मेरे मित्र शिंजो आबे...

Published By : Admin | July 8, 2022 | 22:39 IST

शिंजो आबे न सिर्फ जापान की एक महान विभूति थे, बल्कि विशाल व्यक्तित्व के धनी एक वैश्विक राजनेता थे। भारत-जापान की मित्रता के वे बहुत बड़े हिमायती थे। बहुत दुखद है कि अब वे हमारे बीच नहीं हैं। उनके असमय चले जाने से जहां जापान के साथ पूरी दुनिया ने एक बहुत बड़ा विजनरी लीडर खो दिया है, तो वहीं मैंने अपना एक प्रिय दोस्त…। 

आज उनके साथ बिताया हर पल मुझे याद आ रहा है। चाहे वो क्योटो में ‘तोज़ी टेंपल’ की यात्रा हो, शिंकासेन में साथ-साथ सफर का आनंद हो, अहमदाबाद में साबरमती आश्रम जाना हो, काशी में गंगा आरती का आध्यात्मिक अवसर हो या फिर टोक्यो की ‘टी सेरेमनी’, यादगार पलों की ये लिस्ट बहुत लंबी है। 

 

 

मैं उस क्षण को कभी भूल नहीं सकता , जब मुझे माउंट फूजी की तलहटी में में बसे बेहद ही खूबसूरत यामानाशी प्रीफेक्चर में उनके घर जाने का मौका मिला था। मैं इस सम्मान को सदा अपने हृदय में संजोकर रखूंगा। 

शिंजो आबे और मेरे बीच सिर्फ औपचारिक रिश्ता नहीं था। 2007 और 2012 के बीच और फिर 2020 के बाद, जब वे प्रधानमंत्री नहीं थे, तब भी हमारा व्यक्तिगत जुड़ाव हमेशा की तरह  उतना ही मजबूत बना रहा।  

आबे सान से मिलना हमेशा ही मेरे लिए बहुत ज्ञानवर्धक, बहुत ही उत्साहित करने वाला होता था। उनके पास हमेशा नए आइडियाज का भंडार होता था। इसका दायरा  गवर्नेंस और इकॉनॉमी से लेकर कल्चर और विदेश नीति तक बहुत ही व्यापक था। वे इन सभी मुद्दों की गहरी समझ रखते थे। 

उनकी बातों ने मुझे गुजरात के आर्थिक विकास को लेकर नई सोच के लिए प्रेरित किया। इतना ही नहीं, उनके सतत सहयोग से गुजरात और जापान के बीच वाइब्रेंट पार्टनरशिप के निर्माण को बड़ी ताकत मिली।

भारत और जापान के बीच सामरिक साझेदारी को लेकर उनके साथ काम करना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। इसके जरिए इस दिशा में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला।

पहले जहां दोनों देशों के आपसी रिश्ते केवल आर्थिक संबंध तक सीमित थे, वहीं आबे सान इसे व्यापक विस्तार देने के लिए आगे बढ़े। इससे दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर न केवल तालमेल बढ़ा, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को भी नया बल मिला।

वे मानते थे कि भारत और जापान के आपसी रिश्तों की मजबूती, न सिर्फ दोनों देशों के लोगों, बल्कि पूरी दुनिया के हित में है। वे भारत के साथ सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट के लिए दृढ़ थे, जबकि उनके देश के लिए ये काफी मुश्किल काम था। भारत में हाई स्पीड रेल के लिए हुए समझौते को बेहद उदार रखने में भी उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई। न्यू इंडिया तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जापान कंधे से कंधा मिलाकर हर कदम पर भारत के साथ खड़ा रहेगा। भारत की आजादी के बाद इस सबसे महत्वपूर्ण कालखंड में उनका यह योगदान बेहद अहम है।

भारत -जापान संबंधों को मजबूती देने में उन्होंने ऐतिहासिक योगदान दिया, जिसके लिए वर्ष 2021 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

आबे सान को दुनियाभर की उथलपुथल और तेजी से हो रहे बदलावों की गहरी समझ थी। उनमें दूरदर्शिता भरी थी और यही वजह थी कि वे वैश्विक घटनाक्रमों का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होने वाला प्रभाव, पहले ही भांप लेते थे। ये समझ कि किन विकल्पों को चुनना है, किस तरह के स्पष्ट और साहसिक फैसले लेने हैं, समझौतों की बात हो या फिर अपने लोगों और दुनिया को साथ लेकर चलने की बात, उनकी बुद्धिमत्ता का हर कोई कायल था। उनकी दूरगामी नीतियों – आबेनॉमिक्स - ने जापानी अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत किया और अपने देश के लोगों में इनोवेशन और आंत्रप्रन्योरशिप की भावना को नई ऊर्जा दी।

उन्होंने जो मजबूत विरासत हम लोगों के लिए छोड़ी है, उसके लिए पूरी दुनिया हमेशा उनकी ऋणी रहेगी। उन्होंने पूरे विश्व में बदलती परिस्थितियों को न केवल सही समय पर पहचाना, बल्कि अपने नेतृत्व में उसके अनुरूप समाधान भी दिया।

भारतीय संसद में वर्ष 2007 के अपने संबोधन में उन्होंने इंडो-पेसिफिक क्षेत्र के उदय की नींव रखी, साथ ही ये विजन प्रस्तुत किया कि किस प्रकार ये क्षेत्र इस सदी में राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक रूप से पूरी दुनिया को एक नया आकार देने वाला है।

इसके साथ ही वे इसकी रूपरेखा तैयार करने में भी आगे रहे। उन्होंने इसमें स्थायित्व और सुरक्षा के साथ शांत और समृद्ध भविष्य का एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें वे अटूट विश्वास रखते थे। ये उन मूल्यों पर आधारित था, जिसमें संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सर्वोपरि थी। इसमें अंतर्राष्ट्रीय कानूनों-नियमों और बराबरी के स्तर पर शांतिपूर्ण वैश्विक संबंधों पर भी जोर था। इसमें आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर हर किसी के लिए समृद्धि के द्वार खोलने का अवसर था।

चाहे Quad हो या ASEAN के नेतृत्व वाला मंच, इंडो पेसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव हो या फिर एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर या Coalition for Disaster Resilient Infrastructure, उनके योगदान से इन सभी संगठनों को लाभ पहुंचा है। इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में उन्होंने घरेलू चुनौतियों और दुनियाभर के संदेहों को पीछे छोड़कर, शांतिपूर्ण तरीके से डिफेंस, कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्टेनेबिलिटी समेत जापान के सामरिक जुड़ाव में आमूलचूल परिवर्तन लाने का काम किया है। उनके इसी प्रयास के कारण यह पूरा क्षेत्र आज बहुत आशान्वित है और पूरा विश्व अपने भविष्य को लेकर कहीं अधिक आश्वस्त है।

मुझे इसी वर्ष मई में जापान यात्रा के दौरान आबे सान से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने उसी समय जापान-इंडिया एसोसिएशन के अध्यक्ष का पदभार संभाला था। उस समय भी वे अपने कार्यों को लेकर पहले की तरह ही उत्साहित थे, उनका करिश्माई व्यक्तित्व हर किसी को आकर्षित करने वाला था। उनकी हाजिरजवाबी देखते ही बनती थी। उनके पास भारत-जापान मैत्री को और मजबूत बनाने को लेकर कई नए आइडियाज थे। उस दिन जब मैं उनसे मिलकर निकला, तब यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि हमारी यह आखिरी मुलाकात होगी।

वह हमेशा अपनी आत्मीयता, बुद्धिमत्ता, व्यक्तित्व की गंभीरता, अपनी सादगी, अपनी मित्रता, अपने सुझावों, अपने मार्गदर्शन के लिए बहुत याद आएंगे।

उनका जाना हम भारतीयों के लिए भी ठीक उसी प्रकार दुखी करने वाला है, मानो घर का कोई अपना चला गया हो। भारतीयों के प्रति उनकी जो प्रगाढ़ भावना थी, ऐसे में भारतवासियों का दुखी होना बहुत स्वभाविक है। वे अपने आखिरी समय तक अपने प्रिय मिशन में लगे रहे और लोगों को प्रेरित करते रहे। आज वे भले ही हमारे बीच में न हों, लेकिन उनकी विरासत हमें हमेशा उनकी याद दिलाएगी।

मैं भारत के लोगों की तरफ से और अपनी ओर से जापान के लोगों को, विशेषकर श्रीमती अकी आबे और उनके परिवार के प्रति हार्दिक संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।

ओम शांति!

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ସୋମନାଥ ସ୍ୱାଭିମାନ ପର୍ବ – ୧୦୦୦ ବର୍ଷ (୧୦୨୬- ୨୦୨୬)ର ଏକ ଅତୁଟ ଆସ୍ଥା
January 05, 2026

ସୋମନାଥ... ଏହି ଶବ୍ଦଟିକୁ ଶୁଣିବା ମାତ୍ରେ ଆମମାନଙ୍କ ହୃଦୟ ଓ ମନରେ ଗର୍ବ ଏବଂ ଗୌରବର ଏକ ଭାବନା ଆପେ ଜାଗ୍ରତ ହୋଇଥାଏ । ଏହା ହେଉଛି ଭାରତର ଆତ୍ମାର ଶାଶ୍ୱତ ଆହ୍ୱାନ । ଏହି ଭବ୍ୟ ମନ୍ଦିର ଭାରତର ପଶ୍ଚିମ ତଟରେ ଗୁଜରାଟ ରାଜ୍ୟରେ ପ୍ରଭାସ ପତନ ନାମକ ସ୍ଥାନରେ ଅବସ୍ଥିତ । ଦ୍ୱାଦଶ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ ସ୍ତୋତ୍ରମରେ ସାରା ଭାରତରେ ଥିବା ୧୨ଗୋଟି ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କ ସମ୍ପର୍କରେ ବର୍ଣ୍ଣନା ରହିଛି । ଏହି ସ୍ତୋତ୍ର ଏପରି ଭାବରେ ଆରମ୍ଭ: ‘ସୌରାଷ୍ଟ୍ରେ ସୋମନାଥଂ ଚ...’ ଯାହା ଦେଶର ପ୍ରଥମ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ ଭାବରେ ସୋମନାଥଙ୍କୁ ଆମ ସଭ୍ୟତା ତଥା ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ସଂକେତ ଭାବରେ ଉପସ୍ଥାପନ କରେ ।

ଏଥିରେ ଆହୁରି ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଇଛି:
ସୋମଲିଙ୍ଗଂ ନରୋ ଦୃଷ୍ଟ୍ୱା ସର୍ବପାପୈ ପ୍ରମୁଚ୍ୟତେ ।
ଲଭତେ ଫଳଂ ମନୋବାଞ୍ଚିତଂ ମୃତଃ ସ୍ୱର୍ଗଂ ସମାଶ୍ରୟେତ୍ । ।

ଏହାର ଅର୍ଥ ହେଉଛି: କେବଳ ସୋମନାଥ ଶିବଲିଙ୍ଗଙ୍କ ଦର୍ଶନ ମାତ୍ରେ ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତି ତା’ର ସକଳ ପାପରୁ ନିଶ୍ଚିତ ରୂପେ ମୁକ୍ତ ହୋଇଥାଏ ଏବଂ ଏଥି ସହିତ ତା’ର ମନର ସକଳ ସକାରାତ୍ମକ କାମନା ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବା ସହିତ ସେ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଥାଏ ।

କ୍ଷୋଭର କଥା, ଏହି ସୋମନାଥ, ଯାହାଙ୍କୁ କୋଟି କୋଟି ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁ ପ୍ରାଚୀନ କାଳରୁ ପୂଜାର୍ଚ୍ଚନା କରିଆସୁଥିଲେ, ଉପାସନା କରିଆସୁଥିଲେ, ତାହାକୁ ବିଦେଶାଗତ ଆକ୍ରମଣକାରୀମାନେ ଆକ୍ରମଣ କରିଥିଲେ, କାରଣ ସେମାନଙ୍କର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଥିଲା ଏହାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିବା, କେବଳ ଏହି ମନ୍ଦିରର ଉପାସନାକୁ ବନ୍ଦ କରିବା ନୁହେଁ ।

ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ନିମନ୍ତେ ବର୍ଷ ୨୦୨୬ଟି ବିଶେଷ ମହତ୍ତ୍ୱ ବହନ କରେ । ଏହି ମହାନ ପୀଠ ଉପରେ ପ୍ରଥମ ଆକ୍ରମଣ ଘଟିବାର ୧୦୦୦ ବର୍ଷ ପୂରଣ ହୋଇଛି । ୧୦୨୬ ଖ୍ରୀଷ୍ଟାବ୍ଦର ଜାନୁଆରୀ ମାସରେ ଗଜନୀର ମାହମୁଦ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ଉପରେ ଆକ୍ରମଣ କରିଥିଲେ ଏବଂ ଆସ୍ଥା ଓ ସଭ୍ୟତାର ଏହି ମହାନ ସଂକେତକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବାକୁ ଚାହିଁଥିଲେ । ଏଥି ନିମନ୍ତେ ଯେତେ ରକ୍ତପାତ ଓ ବର୍ବର ଆକ୍ରମଣ କରାଯାଇପାରେ, ସେ ତାହା ଆପଣାଇଥିଲେ ।

ତଥାପି, ଏହି ଘଟଣାର ଏକ ହଜାର ବର୍ଷ ପରେ ସୁଦ୍ଧା, ସେହି ମନ୍ଦିର ପୂର୍ବ ଗୌରବର ସହିତ ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ, କାରଣ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିରର ଭବ୍ୟତାକୁ ବଜାୟ ରଖିବା ସକାଶେ ଅତୀତରେ ଅସଂଖ୍ୟ ପୁନଃର୍ଗଠନ ପ୍ରୟାସ କରାଯାଇଆସିଛି । ଏଭଳି ଏକ ପ୍ରୟାସର ମାଇଲଖୁଣ୍ଟ ୨୦୨୬ ମସିହାରେ ୭୫ ବର୍ଷ ପୂରଣ କରୁଛି । ସେହିଭଳି ପ୍ରୟାସ ୧୯୫୧ ମସିହା ମେ ୧୧ ତାରିଖ ଦିନ ଏକ ଉତ୍ସବରେ ସଂପାଦନ କରାଯାଇଥିଲା ଏବଂ ତାହା ସଂପାଦନ କରାଯାଇଥିଲା ଭାରତର ତତ୍କାଳୀନ ମହାମହୀମ ରାଷ୍ଟ୍ରପତି ଡକ୍ଟର ରାଜେନ୍ଦ୍ର ପ୍ରସାଦଙ୍କ ଉପସ୍ଥିତିରେ । ସେଦିନ ଏହି ପୁନଃର୍ବିନ୍ୟାସକୃତ ମନ୍ଦିରର ଦ୍ୱାରକୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁମାନଙ୍କ ନିମନ୍ତେ ଖୋଲାଯାଇଥିଲା ।

ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ଉପରେ ପ୍ରଥମ ଆକ୍ରମଣ ଘଟିଥିଲା ୧୦୨୬ ଖ୍ରୀଷ୍ଟାବ୍ଦରେ । ସେତେବେଳେ ଏହି ନଗରୀର ଲୋକମାନଙ୍କ ଉପରେ ନିଷ୍ଠୁର ଆକ୍ରମଣ କରାଯାଇଥିଲା । ସେତେବେଳେ ଏହି ମନ୍ଦିରକୁ ଯେଉଁଭଳି ବୀଭତ୍ସ ଭାବରେ ଧ୍ୱଂସ କରାଯାଇଥିଲା ତାହାର ବିସ୍ତୃତ ବର୍ଣ୍ଣନା ବିଭିନ୍ନ ଐତିହାସିକ ଗ୍ରନ୍ଥମାନଙ୍କରେ ଉଲ୍ଲେଖ ରହିଛି । ଆପଣମାନେ ତାହା ପଢ଼ିଲେ, ଛାତି ଥରିଉଠେ । ଏହାର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଧାଡ଼ିରେ ଦୁଃଖ, କ୍ରୂରତା ଭରି ରହିଛି ଏବଂ ଏହି ଦୁଃଖ ସମୟ ସହିତ କେବେ ପ୍ରଶମିତ ହୋଇଯାଇନାହିଁ ।

ଆପଣମାନେ କଳ୍ପନା କରି ପାରିବେ ଯେ ଭାରତ ଉପରେ ଏହା କି ପ୍ରକାର ପ୍ରଭାବ ପକାଇଥିଲା ଏବଂ ଲୋକମାନଙ୍କ ଭାବନାକୁ କେତେ ଆଘାତ ଦେଇଥିଲା । କାହିଁକି ନା, ସୋମନାଥ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅଚିନ୍ତନୀୟ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଗୁରୁତ୍ୱ ବହନ କରେ । ଏହି ତଟ ମଧ୍ୟ ସମାଜକୁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ଆର୍ଥିକ ଶକ୍ତି ଓ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଯୋଗାଇ ଆସୁଥିଲା । ଏହି ସମୁଦ୍ର ଦେଇ ବଣିକମାନେ, ନାବିକମାନେ ଭାରତର ଭବ୍ୟ ଗାଥାକୁ ଦୂର ଦୂରାନ୍ତକୁ ବହନ କରି ନେଉଥିଲେ ।

ତଥାପି, ମୁଁ ଗର୍ବର ସହିତ ଏବଂ ବିନା ଦ୍ୱିଧାରେ ଏକଥା କହିବାକୁ ଚାହେଁ ଯେ ସୋମନାଥଙ୍କ ଗାଥା, ଏହା ଉପରେ ବିଦେଶୀ ଲୁଣ୍ଠନକାରୀଙ୍କ ଆକ୍ରମଣର ଏକ ହଜାର ବିତି ସାରିଥିଲେ ସୁଦ୍ଧା, ସେହି ଧ୍ୱଂସ ଦ୍ୱାରା ସଂଜ୍ଞା ନିରୂପିତ ହୁଏନାହିଁ । ଭାରତ ମାତାଙ୍କ କୋଟି କୋଟି ସନ୍ତାନଙ୍କ ଅତୁଟ ସାହସ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ଏହାର ସଂଜ୍ଞା ନିରୂପିତ ।

ଏହି ମଧ୍ୟଯୁଗୀୟ ବର୍ବରତା ଯାହା ଆଜକୁ ହଜାର ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ୧୦୨୬ ଖ୍ରୀଷ୍ଟାବ୍ଦରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା, ତାହା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ଉପରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ବାରମ୍ବାର ଆକ୍ରମଣ କରିବାକୁ ‘ପ୍ରେରଣା’ ଯୋଗାଇଥିଲା । ଆମର ଜନସାଧାରଣ ଏବଂ ଏହାର ସଂସ୍କୃତିକୁ ଦାସତ୍ୱର ବେଡ଼ିରେ ବାନ୍ଧି ରଖିବା ନିମନ୍ତେ ଏହା ଥିଲା ପ୍ରଥମ ପ୍ରୟାସ । ପ୍ରତ୍ୟେକ ଥର ଏହି ମନ୍ଦିର ଉପରେ ହେଉଥିବା ଆକ୍ରମଣ ବେଳେ, ଆମମାନଙ୍କ ନିକଟରେ ଏହାକୁ ବିରୋଧ କରିବା ଏବଂ ସୁରକ୍ଷା ପ୍ରଦାନ କରିବା ସକାଶେ ମହାନ ବୀର ଓ ବୀରାଙ୍ଗନାମାନେ ଉପଲବ୍ଧ ଥିଲେ ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଥର, ପିଢ଼ି ପରେ ପିଢ଼ି, ଆମର ଏହି ମହାନ ସଭ୍ୟତାର ଲୋକମାନେ, ନିଜକୁ ସେଭଳି ଆକ୍ରାନ୍ତାମାନଙ୍କ ବିରୁଦ୍ଧରେ ଠିଆ ହୋଇଥିଲେ ଏବଂ ଧ୍ୱଂସ ମନ୍ଦିରକୁ ପୁନର୍ବାର ଭବ୍ୟତାର ସହିତ ପୁନଃନିର୍ମାଣ ପୂର୍ବକ ଠିଆ କରାଇଥିଲେ । ଏହା ଆମମାନଙ୍କର ପରମ ସୌଭାଗ୍ୟ ଯେ ଅହଲ୍ୟାବାଈ ହୋଲକାରଙ୍କ ଭଳି ମହାନ୍ ବ୍ୟକ୍ତିତ୍ୱ ଯେଉଁ ଭୂମିରେ ଜନ୍ମ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ ଆମେ ସେହି ଭୂମିରେ ଭୂମିଷ୍ଠ ହୋଇଛେ । ଅହଲ୍ୟାବାଈ ହୋଲକାର ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିରର ପୁନଃନିର୍ମାଣ ନିମନ୍ତେ ଯେଉଁ ଆଦର୍ଶ ପ୍ରୟାସ କରିଥିଲେ ତାହା ପ୍ରଶଂସନୀୟ ଯାହା ଫଳରେ ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁମାନେ ପୁନର୍ବାର ମନ୍ଦିରରେ ପୂଜାର୍ଚ୍ଚନା କରିପାରିଥିଲେ ।

୧୮୯୦ ଦଶକରେ ସ୍ୱାମୀ ବିବେକାନନ୍ଦ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ପରିଦର୍ଶନ କରିଥିଲେ ଏବଂ ତାହା ତାଙ୍କୁ ଗଭୀର ଭାବରେ ପ୍ରଭାବିତ କରିଥିଲା । ସେ ତାଙ୍କର ସେହି ଅନୁଭବକୁ ୧୮୯୭ ମସିହାରେ ଚେନ୍ନାଇଠାରେ ପ୍ରଦାନ କରିଥିବା ଏକ ଭାଷଣରେ ପ୍ରଦାନ କରି କରିଥିଲେ । ସେ କହିଥିଲେ, ‘ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତର କେତେକ ପ୍ରାଚୀନ ମନ୍ଦିର ଏବଂ ଗୁଜରାଟର ସୋମନାଥ ଭଳି ମନ୍ଦିର ଆମମାନଙ୍କୁ ଜ୍ଞାନର ବିପୁଳ ଶିକ୍ଷା ପ୍ରଦାନ କରେ । ସେହିସବୁ ମନ୍ଦିରମାନେ ଆମମାନଙ୍କୁ ମାନବ ଜାତିର ପ୍ରାଚୀନ ଇତିହାସ ମଧ୍ୟକୁ ଗଭୀର ଭାବରେ ଅନ୍ତର୍କ୍ଷେପଣ ନିମନ୍ତେ ପ୍ରେରିତ କରେ ଯାହା ଆମେ କୌଣସି ଗ୍ରନ୍ଥରୁ କେବେ ପାଇପାରିବା ନାହିଁ । ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିବା କଥା ଯେ ସେହିସବୁ ମନ୍ଦିରଗୁଡ଼ିକ କିପରି ଏଭଳି ଆକ୍ରାନ୍ତାମାନଙ୍କ ହଜାର ହଜାର ଆକ୍ରମଣର ସ୍ୱାକ୍ଷର ନିଜ ବକ୍ଷରେ ବହନ କରି ରଖିଛନ୍ତି ଏବଂ ଶହ ଶହ ପିଢ଼ି ଧରି ତାହା ଜାରି ରହିଛି । ସେମାନେ ନିରବଚ୍ଛିନ୍ନ ଭାବରେ ଏହାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଚାଲିଥିଲେ ଏବଂ ସେହି ଧ୍ୱଂସ ସ୍ତୂପ ଭିତରୁ ତାହା ପୁଣି ଥରେ ମୁଣ୍ଡ ଟେକିଥାଏ, ପୁନର୍ଜାଗରିତ ହୋଇ ଆହୁରି ମଜଭୁତ ହୋଇଥାଏ! ଏହା ହେଉଛି ଜାତୀୟ ମାନସିକତା, ତାହା ହିଁ ହେଉଛି ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଜୀବନ ସ୍ରୋତ । ଏହାକୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ଏହା ଆମକୁ ମହିମାମଣ୍ଡିତ କରିବା ଆଡ଼କୁ ଆଗେଇନିଏ । ଏହାକୁ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ଦେଖିବେ, ତୁମର ବିନାଶ ଘଙ୍କିବ । ମୃତ୍ୟୁ ହେଉଛି ଏହାର ଏକମାତ୍ର ପରିଣାମ । ବିନାଶ, ଏହାର ଏକମାତ୍ର ପରିଣାମ- ଯେଉଁ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ସେହି ଜୀବନ ସ୍ରୋତରୁ ତୁମେ ଦୂରେଇଯିବ ।’

ଦେଶ ସ୍ୱାଧୀନତା ଲାଭ କରିବା ପରେ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିରର ପୁନଃନିର୍ମାଣର ପବିତ୍ର କାର୍ଯ୍ୟ ସର୍ଦ୍ଦାର ବଲ୍ଲଭଭାଇ ପଟେଲଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସଂପାଦିତ ହୋଇଥିଲା । ୧୯୪୭ ମସିହାରେ ସେ ଦୀପାବଳୀ ସମୟରେ ଯେତେବେଳେ ସେହି ମନ୍ଦିରକୁ ଏକତା ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଯାଇଥିଲେ ଏହାର ଧ୍ୱଂସାବଶେଷ ଦେଖି ସେ ଏତେ ମାତ୍ରାରେ ମ୍ରିୟମାଣ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିଲେ ଯେ ସେ ସେହିଠାରେ ଘୋଷଣା କରିଥିଲେ ଯେ ଏହି ମନ୍ଦିରର ପୁନଃନିର୍ମାଣ କରାଯିବ । ପରିଶେଷରେ, ୧୯୫୧ ମସିହା ମେ ୧୧ ତାରିଖ ଦିନ, ସେହିଠାରେ ଭବ୍ୟ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ଉନ୍ମୋଚିତ ନିର୍ମିତ ହୋଇ ଏହାର ଦ୍ୱାର ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଉନ୍ମୋଚିତ ହୋଇଥିଲା । ଡକ୍ଟର ରାଜେନ୍ଦ୍ର ପ୍ରସାଦ ସେହି ଅବସରରେ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ମହାନ୍ ସର୍ଦ୍ଦାର ସାହେବ ସେହି ଐତିହାସିକ ଦିନର ଅବସରକୁ ଦେଖିବା ସକାଶେ ସେତେବେଳକୁ ଜୀବିତ ନଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ସାକାରିତ ହୋଇ ରାଷ୍ଟ୍ର ସମ୍ମୁଖରେ ସଗର୍ବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇଥିଲା । ତତ୍କାଳୀନ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ପଣ୍ଡିତ ଜବାହରଲାଲ ନେହରୁ, ଏଭଳି ଘଟଣାକ୍ରମରେ ବିଶେଷ ଖୁସି ନଥିଲେ । ସେ ଚାହୁଁ ନଥିଲେ ଯେ ମାନ୍ୟବର ରାଷ୍ଟ୍ରପତି ତଥା ଅନ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ ଏଭଳି ବିଶେଷ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ହୁଅନ୍ତୁ । ସେ ମତ ପୋଷଣ କରିଥିଲେ ଯେ ଏହା ଭାରତ ସମ୍ପର୍କରେ ଏକ ଖରାପ ଧାରଣା ସୃଷ୍ଟି କରିବ । କିନ୍ତୁ ଡକ୍ଟର ରାଜେନ୍ଦ୍ର ପ୍ରସାଦ ଦୃଢ଼ ଭାବରେ ନିଜ ସିଦ୍ଧାନ୍ତରେ ଅଟଳ ରହିଥିଲେ ଏବଂ ଯାହା ଘଟିଥିଲା, ତାହା ଆଜି ଇତିହାସ । କେ.ଏମ. ମୁନସୀଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ବିନା ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ସମ୍ପର୍କୀତ କୌଣସି ପ୍ରସଙ୍ଗ କଦାପି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବୋଲି ବିବେଚନା କରାଯାଇ ପାରିବନାହିଁ । ସେ ସକ୍ରିୟତାର ସହିତ ସର୍ଦ୍ଦାର ପଟେଲଙ୍କୁ ସମର୍ଥନ ଜ୍ଞାପନ କରିଥିଲେ । ସୋମନାଥଙ୍କ ସମ୍ପର୍କୀତ ତାଙ୍କର ରଚନାବଳୀ, ଏଥିରେ ‘ସୋମନାଥ: ଶାଶ୍ୱତ ଧାମ’ ପୁସ୍ତକ ସାମିଲ, ଅତୀମ ସୂଚନାଧର୍ମୀ ଏବଂ ଶିକ୍ଷଣୀୟ ।

ମୁନସୀଜୀଙ୍କ ଏହି ପୁସ୍ତକର ନାମ ହିଁ ଆମମାନଙ୍କୁ ଏହା ସୂଚାଏ ଯେ ଆମେ ଏଭଳି ଏକ ସଭ୍ୟତା ଯାହା ଏକ ଶାଶ୍ୱତ ଚିନ୍ତାଧାରା ଏବଂ ବିଚାରବୋଧ ସଦାବେଳେ ଧାରଣ କରିଆସିଛୁ । ଆମେ ଏକଥା ଦୃଢ଼ତାର ସହିତ ବିଶ୍ୱାସ କରୁ ଯେ ଯାହା ଶାଶ୍ୱତ ତାହା କଦାପି କ୍ଷୟଶୀଳ ନୁହେଁ । ଏହା ଆମର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଗୀତା ଗ୍ରନ୍ଥରେ ମଧ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣିତ ରହିଛି: ‘ନୈନଂ ଚ୍ଛିନ୍ଦନ୍ତି ଶସ୍ତ୍ରାଣି...’ । ଆମ ସଭ୍ୟତାର ଅଦମ୍ୟ ଭାବନା ସମ୍ପର୍କରେ ସୋମନାଥ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଉତ୍ତମ ଉଦାହରଣ ଦିଆଯାଇ ପାରିବନାହିଁ, ଯାହା ବର୍ତ୍ତମାନ ସୁଦ୍ଧା ଗୌରବର ସହିତ, ସକଳ ପ୍ରକାର ପ୍ରତିକୂଳ ଶକ୍ତିଙ୍କ ପ୍ରଭାବ ଓ ସଂଘର୍ଷ ସତ୍ତ୍ୱେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଛି ।
ସେହି ମାନସିକତା ହିଁ ଆମ ରାଷ୍ଟ୍ରର ପରିକଳ୍ପନାରେ ଜଳଜଳ ହୋଇ ଦୃଶ୍ୟମାନ । ଏହା ବୈଶ୍ୱିକ ବିକାଶର ଉଜ୍ଜ୍ୱଳତମ ବିନ୍ଦୁ ଭାବରେ ବିଦ୍ୟମାନ । ଏହା ଶତାବ୍ଦୀ ଶତାବ୍ଦୀ ଧରି ଆକ୍ରମଣ ଏବଂ ଉପନିବେଶବାଦୀ ଲୁଣ୍ଠନର ଶିକାର ହୋଇ ସୁଦ୍ଧା ନିଜକୁ ଅତୁଟ ରଖିପାରିଛି । ଏହା ଆମର ମୂଲ୍ୟବୋଧ ଧାରା ଏବଂ ଜନସାଧାରଣଙ୍କ ପ୍ରତିବଦ୍ଧତା ଯାହା ଆଜି ଭାରତକୁ ବୈଶ୍ୱିକ ଧ୍ୟାନର କେନ୍ଦ୍ରବିନ୍ଦୁରେ ପରିଣତ କରିଛି । ବିଶ୍ୱ ଆଜି ଆଶା ଓ ସକାରାତ୍ମକ ଭାବନାର ସହିତ ଭାରତକୁ ଦେଖୁଛି । ସେମାନେ ଭାରତର ନବାଚାରଧର୍ମୀ ଯୁବଗୋଷ୍ଠୀଙ୍କ ଉପରେ ପୁଂଜି ନିବେଶ କରିବାକୁ ଆଗ୍ରହୀ । ଆମର କଳା, ସଂସ୍କୃତି, ସଙ୍ଗୀତ ଏବଂ ଅସୁମାରି ଉତ୍ସବ ଦିନକୁ ଦିନ ବୈଶ୍ୱିକ ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଯୋଗ ଓ ଆୟୁର୍ବେଦ ବିଶ୍ୱବ୍ୟାପୀ ପ୍ରଭାବ ବିସ୍ତାର କରିଚାଲିଛି ଏବଂ ନିରାମୟ ଜୀବନ ଧାରଣକୁ ଶକ୍ତି ଯୋଗାଉଛି । ସବୁଠାରୁ କେତେଗୋଟି ଜଟିଳ ବୈଶ୍ୱିକ ଚାଲେଞ୍ଜର ସମାଧାନ ଭାରତରୁ ହିଁ ଆସିପାରିଛି ।

କାହିଁ କେଉଁ ଅସୁମାରି ଅତୀତ ଠାରୁ ସୋମନାଥ ବିଭିନ୍ନ ବର୍ଗର ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ରିତ କରିଛି । ଆଜକୁ ଶହ ଶହ ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ, କଳିକାଳ ସର୍ବାଙ୍ଗ ହେମଚନ୍ଦ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ ନାମକ ଜନୈକ ଜୈନ ମୁନି, ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିରକୁ ଆସିଥିଲେ । କୁହାଯାଏ ଯେ ସେଠାରେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରିବା ପରେ, ସେ ଗାନ କରିଥିଲେ, ‘ଭବବୀଜାଙ୍କୁଜନନାରାଗାଦ୍ୟାଃ କ୍ଷୟମୁପଗତା ଯସ୍ୟ’ । ଏହାର ଅର୍ଥ ହେଲା – ସେହି ଶକ୍ତିଙ୍କୁ ନମସ୍କାର ଯାହାଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ ମାତ୍ରେ ସକଳ ପ୍ରକାର ଜାଗତିକ ବୀଜର ବିନାଶ ଘଟେ, ଯାହାଙ୍କ କରୁଣାରୁ ସକଳ ପ୍ରକାର ସାଂସାରିକ ବନ୍ଧନ ଓ ଲୋଭ ମନରୁ ଉଭେଇଯାଏ ।’ ଆଜି ସୁଦ୍ଧା, ସୋମନାଥ ସେହି ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ବହନ କରିଛି ଏବଂ ଆମମାନଙ୍କ ମନ ଓ ଆତ୍ମା ଭିତରେ ଏକ ଦିବ୍ୟ ଓ ବିରାଟ ଜାଗରଣ ସୃଷ୍ଟି କରୁଛି ।

୧୦୨୬ ଖ୍ରୀଷ୍ଟାବ୍ଦର ସେହି ପ୍ରଥମ ଆକ୍ରମଣର ଏକ ହଜାର ବର୍ଷ ପରେ, ସୋମାନଥର ସମୁଦ୍ର ତଥାପି ସେହିଭଳି ସ୍ୱରରେ ଉଦଘୋଷଣା କରୁଛି ଯାହା ଅତୀତରେ କରିଆସୁଥିଲା । ଯେଉଁ ଢେଊ ଆସି ସୋମନାଥଙ୍କ ପାଦରେ ମଥା ପିଟୁଛି, ତାହା ସେହି ଗୋଟିଏ କାହାଣୀ ହିଁ ବଖାଣୁଛି । ଯାହା ହେଉ ନା କାହିଁକି, ସେହି ଢେଊ ଭଳି ତାହା ବାରମ୍ବାର ମଥା ପିଟି ଚାଲିଛି, ସଙ୍ଗୀତ ଗାନ କରିଚାଲିଛି ।

ଅତୀତର ସେହିସବୁ ଆକ୍ରାନ୍ତାମାନେ ବର୍ତ୍ତମାନ ସମୟର ପବନରେ କାହିଁ ରେଣୁ ଭାବରେ କୁଆଡ଼େ ହଜି ଯାଇଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କର ନାମ କେବଳ ଧ୍ୱଂସ ସହିତ ତୁଳନୀୟ । ଇତିହାସର ପାଦଟୀକାରେ ହିଁ ସେମାନେ ରହିଯାଇଛନ୍ତି, ଯଦ୍ୟପି ସୋମନାଥ ସେହିଭଳି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ, ଦୀପ୍ତୀମାନ ହୋଇ ଦୂର ଦିଗବଳୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସବୁକିଛି ଆଲୋକିତ କରୁଛି । ତାହା ଆମମାନଙ୍କୁ ସେହି ଶାଶ୍ୱତ ଭାବନାକୁ ସ୍ମରଣ କରାଇ ଦେଉଛି ଯେ ୧୦୨୬ର ଆକ୍ରମଣ ସତ୍ତ୍ୱେ ଆମର ଭାବନା ସେହିଭଳି ଅତୁଟ ରହିଛି ଏବଂ ରହିଥିବ । ସୋମନାଥ ହେଉଛି ଆଶାର ସଙ୍ଗୀତ ଯାହା ଆମକୁ ସୂଚାଏ ଯେ ଘୃଣା ଏବଂ ଧର୍ମାନ୍ଧତା ନିକଟରେ ସାମୟିକ ଶକ୍ତି ଥାଇପାରେ, କିନ୍ତୁ ଆସ୍ଥା ଓ ବିଶ୍ୱାସ ନିକଟରେ ଥିବା ସୁସାମର୍ଥ୍ୟ ହେଉଛି ସେହି ଶାଶ୍ୱତ ଶକ୍ତି ଯାହା ଅନନ୍ତକାଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଉଜ୍ଜୀବିତ ରହିଥିବ ।

ଯଦି ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର, ଯାହା ଆଜକୁ ଏକ ହଜାର ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ଏକଦା ଆକ୍ରମଣର ଶିକାର ହୋଇଥିଲା ଏବଂ ଏହା ପରେ ବାରମ୍ବାର ଆକ୍ରମଣକୁ ଅଙ୍ଗେ ନିଭାଇଥିଲା, ତାହା ଯଦି ପୁଣି ଥରେ ମୁଣ୍ଡ ଟେକି ଠିଆ ହୋଇପାରେ, ତେବେ ଆମେମାନେ ଆମର ମହାନ ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ଗୌରବଶାଳୀ କରି ପୁଣି ଥରେ ଠିଆ କରାଇ ପାରିବା, ଯାହା ଆଜକୁ ହଜାର ହଜାର ବର୍ଷ ପୂର୍ବେ ଆମଠାରେ ଥିଲା । ଶ୍ରୀ ସୋମନାଥ ମହାଦେବଙ୍କ ଆଶୀର୍ବାଦ ସହିତ, ଆମେ ଆଗକୁ ପୁନଃସଂକଳ୍ପର ସହିତ ଅଗ୍ରସର ହେବା ଏବଂ ବିକଶିତ ଭାରତ ନିର୍ମାଣ କରିବା, ଯେଉଁଠାରେ ଆମ ସଭ୍ୟତାର ପ୍ରଜ୍ଞା ଆମକୁ ମାର୍ଗ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବ ଏବଂ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର କଲ୍ୟାଣ ନିମନ୍ତେ ସହାୟକ ହେବ ।

ଜୟ ସୋମନାଥ!