दीनदयाल उपाध्याय जी चाहते थे कि भारत केवल कृषि में ही नहीं, बल्कि डिफेंस में भी आत्मनिर्भर हो : प्रधानमंत्री मोदी
हम जैसे-जैसे दीनदयाल जी के बारे में सोचते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं, उनके विचारों में हमें हर बार एक नवीनता का अनुभव होता है : प्रधानमंत्री मोदी
हम उसी विचारधारा में पले हैं, जो विचारधारा ‘राष्ट्र प्रथम’ की बात करती है : भाजपा कार्यकर्ताओं से प्रधानमंत्री मोदी
हर महीने भारत डिजिटल रूप से 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का लेनदेन कर रहा है और यह भारतीयों के जीवन का एक हिस्सा बन गया है: प्रधानमंत्री मोदी
मैं आपसे आग्रह करूंगा कि पार्टी की हर एक ईकाई आजादी के 75 साल निमित्त कम से कम 75 ऐसे कोई न कोई काम करेंगे जिससे देश के सामान्य मानवी से जुड़ सकें : पार्टी कार्यकर्ताओं से पीएम मोदी

भारत माता की.... जय
भारत माता की.... जय
दीनदयाल उपाध्याय...... अमर रहें, अमर रहें
दीनदयाल उपाध्याय..... अमर रहें, अमर रहें
दीनदयाल उपाध्याय..... अमर रहें, अमर रहें

कार्यक्रम में मेरे साथ उपस्थित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमान् जेपी नड्डा जी, पार्टी के सभी वरिष्ठ पदाधिकारीगण, और सभी माननीय सांसद।

आज हम सब दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर उनके चरणों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्र हुए हैं। पहले भी अनेक अवसर पर हमें दीनदयाल जी से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने का, अपने विचार रखने का और अपने वरिष्ठजनों से विचार सुनने का अवसर मिलता रहा है। यहां पर तो सभी लोग उस विचार परिवार के सदस्य हैं, दीनदयाल जी जिसके मुखिया की तरह, एक प्रेरणा की तरह अविरत रूप से हमें प्रेरणा देते रहते हैं। आप सबने दीनदयाल जी को पढ़ा भी है और उन्हीं के आदर्शों से अपने जीवन को गढ़ा भी है। और इसलिए, आप सब उनके विचारों से, उनके समर्पण से भली-भांति परिचित हैं। मेरा अनुभव है और आपने भी महसूस किया होगा कि हम जैसे-जैसे दीनदयाल जी के बारे में सोचते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं, उनके विचारों को पढ़ने का प्रयास करते हैं, हमें उनकी बातों में, उनके विचारों में हर बार एक नई ताजगी, एक नया दृष्टिकोण, एक नवीनता का अनुभव होता है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने तब थे। और आने वाले समय में भी उतने ही आवश्यक रहेंगे जितने आज हैं। एकात्म मानव दर्शन का उनका विचार मानव मात्र के लिए था। इसलिए, जहां भी मानवता की सेवा का प्रश्न होगा, मानवता के कल्याण की बात होगी, दीनदयाल जी का एकात्म मानव दर्शन प्रासंगिक रहेगा ही रहेगा। एकात्म मानव दर्शन में विशेष रूप से इन तीन शब्दों पर व्यष्टि से समष्टि की यात्रा व्यक्त होती है, स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा का मार्ग स्पष्ट होता है और मैं नहीं तू ही संकल्प भी सिद्ध होता है।

साथियो,
हमारे यहां कहा जाता है- “स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।” अर्थात, सत्ता की ताकत से आपको सीमित सम्मान ही मिल सकता है। जहां सत्ता की ताकत प्रभावी होगी वहीं सम्मान मिलेगा। लेकिन विद्वान का सम्मान हर जगह होता है। दीनदयाल जी इस विचार के साक्षात, जीता-जागता उदाहरण हैं। उनका एक-एक विचार, उनके एक-एक शब्द उन्हें पूरी दुनिया में एक विलक्षण व्यक्तित्व बना देते थे। सामाजिक जीवन में एक नेता को कैसा होना चाहिए, भारत के लोकतन्त्र और मूल्यों को कैसे जीना चाहिए, दीनदयाल जी इसके भी बहुत बड़े उदाहरण हैं। एक ओर वो भारतीय राजनीति में एक नए विचार को लेकर आगे बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर, वो हर एक पार्टी, हर एक विचारधारा के नेताओं के साथ भी उतने ही सहज रहते थे। हर किसी से उनके आत्मीय संबंध थे। उन्होंने अपनी पॉलिटिकल डायरी लिखी थी, जिसमें नेहरू जी की सरकार की सुरक्षा के संबंध में, खाद्य नीतियों के संबंध में, कृषि नीति के संबंध में खुलकर तथ्यपरक आलोचना की थी। बहुत ही क्रिटिसाइज किया था। लेकिन जब उन्होंने अपनी इस डायरी को प्रकाशित किया पुस्तक के रूप में, तो इसका प्राक्कथन उन्होंने कांग्रेस नेता और यूपी के मुख्यमंत्री रहे श्रीमान् सम्पूर्णानन्द जी से लिखवाया। सम्पूर्णानन्द जी ने अपनी टिप्पणी में एक बहुत ही प्रभावी लाइन लिखी है। उन्होंने लिखा है, ये पुस्तक फ्यूचर रीडर्स के लिए एक “साइकोलॉजिकल ग्लो” है। आज दुनिया देख रही है कि इस महापुरुष के विचारों का ये ‘ग्लो’ कैसे पूरे भारत में अपनी चमक बिखेर रहा है।

साथियो,
हमारे शास्त्रों में कहा गया है- “स्वदेशो भुवनम् त्रयम्।” अर्थात, अपना देश ही हमारे लिए सब कुछ है, तीनों लोकों के बराबर है। जब हमारा देश समर्थ होगा, तभी तो हम दुनिया की सेवा कर पाएंगे। एकात्म मानव दर्शन को सार्थक कर पाएंगे। दीनदयाल उपाध्याय जी भी यही कहते थे। उन्होंने एक स्थान पर लिखा था- “एक सबल राष्ट्र ही विश्व को योगदान दे सकता है”। यही संकल्प आज आत्मनिर्भर भारत की मूल अवधारणा है। इसी आदर्श को लेकर ही देश आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। कोरोनाकाल में देश ने अंत्योदय की भावना को सामने रखा, और अंतिम पायदान पर खड़े हर गरीब की चिंता की। आत्मनिर्भरता की शक्ति से देश ने एकात्म मानव दर्शन को भी सिद्ध किया, पूरी दुनिया को दवाएं पहुंचाईं, और आज दुनिया को वैक्सीन भी पहुंचा रहा है।

साथियो,
देश की एकता अखंडता के लिए भी आत्मनिर्भरता की जरूरत पर दीनदयाल जी ने विशेष जोर दिया था। 1965 में भारत पाक युद्ध के दौरान भारत को विदेशों से हथियारों के लिए निर्भर रहना पड़ता था। दीनदयाल जी ने कहा था कि- हमें सिर्फ अनाज में ही नहीं बल्कि हथियार और विचार के क्षेत्र में भी भारत को आत्मनिर्भर बनाना होगा। उनके इस विज़न को पूरा करने के लिए भारत आगे बढ़ रहा है। आज भारत में डिफेंस कॉरिडॉर बन रहे हैं, स्वदेशी हथियार बन रहे हैं, और तेजस जैसे फाइटर जेट्स भी हवा में उड़ान भर रहे हैं। हथियार के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से अगर भारत की ताकत और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, तो विचार की आत्मनिर्भरता से भारत आज दुनिया के कई क्षेत्रों में नेतृत्व दे रहा है। आज भारत की विदेश नीति दबाव और प्रभाव से मुक्त होकर, राष्ट्र प्रथम के नियम से चल रही है। नेशन फर्स्ट, प्रकृति के साथ सामंजस्य का दर्शन दीनदयाल जी ने हमें दिया है। भारत आज इंटरनेशनल सोलर अलायंस का नेतृत्व करके दुनिया को वही राह दिखा रहा है।

साथियो,
दीनदयाल उपाध्याय जी ने दुनिया की किसी भी सोच के प्रभाव में अपने विचारों को नहीं गढ़ा था। इसलिए उनके विचारों में एक मौलिकता थी। भारत की भावना, भारत का मानस, भारत के मूल्य वेद से विवेकानंद तक की भारत की चिंतन यात्रा ये सारी बातें दीनदयाल जी के चिंतन में झलकती है, इसलिए वो एक ऐसी अर्थव्यवस्था की बात करते थे, जिसमें पूरा भारत शामिल हो, जिसमें पूरे भारत की विविधता झलके। लोकल इकोनॉमी पर विजन इस बात का प्रमाण है कि उस दौर पर भी उनकी सोच कितनी प्रैक्टिकल और व्यापक थी। आज वोकल फॉर लोकल के मंत्र से देश इसी विजन को साकार कर रहा है। आज आत्मनिर्भर भारत अभियान देश के गांव-गरीब, किसा-मजदूर और मध्यम वर्ग के भविष्य के निर्माण का एक माध्यम बन रहा है। आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति का भी जीवनस्तर कैसे सुधरे, ईज ऑफ लिविंग कैसे बढ़े, इसके प्रयास आज सिद्ध होते दिख रहे हैं। उज्ज्वला योजना, जनधन खाते, किसान सम्मान निधि, हर घर में शौचालय, हर गरीब को मकान आज देश एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए इसको सिद्ध करते हुए गौरव के साथ विकास की राह पर चल पड़ा है। इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में हो रहा बड़ा बदलाव भी सामान्य मानवी के जीवन को सरल बनाएगा। देश को एक नई, भव्य और आधुनिक पहचान देगा।

साथियो,
आज जब देश में इतने सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं, पूरी दुनिया में भारत का कद बढ़ रहा है, तो कौन भारतीय होगा, कौन इस मां का लाल होगा जिसको गौरव न होता हो, उसका सीना चौड़ा न होता हो, उसका माथा ऊंचा न होता हो। आज विश्व भर में फैला हुआ भारतीय समुदाय जिस गर्व के साथ जी रहा है उसका कारण भारत में हो रही गतिविधि है। हमें गर्व होता है कि हम अपने महापुरुषों के सपनों को पूरा कर रहे हैं। हमें गर्व है कि हमारी विचारधारा देशभक्ति को ही अपना सब कुछ मानती है। हमारी विचारधारा देशभक्ति से शुरू होती है, हमारी विचारधारा देशभक्ति से प्रेरित होती है, हमारी विचारधारा देशहित के लिए होती है। हम उसी विचारधारा में पले हैं जो विचारधारा राष्ट्र प्रथम, Nation First की बात करती है। ये हमारी विचारधारा है कि हमें राजनीति का पाठ राष्ट्रनीति की भाषा में पढ़ाया जाता है। हमारी राजनीति में भी राष्ट्रनीति सर्वोपरि है। हमें राजनीति और राष्ट्रनीति में से एक को स्वीकार करना होगा तो हमें संस्कार मिले हैं, राष्ट्रनीति को स्वीकार करना राजनीति को नंबर दो पर रखना। हमें गर्व है कि हमारी विचारधारा ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की बात करती है। उस मंत्र को जीती है।

आप देखिए, हमारी पार्टी ने अपनी सरकारों में ऐसी कितनी ही उपलब्धियां हासिल की हैं जिन पर आपको गर्व होगा, आने वाली पीढ़ियों को गर्व होगा।
जो निर्णय देश में बहुत कठिन माने जाते थे, राजनीतिक रूप से मुश्किल माने जाते थे, हमने वो निर्णय लिए, और सबको साथ लेकर लिए। उदाहरण के तौर पर देश में नए जनजाति कार्य मंत्रालय का गठन, जनजातीय समुदाय कोई हमारे आने के बाद का थोड़े था, पहले भी था, लेकिन उस मंत्रालय का अलग से गठन भाजपा की ही सरकार में हुआ है। ये भाजपा सरकार की ही देन है कि पिछड़ा आयोग भी, उसको संवैधानिक दर्जा मिल सका है। संवैधानिक स्टेटस हमारे यहां ही मिल सका। और ये भाजपा की ही सरकार है जिसने सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को भी आरक्षण देने का काम किया है। और आप देखिए देश में जब भी ऐसे कोई काम हुए हैं तनाव पैदा हुआ है, संघर्ष हुआ है, समाज बंट गया है। उसी काम को हमने मेल-जोल, प्यार के वातावरण में किया है। क्योंकि राष्ट्रनीति सर्वोपरि है, राजनीति एक व्यवस्था है। राज्यों का विभाजन देख लीजिए। राज्यों का विभाजन जैसा काम राजनीति में कितने रिस्क का काम समझा जाता था। इसके उदाहरण भी हैं अगर कोई नया राज्य बना तो देश में कैसे हालत बन जाते थे। लेकिन जब भाजपा की सरकार ने 3 नए राज्य बनाए तो हर कोई हमारे तौर-तरीकों में दीनदयाल जी के संस्कारों का प्रभाव स्पष्ट देख सकता है। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड का निर्माण हुआ। झारखंड बिहार से बनाया गया। और छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से अलग आकार दिया गया, लेकिन उस समय हर राज्य में उत्सव का माहौल था। न शिकायत थी न कोई गिला शिकवा था, आनंद ही आनंद था दोनो तरफ आनंद था। हमारी सरकार ने लद्दाख करगिल को अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया है आज वहां भी उत्सव का ही वातावरण है। इसी तरह, जम्मू कश्मीर और वहां के लोगों की आकांक्षाओं को भी हम पूरी तरह साकार करने में प्राण-पण से जुटे हैं। उसी प्रकार सेलबासा और दमन-दीव अलग थे, हमने उसको जोड़ दिया, दोनों तरफ आनंद है। अगर उनकी नई रचना की तो भी आनंद है, सम्मिलित किया तो भी आनंद है। क्योंकि हमारी प्रेरणा राष्ट्रनीति है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए हम निर्णय नहीं करते, और इसका असर जन सामान्य के मन पर होता है।

साथियो,
हम राजनीति में सर्वसम्मति को महत्व देते हैं। हम सहमति के प्रयास को करते-करते सर्वसम्मति तक जाना चाहते है। दीनदयाल जी कभी भी राजनीतिक अस्पृश्यता में विश्वास नहीं रखते थे। और आपको याद होगा जब मैं 2014 में आया मुझे सदन में बोलने का मौका मिला, तब मैंने सदन में कहा था और बड़ी जिम्मेवारी के साथ कहा था और बड़े ही CONVICTION के साथ कहा था। जिस CONVICTION को हम लोग जीते हैं, हमें संस्कार में मिले थे और मैंने पार्लियामेंट में कहा था “बहुमत से सरकार चलती है, बहुमत से सरकार तो चलती है, लेकिन देश तो सहमति से चलता है, सर्वसम्मति से चलता है।” और हम सिर्फ सरकार चलाने नहीं आए हैं, हम तो देश को आगे ले जाने आए हैं। हमारे राजनीतिक दल हो सकते हैं, हमारे विचार अलग हो सकते हैं, हम चुनाव में पूरी शक्ति से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, पर इसका मतलब ये नहीं कि हम अपने राजनीतिक विरोधी का सम्मान ना करें। आपने देखा होगा प्रणब मुखर्जी साहब, हमें भारत रत्न देने में गर्व हुआ। वे कोई हमारी पार्टी के नहीं थे, हमारे आलोचक थे। अभी असम में तरूण गोगाई जी, नागालैंड में एम.सी.जमीर जी, ये सारे हमारे राजनीतिक विचार से, हमारे राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं था। ना ही हमारी पार्टी का हिस्सा था, ना ही हमारे गठबंधन का हिस्सा थे। लेकिन राष्ट्र के प्रति उनके योगदान का सम्मान करना हमारा कर्तव्य, हमने पद्मश्री दिया, पद्मभूषण दिया। राजनीतिक अस्पृश्यता का विचार हमारा संस्कार नहीं है। आज देश भी इस विचार को, अस्पृश्यता के विचार को देश अस्वीकार कर चुका है। हां, ये बात जरूर है कि हमारी पार्टी में वंशवाद को नहीं कार्यकर्ता को महत्व दिया जाता है। इसीलिए आज देश हमसे जुड़ रहा है, और हमारे कार्यकर्ता भी हर देशवासी को अपना परिवार मानते हैं। कहीं कोई आपदा आती है तो हमारे करोड़ों कार्यकर्ता अपना सब कुछ छोड़कर वहाँ पहुँच जाते हैं। कोरोना जैसा इतना बड़ा संकट आया, दुनिया में हर कोई अपने जीवन के लिए डरा हुआ था, लेकिन हमारे करोड़ों कार्यकर्ताओं ने अपना दायित्व समझकर दिन-रात एक कर दिया, राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से आवाहन किया था कि सरकार के साथ साथ वो भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ, हर कार्यकर्ता ने सेवा के इस संकल्प को राष्ट्रव्यापी मिशन बना दिया। और मैं पार्टी का आभारी हूं, राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का आभारी हूं, कि मुझे वीडियो कांन्फ्रेंस के माध्यम से देश भर के कार्यकर्ताओं के साथ इस कोरोना कालखंड में उन्होंने जो सेवाकार्य किए उसका वृत्त सुनने का मुझे अवसर मिला था। हमारे कार्यकर्ताओं ने कैसे-कैसे संकटों को, रिस्क को उठाया था और कितने जी-जान से उन्होंने गरीबों की सेवा की थी। किसी गरीब के घर में चूल्हा जले, कोई गरीब रात को भूखा ना सोए, इसके लिए भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव में कार्यकर्ता दिन-रात लगा रहा था।

मैं देख रहा था जब हमारे श्रमिक बंधु, अफवाहों के चलते, भय के चलते और कुछ लोगों के राजनीतिक इरादों के चलते जब शहरों को छोड़कर के, रोजी-रोटी छोड़कर के गांव की तरफ चल पड़े थे, तब भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता राह पर खड़े रहकर के उनको जूते तक देने की चिंता करते थे, उनकी दवाई की चिंता करते थे, उनके पानी की चिंता करते थे। ये सारा वृत्त मैं सुन रहा था, मेरे मन को छू रहा था। और कार्यकर्ताओं के इस परिश्रम से मुझे भी काम करने की प्रेरणा मिलती थी। इस अभियान में किसी ने वोट बैंक की चिंता नहीं की, ये नहीं सोचा कि किसका वोट हमें मिलता किसका नहीं मिलता।

साथियो,
हमारी पार्टी, हमारी सरकार आज महात्मा गांधी के उन सिद्धांतों पर चल रही है जो हमें प्रेम और करुणा के पाठ पढ़ाते हैं। हमने बापू की 150वीं जन्मजयंती भी मनाई, और उनके आदर्शों को अपनी राजनीति में, अपने जीवन में भी उतारा। हमारी सरकार ने हमारे महापुरुषों को भी राजनैतिक समीकरण के चश्मे से कभी नहीं देखा। जिन स्वाधीनता सेनानियों की उपेक्षा होती रही, उन्हें हमने सम्मान दिया। ये हमारी ही सरकार है, जिसने नेताजी को वो सम्मान दिया जिसके वो हकदार थे, उनसे जुड़ी हुई फाइल्स को खोला। लालकिले पर झंडा फहराने का काम नेताजी की स्मृति में करना, शायद किसी और शासन में कोई सोच नहीं सकता था। अंडमान-निकोबार में नेताजी को याद करके उस द्वीपसमूह में एक का नाम नेताजी के नाम से कर देना, शायद किसी और सरकार में सोच नहीं सकता था। सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा बनवाकर हमने उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया। देश की एकता के मंत्र को आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा के रूप में उस जगह से चेतना मिलती रहे, उस रूप में उस परिसर को खड़ा किया गया है। और तो मैं अपने सभी सांसदों को चाहूंगा कि कभी ना कभी अपने कार्यकर्ताओं की टोली बनाकर के जरूर उस स्थान पर जाइए। कम से कम एक रात वहां बिताइए।

दूसरा, मैं अपने सभी सांसदों से आग्रह करूंगा, जब भी मौका मिले अपने कार्यकर्ता और अपने साथियों के साथ काशी जाकर के काशी के निकट में ही जहां पंडित दीनदयाल ने अपना अंतिम सांस लिया था, जहां एक स्मारक उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाया है, देखने जैसा स्मारक है। दीनदयाल जी की भव्य प्रतिमा वहां रखी है, वो इतना बढ़िया परिसर बना है, हम लोगों के लिए बड़ा एजुकेटिव है। आप जरूर कभी, काशी से कोई ज्यादा दूर नहीं है, बायरोड आप चले जा सकते हैं और वहां एक बार हो आइए। हमारे लिए सारे तीर्थ क्षेत्र है और हम लोगों ने कभी ना कभी मौका लेकर के वहां जाना चाहिए। आप देखिये जिस जगह हम बैठे हैं। बाबा साहेब अंबेडकर की स्मृति में बना ये भवन, क्या कोई और सरकार बनाती क्या? ये हमारे संस्कार हैं जो हमें इस काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। बाबा साहब अंबेडकर को भी भारत रत्न तब मिला जब बीजेपी के समर्थन से सरकार बनी थी। इन कार्यों का भाजपा को, हम सभी को बहुत गर्व है।

साथियो,
अगले महीनों में पांच राज्यों में चुनाव भी आना वाला है। हम सभी कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के नेतृत्व में अपनी सकारात्मक सोच और परिश्रम के आधार पर जनता के बीच में जाना है। जनता इन छह सालों में हमारी नीतियों को भी देख चुकी है और सबसे बड़ी ताकत हमारी जो है, देश ने हमारी नीयत को भी देखा है, परखा है, और पुरस्कार भी दिया है। हमें उसी विश्वास को लेकर के आगे बढ़ना है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के नेतृत्व में हम जरूर सफलता पाएंगे।
साथियो,
हमने देखा है कि पिछले कुछ सालों में टेक्नोलॉजी का यूज करके हम बहुत बड़े स्केल पर लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने में सफल हुए हैं। गरीब, कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति टेक्नोलॉजी को यूज नहीं कर पाएगा, ऐसे सारे मिथक को तोड़कर आज देश रिकॉर्ड स्तर पर डिजिटल लेन-देन कर रहा है। आज देश में हर महीने चार लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का लेनदेन UPI के माध्यम से हो रहा है, मोबाइल फोन से वो खरीद-बिक्री कर रहा है, पैसे लेना-देना कर रहा है। डिजिटल लेन-देन करना अब लोगों के व्यवहार का हिस्सा बनता जा रहा है। टेक्नोलॉजी के बेहतर इस्तेमाल की वजह से अब गरीब-से-गरीब व्यक्ति अपना हक बिना किसी भ्रष्टाचार के पा रहा है। पहले कितनी ही योजनाओं का पैसा गरीब तक पहुंच ही नहीं पाता था। आज उसके हक का वही पैसा सीधे उसके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जा रहा है। कितनी ही योजनाएं ऐसी थीं, जिसमें लाभार्थियों की सही पहचान नहीं हो पाती थी, जो अपात्र होते थे, वे इसका फायदा उठा लेते थे, लेकिन अब टेक्नोलॉजी की वजह से वे सारी पुरानी अवस्थाएं बदल गई हैं। करोड़ों ऐसे नाम जो सिर्फ कागजों में मिलते थे, जो किसी गरीब का हक उस तक पहुंचने नहीं देते थे, उन नामों को हटाया जा चुका है। आज 1,80,000 करोड़ रुपये से अधिक गलत हाथों में जाने से पैसा बच रहा है। टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल आपको अपने क्षेत्र के लोगों से कनेक्ट करने में बहुत मदद कर सकता है। इसके लिए एक अहम माध्यम नमो ऐप्प भी है। नमो ऐप्प पर जो टूल्स हैं, वो आपको जनता-जनार्दन से संवाद में सहायता कर सकते हैं। मैं चाहता हूं मेरे सभी सांसदों के लिए ये हथियार बहुत काम आएंगे, आप थोड़ा समय दीजिए उसके लिए, आप देखिए, उसमें इतनी चीजें हैं, जो आपके क्षेत्र में लोगों से संपर्क बनाने के लिए वो बहुत बड़ा साधन, बहुत बड़ा हथियार, बहुत बड़ा माध्यम आपके टेलिफोन में उपलब्ध है, आपके मोबाइल फोन में उपलब्ध है। आप उसका फायदा उठाइए। और उसकी अच्छी एक बड़ी ताकत ये है, ये टू-वे कम्यूनिकेशन का भी बहुत अच्छा प्लेटफॉर्म है। आप अपने कार्यकर्ताओं के साथ छोटी-मोटी मीटिंग आराम से कर सकते हैं उसके ऊपर। आप लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। और लोग भी उतनी ही आसानी से अपनी बात आप तक पहुंचा सकते हैं।

साथियो,
आजादी के पचहत्तर वर्ष का अवसर आज हमारे एकदम सामने है। आत्मनिर्भर भारत को लेकर आज पूरे देश में एक चेतना जगी है। मैं आपसे आग्रह करूंगा, पार्टी की हर ईकाई, देश में भी, राज्यों में भी, जिलों में भी और पोलिंग बूथ में भी- हर ईकाई आजादी के 75 साल निमित्त कम से कम 75 ऐसे कोई न कोई काम हम करेंगे। कर सकते हैं क्या। कम से कम 75 काम के साथ हम जुड़ेंगे। भले एक साल लगे, डेढ़ साल लगे, लेकिन हम करेंगे। हम उन 75 कामों को आइडेंटिफाई करें। आजादी के 75 साल के निमित्त इस काम को अवश्य करें और उसका हिसाब-किताब रखें। देश के सामान्य मानवी से जुड़ने का हम प्रयास करें। आजादी के 75 साल सिर्फ रंगारंग कार्यक्रर्म से समाप्त नहीं होना चाहिए। जन मन से साथ जुड़ने का एक बहुत बड़ा अवसर होना चाहिए, नई पीढ़ी को राष्ट्र के लिए प्रेरणा देने की एक ताकत के रूप में परिवर्तित होना चाहिए। और इसलिए, भारतीय जनता पार्टी के हर कार्यकर्ता, जिसके लिए राष्ट्रनीति ही प्रेरणा है, इसके लिए आजादी का 75 का वर्ष ये भी अपने आप में बहुत बड़ी प्रेरणा है।

साथियो,
वोकल फॉर लोकल, आत्मनिर्भर भारत, मैं सभी मेरे एमपी साथियों से आग्रह करता हूं, मेरे सांसद साथियों से आग्रह करता हूं, मैं भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं से आग्रह करता हूं, जो राह हमें दीनदयाल जी ने दिखाई थी, उस राह पर चलने के लिए हम कहीं तो कुछ तो सोंचें। एक काम आप कर सकते हैं क्या। कठिन है, लेकिन करना है। मैं कहूंगा तो आपको लगेगा का ये तो बहुत सरल है, लेकिन फिर भी मैं कहता हूं बहुत कठिन है। परिवार के आपके अपने सदस्य सब बैठकरके, उसमें भी आपके नौजवान बेटे-बेटी, भाई-बहन जो भी हों, उनके साथ बैठें। एक काम कीजिए। एक अच्छी सी डायरी लेकर लिखिए, सुबह उठने से रात को सोने तक जिन-जिन चीजों का उपयोग करते हैं उसमें से कितनी हिन्दुस्तान की हैं और कितनी बाहर की हैं, जरा सूची बनाइए। मैं बिलकुल कहता हूं, आप जब खुद सूची बनाएंगे तो आप चौंक जाएंगे, आप डर जाएंगे। हमें पता ही नहीं है, बिना कारण, जो चीज हमारे देश में उपलब्ध है, जो चीज हमारे देश के लोग बनाते हैं, मेहनतकश लोग बनाते हैं, वे भी चीजें जाने-अनजाने में हमारे जीवन में घुस गई हैं। अगर देश की मिट्टी की सुगंध जिसमें न हो, देश के मजदूर का पसीना जिसमें न हो, ऐसी चीजों से मुक्ति पानी चाहिए कि नहीं पानी चाहिए, ये जिम्मा हमें लेना चाहिए कि नहीं लेना चाहिए। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि भाई आपके पास कोई घड़ी है, कोई चश्मा है, तो फेंक दो। मैं इस बात का, विचार का पक्षधर नहीं हूं। लेकिन सोचिए तो, बिना कारण चीजें घुस गई हैं। अस्सी परसेंट तो चीजें वो होंगी, जब लिखोगे तो लगेगा अच्छा मैं ये भी चीज बाहर की उपयोग कर रहा हूं, अरे-अरे कैसी गलती कर दी। आपका भी मन ऊब जाएगा। और जब हम अपने से शुरू करेंगे तो कन्वीक्शन के साथ हम औरों को भी कह पाएंगे। और इसमें गर्व होगा। और मैंने देखा है जब मैं वोकल फॉर लोकल की बात कर रहा हूं तो ज्यादातर लोग क्या करते हैं, देखिए ये दीया लोकल है। नहीं भाई, दीवाली के दीये से बात पूरी नहीं हो जाती। वो तो हमारे मन के अंधेरे को दूर करने के लिए छोटी सी शुरुआत है। हमें जरा व्यापक रूप से देखना चाहिए।

साथियो,
दीनदयाल जी ने हमें जो संस्कार दिए हैं। जिस समाज के प्रति हमारी जो संवेदना होती है, उस संवेदना का सामर्थ्य कितना होता है। अब देखिए, सरकारें इतनी आईं, कुछ काम हम ऐसे कर रहे हैं, जिसमें आपको वो बात नजर आएगी। जैसे मैंने अभी कई चीजें बताईं, शौचालय का सोचने का विचार एकात्म मानव दर्शन के कारण आता है, सबका साथ सबका विकास के मंत्र से आता है। आपने देखा होगा कि सरकार ने एक काम किया है, हमारे देश में भाषाएं तो अलग-अलग हैं, और हम अलग-अलग भाषाओं के कारण अपनी-अपनी दुनिया में जीते भी हैं। ये हमारी विविधिता अपनी ताकत भी है। लेकिन क्या कारण है कि हमार देश में ये जो हमारे मूक-बधिर भाई-बहन होते हैं, हमारे दिव्यांग होते हैं, उनके लिए भी आजादी के इतने सालों के बाद हम कॉमन लैंगवेज नहीं बना पाए। तमिलनाडु के एक मूक-बधिर जिस लैंग्वेज को जानता था, दिल्ली का बच्चा वो नहीं जानता था, जो बंगाल का जानता था, वो गुजरात का नहीं जानता था, क्यों। हरेक ने अपने-अपने तरीके से शाइनिंग डेवलप की थी, इस सरकार की संवेदनशीलता देखिए कि हमने मेहनत करके अब पूरे देश में एक ही प्रकार की शाइनिंग जिसे वो समझ पाता है, ये शिक्षा शुरू की। इसमे देश की एकता का भी मुद्दा है, सरलता का भी मुद्दा है। यों तो लगने वाली चीज बहुत छोटी है, लेकिन देश में छोटे-छोटे लोगों की चिंता करने से ही देश बड़ा बनता है। कोई चीज छोटी नहीं होती, कोई काम छोटा नहीं होता, कोई व्यक्ति छोटा नहीं होता है। जिसकी आवश्यकता हमें छोटी लगती हो, लेकिन उसकी जिंदगी में वो बहुत बड़ी होती है। ये जो है एकात्म मानव दर्शन का एक रूप है। और इसलिए हमलोगों का काम है पंडित दीनदयाल जी के जीवन को देखें- सादगी, परिश्रम, ये बातें हमें बहुत उभर करके सामने आती हैं। मुझे पंडित दीनदयाल जी को देखने का सौभाग्य नहीं मिला, मुझे उन्हें सुनने का सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन जितना सुना है, जितना पढ़ा है। कहते हैं कि जब वो भारत में यात्रा करते थे, संगठन के लिए काम करते थे। पार्टी के पास आरक्षण के पैसे नहीं होते थे ट्रेन में। तो ट्रेन में जो टॉयलेट होता है उसके बगल में बिस्तर रखकर बैठे रहते थे। चौबीस-चौबीस घंटे यात्रा करके किसी कार्यकर्ता के यहां पहुंचते थे। ये परिश्रम कर के इस पार्टी को बनी है जी। अनेक लोगों ने उस प्रकार का जीवन जीया है। हम लोग तो भाग्यशाली हैं कि आज हमें, हमारे नसीब में यह सब आया है। लेकिन तीन-तीन, चार-चार पीढ़ियों के अखंड, एकनिष्ठ
पुरुषार्थ का परिणाम है कि आज एक वट वृक्ष बना है। और यह साधना कम नहीं है जी, आप अपने इलाकों में देखेगो, ऐसे कई परिवार मिलेंगे, जो तीन-तीन, चार-चार पीढ़ी लगी हैं और उन्होंने कभी कुछ पाया नहीं है, लिया भी नहीं है, मांगा भी नहीं है। उनके सम्मान की चिंता हम लोगों का दायित्व है। हम एक परिवार हैं, हमारे संस्कार हैं।

मैं इस कोरोना काल में, क्योंकि पहले मैं संगठन का काम करता था, मैं देशभर में सभी लोगों से ज्यादातर परिचित रहा, बीच में ये गुजरात मुख्यमंत्री बन गया तो थोड़ा मेरा संपर्क कम भी हो गया। लोग बदल भी गए। लेकिन मैंने इस कोरोना काल में सुबह हर दिन 25-50 लोगों से फोन पर बात करने का एक कार्यक्रम बनाया। और जो भी बड़ी आयु के हैं 70-75 के आयु के आसपास के पुराने लोग, सबको फोन करके उनके आशीर्वाद मांगता था। आप कल्पना कर सकते हैं, आपके क्षेत्र में भी कई लोग होंगे जिनको मेरा फोन गया होगा। वे इतना आशीर्वाद देते थे। कोई शिकायत नहीं करते थे। फोन आया तो फिर ज्यादातर कहते थे कि अरे मोदी जी इतना काम है आपके पास, आप काहे को मेरी इतनी चिंता करते हो, अरे हम कर लेंगे। यह एक परिवार भाव यह अपने आप में एक बहुत बड़ी ताकत होता है। हमने इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। आप देखिए दीनदयाल जी के पास क्या था, कुछ नहीं था जी। वे अनिकेत थे, वे अकिंचन थे, न घर था, न धन था, लेकिन हमारे दिलों में आज भी हैं।

साथियो, ऐसी प्रेरक व्यक्तित्व, ऐसे प्रेरक विचार, ऐसी परंपरा की विरासत हमारे पास जब हो, तो हमें राष्ट्रसेवा के हमारे संकल्पों से कोई विचलित नहीं कर सकता। कोई हमें विमुख नहीं कर सकता।

साथियो,
एक राष्ट्र जब किसी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ता है तो उस लक्ष्य के प्राप्ति की जो प्रक्रिया है उसमें व्यक्ति निर्माण का कार्य होता है। उस लक्ष्य के प्रति उत्साहित, समर्पित-संकल्पित लोग देश के लिये तो मूल्यवान होते ही है वो किसी भी संगठन के लिए भी उतने ही मूल्यवान होते हैं। इसलिए एक संगठन के रूप में हमारे सामने अवसर है की इस प्रक्रिया में हमें ऐसे कई नए लोग ख़ासकर युवा साथी मिलेंगे जिनके स्वभाव में देश के लिए कुछ करना, देशवासियों के प्रति प्रेम - यह सब सहज रूप से होगा। अलग-अलग क्षेत्रों से ऐसे लोगों को भाजपा से जोड़ना यह भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें हमारे परिवार का विस्तार करना चाहिए। जितनी हिंदुस्तान की सीमाएं हैं, उतनी ही भाजपा की सीमाएं भी होनी चाहिए। हमारे संगठन के Quantitative और Qualitative विस्तार का भी यह अवसर है। इसलिए मैं चाहूंगा में हमें इसमें कहीं कोई कमी नहीं करनी चाहिए। एक और बात मैं कहना चाहूँगा। हमें अपने विचारों को व्यापक बनाने का प्रयास भी लगातार करते रहना चाहिए। इसके लिए दीनदयाल जी हमेशा अध्ययन पर विशेष जोर देते थे। आप सभी अध्ययन के लिए जरूर समय निकालें। आप संसद के संसाधनों का प्रयोग करें, और भी जैसी रुचि हो उस विषयों से भी जुड़ें। दीनदयाल जी को पढ़ने समझने के लिए भी आप समय निकालें। इसी तरह, आप बाबा साहब अंबेडकर को, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को, नेता जी सुभाष चंद्र बोस को, इन सबको जरूर पढ़ें। इससे आपके राजनैतिक जीवन में एक नई दिशा मिलेगी, आप एक अलग छाप छोड़ पाएंगे।

मुझे विश्वास है कि हम सब दीनदयाल जी के इन आदर्शों को लेकर के आगे बढ़ेंगे। दीनदयाल जी का अंत्योदय का जो सपना था, वो 21वीं सदी में एक नए भारत के निर्माण के साथ पूरा होगा। मेरे साथियो, देश की हमसे बहुत अपेक्षाएं हैं। उन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए हमें अपनी तरफ नहीं देखना है, आखिरी छोर पर जो इंसान बैठा है, जो परिवार बैठा है उसकी तरफ देखना है। अगर हम उसको मन में रखकर काम करेंगे तो न कभी थकान आएगी, न विराम का मन करेगा, न कोई मोह में उस दिशा में खींच कर ले जाएगा। हम विरक्त भाव से, तन-मन-धन से उसकी सेवा का आनंद ले पाएंगे। इसी एक भाव के साथ जब हम आगे बढ़ना चाहते हैं तो आखिर में एक पंक्ति दोहरा कर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि आप सबको अनेक-अनेक शुभकामना देते हुए मैं ही कहना चाहूंगा-

राष्ट्रभक्ति ले हृदय में हो खड़ा यदि देश सारा,
संकटों पर मात कर यह राष्ट्र विजयी हो हमारा।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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Text of PM’s address at the News18 Rising Bharat Summit
February 27, 2026
Developed nations are eager to sign trade deals with India because a confident India is rising beyond doubt and despair: PM
In the last 11 years, a new energy has flowed into the nation's consciousness, India is determined to regain its rightful strength: PM
India's Digital Public Infrastructure has today become a subject of global discussion: PM
Today, every move India makes is closely watched and analysed across the world, the AI Summit is a clear example of this: PM
Nation-building never happens through short-term thinking; It is shaped by a long-term vision, patience and timely decisions: PM

इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।

नमस्कार!

नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।

साथियों,

सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।

लेकिन साथियों,

बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।

साथियों,

जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।

साथियों,

दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?

साथियों,

एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।

साथियों,

जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।

साथियों,

अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।

साथियों,

AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।

साथियों,

कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।

साथियों,

मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।

साथियों,

देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।

साथियों,

लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।

साथियों,

कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।

और साथियों,

हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।

साथियों,

राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।

साथियों,

मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।

साथियों,

यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।

साथियों,

21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।