नरेन्द्र मोदी - एक ही विकल्प

Published By : Admin | May 15, 2014 | 15:17 IST

पिछले 12 वर्षों में गुजरात में हुए अभूतपूर्व एवं समग्र विकास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि देश में नेतृत्व के लिए श्री नरेन्द्र मोदी ही एकमात्र विकल्प नज़र आते हैं।

श्री नरेन्द्र मोदी अन्य नेताओं से बेहतर कैसे है?जनता को यह पूछने का स्पष्ट अधिकार है कि श्री नरेन्द्र मोदी अन्य नेताओं से बेहतर कैसे हैं? स्वाधीन भारत के इतिहास में आप देखेंगे कि नेतृत्व की सफलता के मुख्य कारक नेता का कर्म के प्रति पूर्ण समर्पण, कड़ी मेहनत एवं लगन के साथ दूरदृष्टा होना रहा है। विरले ही ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने इन विशेषताओं पर अधिकार बनाया है। श्री नरेन्द्र मोदी इन सब विशेषताओं से परिपूर्ण व्यक्तित्व हैं एवं उन्हें अपने कर्म के प्रति ध्यान केंद्रित करना बखूबी आता है। वे आसमान को छूने की बात भी करते हैं लेकिन उनके पैर हमेशा जमीन पर रहते है। इन सब गुणों के कारण श्री नरेन्द्र मोदी एक असाधारण नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण व्यक्तित्व हैं।

एक जन नेता :

श्री नरेन्द्र मोदी देश के एकमात्र ऐसे नेता है जिन्होंने आम जनता से न केवल राजनैतिक रिश्ता विकसित किया है अपितु एक भावनात्मक लगाव स्थापित किया है। उनके प्रशंसक न केवल भारत में हैं अपितु कई अन्य देशों में भी श्री मोदी असंख्य प्रशंसक मौजूद हैं। साथ ही समाज के हर वर्ग, स्त्री एवं पुरुष, शहरी एवं ग्रामीण, अमीर एवं गरीब, बुद्धिजीवी वर्ग सभी में श्री नरेन्द्र मोदी का अपना स्थान है। विदेशों में रहने वाले कई अनिवासी गुजराती उन्हें सम्मान देते हैं। श्री नरेन्द्र मोदी ने जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से सूचना प्रोद्योगिकी का अनूठा उपयोग किया है एवं इसके माध्यम से देश का युवा वर्ग बड़ी संख्या में श्री नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ है।

What makes Narendra Modi different?

विकास के लिए कटिबद्ध :

श्री नरेन्द्र मोदी में विकास के लिए अनूठी कटिबद्धता देखी जा सकती है। ऐसे समय जब चुनाव घोषित होने वाले हों तब राजनैतिक व्यक्तियों की चुनाव ही प्राथमिकता रह जाता है, इसके विपरीत श्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ वर्ष पूर्व चुनावों से पहले निवेशकों को आकर्षित करने के लिए स्विट्ज़रलैंड की यात्रा की एवं गुजरात में निवेश के नए मौके प्रस्तुत किये। इसी तरह वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले श्री नरेन्द्र मोदी ने जापान की आधिकारिक यात्रा की। इस यात्रा में जापान के साथ सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर कई समझौते किये गए एवं गुजरात में निवेश के कई प्रस्तावों पर सहमति बनी। श्री नरेन्द्र मोदी के लिए चुनावी वर्ष में भी राजनैतिक कार्य से ज्यादा प्राथमिकता विकास एवं निवेश के कार्यों की है।

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समस्या समाधान के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

श्री नरेन्द्र मोदी की गुजरात में सफलता के पीछे उनकी कठिन मेहनत एवं लगन के साथ ही समस्याओं के समाधान हेतु एक नयी एवं वैज्ञानिक सोच भी रही है। वे एक उत्कृष्ट श्रोता है एवं प्रयास करते हैं कि किसी भी समस्या के समाधान हेतु सबसे पहले उसके समग्र रूप को जाना जाए। उनका मत है कि समस्या के समाधान की शुरुआत उसे बेहतर तरीके से समझने के साथ होती है। वे हर कोण से समस्या एवं उसके संभावित समाधान पर चर्चा करते है। वे किसी भी कार्य एवं समस्या के लिए तदर्थ अथवा फौरी प्रयास करने के विरुद्ध रहते हैं एवं स्थायी एवं दीर्घकालिक समाधान की रणनीति बनाते हैं। उनके विचार में दूरदृष्टि के साथ योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने पर सफलता अवश्य मिलती है। वे स्पष्ट लक्ष्य, उद्देश्यों एवं कार्ययोजना के साथ अपना कार्य सम्पादित करते हैं।

वे सही प्रक्रिया, उचित व्यक्तियों एवं समय का चुनाव करते हैं। इसके ऊपर उन्हें कार्ययोजना अनुसार कार्य की प्रगति की निगरानी में दक्षता प्राप्त है। वे अपनी बुद्धि एवं नवाचार से कार्य – प्रबंधन को बेहतर तरीके से सम्पादित करते हैं।

बड़ी परियोजनाओं का क्रियान्वयन :

श्री नरेन्द्र मोदी एक सफल रणनीतिकार होने के साथ ही त्वरित कार्य संपादन की कला में भी पारंगत है। वे अपने कार्यों के अनुकूल परिणाम देखने के लिए सदैव उत्साहित रहते हैं। जहाँ एक और देश में नदियों को जोड़ने की योजना पर बहस चल रही है वहीँ गुजरात में श्री नरेन्द्र मोदी ने कई नदियों को आपस में जोड़ कर गुजरात को बाढ़ एवं सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त कराया है। यह बड़ी योजनाएं सफल रणनीति के साथ बहुत ही कम समय में पूर्ण की गयी हैं। सुजलाम - सुफलाम योजना के अंतर्गत 300 किलोमीटर से भी अधिक नहरों कर निर्माण कर सूखा ग्रस्त क्षेत्रों को लाभ पहुँचाया गया है। ज्योतिग्राम योजना के अंतर्गत 56599 किलोमीटर लम्बी ट्रांसमिशन लाइन्स लगाई गयी एवं 18000  से अधिक गावों एवं 9681 शहरी क्षेत्रों को लाभ पहुचाने हेतु मात्र 30 महीने में 12621 ट्रांसफार्मर लगाने का कार्य किया गया। देश में अपने तरह की पानी एंड गैस की ग्रिड बनाने की यह अनूठी परियोजनाएं है। राज्य प्रत्येक ग्राम को ई- विश्व ग्राम योजना से जोड़ने हेतु ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन की व्यवस्था भी रिकॉर्ड समय में की गयी है।

विशाल परियोजनाओं के साथ ही छोटी योजनाओं पर भी निगाह :

श्री नरेन्द्र मोदी जहाँ बड़ी परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन हेतु कटिबद्ध रहते है वहीँ उनका ध्यान छोटी परियोजनाओं पर भी केंद्रित रहता है। उनका स्पष्ट मत है कि ज्ञान - विज्ञान वैश्विक होना चाहिए परन्तु उसका क्रियान्वयन स्थानीय प्रोद्योगिकी के माध्यम से किया जाना चाहिए। उन्होंने एक ओर जल  संरक्षण हेतु स्थानीय तकनीक बोरी - बंद (ख़ाली बोरी में बालू एवं पत्थर रख कर पानी को सहेजना) एवं खेतों में तालाब के निर्माण के प्रयोग को बढ़ावा दिया वहीँ  वाइब्रेंट गुजरात जैसे अंतराष्ट्रीय मंच पर उन्नत तकनीक से भी आम जन को लाभ पहुँचाने का प्रयास किया। वे स्थानीय किसानों से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक से सुझाव आमंत्रित करते हैं एवं उन्हें प्राप्त होने वाले हज़ारों  ईमेल एवं पत्रों के माध्यम से जनता से अपना जीवंत  रखते है।

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राजनीति एवं प्रशासन को पृथक रखना :

श्री नरेन्द्र मोदी अपने लक्ष्य के प्रति बहुत सजग रहते हैं। उन्होंने हमेशा ही राजनीति को उनकी शासन व्यवस्था से अलग रखा है। उन्होंने अपने प्रशासनिक निर्णयों को राजनैतिक नफा - नुक़सान के हिसाब से नहीं लिया है। वे हमेशा ही पूर्ण पेशेवर तरीके से शासन चलाना सुनिश्चित करते हैं। गुजरात सरकार के बहुत से विभागों ने अपनी प्रक्रियाओं को आईएसओ प्रमाणित करवाया है। यह प्रयास सरकारी व्यवस्था में अनोखा ही है।

जनता की समस्याओं की समझ :

श्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के पिछड़े माने वाले क्षेत्र के निवासी हैं एवं पिछड़ी जाति से सम्बन्ध रखते हैं। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में अभावों का सामना करते हुए संघर्ष किया है। उन्हें अच्छी तरह से पता है कि देश का आम नागरिक पानी, बिजली एवं स्वास्थ जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए कैसे संघर्ष करता है। इन्ही अनुभवों के आधार पर उन्होंने मौका मिलते ही योजनाबद्ध एवं आक्रामक तरीके से आम जनता को इन मुलभुत सुविधाओं को उपलब्ध करने हेतु एक नयी व्यवस्था बनाने का कार्य किया है। गुजरात में वे अपने इस लक्ष्य में बहुत हद तक सफल भी हुए है।

सर्वांगीण विकास :

श्री नरेन्द्र मोदी के आलोचक अक्सर उन पर बड़े औद्योगिक समूहों पर ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाते है। ये आरोप एक भ्रम फ़ैलाने के लिए लगाया जाता है। परन्तु वास्तविकता में श्री मोदी ने गुजरात के सम्पूर्ण समावेशी एवं सर्वांगीण विकास का कार्य किया है। उनके द्वारा प्रतिपादित योजनाएं जैसे ज्योतिग्राम योजना, राज्य स्तरीय गैस ग्रिड, वन बन्धु योजना, सागर खेडू योजना, गरीब समृद्धि योजना, उम्मीद योजना ऐसी योजनायें है जो समाज के हर वर्ग के व्यक्ति को विकास यात्रा में सहभागी बनाने के उद्देश्य से लागू की गयी हैं। इन योजनाओं का लाभ गुजरात की 5.5करोड़ जनता को मिल रहा है।

आम जनता की प्रशासन एवं विकास में भागीदारी:

आम लोगों के बीच पले-बढ़े होने और उनके बीच काम करने के कारण उनका विश्वास है कि आम लोग ही बदलाव के असली वाहक हैं। उनका कहना है कि किसी भी विकास कार्यक्रम को अगर जनअन्दोलन में तब्दील कर दिया जो तो उसका असली लाभ प्राप्त किया जा सकता है- वास्तव में सरकारी विकास कार्यक्रम की जगह जनता का आंदोलन। आसान शब्दों में वो कहते हैं, “जन्माष्टमी के दिन आधी रात में मंदिर में लोगों को जमा करने के लिए क्या कोई सरकारी निर्देश पारित किया जाता है?”

इसलिए वो एक रणनीति के तहत विकास कार्यक्रमों में लोगों को शामिल करते हैं। पूरे राज्य में लाखों जल संरक्षण प्रणालियों के निर्माण में मिली सफलता और कृषि महोत्सव और बालिकाओं की शिक्षा के लिए कन्या केलवणी यात्रा उनकी इस क्षमता के बेहतरीन उदाहरण हैं, जहां उन्होंने लोगों की भागीदारी से सरकारी योजनाओं को एक जन आन्दोलन में तब्दील कर दिया।

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प्रभावी एवं पारदर्शी प्रशासन:

श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रभावी प्रशासन के लिए कहा है कि - कम से कम शासन ही अच्छा शासन है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सरकारी प्रक्रियाओं को सरल एवं पारदर्शी बनाया है। इस हेतु सुचना प्रोद्योगिकी का भी उचित योगदान लिया गया है। वर्ष 2001 में जहाँ गुजरात सूचना प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल में पिछड़ा हुआ था वहीँ आज वह ई- गवर्नेंस के क्षेत्र में अग्रणी राज्य है। आम आदमी को सुविधाएं उपलब्द्ध कराने हेतु सरकार ने प्रत्येक गावों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन से जोड़ा है एवं जनता प्रमाण पत्र जैसी अन्य सुविधाएं अपने गावों में ही प्राप्त कर सकते है। इससे सम्पूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता भी बढ़ी है।

नीतिगत व्यवस्था से शासन :

श्री नरेन्द्र मोदी का मानना है कि शासन व्यवस्था किसी की व्यक्तिगत सनक या इच्छा पर नहीं बल्कि एक नीतिगत व्यवस्था के अंतर्गत चलना चाहिए। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान नीतिगत व्यवस्था को बनाने एवं उसे मज़बूत करने का कार्य किया है। श्री मोदी ने व्यवस्थागत (सिस्टम) के अंतर्गत कार्य करने एवं प्रणाली में पारदर्शिता बनाये राख्ने का निर्देश अधिकारियों को हमेशा दिया है। इसके सुखद परिणाम गुजरात में देखे जा सकते है।

शिकायत निवारण :

आम जन मानस की समस्याओं की सुनवाई एवं उसके निराकरण हेतु उन्होंने 'स्वागत' कार्यक्रम   लागू किया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से ऐसी प्रणाली विकसित की गयी है कि शिकायत की सुनवाई एवं उसके निराकरण की पूरी प्रक्रिया की निगरानी की जा सके। उन्होंने न केवल स्वयं को अपितु पूरी शासकीय व्यवस्था को उसके प्रति संवेदनशील एवं उत्तरदायी बनाया है।

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अभिनव दृष्टिकोण :

श्री नरेन्द्र मोदी ने शासन व्यवस्था से प्रभावी परिणाम प्राप्त करने के उद्देश्य से अभिनव प्रयोग किए हैं। उनके ये प्रयोग अनुभवी प्रशासकों एवं प्रबंधकों की सोच से भी बेहतर रहे हैं।

भूकम्प के पुनर्निर्माण के कार्य में उन्होंने अधिकारियों एवं विशेषज्ञों की टीम के साथ ही जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित की। इसके परिणाम स्वरूप गुजरात में पुनर्निर्माण के कार्य उचित गुणवत्ता के साथ बहुत कम समय में पूर्ण कर लिए गए।

अन्य अनुकरणीय पहलों में उन्होंने त्वरित न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कोर्ट एवं विचाराधीन कैदियों के मध्य वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग की सुविधा, सायंकालीन न्यायालय, महिला अदालत एवं जल स्थानीय स्रोतों का प्रबंधन जनता के हाथों में देने का कार्य किया किया है। चिरंजीवी योजना (बीपीएल महिलाओं को प्रसूति हेतु सुविधा), रोमिंग राशन कार्ड, किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता प्रमाण पत्र जैसे कई अन्य कार्य हैं जो उनके अभिनव दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

स्वयं के लिए कुछ भी नहीं :

सत्ताधारी नेताओं पर अक्सर भाई–भतीजावाद एवं पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। श्री नरेन्द्र मोदी ऐसे किसी आरोप से कोसों दूर हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए भी पूरी निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ कार्य किया है। उनका व्यक्तिगत हित का कोई एजेंडा नहीं रहता है। जन कल्याण ही उनका एकमात्र ध्येय है। उनके कटु आलोचक भी यह स्वीकार करते है कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में सरकार में भ्रष्टाचार के स्तर में कमी आई है।

उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि उनको प्राप्त होने वाले उपहार सरकारी तोशखाने में जमा करवाया जाए एवं बाद में उसकी नीलामी कर प्राप्त राशि को कन्या शिक्षा की योजना कन्या केलवणी के क्रियान्वयन में लगाया जाए। उनके इस प्रयास से उत्साहित हो कर आम जनता अब उन्हें चेक़ के माध्यम से भी लाखों रूपए का भुगतान इस योजना हेतु करने लगी है।

नवीन प्रयोगों के माध्यम से कार्य :

श्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के विकास का जो मॉडल विकसित किया है वह पूर्णतः सर्वांगीण एवं समग्र विकास की अवधारणा को प्रतिपादित करता है। उन्होंने सिर्फ राजनैतिक आधार पर ही निर्णय नहीं लिए बल्कि विशेषज्ञों की सलाह पर कुछ अप्रिय निर्णय भी लिए एवं उन्हें सफलता के साथ क्रियान्वित भी करवाया। बिजली की कीमत के मुद्दे पर विद्युत नियामक आयोग के निर्णय का विरोध होने के बाद भी उन्होंने उसे लागू किया लेकिन किसानों की समस्याओं को देखते हुए उन्होंने सुजलाम – सुफलाम योजना के माध्यम से खेती के लिए सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाया। वर्तमान में गुजरात का किसान इन योजनाओं की सफलता के फलस्वरूप सबसे कम दाम में अपने खेतों में सिंचाई करने की स्थिति में है। उन्होंने शहरी क्षेत्रों में अतिक्रमण हटाने के कार्य को भी बखूबी संपन्न करवाया है। श्री मोदी का सफल नेतृत्व जनता में उनके प्रति विश्वास का ही परिणाम है कि ऐसे अप्रिय कार्य भी बिना किसी विरोध के संपन्न करवाये गए है। इससे जनता को भी लाभ हुआ है एवं शासन की साख बनी रही है।

स्पष्ट है कि श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की इन्हीं विशेताओं एवं क्षमताओं की आज देश को आवश्यकता है एवं पूरा राष्ट्र उन्हें उम्मीद से देखता है

 

डिस्कलेमर :

यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।

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परंपरागत ढर्रे से आगे बढ़कर काम करने वाले नेता हैं नरेन्द्र मोदी
February 28, 2026

शायद यह आदत थी, या फिर वह हल्की सी घबराहट जो 140 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री को कुछ देते समय होती है और मन में यही उम्मीद रहती है कि सब ठीक चले। मैंने अपने नोटपैड के कोने पर जल्दी से एक लाइन लिखी, यह देख लिया कि पेन ठीक चल रहा है, और फिर उसे उन्हें दे दिया।

उन्होंने पेन की ओर देखे बिना उसे ले लिया। वह मेरी तरफ देख रहे थे।

नरेन्द्र मोदी को करीब से देखकर मैंने सबसे पहले यही बात नोट की। उनकी आंखों का संपर्क। स्थिर, बिना जल्दबाजी का, ऐसा कि लगे यह मुलाकात तय समय की औपचारिकता नहीं है। उन्होंने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी, और जब उन्होंने हाथ मिलाया तो पकड़ मजबूत थी और आम तौर पर जितनी देर होती है उससे एक पल ज्यादा रही। सब कुछ सुनियोजित सा लगा, जैसे वह चाहते हों कि आपको महसूस हो कि वह सच में गंभीर हैं।

उन्होंने इंतजार के लिए माफी मांगी। किंग डेविड होटल के उनके सुइट के बाहर इजरायली सुरक्षा टीम ने मेरी जितनी जांच की, उसका ब्योरा देना भी मुश्किल है। एक वक्त तो मुझे सच में लगा कि खुद उनका निजी निमंत्रण होने के बावजूद मुझे अंदर जाने से रोक दिया जाएगा, जो एक दिलचस्प कॉलम तो बनाता, लेकिन दोपहर को काफी निराशाजनक बना देता।

मोदी को देरी की जानकारी मिल चुकी थी और उन्होंने सबसे पहले माफी मांगी। मैंने उनसे कहा कि दिक्कत उनकी टीम की नहीं, इजरायली पक्ष की वजह से हुई थी। वह मुस्कुराए और कमरे का माहौल थोड़ा हल्का हो गया।

इसके बाद उन्होंने हमारे द्वारा उनके दौरे के लिए प्रकाशित विशेष फ्रंट पेज उठाया, उसे कुछ पल देखा और खड़े खड़े, बिना बैठे और बिना किसी औपचारिकता के, हिंदी में दो लाइनें लिखीं: “मानवता सर्वोपरि रहेगी। लोकतंत्र अमर रहेगा।”

उन्होंने अपने नाम से साइन किया और 26 फरवरी, 2026 की तारीख लिखी। इस पूरे काम में शायद 45 सेकंड लगे। उन्होंने दोनों हाथों से पेज वापस कर दिया।

इस जॉब में रहते हुए मैंने बहुत से लोगों का इंटरव्यू लिया है। पॉलिटिशियन, प्रेसिडेंट, धार्मिक नेता, सेलिब्रिटी। एक तरह के पब्लिक फ़िगर होते हैं जिन्हें इतने सालों तक देखा गया है कि वे जो कुछ भी करते हैं वह एक तरह का परफ़ॉर्मेंस बन जाता है। हाथ मिलाना, रुकना, प्रैक्टिस की हुई ईमानदारी। मोदी वैसे नहीं थे। वह उस सुइट में जो कुछ भी कर रहे थे, वह बस वहीं थे, पूरी तरह से, एक ऐसे तरीके से जो सुनने में जितना मुश्किल लगता है, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है।

दुभाषिए के जरिए भी उनकी सोच की लय साफ सुनाई देती थी। पूरे और स्पष्ट विचार। ऐसे ठहराव जो समय निकालने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए हों क्योंकि वह सच में आपकी बात पर विचार कर रहे हों।हैं।
एक बार, मैंने उनसे कहा कि उनका क्नेसेट भाषण, जो एक दिन पहले दिया गया था, इज़राइल की पार्लियामेंट में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला भाषण ऐतिहासिक लगा। उन्होंने इसे बिना किसी घुमाव या बढ़ा-चढ़ाकर बताए, आसानी से लिया, और फिर कुछ ऐसा कहा जो मेरे दिमाग में रह गया: “हमारे देश और धर्म लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा मिलते-जुलते हैं।”

उन्होंने पिछला दिन ठीक यही बात कही थी। डिप्लोमैटिक शिष्टाचार के तौर पर नहीं। एक फिलॉसॉफिकल तर्क के तौर पर।

ज्यादातर नेता जब यरूशलम आते हैं तो सुरक्षा, व्यापार और तकनीक की बात करते हैं। मोदी ने भी यह सब कहा, लेकिन इसके बाद वह बिल्कुल अलग दिशा में चले गए। उन्होंने ऐसा भाषण दिया जिसे मैं सभ्यताओं से जुड़ा भाषण कहूंगा, जिसमें उन्होंने एक सच में दिलचस्प सवाल उठाया: जब दुनिया की दो सबसे प्राचीन जीवित संस्कृतियां एक दूसरे को ध्यान से देखती हैं और कुछ अपना सा पहचानती हैं, तो क्या होता है?

‘टिक्कुन ओलाम’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’

उनका जवाब एक ऐसी तुलना पर आधारित था जो सुनने में सरल लगती है, लेकिन गहराई से सोचें तो काफी अर्थ रखती है। उन्होंने टिक्कुन ओलाम, यानी दुनिया को सुधारने और बेहतर बनाने की यहूदी अवधारणा, को वसुधैव कुटुंबकम के साथ रखा, जो प्राचीन संस्कृत का यह संदेश है कि पूरा विश्व एक परिवार है। उन्होंने हलाखा, यानी यहूदी कानून जो रोजमर्रा के नैतिक आचरण का जीवंत ढांचा है, की तुलना धर्म से की, जो हिंदू परंपरा में नैतिक व्यवस्था और व्यक्तिगत कर्तव्य का सिद्धांत है।

वह जिस बात की ओर इशारा कर रहे थे, वह यह थी कि दोनों सभ्यताओं ने एक ही समस्या का समाधान हैरान करने वाली समानता के साथ किया। सवाल यह है कि ऐसा समाज कैसे बनाया जाए जहां नैतिकता सिर्फ किसी पवित्र दिन दिया जाने वाला उपदेश न हो, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के ताने बाने में शामिल एक व्यवहार हो? यहूदी और हिंदू दोनों परंपराओं ने इसका जवाब दिया: कानून के जरिए, कर्तव्य के जरिए और दिन भर में लिए जाने वाले हजारों छोटे छोटे फैसलों के जरिए।

यह कोई ऐसा संयोग नहीं है जो कूटनीतिक शिखर बैठकों में अचानक सामने आ जाए। यह सदियों पुरानी एक गहरी संरचनात्मक समानता है।

हस्सिदिक विचारधारा के पाठक के लिए यह बात खास असर डालती है। हस्सिदिज्म, जिसे हस्सिदुत यानी हस्सिदिक शिक्षाएं और दर्शन भी कहा जाता है, इसे अवोदाह कहता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है काम, यानी भीतर की आध्यात्मिक भावना जो व्यवहारिक कर्मों के जरिए व्यक्त होती है।

18वीं सदी में हस्सिदुत के संस्थापक बाल शेम टोव ने सिखाया कि ईश्वरीय तत्व दुनिया से दूर हटने में नहीं, बल्कि उसके साथ पूरी तरह जुड़ने में मिलता है, बाजार में, भोजन की मेज पर और आपके सामने खड़े व्यक्ति के साथ आपके व्यवहार में। मोदी ने वही शब्द नहीं इस्तेमाल किए, लेकिन वह उसी परंपरा का सम्मान कर रहे थे और यह बता रहे थे कि भारत ने भी अपनी सभ्यता की नींव इसी आधार पर रखी।
उन्होंने हनुक्का और दिवाली को जोड़ा, जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का हिंदू पर्व है, और यह तुलना सिर्फ काव्यात्मक नहीं है।

दोनों पर्व अंधेरे के सामने निष्क्रिय रहने की सोच को ठुकराते हैं। हनुक्का की कथा में रब्बियों ने एक खास फैसला लिया: धार्मिक आदेश यह नहीं है कि एक बड़ा अलाव जलाया जाए, बल्कि हर रात एक छोटी मोमबत्ती जोड़ी जाए, धीरे धीरे, खुले तौर पर और लगातार। यह इतिहास में सक्रिय भूमिका निभाने की एक सोच है। अंधेरा एक ही बार में खत्म नहीं होता, उसे रोशनी के छोटे छोटे और लगातार किए गए प्रयासों से पीछे धकेला जाता है।

दिवाली भी यही संदेश देती है, करोड़ों घरों में जलते दीयों की कतारें, जहां हर छोटा सा दीपक एक अलग प्रयास है जो मिलकर बड़ी रोशनी बनाता है।

उन्होंने पुरीम की तुलना होली से की, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का हिंदू वसंत पर्व है, और यहां भी यह बौद्धिक जुड़ाव और गहरा है। दोनों त्योहार उस अनुभव पर आधारित हैं जब छिपी हुई सच्चाई अचानक सामने आ जाती है।

पुरीम की कहानी में एस्तेर की पुस्तक में ईश्वर का नाम कहीं नहीं आता। चमत्कार सामान्य महल की राजनीति और इंसानी फैसलों के भीतर छिपा रहता है। हस्सिदिक विचारधारा इसे सबसे गहरी सच्चाई के रूप में देखती है कि ईश्वरीय मार्गदर्शन, यानी हशगाचा प्रतित, जो व्यक्ति के जीवन की बारीकियों में काम करता है, बाहर से अक्सर संयोग या इतिहास जैसा दिखता है। पैटर्न तभी दिखता है जब आप उसे देखने के लिए तैयार हों।

मोदी ने भारत और इजराइल के बीच प्राचीन संबंधों पर जोर दिया। उन्होंने पुराने व्यापार मार्गों, साझा धार्मिक ग्रंथों और फारसी रानी एस्तेर का जिक्र किया, जिनके हिब्रू नाम का मतलब “छिपा हुआ” से जुड़ता है। उनका कहना था कि कुछ रिश्ते इतिहास में बहुत पहले से लिखे होते हैं, कूटनीतिक समझौते तो बाद में होते हैं।

उन्होंने आतंकवाद पर बिना लाग-लपेट के साफ बात की। उन्होंने 7 अक्टूबर के नरसंहार को मुंबई हमलों से जोड़ा, जो भारत का अपना घाव है और आज भी महसूस होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी कारण से निर्दोष लोगों की हत्या सही नहीं ठहराई जा सकती। उन्होंने कहा कि कहीं भी आतंकवाद होगा तो वह हर जगह शांति के लिए खतरा है। उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे कोई लंबे समय से जिस सच को मानता आया हो, उसे दोहराने की जरूरत ही न हो।

फिर उन्होंने ऐसा काम किया जिसने औपचारिक घोषणाओं से ज्यादा लोगों को भावुक कर दिया। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल में मौजूद भारतीय कामगारों और देखभाल करने वालों का खास जिक्र किया। वे लोग जो डटे रहे। जिन्होंने मदद की। जो भागे नहीं। उन्होंने तलमूद की यह बात दोहराई: जो एक जान बचाता है, वह पूरी दुनिया बचाता है।

हसीदुत की नजर से देखें तो यह भाषण का सबसे अहम पल था। इस परंपरा में उस छोटे से दिखने वाले काम को बहुत महत्व दिया जाता है, जिसका असर बहुत बड़ा होता है। सामान्य से काम में छिपी पवित्र चिंगारी, जिसे सही इरादे से किया गया कर्म ऊंचा उठा देता है।

उन्होंने युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे विदेशी कामगारों को दो देशों के रिश्ते का नैतिक केंद्र बना दिया। यह सिर्फ भाषण नहीं था। यह सोच का वह तरीका था, जो जानता है कि असली मायने कहां तलाशने हैं।

उन्होंने एक और बात कही, जिसे इजराइल के दोस्त हमेशा खुलकर नहीं कहते। उन्होंने क्नेसेट से कहा कि यहूदी समुदाय सदियों तक भारत में बिना उत्पीड़न, बिना डर और अपनी उजागर पहचान के साथ रहे। उन्होंने अपना धर्म भी बचाए रखा और समाज में पूरी तरह भागीदारी भी की। उन्होंने इसे भारत के लिए गर्व की बात बताया।

उन्होंने इसे गर्व कहकर सही कहा। और 2026 में यरूशलम में यह बात कहना भी सही था, जब दुनिया में यह सवाल पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है कि यहूदी जीवन आखिर कहां खुले तौर पर और सुरक्षित तरीके से जिया जा सकता है।

सुइट में लौटने पर बातचीत गर्मजोशी भरी रही। उनमें यह खासियत है कि औपचारिक मुलाकात भी असली बातचीत जैसी लगने लगती है। जब मैंने उनसे कहा कि क्नेसेट में दिया गया भाषण ऐतिहासिक लगा, तो उन्होंने वही बात दोहराई जिससे शुरुआत की थी कि दोनों सभ्यताएं जितनी लोग समझते हैं, उससे कहीं ज्यादा एक जैसी हैं। उन्होंने यह ऐसे कहा जैसे यह निष्कर्ष वे बहुत पहले निकाल चुके थे और अब उन्हें इसे कहने के लिए सही जगह मिल गई हो।

हमारा बुधवार का कवर मेरे उस सुइट में पहुंचने से पहले ही सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा था। मोदी ने इसे एक्स या ट्विटर पर अपने बड़े फॉलोअर समूह के साथ साझा किया। भारतीय मीडिया ने भी इसे उठाया। आजकल पहला पन्ना इस तरह खुद ही दूर तक पहुंच जाता है, कई बार उसके नीचे लिखी बातों से भी तेज।

वे दो हाथ से लिखी पंक्तियां कुछ अलग ही हैं। वे कागज पर दर्ज हैं, यरूशलम के एक होटल के कमरे में, खड़े होकर लिखी गईं, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे कुछ लिखने की जरूरत नहीं थी, फिर भी उसने वही लिखना चुना। मानवता पहले। लोकतंत्र स्थायी है। हनुक्का की एक मोमबत्ती और एक दीया; रात का वही अंधेरा है और उसमें एक-एक कर सावधानी से रोशनी जोड़ते जाने का वही जज़्बा भी एक जैसा ही है

मैंने उन्हें पेन देने से पहले खुद जांच लिया था कि वह ठीक से चल रहा है।

लेकिन बाद में समझ आया, उन्हें मेरी मदद की कोई जरूरत नहीं थी।

(श्री ज्विका क्लेन, यरूशलम पोस्ट के एडिटर-इन-चीफ हैं। यहां व्यक्त किये गए विचार उनके निजी हैं।)

स्रोत: द यरूशलम पोस्ट