोनाकाल आया, हम लोग मजाक में एक बार बैठे थे तो बातें चल रही थीं। मैंने कहा इस कोरोना के कारण और इस लॉकडाउन के कारण सबसे ज्‍यादा मुसीबत किसको आएगी, मैंने अपने साथियों को पूछा था। सब लोगों को लगा‍ कि मोदीजी ये क्‍या पूछ रहे हैं। मैंने कहा कल्‍पना कीजिए, सबसे ज्‍यादा तकलीफ किसको आएगी, तो कोई जवाब मिला नहीं। मैंने कहा कि इस परिस्थिति की सबसे ज्‍यादा मुसीबत अगर किसी को आएगी तो वैंकेया नायडू को आएगी। क्‍योंकि वो इतनी दौड़धूप करने वाले व्‍यक्ति, उनके लिए एक जगह पर बैठना, ये बहुत बड़ा punishment का कालखंड था उनके लिए। लेकिन वे innovative भी हैं और उसके कारण उन्होंने इस कोरोना कालखंड का एक बड़ा रचनात्‍मक उपयोग किया। उन्‍होंने, मैं एक शब्‍द प्रयोग करना चाहूंगा, बहुत से वो विद्वान लोगों की नजर में ठीक‍ होगा‍ कि नहीं, मैं नहीं जानता हूं, लेकिन वो टेली यात्रा करते थे। वो टेली यात्रा, उन्‍होंने क्‍या किया, सुबह टेलीफोन डायरी लेकर बैठते थे और पिछले 50 साल में देश में भ्रमण करते-करते सार्वजनिक जीवन में, राजनीतिक जीवन में जिन-जिन लोगों से उनका संबंध आया, उसमें जो वरिष्‍ठ लोग थे, daily 30, 40, 50 लोगों को फोन करना, उनके हाल पूछना, कोरोना के कारण कोई तकलीफ तो नहीं है इसकी जानकारी प्राप्‍त करना और हो सके तो मदद करना।

उन्‍होंने समय का इतना सदुपयोग किया था लेकिन उन दूर-सुदूर इलाकों में छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को जब उनका टेलीफोन आता था तो वो तो ऊर्जा से भर जाता था। इतना ही नहीं, शायद ही कोई एमपी ऐसा होगा कि जिन्‍होंने कोराना काल में वैंकेया जी की तरफ से फोन उनको न आया हो, उनकी खबर न पूछी हो, वैक्‍सीनेशन की चिंता न की हो। यानी एक प्रकार से परिवार के मुखिया की तरह उन्‍होंने सबको संभालना, सबकी चिंता करने का भी उनका प्रयास रहा।

वैंकेया जी की एक विशेषता है, मैं जो कहता हूं ना कि वो कभी हमसे अलग हो ही नहीं सकते और उसका मैं उदाहरण बता रहा हूं। एक बार इलेक्‍शन कैंपेन के लिए वो बिहार गए हुए थे। अचानक उनके हेलीकॉप्‍टर को लैंडिंग करना पड़ा, खेत में उतरना पड़ा। अब वो इलाका भी थोड़ा चिंताजनक था, थोड़े सिक्‍योरिटी के भी इशू खड़े हो जाएं इस प्रकार का था। लेकिन नजदीक के एक किसान ने आ करके उनकी मदद की, मोटरसाइकिल पर उनको नजदीक के पुलिस थाने तक ले गया।

अब भारत के सार्वजनिक जीवन के हिसाब से देखें तो वैंकेया जी बहुत बड़े व्‍यक्ति हैं लेकिन आज भी उस किसान परिवार से उनका जीवंत नाता है। यानी बिहार के दूर-सूदूर ग्रामीण जीवन में एक घटना के समय किसी की मदद मिली। वो मोटरसाइकिल वाला किसान आज भी वैंकेया जी के साथ मेरी बात होती है, लगातार होती है, इस प्रकार का गर्व से बात करे, ये वैंकेया जी की विशेषता है।

और इसलिए मैं कहता हूं क्‍योंकि हमेशा हमारे बीच एक सक्रिय साथी के रूप में रहेंगे, मार्गदर्शक के रूप में रहेंगे, उनका अनुभव हमारे लिए काम आता रहेगा। आने वाला उनका कार्यकाल अधिक अनुभव के साथ अब वैंकेया जी समाज की एक नई जिम्‍मेदारी की तरफ आगे बढ़ रहे हैं तब। ये बात सही है, आज सुबह जब वो कह रहे थे तो उनका उन्‍होंने भई मुझे जब ये दायित्‍व आया तो मेरा एक पीड़ा का कारण ये था कि मुझे मेरी पार्टी से इस्‍तीफा देना पड़ेगा। जिस पार्टी के लिए मैंने जीवन खपा दिया, इससे मुझे इस्‍तीफा देना पड़ेगा। उसका मुझे कोई वो संवैधानिक आवश्‍यकता थी तो। लेकिन मुझे लगता है कि वो पांच साल की जो कमी है वैंकेया जी जरूर भरपाई कर देंगे, जरूर उन पुराने सारे साथियों को प्रेरित करना, प्रोत्‍साहित करना, पृस्कृत करने का उनका काम निरंतर जारी रहेगा। मेरी तरफ से, आप सबकी तरफ से वैंकेया जी का जीवन हम लोगों के लिए बहुत बड़ी अमानत है, बहुत बड़ी विरासत है। उनके साथ जो कुछ भी हमने सीखा है उसको हम आगे बढ़ाएं।

भाषा के प्रति उनका जो लगाव है और उनहोंने मातृभाषा को जिस प्रकार से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है उसको आगे बढ़ाने के और भी प्रयास होंगे।

मैं आप में से शायद लोगों को अगर रूचि हो तो मैं आग्रह करूंगा कि ''भाषिणी'' एक वेबसाइट भारत सरकार ने लॉन्‍च की हुई है, इस ''भाषिणी'' में हम भारतीय भाषाओं को, उसकी समृद्धि को और हमारी अपनी ही भाषाओं को एक भाषा में से दूसरी भाषा में अगर interpretation करना है, ट्रांसलेशन करना है, उसमें सारी व्‍यवस्‍था है। एक बहुत ही अच्‍छा टूल बना हुआ है जो हम लोगों को काफी काम आ सकता है। लेकिन उसमें से मुझे एक और विचार आया है, मैं चाहूंगा कि स्‍पीकर महोदय भी और हरिवंश जी भी, हरिवंश जी तो उसी दुनिया के व्‍यक्ति हैं, जरूर इस दिशा में काम हो सकता है। दुनिया में डिक्‍शनरी में नए शब्‍द जोड़ने की परंपरा रही है। और officially announce भी होता है, एक बड़ा इसका महात्‍मय होता है जब फलाने देश की फलानी भाषा का फलाना वर्ड अब अंग्रेजी की उस डिक्‍शनरी में स्‍थान प्राप्‍त कर रहा है, उसका गौरव भी होता है। जैसे हमारा गुरू शब्‍द वहां की अंग्रेजी डिक्‍शनरी में उसका हिस्‍सा बन चुका है, ऐसे कई शब्‍द होते हैं।

हमारे यहां जो मातृभाषा में भाषण हो दोनो सदनों में उसमें कई लोगों के पास से बहुत बढ़िया शब्‍द निकले, निकलते हैं। और और भाषा के लोगों के लिए वो शब्‍द बड़ा सार्थक भी लगता है और बड़ा interesting लगता है। क्‍या हमारे दोनों सदन हर साल इस प्रकार के नए शब्‍द कौन से आ रहे हैं, जो सचमुच में हमारी भाषा वैविध्‍य को ले करके आते हैं, नए तरीके से आते हैं, उसका संग्रह करके चलें, और हर वर्ष एक बार अच्‍छे शब्‍दों का संग्रह की परंपरा खड़ी करें ताकि हमारी मातृभाषा से जो वैंकेया जी का लगाव रहा है, उनकी इस legacy को हम आगे बढ़ाएं। और जब भी हम इस काम को करेंगे, हमें हमेशा वैंकेया जी की बातें याद आएंगी और एक जीवंत काम हम खड़ा कर देंगे।

मैं फिर एक बार आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं। वैंकेया जी को, उनके पूरे परिवार को अनेक-अनेक शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।