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I thank the people of Rishikesh to have joined the programme at such a short notice: PM
Our sole agenda is -development, progress of the nation and welfare of people: PM Modi
Congress' anti-poor mind-set and negative politics is responsible for their fall: PM
Congress has let down the spirit of democracy by not letting the Parliament function: PM
Govt at Centre is committed to timely delivery of all schemes: PM Narendra Modi
We successfully implemented 'One Rank, One Pension'. Dignity of our armed forces is our prime focus: PM
After their defeat in polls, Congress party has been putting roadblocks in development of the country: PM
 

भारत माता की जय, भारत माता की जय!  

मंच पर विराजमान भाजपा के सभी वरिष्ठ नेतागण और विशाल संख्या में पधारे हुए प्यारे भाईयों और बहनों

चुनाव का बुखार चढ़ा हो, चारों तरफ चुनाव की धूम हो और पक्ष-विपक्ष में प्रचार अभियान तेज हो तो ऐसे समय गर्माए हुए माहौल में कोई 24 घंटे पहले सभा करने को कहे तो पार्टी के लोग कहेंगे कि कुछ दिन और दे दीजिए, अगले सप्ताह भेज दीजिए। आपने ये 24 घंटे में जो कमाल किया है... जहाँ भी नजर दौड़ रही है, माथे ही माथे नजर आ रहे हैं। जब मैं हेलिपैड से यहाँ आया तो पूरे रोड पर दोनों तरफ भीड़ लगी हुई थी। देवभूमि के मेरे प्यारे भाईयों-बहनों, प्रधानमंत्री बनने के बाद यह मेरी पहली यात्रा है और आपने जो स्वागत-सम्मान किया, जो प्यार दिया; वो मैं कभी भूल नहीं सकता। चुनाव में सभाएं होती हैं लेकिन ऐसे सहज वातावरण में इतना बड़ा जन सैलाब; मैं आप सभी लोगों एवं पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को ह्रदय से अभिनंदन करता हूँ।

मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि देश के विकास के लिए कार्य करने में कोई कोर-कसर नहीं रहेगी। सवा साल के कार्यकाल में आपने देखा होगा... मैंने देशवासियों से कहा था कि मैं परिश्रम की पराकाष्ठ करूँगा। अब तो मेरी बात का विश्वास है? पल-पल आपके लिए खपा रहा हूँ? जिम्मेवारी निभाने का पूरा प्रयास कर रहा हूँ? मैंने वादा किया था कि मैं चैन से नहीं बैठूँगा। आज मैं पांच राज्यों की यात्रा करके आया हूँ। सरकार में जनता का विश्वास है, आज मैं देख रहा हूँ। आज जन-मन इतना बदला है कि मैं एक इच्छा करूँ तो मेरे देशवासी पूरी ताकत लगाकर उसे पूरी कर देते हैं।

कुछ पहले तक यह स्थिति थी कि बालिकाएं तीसरी-चौथी कक्षाओं तक आते-आते स्कूल छोड़ देती थीं और अगर हमारी बालिकाएं अशिक्षित रहेंगी तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अशिक्षित रहेंगी। हमारी बेटियां पढ़नी चाहिए। हमारे ध्यान में आया कि बेटियां स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं क्योंकि स्कूलों में उनके लिए अलग से शौचालय नहीं हैं। ये शर्म की बात है कि नहीं है? हमें आजादी को मिले 65 साल से भी ज्यादा समय हो गया लेकिन बालिकाओं के लिए स्कूलों में अलग से शौचालय नहीं बने। हमने निर्णय किया कि हम इस काम को 1 साल में पूरा करेंगे। लोग कहते थे कि मोदी जी जो 60 साल में नहीं हुआ, वो 1 साल में कैसे होगा। मैंने कहा कि ये मैं नहीं बल्कि मेरे देशवासी पूरा करेंगे और आज मैं गर्व से कहता हूँ कि करीब-करीब सवा चार लाख शौचालय बनाने का काम एक साल के भीतर-भीतर हमने पूरा किया।

बैंकों का जब राष्ट्रीयकरण हुआ तो यह कहा गया था कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसलिए किया जाता है ताकि बैंक गरीबों के काम आए और गरीब बैंकों के दरवाजे पर जा सके लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी यहाँ की आधी आबादी ऐसी थी जिसने कभी बैंक का दरवाजा नहीं देखा। हमने निर्णय किया कि बैंकों के पैसों पर अगर पहला किसी का अधिकार है तो देश के गरीबों, किसानों, नौजवानों और देश की माता-बहनों का है। हमने प्रधानमंत्री जन-धन योजना शुरू की। 26 जनवरी के पहले काम पूरा करने का निर्णय किया और आज मुझे आपको हिसाब देते हुए गर्व होता है कि 100 दिन के भीतर पूरे देश में आंदोलन चल पड़ा और करीब 17 करोड़ जन-धन खाते खुले।

मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था; नया-नया था तो अनुभव भी कम था; विधानसभा में हमने घोषणा की कि हम 24 घंटे बिजली देंगे। गुजरात में उस समय 24 घंटे बिजली नहीं आती थी। हमने जब घोषणा की तो कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता हमसे मिलने आये। उन्होंने कहा कि मोदी जी आपसे कोई गलती हो गई है। मैंने उनसे पूछा – कौन सा? उन्होंने कहा कि आप नए आए हो; किसी ने आपको गुमराह किया है या आपने गलत हाथ पकड़ लिया है। मैंने कहा – कौन सी? उन्होंने कहा, 24 घंटे बिजली देने की जोकि संभव ही नहीं है; आप विफल हो जाओगे और अभी तो आपकी शुरुआत है; आपकी राजनीति ख़त्म हो जाएगी; आपको किसी ने गलत सलाह दी है। मैंने कहा, नेताजी आपने मुझे जो मार्गदर्शन दिया, मैं उसका बहुत आभारी हूँ। वे राजनीति करने नहीं आये थे। ईमानदारी से मेरे कमरे में आकर मुझे कान में बता रहे थे। मैंने उनसे कहा कि हाँ, 24 घंटे बिजली पहुँचाना काम कठिन तो है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि लोगों ने कठिन काम के लिए मुझे यहाँ भेजा है।

भाईयों-बहनों, मैं आज देश के लिए सपना देख रहा हूँ कि 2022 में आजादी के 75 साल पूरे होने पर जब हम आजादी के वीरों को याद करेंगे तो हम उन्हें ऐसा हिन्दुस्तान देना चाहते हैं जहाँ घरों में 24 घंटे बिजली आती हो। भाईयों-बहनों, हमने ठान लिया है कि 2022 में दूर पहाड़ी क्षेत्रों में भी रहने वाले लोगों को भी हम 24 घंटे बिजली मुहैया कराएंगे। इस काम को करने के लिए जब मैं मीटिंग करता हूँ तो मुझे पता चला कि अभी भी हमारे देश में 18 हजार गाँव ऐसे हैं जहाँ न बिजली का खंभा पहुंचा है और न बिजली की तार पहुंची है और ये संख्या कम नहीं है। सबने कहा कि ये लगेगा, वो लगेगा; मैंने कहा, कुछ नहीं, जो होना है, होगा; जो करना है, कीजिये; मैं एक ही भाषा समझता हूँ कि 1000 दिन में 18 हजार गांवों में मुझे बिजली पहुंचानी है। आज मैं इस पूरे काम को मॉनिटर कर रहा हूँ कि काम शुरू हुआ है कि नहीं; तारें पहुंची कि नहीं। हर बात के पीछे सरकार एक समयबद्ध कार्यक्रम लेकर चल रही है और उस काम को आगे बढ़ाने की दिशा में हम तैयारी कर रहे हैं।

मैं चुनाव में जब आया था तो उत्तराखंड की धरती जहाँ परमात्मा हमारी रक्षा करता है और यहाँ नीचे जवान हमारी रक्षा करते हैं; ऊपर में बाबा केदारनाथ, बाबा बद्रीनाथ का हमें आशीर्वाद मिलता है और नीचे... यहाँ शायद ही कोई घर होगा जिसमें कोई जवान नहीं हो और जो देश की सेवा में जुटा न हो।

मैं उत्तराखंड में जब चुनावी सभाओं में आता था तो ‘वन रैंक, वन पेंशन’ की बात करता था। कांग्रेस ने इसके लिए 500 करोड़ का बजट रखा था जिसपर वे खूब वाहवाही लूटते थे। हमारे कुछ जवान भी उनकी जय-जयकार करने लग गए थे कि ‘वन रैंक, वन पेंशन’ के लिए इतना बजट हो गया। मैंने सोचा कि इससे थोड़ा ज्यादा खर्चा हो जाएगा, 1000 करोड़ या 1500 करोड़। फिर कमिटी ने कहा कि 265 करोड़ और लगेंगे, मैंने कहा ठीक है लेकिन जब हिसाब करने बैठे तो मामला 10 हजार करोड़ तक पहुँच गया। भारत जैसे देश के लिए 10 हजार करोड़ कोई मामूली रकम नहीं है। ये बहुत बड़ी रकम है लेकिन हमारे जवानों का सम्मान उससे भी बड़ा है। इसलिए हमने निर्णय किया है हमारे देश के जवानों को इसका लाभ मिले लेकिन अभी भी जिन लोगों को लगता था कि ये तो कभी होने वाला नहीं है और उन्हें पता भी था कि इतना खर्च होगा, उन्हें आंदोलन चलाने में अभी भी मजा आता है, वे अभी भी आंदोलन चला रहे हैं।

देश में नकारात्मक राजनीति कभी चल नहीं सकती। ये कांग्रेस का फार्मूला है और इसलिए कभी 400 सांसदों वाली कांग्रेस आज 40 पर सिमट गई है और ये इसलिए हो रहा है क्योंकि वे नकारात्मक राजनीति पर तुले हुए हैं और हर बात का विरोध करते हैं। लोकतंत्र में विरोधी दल का काम है – विरोध करना लेकिन नकारात्मक राजनीति और विरोध करने में बहुत बड़ा अंतर है। संसद चलने नहीं दी; उत्तराखंड के विषयों की चर्चा होनी चाहिए जो उन्होंने होने नहीं दी। आपने इतने सांसद चुन करके भेजे लेकिन संसद के अंदर उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया गया। क्या ये नकारात्मक राजनीति लोकतंत्र का भला करेगी? संसद चलनी चाहिए कि नहीं चलनी चाहिए? मान हो, मदद हो, सम्मान हो, यही तो लोकतंत्र का धर्म है लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिये, इतने साल जो सत्ता में रहे, उनको विरोध करना, विरोध में बैठना रास नहीं आ रहा। वो जैसे थे, वैसे ही हैं। उन्हें लगता है कि ये तो उनकी पारिवारिक संपत्ति है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्हें ही मिलनी चाहिए; उनसे कौन छीन सकता है, वो भी मोदी, चायवाला, एक गरीब का बेटा। उनकी गरीब-विरोधी और सामंतशाही मानसिकता नहीं चलेगी।

देश में पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई है; जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से आई है। हम यहाँ किसी का हक़ छीन करके नहीं आए हैं। हमारा दायित्व बनता है – जनता की आशा-आकांक्षाओं को पूरा करना और ईश्वर ने जितनी शक्ति और सामर्थ्य दिया है, उसका प्रयोग करते हुए देश का भला करना लेकिन कांग्रेस वाले समझें कि नकारात्मक राजनीति का परिणाम क्या होता है। जिस कांग्रेस पार्टी का पंचायत से लेकर संसद तक झंडा झुकता नहीं था, वो आज नजर नहीं आते हैं। अभी पार्लियामेंट में इतना तूफ़ान किया; संसद चलने नहीं दी; जितनी प्रकार की गालियां मुझे दे सकते थे, सारी दे दी। रोज डिक्शनरी लेकर बैठते हैं कि आज कौन सी गाली दूं। इतना सारा करने के बावजूद अभी मध्यप्रदेश में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए थे; उसमें क्या हुआ, ख़त्म हो गए न। अभी राजस्थान में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए; क्या हुआ कांग्रेस का, लोगों ने ख़त्म कर दिया न। उसी तरह बंगलौर में भी उनका यही हाल हुआ।

कांग्रेस अपने वरिष्ठ नेताओं से कुछ सीखें। चुनाव में जय-पराजय तो होती रहती है। हमारी भी हुई थी; हम तो कभी पार्लियामेंट में 2 ही लोग थे; अटल जी समेत सब हार गए थे लेकिन हमने जनता का विश्वास जीतने के लिए मेहनत की। हम जनता के सवालों को लेकर चलते रहे और कभी नकारात्मक राजनीति नहीं की और यही जनता-जनार्दन है जिसने हमें सर-आँखों पर बिठा दिया।

मेरे भाईयों-बहनों, हमारा एक ही मकसद है – विकास। देश का कल्याण करना हो या नौजवानों को रोजगार दिलाना हो, विकास के बिना संभव नहीं है। ये लोग विकास के हर रास्ते में आड़े आ रहे हैं और उनका इरादा देश की प्रगति को रोकना है। भाजपा को नहीं रोक पाए तो अब देश को रोक रहे हैं। चुनाव में जनता ने उन्हें हरा दिया तो अब वे जनता से बदला लेने, उन्हें सजा देने और उनके कामों को रोकने पर तुले हुए हैं। मुझे विश्वास है कि देश की जनता नकारात्मक राजनीति करने वालों को पहचानेगी, उन्हें आगे आने वाले दिनों में भी सबक सिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। आप लोगों ने इतना स्वागत और सम्मान किया, मैं आपका बहुत आभारी हूँ।   

भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय!

बहुत-बहुत धन्यवाद!

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Venkaiah ji’s quality of always staying active will keep him connected to public life for a long time to come: PM
August 08, 2022
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“Venkaiah ji’s quality of always staying active and engaged will keep him connected to public life for a long time to come”
“We should always try to fulfil the expectations that he has from all the Parliamentarians”
​​​​​​​“Initiatives like ‘Bhashini’ and annual compendium of new words emerging from Parliamentary debates will carry forward Venkaiah ji’s legacy of love for the mother tongue”

आदरणीय उपराष्‍ट्रपति जी, मंचस्‍थ सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, उपस्थित सभी गणमान्‍य सांसदगण, अन्‍य सभी महानुभाव।

जितना मैं वैंकेया जी को जानता हूं, मुझे नहीं लगता है कि विदाई संभव है। 11 तारीख के बाद आप जरूर अनुभव करेंगे कि किसी न किसी काम से आप के पास फोन आएगा, आपके विषय में कोई जानकारी लेनी होगी, सुख-दुख की बात होगी तो तुरंत पूछेंगे। यानी एक प्रकार से वो हल पल सक्रिय रहते हैं, हर पल हर किसी के बीच होते हैं और ये उनकी बड़ी विशेषता रही है। उनके जीवन की भी क्षमता को अगर हम देखें, मैं जब पार्टी संगठन का काम करता था और उस समय अटलजी की सरकार बनी। मंत्रीपरिषद की रचना हो रही थी, मैं संगठन का काम करता था तो मेरा और वैंकेया जी के बीच संवाद जरा अधिक रहता था। उन्‍होंने मुझे कहा कि वैसे तो ये प्रधानमंत्री का ही अंतिम निर्णय होता है कि कौन मंत्री बनेगा, किस मंत्री को क्‍या काम मिलेगा, कौन सा डिपार्टमेंट रहेगा और ये भी तय था कि साउथ में से वैंकेया जी जैसे वरिष्‍ठ नेता का मंत्री होना तय था। लेकिन वो चाहते थे कि बहुत बड़ा तामझाम वाला जरा ग्लैमरस, ऐसा कोई डिपार्टमेंट से मुझे बचाइए और बोले अगर प्रधानमंत्री जी को बुरा न लगे तो मेरी इच्‍छा है कि मेरे मन का काम अगर है वो ग्रामीण विकास है, अगर ग्रामीण विकास का काम मुझे मिले तो मैं करना चाहता हूं। यानी ये passion, ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है।

अटलजी को वैंकेया जी की और भी जरूरतें थीं, लेकिन चूंकि उनका मन ये था तो अटलजी ने उस प्रकार से निर्णय भी किया और उस काम को बखूबी वैंकेया जी ने निभाया। अब और एक विशेषता देखिए, वैंकेया जी शायद एक ऐसे व्‍यक्ति हैं कि जिन्‍होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय तो देखा ही देखा, शहरी विकास भी देखा। यानी एक प्रकार से विकास के जो दोनों प्रमुख पहलु कहें, उसमें उन्‍होंने अपनी महारत दिखाई।

वे पहले ऐसे उपराष्‍ट्रपति थे, राज्‍यसभा के पहले सभापति थे, जो राज्‍यसभा के मेंबर रहे। बाकी ये सौभाग्‍य बहुत कम लोगों को मिला, शायद अकेले वैंकेया जी को मिला। अब जो स्‍वयं लंबे समय तक राज्‍यसभा में रहे हों, जो पार्लियामेंटरी अफेयर्स के रूप में कार्यभार देख चुके हों, इसका मतलब है कि उनको सदन में क्‍या-क्‍या चलता है, परदे के पीछे क्‍या-क्‍या चलता है, कौन सा दल क्‍या करेगा, ट्रेजरी बेंच की तरफ से क्‍या होगा, सामने से क्‍या होगा, वो उठकर उसके पास गया मतलब ये खुराफत कुछ चल रही है, इन सारी बातों का उनको भलीभांति अंदाज था और इसलिए सभापति के रूप में दोनों तरफ उनको पता रहता था आज ये करेंगे। और ये उनका जो अनुभव था वो ट्रेजरी बेंच के लिए उपयोगी होता था तो विपक्ष के मित्रों के लिए परेशानी का भी कारण बनता था कि पता चल जाता था। लेकिन उन्‍होंने सदन को और अधिक सक्षम बनाना, सांसद का बेस्‍ट देश को कैसे मिले, ये उसकी चिंता है। पार्लियामेंटरी कमिटीज अधिक productive हो, आउटकम ओरिएंटेड हो और वैल्‍यू एडीशन करने वाली हो। शायद वैंकेया जी पहले ऐसे सभापति रहे होंगे जिन्‍होंने पार्लियामेंटरी कमीटीज के फंक्‍शन के संबंध में भी इतनी चिंता की होगी और राजी-नाराज़गी व्‍यक्‍त करते हुए उसमें सुधार लाने का एक निरंतर प्रयास किया।

मैं आशा करता हूं कि आज जब हम वैंकेया जी के कार्यों की सराहना करते हैं तो साथ-साथ हम संकल्‍प भी करें कि सभापति के रूप में एक सांसद के नाते हम लोगों से उनकी जो अपेक्षाएं रही हैं उन अपेक्षाओं को परिपूर्ण करके सच्‍चे अर्थ में उनकी सलाह को हम जीवन में यादगार बनाएंगे तो मैं समझता हूं बहुत बड़ी सेवा होगी।

वैंकेया जी समय का सर्वाधिक उपयोग कैसे हो उनके व्‍यक्तिगत जीवन में बहुत यात्रा करना, स्‍थान-स्‍थान पर खुद जाना तो उनके पिछले पांच दशक की जिंदगी रही। लेकिन जब कोरोनाकाल आया, हम लोग मजाक में एक बार बैठे थे तो बातें चल रही थीं। मैंने कहा इस कोरोना के कारण और इस लॉकडाउन के कारण सबसे ज्‍यादा मुसीबत किसको आएगी, मैंने अपने साथियों को पूछा था। सब लोगों को लगा‍ कि मोदीजी ये क्‍या पूछ रहे हैं। मैंने कहा कल्‍पना कीजिए, सबसे ज्‍यादा तकलीफ किसको आएगी, तो कोई जवाब मिला नहीं। मैंने कहा कि इस परिस्थिति की सबसे ज्‍यादा मुसीबत अगर किसी को आएगी तो वैंकेया नायडू को आएगी। क्‍योंकि वो इतनी दौड़धूप करने वाले व्‍यक्ति, उनके लिए एक जगह पर बैठना, ये बहुत बड़ा punishment का कालखंड था उनके लिए। लेकिन वे innovative भी हैं और उसके कारण उन्होंने इस कोरोना कालखंड का एक बड़ा रचनात्‍मक उपयोग किया। उन्‍होंने, मैं एक शब्‍द प्रयोग करना चाहूंगा, बहुत से वो विद्वान लोगों की नजर में ठीक‍ होगा‍ कि नहीं, मैं नहीं जानता हूं, लेकिन वो टेली यात्रा करते थे। वो टेली यात्रा, उन्‍होंने क्‍या किया, सुबह टेलीफोन डायरी लेकर बैठते थे और पिछले 50 साल में देश में भ्रमण करते-करते सार्वजनिक जीवन में, राजनीतिक जीवन में जिन-जिन लोगों से उनका संबंध आया, उसमें जो वरिष्‍ठ लोग थे, daily 30, 40, 50 लोगों को फोन करना, उनके हाल पूछना, कोरोना के कारण कोई तकलीफ तो नहीं है इसकी जानकारी प्राप्‍त करना और हो सके तो मदद करना।

उन्‍होंने समय का इतना सदुपयोग किया था लेकिन उन दूर-सुदूर इलाकों में छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं को जब उनका टेलीफोन आता था तो वो तो ऊर्जा से भर जाता था। इतना ही नहीं, शायद ही कोई एमपी ऐसा होगा कि जिन्‍होंने कोराना काल में वैंकेया जी की तरफ से फोन उनको न आया हो, उनकी खबर न पूछी हो, वैक्‍सीनेशन की चिंता न की हो। यानी एक प्रकार से परिवार के मुखिया की तरह उन्‍होंने सबको संभालना, सबकी चिंता करने का भी उनका प्रयास रहा।

वैंकेया जी की एक विशेषता है, मैं जो कहता हूं ना कि वो कभी हमसे अलग हो ही नहीं सकते और उसका मैं उदाहरण बता रहा हूं। एक बार इलेक्‍शन कैंपेन के लिए वो बिहार गए हुए थे। अचानक उनके हेलीकॉप्‍टर को लैंडिंग करना पड़ा, खेत में उतरना पड़ा। अब वो इलाका भी थोड़ा चिंताजनक था, थोड़े सिक्‍योरिटी के भी इशू खड़े हो जाएं इस प्रकार का था। लेकिन नजदीक के एक किसान ने आ करके उनकी मदद की, मोटरसाइकिल पर उनको नजदीक के पुलिस थाने तक ले गया।

अब भारत के सार्वजनिक जीवन के हिसाब से देखें तो वैंकेया जी बहुत बड़े व्‍यक्ति हैं लेकिन आज भी उस किसान परिवार से उनका जीवंत नाता है। यानी बिहार के दूर-सूदूर ग्रामीण जीवन में एक घटना के समय किसी की मदद मिली। वो मोटरसाइकिल वाला किसान आज भी वैंकेया जी के साथ मेरी बात होती है, लगातार होती है, इस प्रकार का गर्व से बात करे, ये वैंकेया जी की विशेषता है।

और इसलिए मैं कहता हूं क्‍योंकि हमेशा हमारे बीच एक सक्रिय साथी के रूप में रहेंगे, मार्गदर्शक के रूप में रहेंगे, उनका अनुभव हमारे लिए काम आता रहेगा। आने वाला उनका कार्यकाल अधिक अनुभव के साथ अब वैंकेया जी समाज की एक नई जिम्‍मेदारी की तरफ आगे बढ़ रहे हैं तब। ये बात सही है, आज सुबह जब वो कह रहे थे तो उनका उन्‍होंने भई मुझे जब ये दायित्‍व आया तो मेरा एक पीड़ा का कारण ये था कि मुझे मेरी पार्टी से इस्‍तीफा देना पड़ेगा। जिस पार्टी के लिए मैंने जीवन खपा दिया, इससे मुझे इस्‍तीफा देना पड़ेगा। उसका मुझे कोई वो संवैधानिक आवश्‍यकता थी तो। लेकिन मुझे लगता है कि वो पांच साल की जो कमी है वैंकेया जी जरूर भरपाई कर देंगे, जरूर उन पुराने सारे साथियों को प्रेरित करना, प्रोत्‍साहित करना, पृस्कृत करने का उनका काम निरंतर जारी रहेगा। मेरी तरफ से, आप सबकी तरफ से वैंकेया जी का जीवन हम लोगों के लिए बहुत बड़ी अमानत है, बहुत बड़ी विरासत है। उनके साथ जो कुछ भी हमने सीखा है उसको हम आगे बढ़ाएं।

भाषा के प्रति उनका जो लगाव है और उनहोंने मातृभाषा को जिस प्रकार से प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है उसको आगे बढ़ाने के और भी प्रयास होंगे।

मैं आप में से शायद लोगों को अगर रूचि हो तो मैं आग्रह करूंगा कि ''भाषिणी'' एक वेबसाइट भारत सरकार ने लॉन्‍च की हुई है, इस ''भाषिणी'' में हम भारतीय भाषाओं को, उसकी समृद्धि को और हमारी अपनी ही भाषाओं को एक भाषा में से दूसरी भाषा में अगर interpretation करना है, ट्रांसलेशन करना है, उसमें सारी व्‍यवस्‍था है। एक बहुत ही अच्‍छा टूल बना हुआ है जो हम लोगों को काफी काम आ सकता है। लेकिन उसमें से मुझे एक और विचार आया है, मैं चाहूंगा कि स्‍पीकर महोदय भी और हरिवंश जी भी, हरिवंश जी तो उसी दुनिया के व्‍यक्ति हैं, जरूर इस दिशा में काम हो सकता है। दुनिया में डिक्‍शनरी में नए शब्‍द जोड़ने की परंपरा रही है। और officially announce भी होता है, एक बड़ा इसका महात्‍मय होता है जब फलाने देश की फलानी भाषा का फलाना वर्ड अब अंग्रेजी की उस डिक्‍शनरी में स्‍थान प्राप्‍त कर रहा है, उसका गौरव भी होता है। जैसे हमारा गुरू शब्‍द वहां की अंग्रेजी डिक्‍शनरी में उसका हिस्‍सा बन चुका है, ऐसे कई शब्‍द होते हैं।

हमारे यहां जो मातृभाषा में भाषण हो दोनो सदनों में उसमें कई लोगों के पास से बहुत बढ़िया शब्‍द निकले, निकलते हैं। और और भाषा के लोगों के लिए वो शब्‍द बड़ा सार्थक भी लगता है और बड़ा interesting लगता है। क्‍या हमारे दोनों सदन हर साल इस प्रकार के नए शब्‍द कौन से आ रहे हैं, जो सचमुच में हमारी भाषा वैविध्‍य को ले करके आते हैं, नए तरीके से आते हैं, उसका संग्रह करके चलें, और हर वर्ष एक बार अच्‍छे शब्‍दों का संग्रह की परंपरा खड़ी करें ताकि हमारी मातृभाषा से जो वैंकेया जी का लगाव रहा है, उनकी इस legacy को हम आगे बढ़ाएं। और जब भी हम इस काम को करेंगे, हमें हमेशा वैंकेया जी की बातें याद आएंगी और एक जीवंत काम हम खड़ा कर देंगे।

मैं फिर एक बार आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं। वैंकेया जी को, उनके पूरे परिवार को अनेक-अनेक शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।