"भारत में जनभागीदारी और जन आंदोलन से जल संरक्षण और प्रकृति संरक्षण का अनूठा अभियान चल रहा है"
"जल संरक्षण केवल नीति नहीं, एक प्रयास भी है और पुण्य भी है"
"भारतीयों की संस्कृति ऐसी है, जिसमें जल को भगवान का रूप, नदियों को
देवी और सरोवरों को देवताओं का निवास माना जाता है"
"हमारी सरकार ने समग्र समाज और समग्र सरकार के दृष्टिकोण से काम किया है"
"जल संरक्षण और प्रकृति संरक्षण भारत की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं"
"जल संरक्षण केवल नीतियों का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिबद्धता का भी मामला है"
"हमें देश में भविष्‍य के लिए जल संरक्षण को सुरक्षित करने के लिए 'रिड्यूस, रीयूज, रिचार्ज और रीसाइकिल' के मंत्र को अपनाना होगा"
"हम सब मिलकर भारत को पूरी मानवता के लिए जल संरक्षण का प्रतीक बनाएंगे"

गुजरात के मुख्यमंत्री श्रीमान भूपेंद्र भाई पटेल, केंद्रीय मंत्रिपरिषद में मेरे साथी सी. आर. पाटिल, निमुबेन, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, सांसदगण, विधायकगण, देश के सभी जिलों के डीएम, कलेक्टर, अन्य महानुभाव और मेरे सभी भाइयों एवं बहनों!

आज गुजरात की धरती से जलशक्ति मंत्रालय द्वारा एक अहम अभियान का शुभारंभ हो रहा है। उसके पूर्व पिछले दिनों देश के हर कोने में जो वर्षा का तांडव हुआ, देश का शायद ही कोई इलाका होगा, जिसको इस मुसीबत से संकट को झेलना ना पड़ा हो। मैं कई वर्षों तक गुजरात का मुख्यमंत्री रहा, लेकिन एक साथ इतने सभी तहसीलों में इतनी तेज बाारिश मैंने कभी ना सुना था, ना देखा था। लेकिन इस बार गुजरात में बहुत बड़ा संकट आया। सारी व्यवस्थाओं की ताकत नहीं थी कि प्रकृति के इस प्रकोप के सामने हम टिक पाएं। लेकिन गुजरात के लोगों का अपना एक स्वभाव है, देशवासियों का स्वभाव है, सामर्थ्य है कि संकट की घड़ी में कंधे से कंधा मिलाकर के हर कोई, हर किसी की मदद करता है। आज भी देश के कई भाग ऐसे हैं, जो भयंकर वर्षा के कारण परेशानियों से गुजर रहे हैं।

साथियों,

जल-संचय, ये केवल एक पॉलिसी नहीं है। ये एक प्रयास भी है, और यूं कहें तो ये एक पुण्य भी है। इसमें उदारता भी है, और उत्तरदायित्व भी है। आने वाली पीढ़ियाँ जब हमारा आंकलन करेंगी, तो पानी के प्रति हमारा रवैया, ये शायद उनका पहला पैरामीटर होगा। क्योंकि, ये केवल संसाधनों का प्रश्न नहीं है। ये प्रश्न जीवन का है, ये प्रश्न मानवता के भविष्य का है। इसीलिए, हमने sustainable future के लिए जिन 9 संकल्पों को सामने रखा है, उनमें जल-संरक्षण पहला संकल्प है। मुझे खुशी है, आज इस दिशा में जनभागीदारी के जरिए एक और सार्थक प्रयास शुरू हो रहा है। मैं इस अवसर पर, भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय को, गुजरात सरकार को, और इस अभियान में भाग ले रहे देश के सभी लोगों को शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

आज जब पर्यावरण और जल-संरक्षण की बात आती है, तो कई सच्चाइयों का हमेशा ध्यान रखना है। भारत में दुनिया के कुल fresh water का सिर्फ 4 प्रतिशत ही है। हमारे गुजरात के लोग समझेंगे सिर्फ 4 प्रतिशत ही है। कितनी ही विशाल नदियां भारत में हैं, लेकिन हमारे एक बड़े भूभाग को पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है। कई जगहों पर पानी का स्तर लगातार गिर रहा है। क्लाइमेट चेंज इस संकट को और गहरा रहा है।

और साथियों,

इस सबके बावजूद, ये भारत ही है जो अपने साथ-साथ पूरे विश्व के लिए इन चुनौतियों के समाधान खोज सकता है। इसकी वजह है भारत की पुरातन ज्ञान परंपरा। जल संरक्षण, प्रकृति संरक्षण ये हमारे लिए कोई नए शब्द नहीं है, ये हमारे लिए किताबी ज्ञान नहीं है। ये हालात के कारण हमारे हिस्से आया हुआ काम भी नहीं है। ये भारत की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। हम उस संस्कृति के लोग हैं, जहां जल को ईश्वर का रूप कहा गया है, नदियों को देवी माना गया है। सरोवरों को, कुंडों को देवालय का दर्जा मिला है। गंगा हमारी माँ है, नर्मदा हमारी माँ है। गोदावरी और कावेरी हमारी माँ हैं। ये रिश्ता हजारों वर्षों का है। हजारों वर्ष पहले भी हमारे पूर्वजों को जल और जल-संरक्षण का महत्व पता था। सैकड़ों साल पुराने हमारे ग्रन्थों में कहा गया है- अद्भिः सर्वाणि भूतानि, जीवन्ति प्रभवन्ति च। तस्मात् सर्वेषु दानेषु, तयोदानं विशिष्यते॥ अर्थात्, सब प्राणी जल से ही उत्पन्न हुये हैं, जल से ही जीते हैं। इसलिए, जल-दान, दूसरों के लिए पानी बचाना, ये सबसे बड़ा दान है। यही बात सैकड़ों साल पहले रहीमदास ने भी कही थी। हम सबने पढ़ा है। रहीमदास ने कहा था- रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून! जिस राष्ट्र का चिंतन इतना दूरदर्शी और व्यापक रहा हो, जलसंकट की त्रासदी के हल खोजने के लिए उसे दुनिया में सबसे आगे खड़ा होना ही होगा।

साथियों,

आज का ये कार्यक्रम गुजरात की उस धरती पर प्रारंभ हो रहा है, जहां जन-जन तक पानी पहुंचाने और पानी बचाने की दिशा में कई सफल प्रयोग हुए हैं। दो-ढाई दशक पहले तक सौराष्ट्र के क्या हालात थे, ये हम सबको याद है, उत्तर गुजरात की क्या दशा थी हमें पता है। सरकारों में जल संचयन को लेकर जिस विजन की आवश्यकता होती है, पहले के समय में उसकी भी कमी थी। तभी मेरा संकल्प था कि मैं दुनिया को बता के रहूँगा कि जल संकट का भी समाधान हो सकता है। मैंने दशकों से लटके पड़े सरदार सरोवर डैम का काम पूरा करवाया। गुजरात में सौनी योजना शुरू हुई। जहां पानी की अधिकता थी, वहाँ से पानी, जलसंकट वाले इलाकों में पहुंचाया गया। विपक्ष के लोग तब भी हमारा मजाक उड़ाते थे कि पानी के जो पाइप बिछाए जा रहे हैं उनमें से हवा निकलेगी, हवा। लेकिन आज गुजरात में हुए प्रयासों के परिणाम सारी दुनिया के सामने हैं। गुजरात की सफलता, गुजरात के मेरे अनुभव मुझे ये भरोसा दिलाते हैं कि हम देश को जल-संकट से निजात दिला सकते हैं।

साथियों,

जल-संरक्षण केवल नीतियों का नहीं, बल्कि सामाजिक निष्ठा का भी विषय है। जागरूक जनमानस, जनभागीदारी और जनआंदोलन ये इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत है। आप याद करिए, पानी के नाम पर, नदियों के नाम पर पहले भी दशकों तक हजारों करोड़ की योजनाएँ आती रहीं। लेकिन, परिणाम इन्हीं 10 वर्षों में देखने को मिले हैं। हमारी सरकार ने whole of society और whole of government की approach के साथ काम किया है। आप 10 वर्षों की सभी बड़ी योजनाओं को देखिए। पानी से जुड़े विषयों पर पहली बार silos को तोड़ा गया। हमने whole of the government के कमिटमेंट पर पहली बार एक अलग जलशक्ति मंत्रालय बनाया। जल-जीवन मिशन के रूप में पहली बार देश ने 'हर घर जल' इसका संकल्प लिया। पहले देश के केवल 3 करोड़ घरों में पाइप से पानी पहुंचता था। आज देश के 15 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों को पाइप से पानी मिलने लगा है। जल-जीवन मिशन के जरिए देश के 75 प्रतिशत से ज्यादा घरों तक नल से साफ पानी पहुँच चुका है। जल-जीवन मिशन की ये ज़िम्मेदारी स्थानीय जल समितियां संभाल रही हैं। और जैसा गुजरात में पानी समिति में महिलाओं ने कमाल किया था, वैसे ही पूरे देश में अब पानी समिति में महिलाएं शानदार काम कर रही हैं। इसमें कम से कम 50 प्रतिशत भागीदारी गाँव की महिलाओं की है।

भाइयों और बहनों,

आज जलशक्ति अभियान एक राष्ट्रीय mission बन चुका है। पारंपरिक जलस्रोतों का renovation हो, नए structures का निर्माण हो, stakeholders से लेकर सिविल सोसाइटी और पंचायतों तक, हर कोई इसमें शामिल है। जनभागीदारी के जरिए ही हमने आज़ादी के अमृत महोत्सव में हर जिले में अमृत सरोवर बनाने का काम भी शुरू किया था। इसके तहत देश में जनभागीदारी से 60 हजार से ज्यादा अमृत सरोवर बने। आप कल्पना कर सकते हैं देश की भावी पीढ़ी के लिए ये कितना बड़ा काम है। इसी तरह, ग्राउंड वॉटर के रीचार्ज के लिए हमने अटल भूजल योजना शुरू की। इसमें भी जल स्रोतों के मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी गाँव में समाज को ही दी गई है। 2021 में हमने Catch the rain कैम्पेन शुरू किया। आज शहरों से लेकर गाँवों तक, catch the rain से लोग बड़ी संख्या में जुड़ रहे हैं। 'नमामि गंगे' योजना का भी उदाहरण हमारे सामने है। 'नमामि गंगे' करोड़ों देशवासियों के लिए एक भावनात्मक संकल्प बन गया है। हमारी नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए लोग रूढ़ियों को भी छोड़ रहे हैं, अप्रासंगिक रीतियों को भी बदल रहे हैं।

साथियों,

आप सब जानते हैं, मैंने पर्यावरण के लिए देशवासियों से 'एक पेड़ माँ के नाम' लगाने की अपील की है। जब वृक्ष लगते हैं तो ग्राउंड वॉटर लेवेल तेजी से बढ़ता है। बीते कुछ सप्ताह में ही माँ के नाम पर देश में करोड़ों पेड़ लगाए जा चुके हैं। ऐसे कितने ही अभियान हैं, कितने ही संकल्प हैं, 140 करोड़ देशवासियों की भागीदारी से आज ये जन-आंदोलन बनते जा रहे हैं।

साथियों,

जल-संचयन के लिए आज हमें reduce, reuse, recharge और recycle के मंत्र पर बढ़ने की जरूरत है। यानी, पानी तब बचेगा जब हम पानी का दुरुपयोग रोकेंगे- reduce करेंगे। जब हम पानी को reuse करेंगे, जब हम जलस्रोतों को recharge करेंगे, और दूषित जल को recycle करेंगे। इसके लिए हमें नए तौर-तरीकों को अपनाना होगा। हमें इनोवटिव होना होगा, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना होगा। हम सब जानते हैं कि हमारी पानी की जरूरतों का 80 प्रतिशत हिस्सा, खेती के कामों में आता है। इसलिए, sustainable agriculture की दिशा में हमारी सरकार drip irrigation जैसी तकनीकों को लगातार बढ़ा रही है। Per drop more crop जैसे अभियान इनसे पानी की बचत भी हो रही है, कम पानी वाले इलाकों में किसानों की आय भी बढ़ रही है। सरकार दलहन, तिलहन और मिलेट्स जैसी कम पानी की खपत वाली फसलों की खेती को भी बढ़ावा दे रही है। कुछ राज्य जल-संरक्षण के लिए वैकल्पिक फसलों पर किसानों को incentive भी दे रहे हैं। मेरा आग्रह है, इन प्रयासों को और गति देने के लिए सभी राज्यों को साथ आना चाहिए, मिशन मोड में काम करना चाहिए। खेतों के पास तालाब-सरोवर बनाना, रीचार्ज वेल बनाना हमें कई नई तकनीक के साथ ऐसे पारंपरिक ज्ञान को भी बढ़ावा देना होगा।

साथियों,

साफ पानी की उपलब्धता, जल संरक्षण की सफलता, इससे एक बहुत बड़ी वॉटर इकोनॉमी भी जुड़ी है। जैसे जल जीवन मिशन ने लाखों लोगों को रोजगार और स्वरोजगार के मौके दिए हैं। बड़ी संख्या में इंजीनियर्स, प्लंबर्स, इलेक्ट्रिशियन्स और मैनेजर्स जैसी जॉब्स लोगों को मिली हैं। WHO का आकलन है कि हर घर पाइप से जल पहुँचने से देश के लोगों के करीब साढ़े 5 करोड़ घंटे बचेंगे। ये बचा हुआ समय विशेषकर हमारी बहनों-बेटियों का समय फिर सीधे देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में लगेगा। वॉटर इकोनॉमी का एक पहलू, अहम पहलू हेल्थ भी है- आरोग्य। रिपोर्ट्स कहती हैं जल जीवन मिशन से सवा लाख से ज्यादा बच्चों की असमय मौत भी रोकी जा सकेगी। हम हर साल 4 लाख से ज्यादा लोगों को डायरिया जैसी बीमारियों से भी बचा पाएंगे यानि बीमारियों पर लोगों का जो खर्च होता था, वो भी कम हुआ है।

साथियों,

जनभागीदारी के इस मिशन में बहुत बड़ा योगदान हमारे उद्यम क्षेत्र का भी है। आज मैं उन इंडस्ट्रीज को भी धन्यवाद दूंगा, जिन्होंने net zero liquid discharge standards और water recycling goals को पूरा किया है। कई industries ने corporate social responsibilities के तहत जल संरक्षण के काम शुरू किए हैं। गुजरात ने जल संरक्षण के लिए CSR का इस्तेमाल करने का एक नया कीर्तिमान बनाया है। सूरत, वलसाड, डांग, तापी, नवसारी मुझे बताया गया है कि इस सब जगहों पर CSR initiatives की मदद से करीब 10 हजार बोरवेल रिचार्ज स्ट्रक्चर्स का काम पूरा हुआ है। अब 'जल संचय-जन भागीदारी अभियान' के माध्यम से जलशक्ति मंत्रालय और गुजरात सरकार ने साथ मिलकर 24 हजार और ऐसे स्ट्रक्चर्स बनाने का अभियान शुरू किया है। ये अभियान अपने आप में एक ऐसा मॉडल है, जो भविष्य में अन्य राज्यों को भी ऐसा प्रयास करने की प्रेरणा देगा। मुझे आशा है, हम साथ मिलकर भारत को जल संरक्षण की दिशा में पूरी मानवता के लिए एक प्रेरणा बनाएँगे। इसी विश्वास के साथ, मैं आप सभी को एक बार फिर इस अभियान की सफलता के लिए अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफी भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक अनमोल धरोहर बनेगी: पीएम मोदी
August 12, 2026
Today, we have the opportunity to release the autobiography of Shri Ram Nath Kovind ji; I am happy to be a part of this program: PM
His journey reflects a life dedicated to public service and the progress of our nation:PM
My prolonged acquaintance with Kovind Ji and his special affection and warmth towards me have been my greatest assets: PM
महात्मा गांधी, बाबासाहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने एक ऐसे नए भारत का सपना देखा था जहाँ सबसे गरीब और सबसे वंचित लोग भी शिखर तक पहुँच सकें: पीएम मोदी
कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने न केवल खुद का जीवन बदला है, बल्कि भारत के लिए अपने सपने और विजन को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाई है: पीएम मोदी


हमारे पूर्व राष्ट्रपति श्रीमान रामनाथ कोविंद जी, लोकसभा के अध्यक्ष आदरणीय ओम बिरला जी, श्रीमती सविता कोविंद जी, सभाग्रह में सभी वरिष्ठ जन बैठे हैं, सबका उल्लेख नहीं कर पाऊंगा, लेकिन मेरे लिए बहुत आनंद है कि एक पारिवारिक कार्यक्रम लग रहा है।

भाइयों-बहनों,

आज हमें श्री रामनाथ कोविंद जी की आत्मकथा के विमोचन का अवसर मिला है। मुझे खुशी है कि मुझे भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है। कोविंद जी से मेरा बहुत लंबा परिचय रहा है, उन्हें करीब से जानने का भी अवसर मिला और राष्ट्रपति के रूप में उनका मार्गदर्शन और इस सबके साथ-साथ उनका मेरे प्रति विशेष स्नेह, उनकी आत्मीयता, ये मेरी बहुत बड़ी पूंजी रही है। मैंने उनके जीवन को जितना समझा है, उनकी कार्यक्षमताओं को जितना जाना है, मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफ़ी अपने आप में भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक धरोहर बनेगी। कोविंद जी की जीवन यात्रा, समाज और राष्ट्र के लिए उनका योगदान, ऐसा कितना कुछ है जिसके बारे में मैं विस्तार से बात कर सकता हूं, लेकिन बुक रिलीज़ में केवल ‘कर्टन रेज़र’ ही होना चाहिए। आप सब किताब का पूरा लाभ पढ़कर ही लें, तो ही ज्यादा अच्छा है।

साथियों,

कोविंद जी की जीवन यात्रा को आप उनके शब्दों में जानें, उनकी लेखनी को, उनके अनुभवों को देश की नई पीढ़ी पढ़े, इससे हर किसी को काफी कुछ सीखने को मिलेगा। मैं रामनाथ कोविंद जी को इस आत्मकथा के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

कोविंद जी ने अपनी इस पुस्तक को बहुत ही सटीक नाम दिया है- “Triumph of the Indian Republic: My Life, My Struggles” कहने का भाव ये कि जीवन और जीवन के संघर्ष उनके व्यक्तिगत हैं, लेकिन उन संघर्षों के परिणामस्वरूप मिली जीत, भारत के गणतंत्र की है, भारत के लोकतंत्र की है।

साथियों,

हम सब अक्सर अनुभव करते हैं कि इंसान का एक स्वभाव होता है, लोग अपनी सफलता का श्रेय खुद को देते हैं और जीवन की मुश्किलों के लिए, कठिनाइयों के लिए समाज को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन, जब हृदय उदार हो, भारतीय संस्कार हों, तब व्यक्ति समाज की कमियाँ निकालने में समय नहीं गँवाता, वो उसके सकारात्मक पक्ष पर फोकस करता है, वो अपनी सफलता में समाज को बराबर का भागीदार मानता है। कोविंद जी की आत्मकथा और उसका शीर्षक इसके उदाहरण हैं। आप उनका जीवन देखिए, एक बेहद सामान्य परिवार में, कानपुर देहात में उनका जन्म हुआ। कोविंद जी ने अभी भी कुछ वर्णन किया और अपनी किताब में भी लिखा है, कैसे गर्मी के मौसम में एक दिन उनके घर में आग लग गई, उनकी माँ अपनी चिंता छोड़कर घर की चीजों को बचा रही थीं। आखिर, एक सामान्य परिवार में, माँ के लिए एक-एक चीज बच्चों के पालन-पोषण का जरिया होती है। उसी कोशिश में, आग में फंसकर उनकी माता जी की मृत्यु हो गई। आप कल्पना कर सकते हैं, छोटी सी उम्र में इस तरह की घटना, माँ को इस तरह खो देना, ये कितना दर्दनाक रहा होगा। मैं तो भाग्यशाली रहा हूं, मेरी मां 100 साल से भी अधिक जीवित रही और मुझे आशीर्वाद देती रही। उसके बावजूद भी, आज भी मैं मां की कमी महसूस करता हूं।

साथियों,

उनके जीवन का एक ऐसा दर्दनाक ये घटनाक्रम था, कोई भी इससे टूट सकता था, लेकिन कोविंद जी को उन मुश्किलों ने मजबूत किया। पड़ोस की एक माता जी ने उनके पालन-पोषण में मदद की। इससे उन्होंने समाज की एकता और सौहार्द की ताकत को समझा। इस घटना के बाद कोविंद जी के जीवन में उनके पिता की भूमिका और बड़ी हो गई और जिस तरह से उन्होंने अपने परिवार को संभाला, बच्चों को संस्कार दिये, इसीलिए, कोविंद जी अपने पिता को अपना हीरो मानते हैं।

साथियों,

बचपन के इन संघर्षों के बीच, कोविंद जी ने शिक्षा को, अपने सामर्थ्य को बढ़ाने का मार्ग बनाया। उन्होंने मेहनत की, उन्होंने संसाधनों की कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया। और, एक ऐसे मुकाम तक पहुंचे, जिसकी कल्पना भी तब लोगों ने नहीं की थी। वो भारत जैसे विशाल देश के राष्ट्रपति बने।

साथियों,

इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी कोविंद जी का विनम्र व्यक्तित्व, उनकी सादगी ऐसे ही कायम रही। मुझे याद है प्रधानमंत्री के तौर पर मैं राष्ट्रपति भवन में उनसे मिलने जाता था। प्रोटोकॉल के हिसाब से जो बातें नहीं हो सकती हैं, वो बातें वो करते थे। वो प्रधानमंत्री को छोड़ने के लिए गाड़ी के दरवाजे तक आते थे। मैं शुरू में उनको प्रार्थना करता रहता था, प्लीज आप ऐसा मत कीजिए, लेकिन उन्होंने जीवन के आखिर तक अपनी उस विनम्रता को कभी छोड़ा नहीं। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे अपने गांव परौंख गए, तो उन्होंने वहाँ अपने गुरुओं के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया। गाँव की मिट्टी को नमन करके उन्होंने गाँव के सामान्य लोगों का धन्यवाद किया। पूरे देश ने वो भावुक दृश्य देखा था। उनके इस आचरण ने दुनिया के सामने भारत के संस्कारों की ऐसी तस्वीर सामने रखी, जिस पर हर भारतवासी गर्व करता है।

साथियों,

गुलामी के सैकड़ों साल में हमारे देश ने आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत कुछ खोया था। हमारे पूर्वजों ने सदियों तक संघर्ष किया। महात्मा गांधी, बाबा साहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रबाई फुले, ऐसी कितनी ही महान विभूतियों ने भारत के नवनिर्माण का सपना देखा था। एक ऐसा भारत जहां गरीब से गरीब, वंचित से वंचित को शिखर तक पहुँचने का अवसर मिल सके। कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने अपने श्रम और काबिलियत से केवल खुद का जीवन ही बदला, इतना नहीं है, उन्होंने सदियों के उस स्वप्न को, उस विज़न को भी साकार करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। और इस दिशा में हम सबके प्रयास अभी भी जारी हैं। हमें भविष्य में कोविंद जी जैसे अनेकों युवा चाहिए, जो परेशानियों से परास्त न हों, जो मुश्किलों के सामने मायूस न हों, बल्कि अपनी मेहनत से हर मंजिल को आसान बनाने का हौसला रखें। इसी बदलाव से सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प पूरा होगा। यहीं से आत्मनिर्भर और विकसित भारत का रास्ता बनेगा।

साथियों,

ऐसे युवाशक्ति के निर्माण के लिए जो प्रेरणा चाहिए, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी उसका अहम स्रोत बन सकती है।

साथियों,

कोविंद जी ने अपनी जीवनी में मोरारजी भाई देसाई के साथ अनुभवों के बारे में भी इसमें विस्तार से बताया है। कोविंद जी के भीतर देशसेवा की जो भावना थी, मोरारजी भाई के साथ काम करके उन्हें जो सीखने को मिला, जो रास्ता मिला। कोविंद जी ने राजनीति और समाजसेवा को अपना मार्ग बनाया। वो अपने कर्तव्यों के लिए समर्पित रहे। सेवा को उन्होंने अपना लक्ष्य बनाकर काम किया। संसद में उनका कार्यकाल गवाह है। राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया। राष्ट्रपति के रूप में भी हमें उनकी यही कर्तव्यनिष्ठा दिखाई देती रही। यहाँ तक कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद से सेवामुक्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम नहीं लिया है। वो अभी भी ‘एक देश, एक चुनाव’ One Nation, One Election जैसे महत्वपूर्ण विषय पर काम कर रहे हैं। देश को जगा रहे हैं। ये एक ऐसा विषय है, जिसका समाधान देश के लोकतंत्र का नया अध्याय शुरू कर सकता है। मैं मानता हूँ, कोविंद जी की इस कर्तव्यनिष्ठा और सेवाभाव से देश के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं।

साथियों,

सामाजिक जीवन में सक्रिय रहते हुये ऑटोबायोग्राफ़ी के लिए समय निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है। कोविंद जी ने ये काम हम सबके लिए किया है, क्योंकि उनके जीवन में ऐसा कितना कुछ है, जिसमें गरीब वंचित तबके से आए तमाम लोग अपने जीवन की परछाई देख सकते हैं। कैसे एक साधारण परिवार मुश्किल हालातों में भी जीवन की शुचिता और ईमानदारी से समझौता नहीं करता, कैसे वही आदर्श आगे चलकर हमारे जीवन का आधार बनते हैं, हमारे कठिन समय के मूल्य किस तरह जीवनभर हमें रोशनी देते हैं, कैसे इस पवित्रता से हमें राष्ट्र सेवा की शक्ति मिलती है। अलग-अलग पदों का दायित्व निभाते हुए, कोविंद जी ने समाज को निरंतर इसकी प्रेरणा दी है।

साथियों,

मुझे विश्वास है, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी, इसमें उनके जीवन की ही नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की भी अहम स्मृतियाँ सुरक्षित होंगी। मैं एक बार फिर उन्हें उनकी आत्मकथा के लिए शुभकामनाएं देता हूं। और मैं खास करके युवा पीढ़ी से आग्रह करूंगा, रील का जमाना है, सोशल मीडिया में इनफ्लुएंसर आपको खींच के कहीं-कहीं ले जाते हैं। इस शॉर्टकट के युग में भी एक बात हम जरूर याद रखें, रेलवे स्टेशन पर लिखा हुआ होता है, कुछ लोगों को पटरी पर कूद कर के जाने की आदत होती है, ब्रिज पर नहीं जाते। तो वहां लिखा होता है, शॉर्टकट विल कट यू शॉर्ट। और अगर शॉर्टकट के रास्ते से भी कहीं बाहर निकलना है, तो मैं नौजवानों को कहूंगा आपको जिसका भी पसंद हो ऑटोबायोग्राफी जरूर पढ़ें। ऑटोबायोग्राफी उस कालखंड की इतिहास की घटनाओं को अलग तरीके से समझने का अवसर देती है। इतिहास से काफी निकट होता है वो कालखंड बायोग्राफी का और इसलिए मैं जरूर चाहूंगा कि कोविंद जी की जो मेहनत है, वो आने वाली पीढ़ियों को काम आए, युवा पीढ़ी को विशेष रूप से काम आए। बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद।