खेलों में भारतीय परंपराएं वास्तव में अद्वितीय और सभ्यतागत रही हैं। उदाहरण के लिए, कुश्ती या मल्ल युद्ध, पुरुषों के लिए फिट रहने के एक तरीके के रूप में शुरू हुआ। जल्लीकट्टू या सांडों को वश में करने का खेल, स्वदेशी बैलों की रक्षा और संरक्षण के लिए एक पारंपरिक खेल है। चतुरंग या शतरंज प्राचीन भारतीयों को युद्ध की रणनीति बनाने की कला सिखाने के लिए प्रसिद्ध है। सांप और सीढ़ी या मोक्ष पाटम ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया, जो पाप और पुण्य के परिणामों के बीच झूलती हुई जीवन यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ये परंपराएं खेल और भारतीय जीवन शैली के बीच गहरा संबंध दर्शाती हैं।
लेकिन हाल के दिनों में भारतीय खेलों का परिदृश्य सचमुच सांप-सीढ़ी का खेल बन गया था - शुद्ध मौके का खेल, जहां सीढ़ियां आपको ऊपर ले जाती थीं और सांप नीचे खींच लाते थे। मगर समस्या ये थी कि सीढ़ियां तो कम थीं मगर सांप बहुत ज़्यादा - खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, लगातार धन की कमी, सरकारी दखलंदाजी और भ्रष्टाचार आदि। स्थिति इतनी गंभीर थी कि कई बार एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए खुद ही फंड का इंतजाम करना पड़ा।
यह सच है कि भारतीय खेलों की खस्ता हालत को शब्दों में बयां करना और दोबारा कल्पना करना मुश्किल हो सकता है, खासकर अब, जब आप और हम उस पल में साझीदार थे जब नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक 2020 में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतकर दुनिया को चौंका दिया था; हमने टोक्यो पैरालंपिक 2020 में जादू देखा, जहां हमने पिछले सभी पदकों को मिलाकर भी ज्यादा पदक जीते थे; हाल ही में संपन्न एशियाई खेलों 2023 में 107 पदकों के रिकॉर्ड के साथ भारत ने नए बेंचमार्क स्थापित किए, और एशियाई पैरा खेलों, 2023 में अभूतपूर्व 111 पदक जीते। और यह सिलसिला जारी है।
यह अपने आप में एक केस स्टडी है, यह अहम बदलाव प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के पहले कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में ही आकार लेने लगा था। फंड और मटेरियल की कमी के अलावा, पॉजिटिव विजन की कमी ने भी हमारे खेल के गौरव को और अधिक पटरी से उतारने में अपनी भूमिका निभाई है। पीएम मोदी ने भारतीय खेलों का चेहरा बदलना शुरू किया - नजरिये में बदलाव और भारत को एक खेल समाज के रूप में विजन बनाने के साथ। जैसा कि पीवी सिंधु Modi@20 में कहती हैं, "उनके सामने एक चुनौती पेश कीजिए, जिसे पूरा किया जाना हो, वह कभी भी औसत परिणाम से समझौता नहीं करते हैं, बल्कि 'होगा कैसे नहीं?' के रवैये के साथ टॉप प्राइज के लिए जाते हैं।"
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने "पोटेंशियल+प्लेटफॉर्म = परफॉरमेंस" के मंत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए 'एथलीट-सेंट्रिक' अप्रोच अपनाया। और इसे टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS), खेलो इंडिया और फिट इंडिया मूवमेंट जैसी प्रमुख पहलों के माध्यम से आगे बढ़ाया। खेल के इंफ्रास्ट्रक्चर में जरूरी गैप को भरने के अलावा, इन पहलों ने खेल को देश के सुदूर कोनों तक पहुंचाया है, युवाओं के लिए खेल को एक आकर्षक करियर विकल्प के रूप में स्थापित किया और समावेशिता तथा विविधता के माध्यम से खेल भावना को प्रोत्साहित किया।
खेलो इंडिया को मोदी सरकार ने 2016 में खेलों में व्यापक भागीदारी बढ़ाने और उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के दोहरे उद्देश्यों के साथ लॉन्च किया था। मई 2023 तक खेलो इंडिया के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर ₹3000 करोड़ खर्च किए गए हैं, जिससे पूरे भारत में 28,000 से अधिक एथलीटों को मदद मिली है।
जमीनी स्तर के अलावा, दिव्यांग एथलीटों की जरूरतों और पारंपरिक खेलों तथा मल्लखंभ, कलारीपयट्टू, गतका एवं थांग-ता जैसे स्वदेशी मार्शल आर्ट की मांगों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
महिलाएं सामाजिक मानसिकता पर विजय पाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण पदचिह्न छोड़ने में भी सक्षम रही हैं, जिससे व्यापक और प्रगतिशील बदलाव आया है। महिला लीग 'खेल के माध्यम से समावेशिता' के तहत आयोजित की जाती हैं, जिसमें विभिन्न आयु समूहों की लगभग 23,000 महिला एथलीटों की भागीदारी होती है। जब हम पीटी उषा को भारतीय ओलंपिक संघ के प्रमुख के रूप में नियुक्त होते देखते हैं तो इस सरकार की मंशा स्पष्ट हो जाती है; जहां भारत की पहली महिला पैरालंपिक पदक विजेता दीपा मलिक, 'नि-क्षय मित्र' एंबेसडर बनाई जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संवेदनशीलता, विविधता और समावेशिता को यथासंभव सही अर्थों में संस्थागत बना दिया गया है।
पूरे देश में जमीनी स्तर पर खेल स्कूलों और क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में खेल संस्कृति का यह विचार फैलाया गया है। इनका लक्ष्य विशेषज्ञता का प्रशिक्षण देना और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। भारतीय खेल प्राधिकरण ने इस उद्देश्य के लिए पूरे भारत में 23 राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं। अगस्त 2023 तक 7,780 एथलीटों को समर्थन दिया गया है। इसके अलावा, सरकार ने चयन और प्रशिक्षण की पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक और सख्ती से पेशेवर बनाने के लिए विशेष प्रयास किए हैं।
मेरठ में मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी और मणिपुर में नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी जैसे खेल विश्वविद्यालय हजारों खिलाड़ियों को सही तरह के प्रशिक्षण और प्रेरणा के साथ समर्थन देकर आगे बढ़ रहे हैं।
टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना (TOPS) एक अनुकरणीय पहल है जिसका उद्देश्य ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के लिए होनहार एथलीटों को खोजना और तराशना है। यह योजना चयनित एथलीटों को प्रति माह 50,000 रुपये की सीधी वित्तीय सहायता प्रदान करती है, साथ ही उन्हें अत्याधुनिक खेल सुविधाओं में प्रसिद्ध कोचों, फिजियोथेरेपिस्ट और मनोवैज्ञानिकों से विशेष निर्देश और देखभाल भी मिलती है। TOPS के तहत चुने गए एथलीटों की और सहायता के लिए मिशन ओलंपिक सेल का भी गठन किया गया है। इसी तरह, जूनियर TOPS की स्थापना 12, 13 या 14 वर्ष की आयु के जूनियर एथलीटों को विशेष रूप से तैयार करने के उद्देश्य से की गई है, ताकि उन्हें 2028 तक ओलंपिक चैंपियन बनाया जा सके।
2013-14 की तुलना में, खेलों के लिए आवंटित बजट तीन गुना से अधिक बढ़ गया है। 2004-05 में 466 करोड़ रुपये से थोड़े से अधिक के मामूली खर्च से, मोदी सरकार ने साल दर साल खेलों के लिए आवंटन को लगातार बढ़ाया है, और 2023-24 में यह राशि लगभग 3,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
सरकार ने तो खेलों को पनपने और फलने-फूलने का अनुकूल वातावरण बनाने में सराहनीय काम किया ही है, लेकिन यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत तौर पर एथलीटों को प्रेरित करने में कितनी दिलचस्पी ली है।
टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम की हार के बाद प्रधानमंत्री के मार्मिक और उत्साहवर्धक शब्द सभी को याद हैं। उन्होंने टीम से कहा, "रोना बंद करो, मैं आपका रोना यहां सुन सकता हूं। पूरा देश आप पर गर्व करता है, निराश मत हो। आपका पसीना देश की करोड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गया है। इतने दशकों के बाद, हॉकी, जो भारत की पहचान है, आपकी मेहनत की बदौलत फिर से चमक रही है।"
एशियाई पैरा खेल-2023 में भाग लेने वाले एथलीटों को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "आप सभी जो यहां मौजूद हैं, कुछ विजेता के रूप में लौटे हैं, तो कुछ और अनुभवी होकर लौटे हैं, लेकिन कोई भी हार कर नहीं लौटा है।"
प्रधानमंत्री मोदी खेलों के विकास को समग्र और जीवन-पथ का अभिन्न अंग बनाकर पूरे कार्यक्रम में अपना चरित्र लाते हैं। उनके आवास पर आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग में खिलाड़ियों को दिया गया स्पेशल टास्क इस बात का प्रमाण है – जहां उन्होंने सभी ओलंपियनों से वादा लिया कि वे 2023 के स्वतंत्रता दिवस तक कम से कम 75 प्राथमिक स्कूलों और कॉलेजों का दौरा करेंगे और कुपोषण के बारे में जागरूकता फैलाएंगे और साथ ही स्कूली बच्चों को खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। यह इस बात की झलक देता है कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी भारतीय ग्रोथ स्टोरी को अपना व्यक्तिगत लक्ष्य बनाते हैं।
पिछले नौ वर्षों में आए सुधारों ने, जिनमें प्रशासनिक मशीनरी और काम करने के पारंपरिक तरीकों में बदलाव, साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंशियल सपोर्ट शामिल हैं, भारतीय खेल परिदृश्य को एक नाटकीय रूप से बदल दिया है! लेकिन इस शानदार यात्रा में सबसे अहम भूमिका निभाई है एक ऐसे नेता ने, जो खुद उदाहरण स्थापित करता है; जिसके दिल में बदलाव, विकास और भारत को उसके सही मुकाम पर देखने का जुनून है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत न केवल खेल आयोजनों में, अपनी पदक तालिका में सुधार कर रहा है, बल्कि देश 2030 में यूथ ओलंपिक और 2036 में समर ओलंपिक जैसे प्रमुख ग्लोबल इवेंट की मेजबानी करने की भी आशा रखता है।




