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PM addresses at the Birth Centenary function of Shri Girdhari Lal Dogra in Jammu & Kashmir
PM Narendra Modi pays tribute to Shri Girdhari Lal Dogra
There is no question of political untouchability. Everyone who worked for the nation has to be respected: PM

उपस्थित प्‍यारे भाईयों और बहनों।

यह कार्यक्रम, गिरधारी लाल जी के नाम पर जो ट्रस्‍ट चल रहा है, उनके द्वारा आयोजित किया गया है और उनका यह शताब्‍दी वर्ष है। आमतौर पर राजनीति का दुर्भाग्‍य ऐसा है कि मरने के बाद बहुत ही कम राजनेता जीवित रहते हैं। कुछ ही समय में वो भुला दिए जाते हैं। लोग भी भूल जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे अपवाद होते हैं, जो अपने कार्यकाल में जो कार्य करते हैं। जिस प्रकार का जीवन जीते हैं, जिसके कारण मृत्‍यु के कई वर्षों के बाद भी वो जीवित रहते हैं और मैं मानता हूं कि गिरधारी लाल जी उसमें से एक हैं।

मैं कल यहां आने से पूर्व देख रहा था उनके जीवन की तरफ, वे सार्वजनिक जीवन में देशभक्ति की प्रेरणा से आए थे। वे तब सार्वजनिक जीवन में आए थे, जब लेना, पाना, बनना दूर-दूर तक नजर नहीं आता था। उस समय वो सार्वजनिक जीवन में आए थे और लाहौर की धरती पर आजादी के आंदोलन के साथ अपने को जोड़ा था, विद्यार्थी काल में भी उन्‍होंने आजादी के लिए कुछ न कुछ करना इस प्रबल भावना के साथ अपने आप को जोड़ दिया था। और बाद में राजनीतिक यात्रा में जीवन का अधिकतम समय उनको सत्‍ता में रहने का अवसर मिला है। जिसमें 26 बार बजट देने का सौभाग्‍य शायद ही दो-चार लोगों को मिला नहीं है। 26 बार बजट देने के पीछे की दो बात साबित होती है, एक तो राजनीतिक जीवन में स्‍वीकिृति और स्थिरता और दूसरी जो दायित्‍व मिला है उसके प्रति expertise और समर्थन, तभी जाकर के होता है। otherwise तो लोग आते हैं, जाते हैं, बनते हैं, बदलते हैं यह रहता है। लेकिन मूलभूत बातें जब होती हैं तभी यह संभव होता है।



और आज शायद जम्‍मू-कश्‍मीर में दो या तीन पीढ़ी ऐसी होगी सार्वजनिक जीवन में जो गर्व से कहते होंगे कि मुझे गिरिधारी लाल जी की उंगली पकड़कर चलने का सौभाग्‍य मिला था। मेरे राजनीतिक जीवन को shape देने का प्रारंभ उन्‍हीं के हाथों से हुआ था। जैसे अभी गुलाम नबी जी बता रहे थे कि उन्‍होंने मुझे तैयार किया। यह भी उनकी एक सफलता है कि अपने पीछे एक ऐसे कार्यकर्ताओं की परंपरा तैयार करना जो आगे चलकर के राजनीतिक जीवन को आगे बढ़ाए और इस दृष्टि से भी वे सिर्फ राजनेता नहीं लेकिन एक सार्वजनिक जीवन में निरंतर चेतना बनाए रखने का प्रयत्‍न करने वाले उन व्‍यक्तियों में से थे, जिन्‍होंने पीढि़यों को तैयार करने की चिंता की।

मैं अभी यहां आया तो मैंने पहले उनकी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और प्रदर्शनी देख रहा था। एक बात मेरे मन को छू गई उस प्रदर्शनी में और छू इसलिए गई कि आज के राजनीतिक जीवन में वो नजर नहीं आता है। मैंने उनकी राजनीतिक यात्रा की जितनी तस्‍वीरें देखी उन तस्‍वीरों में उनके परिवार का एक भी व्‍यक्ति कहीं नजर नहीं आता है। यह छोटी बात नहीं है। यह बहुत बड़ी बात है कि इतना लम्‍बे समय का सार्वजनिक जीवन हो, राजनीतिक जीवन हो, सत्‍ता के गलियारों में हो। देश के सभी पहले प्रधानमंत्रियों के साथ निकट संबंध रहा हो, लेकिन कहीं पर भी राजनीतिक यात्रा में एक भी तस्‍वीर में परिवार मुझे नजर नहीं आया। मैं कल्‍पना कर सकता हूं कि यह कठिन काम होता है, सरल नहीं होता। अपनों की थोड़ी बहुत इच्‍छा रहती है। लेकिन अपने काम के समय भई आप अपनी जगह पर जब घर आउंगा तब ठीक है। परिवार के जन दिखाई दिए एक तस्‍वीर में, कब? जब उनकी अन्‍त्‍येष्टि की यात्रा की तस्‍वीर है, सिर्फ वहीं परिवार जन दिखाई दे रहे हैं। आज के राजनीतिक जीवन के लिए यह अपने आप में संदेश है। कभी-कभार लोगों को लगता है कि भई यह शताब्‍दी मनाना वगैरह क्‍या होता ? मैं मानता हूं कि यही सबसे बड़ा सबक होता है कि जब उनके जीवन को याद करते हैं, जो आज नजर नहीं आता है, वो वहां नजर आता है तो शायद कभी उस प्रकार से जीने की इच्‍छा कर जाती है। उस प्रकार से कुछ काम करने की इच्‍छा जग जाती है। वहीं से प्रेरणा मिल जाती है और उस अर्थ में मैं मानता हूं कि उन्‍होंने सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं का पालन पल-पल किया होगा। हर गतिविधि में इस बात का ध्‍यान रखा होगा और तब जाकर के इतने लम्‍बे कार्यकाल में यह संभव हुआ होगा।

मुझे और एक बात भी नजर आती है कि डोगरा साहब को व्‍यक्तियों की परख बड़ी पक्‍की होगी, ऐसा मुझे लगता है। जैसे उन्‍होंने गुलाम नबी जी को युवा मोर्चा का अध्‍यक्ष बना दिया, तो व्‍यक्तियों की परख बहुत ही अच्‍छी रहती होगी। वो बराबर नाप लेते होंगे कि व्‍यक्ति ठीक है या नहीं है। और उसका उदाहरण है उन्‍होंने जो दामाद चुने हैं। यह उनकी….वरना अरूण जी की विचारधारा को और उनकी राजनीतिक विचारधारा का कोई मेल नहीं था। उसके बावजूद भी कुर्सी दे कि न दें, बेटी तो दी। और यह भी विशेषता है कि दामाद ससुर के कारण नहीं जाने जाते और ससुर दामाद के कारण नहीं जाने जाते। वरना इतने साल के सार्वजनिक जीवन में अरूण जी को कभी तो मन कर गया होगा कि ससुर इतनी बड़ी जगह पर बैठे हैं, लेकिन उन्‍होंने भी अपने आप को दूर रखा और उन्‍होंने भी इनको दूर रखा। आप अपना भाग्‍य अपने खुद तय कीजिए मेरा जिम्‍मा मैं निभाऊंगा और आज तो हम जानते हैं कि दामादों के कारण क्‍या-क्‍या बातें होती हैं। और इसलिए मैं कहता हूं कि किस दल से थे, किस विचार से जुड़े थे, किसके नेतृत्‍व में काम करते थे इसके आधार पर सार्वजनिक जीवन नहीं चलता है।



और सार्वजनिक जीवन में एक अहम आवश्‍यकता है आज देश में, जो चिंता का विषय है। हम हमारी विरासत को बंटने न दें। कभी-कभार तो हर कोई सार्वजनिक जीवन का व्‍यक्ति अपने-अपने कालखंड में अपनी-अपनी विचारधारों को लेकर काम किया, लेकिन वो जीता है देश के लिए, मरता है देश के लिए। हम जो आज की पीढ़ी के लोग हैं उनका काम नहीं है कि उनके लिए हम दीवार पैदा करें, हमारे लिए तो वो सभी महापुरूष हैं, उन सभी महापुरूषों ने, जिसके लिए देश के लिए काम किया है आदर और गौरव का विषय होना चाहिए, इसमें कभी छुआछूत नहीं होना चाहिए। वो नेशनल कांफ्रेंस में थे या कांग्रेस में थे, प्रधानमंत्री को आना चाहिए कि नहीं आना चाहिए। सवाल यह नहीं है आना इसलिए चाहिए कि उन्‍होंने अपनी जवानी देश के लिए खपाई थी।

और इसलिए हमारी विरासतें कभी बंटनी नहीं चाहिए। किसी भी विचार में न हो, मुझे याद है जब अटल जी की सरकार बनी, पहली बार अटल जी प्रधानमंत्री बने थे। पहली बार या दूसरी बार, पहली बार शायद 13 दिन के थे, दूसरी बार मुझे याद नहीं रहा और उसी दिन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के एक बहुत बड़े नेता, जिनका केरल में स्‍वर्गवास हो गया। उस समय वो सत्‍ता में तो नहीं थे और अभी तो शपथ समारोह पूरा हुआ था। उसी समय अटल जी ने कहा आडवाणी जी आप उनकी अन्‍त्‍येष्टि में जाइये, उन्‍होंने देश के लिए बहुत काम किया है। कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के नेता थे। भारतीय जनता पार्टी के घोर विरोध करने वाली उनकी विचार धारा थी। लेकिन सरकार बनने के दूसरे ही दिन फूल माला पहनने का कार्यक्रम नहीं, आडवाणी जी को वहां भेजा गया था। यह सार्वजनिक जीवन की आवश्‍यकता होती है।

सार्वजनिक जीवन में.... अब हम यहां मस्‍ती से बैठे हैं लेकिन परसों देखना आप कैसा मुकाबला होता है। ये लोकतंत्र का सहज गुण-धर्म है। हर फोरम में अपनी बात होती है, लेकिन राजनीतिक छूआछूत नहीं चलती हैं। देश के लिए जीने-मरने वालों के लिए समान भाव होना जरूरी होता है, उनके प्रति सम्‍मान होना जरूरी होता है और उसी के तहत डोगरा जी आज होते तो हमारा विरोध करते, शायद उनके दामाद का भी करते। लेकिन उनके जीवन को, उनके कार्य को हम गौरव के साथ देखें, उनसे कुछ सीखें-पाएं और आगे बढ़ें। इसी अपेक्षा के साथ हम सब ऐसे महापुरूषों को याद करते रहें, उनसे प्रेरणा लेते रहें।

रमजान का पवित्र महीना उन्‍नता पर है। बहुत बड़ी उमंग और उत्‍साह के साथ देश और दुनिया में ईद की प्रतीक्षा हो रही है। मेरी तरफ से ईद के पावन पर्व के लिए सभी इस पंरपरा को मानने वाले महानुभावों को हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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It is our sacred duty to leave a healthy planet for our future generations: PM Modi
June 14, 2021
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In last 10 years, around 3 million hectares of forest cover added in India, enhancing the combined forest cover to almost one-fourth of the country's total area: PM
India is on track to achieve its national commitment of Land degradation neutrality: PM
Restoration of 26 million hectares of degraded land aimed by 2030 to achieve an additional carbon sink of 2.5 to 3 billion tonnes of carbon dioxide equivalent
Centre of Excellence is being set up in India to promote a scientific approach towards land degradation issues
It is our sacred duty to leave a healthy planet for our future generations: PM

Excellency, President of the General Assembly,

Excellencies, Ladies and Gentlemen,

Namaste

I thank the President of the General Assembly for organising this High-Level Dialogue.

Land is the fundamental building block for supporting all lives and livelihoods. And, all of us understand that the web of life functions as an inter-connected system. Sadly, land degradation affects over two-thirds of the world today. If left unchecked, it will erode the very foundations of our societies, economies, food security, health, safety and quality of life. Therefore, we have to reduce the tremendous pressure on land and its resources. Clearly, a lot of work lies ahead of us. But we can do it. We can do it together.

Mr. President,

In India, we have always given importance to land and considered the sacred Earth as our mother. India has taken the lead to highlight land degradation issues at international forums. The Delhi Declaration of 2019 called for better access and stewardship over land, and emphasised gender-sensitive transformative projects. In India, over the last 10 years, around 3 million hectares of forest cover has been added. This has enhanced the combined forest cover to almost one-fourth of the country's total area.

We are on track to achieve our national commitment of Land degradation neutrality. We are also working towards restoring 26 million hectares of degraded land by 2030. This would contribute to India's commitment to achieve an additional carbon sink of 2.5 to 3 billion tonnes of carbon dioxide equivalent.

We believe that restoration of land can start a virtuous cycle of good soil health, increased land productivity, food security and improved livelihoods. In many parts of India, we have taken up some novel approaches. To give just one example, the Banni region in Rann of Kutch in Gujarat suffers from highly degraded land and receives very little rainfall. In that region, land restoration is done by developing grasslands, which helps in achieving land degradation neutrality.  It also supports pastoral activities and livelihood by promoting animal husbandry. In the same spirit, we need to devise effective strategies for land restoration while promoting indigenous techniques.

Mr. President,

Land degradation poses a special challenge to the developing world. In the spirit of South-South cooperation, India is assisting fellow developing countries to develop land restoration strategies. A Centre of Excellence is being set up in India to promote a scientific approach towards land degradation issues.

Mr. President,

It is mankind's collective responsibility to reverse the damage to land caused by human activity. It is our sacred duty to leave a healthy planet for our future generations. For their sake and ours, I extend my best wishes for productive deliberations at this High-Level Dialogue.

Thank you.

Thank you very much.