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Glad to be present at the Bhoomi Poojan of Baba Saheb Ambedkar's memorial in Mumbai on birth anniversary of JP: PM
A vibrant port sector is very important for a nation blessed with long coastlines: PM Modi
Coastal sector and space are crucial in this century. Be it space & sea, we need to be moving at a quick pace: PM
Babasaheb Ambedkar is an inspiration not just for one community but for the entire world: PM Modi
Dr. Babasaheb Ambedkar is a Maha Purush. He faced so many challenges but there was no bitterness in him: PM
26th November will be marked as Constitution Day. People must know about our constitution, how it was made: PM

मंच पर विराजमान सभी वरिष्‍ठ महानुभाव और विशाल संख्‍या में पधारे हुए मेरे प्‍यारे भाइयों और बहनों,

आज 11 अक्‍तूबर, जयप्रकाश नारायण जी की जन्‍म जयंती है और ये सुयोग है कि जयप्रकाश जी की जन्‍म जयंती के दिन मुझे आज मुंबई में, विशेषकर के बाबा साहेब आंबेडकर के भव्‍य स्‍मारक निर्माण का भूमि पूजन का सौभाग्‍य मिला है। ये सुयोग इसलिए है कि भारत के संविधान के जन्‍मदाता बाबा साहेब आंबेडकर और भारत के संविधान का दुरुपयोग करते हुए, भारत के लोकतंत्र पर खतरा पैदा करने का पाप जब इस देश में हुआ तो संविधान के spirit को बचाने के लिए, संविधान की भावनाओं को बचाने के लिए बाबा साहेब आंबेडकर ने जो हमें लोकतंत्र के अधिकार दिए थे, वो वापिस लाने के लिए जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के खिलाफ जंग किया था और देश आपातकाल से मुक्‍त हुआ था और उस अर्थ में मैं इस सुयोग को बहुत बड़ा महत्‍वपूर्ण मानता हूं।

आज यहां कई योजनाओं का शुभारंभ करने का मुझे सुअवसर मिल रहा है। दुनिया के किसी भी समृद्ध देश, तो ये एक बात बहुत ध्‍यान में आती है, उस देश का Port sector कितना vibrant है। समुद्री तट का देश हो और port sector vibrant हो। आपने देखा होगा, उस देश की economy और port की vibrancy साथ-साथ चलती है। भारत को भी एक वैश्विक आर्थिक वातावरण में अपना स्थान बनाने के लिए अपने port sector को मजबूत करने की आवश्यकता है, उसका विस्तार करने की आवश्यकता है, उसका विकास करने की आवश्कता है, उसे आधुनिक बनाने की आवश्यकता है और मैं आज गर्व के साथ कहता हूं कि हमारे नितिन जी ने पंद्रह महीने की छोटी अवधि में जो काम पिछले दस साल में नहीं हो पाए थे, ऐसे अनेक नए initiative लेकर के पूरे port sector को नई ताकत दी है, नई ऊर्जा दी है और नई गति दी है।

Foreign Direct Investment की चर्चा होती है। आज मैं देख रहा हूं कि सिंगापुर के साथ आठ हजार करोड़ रुपयों के पूंजी निवेश से मुंबई को और हिन्‍दुस्‍तान को port sector का ऐसा एक नजराना मिल रहा है जो सिर्फ यहां के लोगों को रोजगार ही देता है, ऐसा नहीं है। विश्‍व व्‍यापार में हमारी साख बढ़ेगी। मेक इन इंडिया की जब मैं बात करता हूं तो जो लोग इस देश में manufacturing के लिए आएंगे उनको विश्‍व भर में अपना माल बेचने के लिए अच्‍छे port sector की आवश्‍यकता होगी, अच्‍छे बंदरगाहों की आवश्‍यकता होती है। हम जिस तेजी से काम कर रहे है उसके कारण मेक इन इंडिया के तहत, जब देश में उत्‍पादन की परंपरा चलेगी और वो उत्‍पादित चीजें वैश्‍विक बाजार को पकड़ेगी तब हमारी ये port का development पीछे नहीं रहना चाहिए और इसलिए एक तरफ मेक इन इंडिया और दूसरी तरफ विश्‍व व्‍यापार के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए हमारे port sector को vibrant बनाना है।

हमारे देश में बंदरगाहों का विकास कम अधिक मात्रा में हर कोई सोचता रहा है। लेकिन आज सिर्फ port development से काम चलने वाला नहीं है। आज आवश्‍यक है Port led development, और Port led development के आधार पर हमारे port के साथ maximum infrastructure की connectivity हो, रेल हो, road हो, एयरपोर्ट हो, cold storage का network हो, warehousing का network हो और इस काम के लिए हमारे देश के पूरे समुद्री तट को जोड़ने वाला एक सागरमाला project हम आगे बढ़ा रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने ये सागरमाला project की शुरूआत की थी। लेकिन वो सरकार चली गई, बाद में जो सरकार आई उसका एजेंडा कुछ और था और उसके कारण वो विचार वहीं का वहीं रह गया था। हमारी सरकार बनने के बाद अटल जी के उस विचार को हमने मूर्त रूप देने का प्रयास किया है जो coastal states है, उनकी भागीदारी से क्‍योंकि हम cooperative, competitive federalism इस पर बल दे रहे हैं। समुद्री तट के राज्‍यों का सहयोग हो, समुद्री तट के राज्‍यों के बीच स्‍पर्धा हो, कौन अच्‍छा port बनाए, कौन अच्‍छे port में आगे बढ़े। भारत सरकार और राज्‍य मिलकर के port sector को कैसे develop करे, उन काम की ओर हम आगे बढ़ रहे हैं और आज जिस काम का शिलान्‍यास किया है। हमारी ताकत बहुत बड़ी मात्रा में एक ही जगह पर बढ़ जाएगी और उसके कारण जो wear and tear के खर्च होते हैं वो कम होते हैं, profit का level बढ़ता है, expansion का अवसर भी मिलता है। मजदूरों को सम्‍मानपूर्वक जीने के लिए सुविधाएं उपलब्‍ध कराई जा सकती हैं। गरीब के कल्‍याण के लिए विकास का ये मार्ग प्रशस्‍त करने की दिशा में आज नितिन जी के नेतृत्‍व में हम पहुंच रहे हैं, हम विश्‍व में अपनी जगह बना रहे हैं।

भारत ईरान में Chabahar port के विकास के अंदर भागीदारी कर रहा है। क्‍योंकि हम मानते हैं कि आने वाले दिनों में दो क्षेत्र का प्रभाव रहने वाला है – एक सामुद्रिक और दूसरा space technology का। 21वीं सदी में ये दो क्षेत्र बहुत प्रभाव पैदा करने वाले हैं। और इसलिए space हो या sea हो भारत समय के साथ तेज गति से आगे बढ़ना चाहता है।

हमारे नितिन जी के पास road भी है। महाराष्‍ट्र ने उनके काम को पहले भी देखा हुआ है। वो speed में विश्‍वास करते हैं। पहले के समय पिछली सरकार में प्रति दिवस कितने किलोमीटर road बनते थे, आज मैं उसकी चर्चा नहीं करना चाहता हूं। इस विषय में जो रूचि रखते हैं, जानकार लोग हैं जरूर खोजकर के निकाले कि per day हमारे कितने किलोमीटर road बनते हैं। लेकिन आज मैं बड़े गर्व और संतोष के साथ कहता हूं कि नितिन जी ने जिस प्रकार से गति लाई है, औसत प्रति दिन 15 किलोमीटर से ज्‍यादा road आज देश में बन रहे हैं। और इसको और बढ़ाने का प्रयास है क्‍योंकि विकास करना है, तो infrastructure पर बल देना बहुत आवश्‍यक होता है। और रास्‍ते जब बनते है तो ऐसा नहीं है कि पैसे है इसलिए रास्‍ते बनते हैं। जब रास्‍ते बनते हैं तब पैसा बनना शुरू हो जाता है, ये रास्‍तों की ताकत होती है।

मैं श्रीमान देवेन्‍द्र जी को बधाई देना चाहता हूं। हमारे देश में कम से कम एक मेट्रो रेल type काम DPR बनाने हैं तो डेढ़-डेढ दो-दो साल चले जाते हैं। लेकिन उन्‍होंने चार महीने के भीतर-भीतर उसकी DPR तैयार कर दी और जो इस field को जानते हैं, उनको मालूम है कि चार महीने में इतना बड़ा काम कागज पर बनाना, ये हमारे देश के स्‍वभाव में नहीं है, हमारी व्‍यवस्‍था में ही नहीं है। और उसको कोई बुरा भी नहीं मानता। सब मानते हैं हां भाई, इतना तो समय लगता है। लेकिन उन सारी आदतों को छुड़वा करके देवेन्‍द्र जी ने जिस तेज गति से मेट्रो के इस काम को बल दिया है, ये बदलते हुए शहरों के जीवन की अनिवार्यता बन गया है। अगर हम environment friendly development का विचार करे तो mass transportation, ये इसका एक बहुत बड़ा पहलू है। जिस प्रकार से हमारे शहर बढ़ रहे हैं, उन बढ़ते हुए शहरों को कभी लोग संकट मानते थे। मैं बढ़ते हुए शहरों को अवसर मानता हूं। urban growth, ये बोझ नहीं हैं, ये opportunity हैं और इसलिए हमारी सारी योजनाएं उस opportunity को ध्‍यान में रखकर के होनी चाहिए।

आज देश में 50 शहरों में मेट्रो नेटवर्क बनाने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। हमने रेलवे में 100% Foreign Direct Investment, इसके दरवाजे खोल दिए है और उसका परिणाम यह आया है कि आज देशभर में से, दुनिया भर में से लोग भारत के रेलवे के अंदर अपनी पूंजी लगाने के लिए तैयार हो रहे हैं। 400 के करीब रेलवे स्‍टेशन जो heart of the city हैं, बहुत बड़ी मात्रा में जमीन है, लेकिन प्‍लेटफार्म के सिवा वहां कुछ नहीं है। ticket window है, rest room है, प्‍लेटफार्म है। ये इसको multi storey रेलवे स्‍टेशन नहीं हो सकते हैं क्‍या? आधुनिक से आधुनिक 100 मंजिला रेलवे स्‍टेशन नहीं हो सकता क्‍या? heart of the city कितनी मूल्‍यवान जमीन होती है, लेकिन कोई उपयोग नहीं हो रहा है। हमने दिशा उठाई है 400 रेलवे स्‍टेशन जो heart of the city है country में, वहां पर अनेक प्रकार का development। नीचे ट्रेन चलती रहेगी, ऊपर उस पर development होगा, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

ये जो मेट्रो का काम है, हजारों करोड़ रुपया लगते हैं लेकिन सुविधा बनती है। अब तो technology भी काफी, आधुनिक technology दिन पर दिन नई मिलती जा रही है। उसके कारण गति मिलने की संभावना भी बढ़ रही है और मैं इस काम के लिए श्रीमान देवेन्‍द्र जी को बधाई देता हूं।

हमारे सुरेश प्रभु जी ने रेलवे में भी सचमुच में उत्‍तम काम करके दिखाया है। पहले रेलवे का expansion, gaze conversion, डीजल इंजन से electricity इंजन की तरफ जाना। इन सारी बातों में एक उदासीनता थी। आज गति आई है और उसके परिणाम भी नजर आने लगे हैं। आने वाले दिनों में, और जब में रेलवे की बात करता हूं, तो बाबा साहेब आंबेडकर को भी याद करता हूं। बाबा साहेब आंबेडकर ने रेल नेटवर्क का सामाजिक मूल्‍यांकन किया और उन्‍होंने कहा था के समाज में जो छुआछूत का भाव है, ऊंच-नीच का भाव है, दूरी बनाने का जो स्‍वभाव है, इसको तोड़ने का काम रेलवे करेगी, ऐसा बाबा साहेब आंबेडकर ने रेलवे का एक analysis किया था।

मैं मानता हूं कि public transportation system बाबा साहेब आंबेडकर जिसमें सामाजिक एकता का अवसर देखते थे, उसको भी चरितार्थ करने का एक कारण बन सकता है। मुझे विशेष रूप से देवेन्‍द्र जी को इस बात के लिए भी बधाई देनी है।

हमारे देश में किसानों के लिए सिंचाई की जितनी व्‍यवस्‍था चाहिए वो नहीं हुई, वे बारिश पर निर्भर उसकी जिंदगी है, अगर वर्षा नहीं हुई तो किसान बेचारा तबाह हो जाता है और अकाल उसके लिए एक ऐसा काल बन करके आता है जो उसका जीना हराम कर देता है। अकाल के प्रति संवेदना करना, किसान के प्रति संवेदना व्‍यक्‍त करना, या तो दिल्‍ली में जा करके भारत सरकार के पास मांगे रखना, या राजनीतिक खेल खेलना, देवेन्‍द्र जी उससे बाहर निकल करके उन्‍होंने समस्‍या का समाधान खोजने का बहुत ही अभिनंदनीय प्रयास किया है। आज वो मुझे बता रहे थे कि करीब 6200 गांवों में जल संचय के एक लाख से ज्‍यादा छोटे-छोटे-छोटे प्रोजेक्‍ट किए हैं और उसके कारण पानी का संग्रह हुआ है। नीचे water level कहीं ऊपर आए हैं और उस इलाके के किसान रबी पांक ले सकें ऐसी आज परिस्थिति पैदा हुई है, और खर्चा ज्‍यादा नहीं हुआ। मुझे बताया गया कि करीब 1400 करोड़ रुपये में इतना बड़ा काम हो गया, अब मजा ये है कि 300 करोड़ रुपया लोगों ने जन-भागीदारी में दिया। मैं उन जन-भागीदारी करने वाले, उन गांव के लोगों को लाख-लाख अभिनंदन करता हूं, आपने देश को दिशा दिखाई।

जल संचय, संकटों से सामना करने का सबसे बड़ा शस्‍त्र होता है। मैं गुजरात में काम करता था, वहां तो रेगिस्‍तान है, वर्षा बहुत कम होती है, लेकिन जल संचय का अभियान चलाया हमने, दस साल लगातार चलाया, लाखों छोटे-छोटे check dam बनाए, और हमारा किसान संकटों से बचने में ताकतवर बना। लेकिन मैं दो और सुझाव देना चाहूंगा देवेन्‍द्र जी को, कुछ नयेपन से सोचने के लिए भी सोचें वो। एक हमारे यहां Marginal किसान हैं, बड़े किसान नहीं हैं छोटे किसान हैं लेकिन दो खेतों के बीच bifurcation के लिए division के लिए एक बहुत बड़ी बाड़ लगा दी। एक मीटर जमीन उसकी खराब होती है, एक मीटर जमीन इस वाले की खराब होती है, और ऐसे असीम लाखों एकड़ भूमि हमारी बाड़ बनाने में ही चली जाती है। इन इलाकों में जहां बाड़ है, वहां पेड़ लगा करके Timber की खेती, इस पर बल दिया जा सकता है और उस किसान को 15 साल, 20 साल के बाद जब पेड़ बड़े होते हैं, अगर उसको हर साल एक पेड़ काटने का भी अवसर दिया जाए तो भी उसको दो-पांच लाख रुपया Timber का वैसे ही मिल जाएगा। उसको कभी इधर-उधर देखना नहीं पड़ेगा। सिर्फ किनारे पर, अपनी बॉर्डर पे। दूसरा एक उपाय ये भी है कि दो पड़ौसी किसान मिल करके अगर Solar Panel लगा देते हैं, बिजली भी पैदा होगी, सरकार बिजली खरीद ले, किसान का खेत भी चलेगा, खेत में बिजली भी आएगी, किसान के काम आएगी। और एक काम है जिस पर हमारे महाराष्‍ट्र में, खास करके विदर्भ में ध्‍यान देने की आवश्‍यकता मुझे लगती है, और वो Honey Bee, शहद Honey, मधु।खेतों में किसानों को ट्रेनिंग देनी चाहिए। आज बहुत बड़ा Global Market है Honey का, और वो खराब नहीं होता है, कितने ही साल रहे खराब नहीं होता। उसकी Extra Income के लिए हमने उसको प्रेरित करना चाहिए। इसी प्रकार से Organic Farming। शहरों के नजदीक में, Earth Worm, महिलाओं की मंडलियां बना करके, छोटे-छोटे गड्ढे कर करके कूड़ा-कचरा शहर का उसमें डालते जाओ, Earth Worm रख दो, केंचुए, वो गंदगी भी साफ कर देते हैं, Organic Fertilizer तैयार कर देते हैं, किसान की जो जमीन Chemical, Fertilizer और दवाईयों के कारण बर्बाद होती है, उसको बचाने का काम होगा, हम Multiple Activity के द्वारा हमारे किसानों को मदद कर सकते हैं, और मैं देख रहा हूं कि देवेन्‍द्र जी जिस प्रकार से Innovative और सतत् कर्मशील व्‍यक्‍ति के रूप में इन चीजों का initiative ले रहे हैं, आने वाले दिनों में महाराष्‍ट्र के कृषि जगत में एक आमूल-चूल परिवर्तन ला करके पूरे देश को एक नई दिशा देंगे, ऐसा मेरा विश्‍वास है, और इन कामों के लिए मैं उनको ह्दय से अभिनंदन करता हूं।

आज एक महत्‍वपूर्ण कार्य करने का जो सौभाग्‍य मिला, एक प्रकार से मुझे लगता है, ये काम ऐसा है जिसका सौभाग्‍य शायद हम लोगों को ही मिला होगा, और किसी के नसीब में ये पवित्र कार्य लिखा हुआ ही नहीं है। ये इंदु मिल की जमीन मैं प्रधानमंत्री बना उसके बाद आई है क्‍या? पहले थी, लेकिन कोई पवित्र काम करने का सौभाग्‍य हमारे ही हाथ में लिखा हुआ है और इसलिए आज उस इंदु मिल की जमीन पर डॉक्‍टर बाबा साहेब आंबेडकर का, एक प्रेरणा स्‍थली बनने वाली है। ये चैत्‍य भूमि.. भारत में नई चेतना जगाने का एक कारण बनने वाली है। और आप देखिए पंच-तीर्थ का निर्माण, ये पंच-तीर्थ का निर्माण.. आने वाले दिनों में ये पंच-तीर्थ, जिनकी लोकतंत्र में आस्‍था है, जिनकी सामाजिक न्‍याय में आस्‍था है, जिसकी देश की अखंडता और एकता में आस्‍था है, उन लोगों के लिए ये तीर्थाटन के.. यात्रा के धाम बनने वाले हैं। ये पंच-तीर्थ, इसका सौभाग्‍य हमें मिला। आप देखिए मध्‍य प्रदेश में Mhow, इतनी सरकारें रहीं लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्‍यान नहीं गया। जब मध्‍य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तब जा करके उस जगह पर बाबा साहेब का स्‍मारक बना, जीवंत स्‍मारक बना और आज बाबा साहेब के प्रति श्रद्धारखने वाले लोगों के लिए वो एक तीर्थ क्षेत्र बना हुआ है। उसी प्रकार से दिल्‍ली में, दिल्‍ली में जहां बाबा साहेब रहते थे, वो जगह अलीपुर रोड वाली, 25 साल तक ये विषय फाइलों में लटकता रहा। बाबा साहेब आंबेडकर के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग इसके पीछे प्रयास करते रहे। अटल जी की सरकार ने उस को move किया। लेकिन सरकार गयी उसको फिर दबा दिया गया। हम आये, हमने उस बात को हाथ में लिया और कुछ महीने पहले मुझे अलीपुर रोड के बाबा साहेब आंबेडकर के उस मकान में एक भव्‍य स्‍मारक बनाने का Foundation, उसका शिलान्‍यास करने का सौभाग्‍य मिला, करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से एक भव्‍य स्‍मारक वहां बन रहा है। दिल्‍ली में जो भी लोग आएंगे, और स्‍थानों पर जाते हैं, अब इस स्‍थान पर भी जाएंगे और बाबा साहेब आंबेडकर ने कितना बड़ा योगदान किया था ये उनके ध्‍यान में आएगा।

बाबा साहेब आंबेडकर के माता-पिता रत्‍नागिरी जिले के Ambavade गांव में रहते थे, हमारे एक सांसद ने उस आदर्श गांव के लिए strike किया और महाराष्‍ट्र सरकार भी उसमें मदद कर रही है, जहां बाबा साहेब आंबेडकर के माता-पिता रहे, वो भी एक तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहा है। और आज ये इंदु मिल में एक नए स्‍मारक का निर्माण और पांचवां लंदन में, जहां बाबा साहेब आंबेडकर रहते थे, वो भवन, अब हिंदुस्‍तान से कोई लंदन जाएगा, तो प्रेरणा का केंद्र बिंदु बनेगा, विश्‍व के लोग भारत के आर्थिक चिंतन को समझने के लिए लंदन में जो बाबा साहेब रहते थे, उस मकान के अंदर आ करके, अध्‍ययन करके, विश्‍व को, भारत के संबंध में समझ ले करके, अपनी बात बताने का उनको अवसर मिलेगा।

ये पंच-तीर्थ, ये पंच-तीर्थ निर्माण सिर्फ और सिर्फ हम भारतीय जनता पार्टी के समय में ही हुआ है और हम सब जानते हैं, मुझे राजनीति नहीं करनी है, लेकिन मेरे मन की पीड़ा मैं कहे बिना रह नहीं सकता हूं, क्‍या कारण है कि बाबा साहेब आंबेडकर की पार्लियामेंट में, जिस महापुरुष ने संविधान दिया, उस महापुरुष का तैल चित्र पार्लियामेंट में रखने के लिए वो सरकारें सहमत नहीं थीं। 90 में जब गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से बनी, तब जा करके बाबा साहेब आंबेडकर का तैल चित्र हिन्‍दुस्‍तान की पार्लियामेंट में लगा।

भारत रत्‍न, हम जानते हैं औरों को कब मिला, लेकिन बाबा साहेब आंबेडकर को भारत रत्‍न दिलाने के लिए नाकों दम आ गया और वो भी उन लोगों के द्वारा नहीं मिला। और इसलिए मैं कहता हूं कि देश में जिस प्रकार के एक सामंतशाही मानसिकता वाले लोग हैं, एक दलित के बेटे को स्‍वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं, और मैं, आज कई लोग यहां बैठे हैं, जिन्‍होंने अपना जीवन बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों के पीछे खपा दिया है, मैं उनको भी आज कहना चाहता हूं, मेरी बात शायद कड़वी लगेगी, लेकिन ये बात करने का मैं साहस करता हूं, अगर हम दीर्घ दृष्‍टि के अभाव में बाबा साहेब को, अगर सिर्फ दलितों का बाबा साहेब बना देंगे तो उससे बड़ा बाबा साहेब को कोई अपमान नहीं होगा, कोई अन्‍याय नहीं होगा। बाबा साहेब न सिर्फ भारत के, विश्‍व के दलित, पीड़ित, शोषित, वंचितों की प्रेरणा का नाम बाबा साहेब आंबेडकर है। दुनिया मार्टिन लूथर किंग को तो जानती है, लेकिन दुनिया बाबा साहेब आंबेडकर को नहीं जानती है, ये हमारा दुर्भाग्‍य है और इसके लिए हम लोगों का दायित्‍व है, के विश्‍व बाबा साहेब आंबेडकर किस परिस्‍थिति में पैदा हुए, कैसे पले-बढ़े, और इतना जुल्‍म सहने के बाद, इतना अपमान सहने के बाद किसी भी व्‍यक्‍ति के मन में लबालब जहर भरा रहना, शायद कोई बुरा नहीं मानता। इतना अपमान झेलने के बाद कटुता होना, कोई बुरा नहीं मानता लेकिन ये बाबा साहेब आंबेडकर थे, जिंदगी के हर पल अपमान झेला, हर पल बाबा साहेब को संकटों से गुजरना पड़ा, लेकिन जब खुद को निर्णय करने के अवसर आए, कटुता का नामो-निशान नहीं था, बदले की भावना का नामो-निशान नहीं था, किसी को मैं बता दूंगा ये भाव नहीं था, इससे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है और इसलिए भाइयो-बहनों, मेरे जैसे लोग बाबा साहेब आंबेडकर के प्रति वो श्रद्धा भाव से देखते हैं।

मैं तो खुद के लिए कभी सोचता था, कभी-कभी मेरे मन में विचार आता था के बाबा साहेब आंबेडकर न होते तो मोदी कहां होता? हम जैसे सामान्‍य लोगों को कौन पूछता? ये बाबा साहेब आंबेडकर हैं, जिसके कारण ये बातें संभव हुई हैं और इसलिए मैं कहता हूं हम जो कर रहे हैं, वो तो सिर्फ कर्ज चुकाने का एक प्रामाणिक प्रयास कर रहे हैं। इस महापुरुष ने जो किया है.. और इसलिए हम सबका दायित्‍व बनता है लेकिन बाबा साहेब ने जो हमें कहा है उससे हम अगर हटेंगे तो बाबा साहेब के साथ घोर अन्‍याय होगा। बाबा साहेब ने हमें कहा, शिक्षित बनो। दलित हो, शोषित हो, वंचित हो, गरीब हो, शिक्षा उसके जीवन का सबसे प्रमुख धर्म बनना चाहिए, जो बाबा साहेब ने हमें सिखाया। बाबा साहेब ने हमें सिखाया संगठित बनो।

आज मुझे खुशी है नितिन जी कह रहे थे कि दलित समाज के सभी, अलग-अलग दिशा में काम करने वाले आज सब लोग इकट्ठे हुए हैं। बाबा साहेब की इसलिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही है कि हम संगठित बने, हम एक बने और अन्‍याय के खिलाफ जब संघर्ष की बात आए तो उसके लिए भी हम तैयार रहे। यही हम लोगों को बाबा साहेब ने संदेश दिया है और इसलिए मेरे भाइयों-बहनों आज Indu mill में बाबा साहेब का जो स्‍मारक बन रहा है। मेरे मन में एक इच्‍छा है, मैंने अध्‍ययन तो नहीं किया है लेकिन जिस दिन मैंने जमीन दी थी उस दिन भी मैंने कहा था। आज architecture मिले तब भी मैंने कहा। मैंने कहा मुंबई या महाराष्‍ट्र में आया हुआ व्‍यक्‍ति जिन्‍दगी से तंग आया हो, परेशान हुआ हो तो यहां ऐसी जंद जगह बननी चाहिए कि वो घंटे भर वहां बैठे, एक शांति का अहसास लेकर के जाए, ऐसी जगह बननी चाहिए और इसलिए मैंने कहा जहां स्‍मारक बने वहां साथ-साथ, ये विशाल भूमि है, वहां एक घना जंगल बनाना चाहिए। इतने पेड़ लगाने चाहिए, इतनी हरियाली कर देनी चाहिए कि एक शांति की भूमि 60 फुट में बन जाए और ये बन सकता है। और मैं देवेन्‍द्र जी से आग्रह करूंगा कि ये स्‍मारक सिर्फ ईंट-माटी-पत्‍थर-चूने तक सीमित न रहे। वो तो भव्‍य होना ही चाहिए, दुनिया के लोगों के लिए अजूबा होना चाहिए। लेकिन इसको जन भागीदारी से जोड़ा जा सकता है क्‍या? महाराष्‍ट्र में 40 हजार गांव है। हर गांव से लोग आए और उनको जो बताया गया हो वो पौधा लेकर के आए और वहां पर हर गांव का एक पौधा लगे और वो गांव भी उसके लालन-पालन के लिए गांव समस्‍त की तरफ से एक रूपया, दो रुपया, पांच रुपया collect करके एक पेड़ लगाए और 11 हजार रुपया दान दे। आप देखिए कितनी बड़ी जन भागीदारी से काम हो सकता है। हर गांव को लगेगा कि चैत्‍य भूमि में, Indu mill के मैदान में जो स्‍मारक बना है, बाबा साहेब आंबेडकर के प्रति हमारे गांव की भी श्रद्धा है, हमारा भी एक पेड़ उस गांव में लगा है।

दूसरा, हिन्‍दुस्‍तान के सभी राज्‍यों से एक पेड़ मंगाया जाए, वो पेड़ भी लगाया जाए और दुनिया के सभी देशों से हर देश से एक पेड़ मंगवाया जाए और ये विश्‍व महापुरुष थे, उनका भी एक पेड़ लगाया जाए दुनिया का और वहां लिखा जाए। सारा विश्‍व Indu mill के इस हरियाली के साथ कैसे जोड़ा जाए। अगर हम नई कल्पना के साथ, जन सामान्‍य को जोड़ने के विचार के साथ स्‍मारक को बनाएंगे, हिन्‍दुस्‍तान में शायद कभी किसी महापुरुष का ऐसा स्‍मारक नहीं बना हो जहां पर 40 हजार गांव सीधे-सीधे जुड़े हों। ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। ये हो सकता है और महीने भर हर सप्‍ताह गांव के लोग आते चले, वहां रहे, चैत्‍य भूमि जाए, देखे Indu mill जाए, जहां डिजाइन हो वही पर पौधा लगाए। जो पौधे का sample तय किया हो, वही लगाए। आप देखिए क्‍या से क्‍या हो सकता है और इसलिए ये अपने आप में प्रेरणा स्‍थल बनना चाहिए और इसलिए मैंने कहा, हम पंचतीर्थ निर्माण कर रहे हैं। ये पंचतीर्थ लोकतंत्र पर आस्‍था रखने वालों के लिए, संविधान को स्‍वीकार करने वाले लोगों के लिए, सामाजिक एकता के लिए जीने वालों के लिए वे तीर्थ क्षेत्र बनेंगे।

भाइयों-बहनों कभी-कभी हम लोगों के खिलाफ झूठ फैलाना, अफवाहें फैलाना, लोगों में भ्रम पैदा करना इसके लिए टोली लगातार लगी रहती है, क्‍योंकि वो सहन नहीं कर पाते हैं कि ऐसे लोग कैसे आए गए। उन लोगों को मैं कहना चाहता हूं। आज हिन्‍दुस्‍तान में जिन राज्‍यों में सर्वाधिक दलित जनसंख्‍या है, जिन राज्‍यों में सर्वाधिक आदिवासी जनसंख्‍या है, जिन राज्‍यों में सर्वाधिक OBC जनसंख्‍या है, उनमें से अधिकतर राज्‍य ऐसे हैं, जहां के नागरिकों ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चुना है। महाराष्‍ट्र हो, हरियाणा हो, पंजाब हो, सबसे ज्‍यादा आदिवासी जनसंख्‍या महाराष्‍ट्र हो, गुजरात हो, राजस्‍थान हो, छत्‍तीसगढ़ हो, उड़ीसा हो, उड़ीसा हमारा NDA का partner है, हमारा झारखंड हो। अधिकतम! इसका मतलब हुआ कि बाबा साहेब आंबेडकर के साथ तत्‍वत: जुडकर के काम करने वाले कोई लोग है, तो हम लोग हैं और समाज के ये दलित पीड़ित शोषित आज हमें स्‍वीकार करते हैं। इसका ये जीता-जागता सबूत है।

दूसरा, जब भी हम सत्‍ता में आते हैं, जब भी चुनाव आता है, जब भी सरकार बननी होती है एक झूठ प्रचारित किया जाता है – भाजपा वाले आएंगे आरक्षण खत्‍म कर देंगे। अटल बिहारी वाजपेयी की जब सरकार बनी थी ऐसा ही बवंडर खड़ा कर दिया गया था। अटल जी की सरकार में बैठे लोग कह कहकर के थक गए, लेकिन ये झूठ फैलाने वाली टोली मुंह बंद करने को तैयार ही नहीं थी। फिर एक बार जब हम राज्‍यों में चुनकर के आते हैं, तो राज्‍यों में चालू कर देते हैं - आरक्षण हटा देंगे, आरक्षण हटा देंगे, आरक्षण हटा देंगे। फिर हमारी दिल्‍ली में सरकार बनी, फिर तूफान खड़ा कर दिया। बाबा साहेब आंबेडकर ने जो हमें दिया है, उसी ने देश को एक ताकत दी है और उस ताकत को कोई रोक नहीं सकता है, मेरे भाइयों-बहनों कोई रोक नहीं सकता है। और इसलिए मैं ऐसा भ्रम फैलाने वाले लोग, आज तक कोई राजनीतिक फायदा ले नहीं पाए हैं लेकिन समाज में वही वैमनस्‍य पैदा करते हैं, झूठ फैलाते हैं, समाज को भ्रमित करते हैं। मैंने, मैंने गरीबी देखी है, मैं उस दर्द को जी चुका हूं और मुझे मालूम है समाज की इस अवस्‍था में जीने वालों के लिए अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है, बहुत कुछ करना बाकी है और ये देश दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित, गरीब, इनको छोड़ करके आगे नहीं निकल सकता है। और मेरी सरकार, मुझे जब संसद के अंदर नेता के रूप में चुना गया, संसद के अंदर नेता के रूप में चुना गया, अभी प्रधानमंत्री बना नहीं था, उस दिन मेरा भाषण है कि मेरी सरकार गरीबों को समर्पित है, गरीबों के कल्‍याण के लिए हम जीएंगे। देश में गरीबी को, गरीबी से मुक्‍ति चाहिए, गरीबी से मुक्‍ति के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं, हमारा मार्ग है, वो देश पूरी तरह जानता है और इसलिए भाइयो-बहनों ये अप्रचार बंद होना चाहिए, ये झूठ बंद होना चाहिए, समाज को आशंकित, भयभीत करने का खेल बंद होना चाहिए, इससे राजनीति नहीं होती। आइए, मिल-बैठ करके चलें। दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित, गरीब, गांव का हो, उनको आगे बढ़ाए बिना देश कभी आगे बढ़ नहीं सकता। और इसलिए मेरे भाइयो-बहनों, इस मूलमंत्र को ले करके, समाज के सभी लोगों को साथ ले करके चलने का इरादा ले करके देश चल रहा है। राज्‍यों में जहां हमें सेवा करने का मौका मिला है, हम पूरे मनोयोग से काम कर रहे हैं। दिल्‍ली में हमें सेवा करने का मौका मिला है, जी-जान से जुटे हुए हैं और बदलाव ला करके रहेंगे, ये विश्‍वास में प्रकट करता हूं।

मेरे साथ बोलेंगे, मैं बोलूंगा, बाबा साहेब आंबेडकर, आप बोलेंगे अमर रहे, अमर रहे

बाबा साहेब आंबेडकर, अमर रहे, अमर रहे

बाबा साहेब आंबेडकर, अमर रहे, अमर रहे

बाबा साहेब आंबेडकर, अमर रहे, अमर रहे

26 नवम्‍बर भारत के संविधान का महत्‍वपूर्ण दिवस है। बाबा साहेब के जीवन का महत्‍वपूर्ण दिवस है और इसलिए भारत सरकार ने 26 नवम्‍बर को पूरे देश में संविधान दिवस के रूप में मनाना तय किया और हिन्‍दुस्‍तान के बच्‍चे-बच्‍चे को स्‍कूल-कॉलेज में ही संविधान क्‍या है? कैसे बना? क्‍यों बना? ये बात बताने का ये Regular व्‍यवस्‍था होनी चाहिए और इसलिए हमारी सरकार ने 26 नवम्‍बर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का तय किया है।

मैं फिर एक बार आप सबका बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age: PM Modi
June 07, 2021
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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age
25 per cent vaccination that was with states will now be undertaken by Government of India: PM
Government of India will buy 75 per cent of the total production of the vaccine producers and provide to the states free of cost: PM
Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojna extended till Deepawali: PM
Till November, 80 crore people will continue to get free food grain every month: PM
Corona, Worst Calamity of last hundred years: PM
Supply of vaccine is to increase in coming days: PM
PM informs about development progress of new vaccines
Vaccines for children and Nasal Vaccine under trial: PM
Those creating apprehensions  about vaccination are playing with the lives of people: PM

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार! कोरोना की दूसरी वेव से हम भारतवासियों की लड़ाई जारी है।  दुनिया के अनेक देशों की तरह, भारत भी इस लड़ाई के दौरान बहुत बड़ी पीड़ा से गुजरा है। हममें से कई लोगों ने अपने परिजनों को, अपने परिचितों को खोया है। ऐसे सभी परिवारों के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं।

साथियों,

बीते सौ वर्षों में आई ये सबसे बड़ी महामारी है, त्रासदी है। इस तरह की महामारी आधुनिक विश्व ने न देखी थी, न अनुभव की थी। इतनी बड़ी वैश्विक महामारी से हमारा देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा है। कोविड अस्पताल बनाने से लेकर ICU बेड्स की संख्या बढ़ानी हो, भारत में वेंटिलेटर बनाने से लेकर टेस्टिंग लैब्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार करना हो, कोविड से लड़ने के लिए बीते सवा साल में ही देश में एक नया हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी। भारत के इतिहास में कभी भी इतनी मात्रा में मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी महसूस नहीं की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम किया गया। सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। बहुत ही कम समय में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के प्रॉडक्शन को 10 गुना से ज्यादा बढ़ाया गया। दुनिया के हर कोने से, जहां कही से भी, जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था उसको प्राप्त करने का भरसक प्रयास  किया गया, लाया गया। इसी तरह ज़रूरी दवाओं के production को कई गुना बढ़ाया गया, विदेशों में जहां भी दवाइयां उपलब्ध हों, वहां से उन्हें लाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी गई।

साथियों,

कोरोना जैसे अदृश्य और रूप बदलने वाले दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रभावी हथियार, कोविड प्रोटोकॉल है, मास्क, दो गज की दूरी और बाकी सारी सावधानियां उसका पालन ही है। इस लड़ाई में वैक्सीन हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह है। आज पूरे विश्व में वैक्सीन के लिए जो मांग है, उसकी तुलना में उत्पादन करने वाले देश और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं, इनी गिनी है। कल्पना करिए कि अभी हमारे पास भारत में बनी वैक्सीन नहीं होती तो आज भारत जैसे विशाल देश में क्या होता?  आप पिछले 50-60 साल का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाते थे। विदेशों में वैक्सीन का काम पूरा हो जाता था तब भी हमारे देश में वैक्सीनेशन का काम शुरू भी नहीं हो पाता था। पोलियो की वैक्सीन हो, Smallpox जहां गांव में हम इसको चेचक कहते हैं। चेचक की  वैक्सीन हो, हेपिटाइटिस बी की वैक्सीन हो, इनके लिए देशवासियों  ने दशकों तक इंतज़ार किया था। जब 2014 में देशवासियों ने हमें सेवा का अवसर दिया तो भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज, 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के ही आसपास था। और हमारी दृष्टि में ये बहुत चिंता की बात थी। जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा था, उस रफ्तार से, देश को शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब-करीब 40 साल लग जाते। हमने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष को लॉन्च किया। हमने तय किया कि मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन किया जाएगा और देश में जिसको भी वैक्सीन की जरूरत है उसे वैक्सीन देने का प्रयास होगा। हमने मिशन मोड में काम किया, और सिर्फ 5-6 साल में ही वैक्सीनेशन कवरेज 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। 60 से 90,  यानि हमने वैक्सीनेशन की स्पीड भी  बढ़ाई और दायरा भी बढ़ाया।

 हमने बच्चों को कई जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए कई नए टीकों को भी भारत के टीकाकरण अभियान का हिस्सा बना दिया। हमने ये इसलिए किया, क्योंकि हमें हमारे देश के बच्चों की चिंता थी, गरीब की चिंता थी, गरीब के उन बच्चों की चिंता थी जिन्हें कभी टीका लग ही नहीं पाता था। हम शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की तरफ बढ़ रहे थे कि कोरोना वायरस ने हमें घेर लिया। देश ही नहीं, दुनिया के सामने फिर पुरानी आशंकाएं घिरने लगीं कि अब भारत कैसे इतनी बड़ी आबादी को बचा पाएगा? लेकिन साथियों,जब नीयत साफ होती है, नीति स्पष्ट होती है, निरंतर परिश्रम होता है, तो नतीजे भी मिलते हैं। हर आशंका को दरकिनार करके भारत ने एक साल के भीतर ही एक नहीं बल्कि दो 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन्स लॉन्च कर दीं। हमारे देश ने, देश के वैज्ञानिकों ने ये दिखा दिया कि भारत बड़े बड़े देशों से पीछे नहीं है। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश में 23 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी हैं।

साथियों,

हमारे यहाँ कहा जाता है- विश्वासेन सिद्धि: अर्थात, हमारे प्रयासों में हमें सफलता तब मिलती है, जब हमें स्वयं पर विश्वास होता है। हमें पूरा विश्वास था कि हमारे वैज्ञानिक बहुत ही कम समय में वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर लेंगे। इसी विश्वास के चलते जब हमारे वैज्ञानिक अपना रिसर्च वर्क कर ही रहे थे तभी हमने लॉजिस्टिक्स और दूसरी तैयारियां शुरू कर दीं थीं। आप सब भली-भांति जानते हैं कि पिछले साल यानि एक साल पहले, पिछले साल अप्रैल में, जब कोरोना के कुछ ही हजार केस थे, उसी समय वैक्सीन टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया था। भारत में, भारत के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया। वैक्सीन निर्माताओं को क्लिनिकल ट्रायल में मदद की गई, रिसर्च और डवलपमेंट के लिए ज़रूरी फंड दिया गया, हर स्तर पर सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। 

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मिशन कोविड सुरक्षा के माध्यम से भी उन्हें हज़ारों करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गये। पिछले काफी समय से देश लगातार जो प्रयास और परिश्रम कर रहा है, उससे आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई और भी ज्यादा बढ़ने वाली है। आज देश में 7 कंपनियाँ, विभिन्न प्रकार की वैक्सीन का प्रॉडक्शन कर रही हैं। तीन और वैक्सीन का ट्रायल भी एडवांस स्टेज पर चल रहा है। वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की कंपनियों से भी वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इधर हाल के दिनों में, कुछ एक्सपर्ट्स द्वारा हमारे बच्चों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इस दिशा में भी 2 वैक्सीन्स का ट्रायल तेजी से चल रहा है। इसके अलावा अभी देश में एक 'नेज़ल' वैक्सीन पर भी रिसर्च जारी है। इसे सिरिन्ज से न देकर नाक में स्प्रे किया जाएगा। देश को अगर निकट भविष्य में इस वैक्सीन पर सफलता मिलती है तो इससे भारत के वैक्सीन अभियान में और ज्यादा तेजी आएगी।

साथियों,

इतने कम समय में वैक्सीन बनाना, अपने आप में पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। वैक्सीन बनने के बाद भी दुनिया के बहुत कम देशों में वैक्सीनेशन प्रारंभ हुआ, और ज्यादातर समृद्ध देशों में ही शुरू हुआ। WHO ने वैक्सीनेशन को लेकर गाइडलाइंस दीं। वैज्ञानिकों ने वैक्सीनेशन की रूप रेखा रखी। और भारत ने भी जो अन्य देशों की best practices थी , विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक  थे, उसी आधार पर चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन करना तय किया। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अनेकों बैठकों से जो सुझाव मिले, संसद के विभिन्न दलों के साथियों द्वारा जो सुझाव मिले, उसका भी पूरा ध्यान रखा। इसके बाद ही ये तय हुआ कि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए ही, हेल्थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के नागरिक, बीमारियों से ग्रसित 45 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिक, इन सभी को वैक्सीन पहले लगनी शुरू हुई। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोरोना की दूसरी वेव से पहले हमारे फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन नहीं लगी होती तो क्या होता? सोचिए, हमारे डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को वैक्सीन ना लगी तो क्या होता? अस्पतालों में सफाई करने वाले हमारे भाई-बहनों को, एंबुलेंस के हमारे ड्राइवर्स भाई - बहनों को वैक्सीन ना लगी होती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स का वैक्सीनेशन होने की वजह से ही वो निश्चिंत होकर दूसरों की सेवा में लग पाए, लाखों देशवासियों का जीवन बचा पाए।

लेकिन देश में कम होते कोरोना के मामलों के बीच, केंद्र सरकार के सामने अलग-अलग सुझाव भी आने लगे, भिन्न-भिन्न मांगे होने लगीं। पूछा जाने लगा, सब कुछ भारत सरकार ही क्यों तय कर रही है? राज्य सरकारों को छूट क्यों नहीं दी जा रही? राज्य सरकारों को लॉकडाउन की छूट क्यों नहीं मिल रही? One Size Does Not Fit All जैसी बातें भी कही गईं। दलील ये दी गई कि संविधान में चूंकि Health-आरोग्य, प्रमुख रूप से राज्य का विषय है, इसलिए अच्छा है कि ये सब राज्य ही करें। इसलिए इस दिशा में एक शुरूआत की गई। भारत सरकार ने एक बृहद गाइडलाइन बनाकर राज्यों को दी ताकि राज्य अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार काम कर सकें। स्थानीय स्तर पर कोरोना कर्फ्यू लगाना हो, माइक्रो कन्टेनमेंट जोन बनाना हो, इलाज से जुड़ी व्यवस्थाएं हो, भारत सरकार ने राज्यों की इन मांगों को स्वीकार किया।

साथियों,

इस साल 16 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल महीने के अंत तक, भारत का वैक्सीनेशन कार्यक्रम मुख्यत: केंद्र सरकार की देखरेख में ही चला। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने के मार्ग पर देश आगे बढ़ रहा था। देश के नागरिक भी, अनुशासन का पालन करते हुए, अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवा रहे थे। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने फिर कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सीनेशन के लिए Age Group क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सीनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया।

साथियों,

काफी चिंतन-मनन के बाद इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकारें अपनी तरफ से भी प्रयास करना चाहती हैं, तो भारत सरकार क्यों ऐतराज करे? और भारत सरकार ऐतराज क्यों करे? राज्यों की इस मांग को देखते हुए, उनके आग्रह को ध्यान में रखते हुए 16 जनवरी से जो व्यवस्था चली आ रही थी, उसमें प्रयोग के तौर पर एक बदलाव किया गया। हमने सोचा कि राज्य ये मांग कर रहे हैं, उनका उत्साह है, तो चलो भई 25 प्रतिशत काम उन्ही की शोपित कर दिया जाये, उन्ही को दे दिया जाए। स्वभाविक है, एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम उनके हवाले दिया गया, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपने-अपने तरीके से प्रयास भी किए। 

इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, ये भी उनके ध्यान में आने लगा, उनको पता चला। पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की क्या स्थिति है, इसकी सच्चाई से भी राज्य परिचित हुए। और हमने देखा, एक तरफ मई में सेकेंड वेव, दूसरी तरफ वैक्सीन के लिए लोगों का बढ़ता रुझान और तीसरी तरफ राज्य सरकारों की कठिनाइयां। मई में दो सप्ताह बीतते-बीतते कुछ राज्य खुले मन से ये कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था ही अच्छी थी। धीरे-धीरे इसमें कई राज्य सरकारें जुड़ती चली गईं। वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए, जो इसकी वकालत कर रहे थे, उनके विचार भी बदलने लगे। ये एक अच्छी बात रही कि समय रहते राज्य, पुनर्विचार की मांग के साथ फिर आगे आए। राज्यों की इस मांग पर, हमने भी सोचा कि देशवासियों को तकलीफ ना हो, सुचारू रूप से उनका वैक्सीनेशन हो, इसके लिए एक मई के पहले वाली, यानि 1 मई के पहले 16 जनवरी से अप्रैल अंत तक जो व्यवस्था थी, पहले वाली पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जाए।

 

साथियों,

आज ये निर्णय़ लिया गया है कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा जो 25 प्रतिशत काम था, उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी। ये व्यवस्था आने वाले 2 सप्ताह में लागू की जाएगी। इन दो सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नई गाइड-लाइंस के अनुसार आवश्यक तैयारी कर लेंगी। संयोग है कि दो सप्ताह बाद, 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी है। 21 जून, सोमवार से देश के हर राज्य में, 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के सभी नागरिकों के लिए, भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन मुहैया कराएगी। वैक्सीन निर्माताओं से कुल वैक्सीन उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार खुद ही खरीदकर राज्य सरकारों को मुफ्त देगी। यानि देश की किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। अब तक देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिली है।

 अब 18 वर्ष की आयु के लोग भी इसमें जुड़ जाएंगे। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार ही मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी। गरीब हों, निम्न मध्यम वर्ग हों, मध्यम वर्ग हो या फिर उच्च वर्ग, भारत सरकार के अभियान में मुफ्त वैक्सीन ही लगाई जाएगी। हां, जो व्यक्ति मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते, प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाना चाहते हैं, उनका भी ध्यान रखा गया है। देश में बन रही वैक्सीन में से 25 प्रतिशत,  प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल सीधे ले पाएं, ये व्यवस्था जारी रहेगी। प्राइवेट अस्पताल, वैक्सीन की निर्धारित कीमत के उपरांत एक डोज पर अधिकतम 150 रुपए ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी करने का काम राज्य सरकारों के ही पास रहेगा।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-प्राप्य आपदं न व्यथते कदाचित्, उद्योगम् अनु इच्छति चा प्रमत्तः॥ अर्थात्, विजेता आपदा आने पर उससे परेशान होकर हार नहीं मानते, बल्कि उद्यम करते हैं, परिश्रम करते हैं, और परिस्थिति पर जीत हासिल करते हैं। कोरोना से लड़ाई में 130 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अभी तक की यात्रा आपसी सहयोग, दिन रात मेहनत करके तय की है। आगे भी हमारा रास्ता हमारे श्रम और सहयोग से ही मजबूत होगा। हम वैक्सीन प्राप्त करने की गति भी बढ़ाएंगे और वैक्सीनेशन अभियान को भी और गति देंगे। हमें याद रखना है कि, भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार आज भी दुनिया में बहुत तेज है, अनेक विकसित देशों से भी तेज है। हमने जो टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाया है- Cowin, उसकी भी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। अनेक देशों ने भारत के इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में रुचि भी दिखाई है। हम सब देख रहे हैं कि वैक्सीन की एक एक डोज कितनी महत्वपूर्ण है, हर डोज से एक जिंदगी जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने ये व्यवस्था भी बनाई है कि हर राज्य को कुछ सप्ताह पहले ही बता दिया जाएगा कि उसे कब, कितनी डोज मिलने वाली है। मानवता के इस पवित्र कार्य में वाद-विवाद और राजनीतिक छींटाकशी, ऐसी बातों को कोई भी अच्छा नहीं मानता है। वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार, पूरे अनुशासन के साथ वैक्सीन लगती रहे, देश के हर नागरिक तक हम पहुंच सकें, ये हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रिय देशवासियों,

टीकाकरण के अलावा आज एक और बड़े फैसले से मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। पिछले वर्ष जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाना पड़ा था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 8 महीने तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन की व्यवस्था हमारे देश ने की थी। इस वर्ष भी दूसरी वेव के कारण मई और जून के लिए इस योजना का विस्तार किया गया था। आज सरकार ने फैसला लिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को अब दीपावली तक आगे बढ़ाया जाएगा। महामारी के इस समय में, सरकार गरीब की हर जरूरत के साथ, उसका साथी बनकर खड़ी है। यानि नवंबर तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को, हर महीने तय मात्रा में मुफ्त अनाज उपलब्ध होगा। इस प्रयास का मकसद यही है कि मेरे किसी भी गरीब भाई-बहन को, उसके परिवार को, भूखा सोना ना पड़े।

साथियों,

देश में हो रहे इन प्रयासों के बीच कई क्षेत्रों से वैक्सीन को लेकर भ्रम और अफवाहों की  चिंता बढ़ाती है। ये चिंता भी मैं आपके सामने व्यक्त करना चाहता हूं। जब से भारत में वैक्सीन पर काम शुरू हुआ, तभी से कुछ लोगों द्वारा ऐसी बातें कही गईं जिससे आम लोगों के मन में शंका पैदा हो। कोशिश ये भी हुई कि भारत के वैक्सीन निर्माताओं का हौसला पस्त पड़ जाए और उनके सामने अनेक प्रकार की बाधाएं आएं। जब भारत की वैक्सीन आई तो अनेक माध्यमों से शंका-आशंका को और बढ़ाया गया। वैक्सीन न लगवाने के लिए भांति-भांति के तर्क प्रचारित किए गए। इन्हें भी देश देख रहा है। जो लोग भी वैक्सीन को लेकर आशंका पैदा कर रहे हैं, अफवाहें फैला रहे हैं, वो भोले-भाले भाई-बहनों के जीवन के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

ऐसी अफवाहों से सतर्क रहने की जरूरत है। मैं भी आप सबसे, समाज के प्रबुद्ध लोगों से, युवाओं से अनुरोध करता हूँ, कि आप भी वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करें। अभी कई जगहों पर कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच से कोरोना चला गया है। हमें सावधान भी रहना है, और कोरोना से बचाव के नियमों का भी सख्ती से पालन करते रहना है। मुझे पूरा विश्वास है, हम सब कोरोना से इस जंग में जीतेंगे, भारत कोरोना से जीतेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत धन्यवाद!