आज के कार्यक्रम के केन्द्र बिंदु हमारे मित्र श्री विनय सहस्त्रबुद्घे जी, पार्टी के राष्ट्रीय नेता नितिन गडकरी जी, श्री गोपीनाथ जी मुंडे, महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष श्रीमान देवेन्द्र जी, मुंबई महानगर के अध्यक्ष श्रीमान आशीष शेनार जी, प्रकाशक श्रीमान सुमित आर्य, भाई नलिन, उपस्थित सभी वरिष्ठ महानुभाव, भाइयों और बहनों..! मैं विशेष रूप से इस कार्यक्रम में विनय जी का अभिनंदन करने के लिए आया हूँ। बहुत सालों से विनय जी के साथ कार्य करने का मुझे सौभाग्य मिला है और जिन चालीस हजार कार्यकर्ताओं का इन्होंने प्रशिक्षण किया है, उन चालीस हजार में से मैं भी एक हूँ, तो एक प्रकार से वे हमारे गुरूजन हैं..! एक एकेडमिशियन रिसर्च करे और एक एक्टिविस्ट रिसर्च करे, इन दोनों में आसमान-जमीन का अंतर होता है। 

एकेडमिशियन इंटेलेक्चुअल ताकत का अनुभव करते हुए, उपयोग करते हुए, विचार-विमर्श करते हुए, अपनी बुद्घि का उपयोग करते हुए अपने निष्कर्ष निकालता है और एक एक्टिविस्ट अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को अपने अनुभव के तराजू में तराशता है और तब जो वो देता है उसकी ताकत भिन्न होती है। और सरल शब्दों में अगर मुझे कहना हो तो मैं कहूँगा कि फाइव स्टार होटल में कोई खाना खिलाए और माँ अपने बेटे को प्यार से जो खाना बना कर दे, उन दोनों में जितना अंतर होता है, उतना अंतर एक एकेडमिशियन की रिसर्च में और एक एक्टिविस्ट की रिसर्च में होता है और वो नजराना श्रीमान विनय जी ने दिया है। मित्रों, ये विषय भी ऐसा है कि लोकतंत्र हमें अच्छा लगता है लेकिन बारीकियों में, गहराइयों में जाना ज्यादातर लोगों का स्वभाव नहीं होता है। और मैं नहीं जानता हूँ इस किताब में वो पहलू आया है या नहीं आया है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में लोकतंत्र के स्पिरिट का जिस प्रकार से व्याप बढ़ना चाहिए, वो नहीं बढ़ा है। उसमें एक ठहराव है और ठहराव क्यों आया है..? राजनेताओं ने एक ऐसी मानसिकता बना दी है, राजनैतिक दलों ने लोगों का ऐसा प्रबोधन किया है कि लोकतंत्र का मतलब है कि आप वोट के माध्यम से किसी एक दल को पाँच साल का कॉन्ट्रेक्ट दे दो। कि भाई, तुम अब पाँच साल में मेरा इतना-इतना कर दो, मेरा इतना भला कर दो और अगर पाँच साल में उसने कॉन्ट्रेक्ट को ठीक नहीं चलाया, काम ठीक नहीं किया, तो अब तू जा, हम दूसरे को लाएंगे..! मित्रों, लोकतंत्र सिर्फ ठेका देने की व्यवस्था नहीं है, लोकतंत्र हम सबको मिल कर के इस राष्ट्र की आशा-आकांक्षाओं को, जन-जन की इच्छाओं-आकांक्षाओं को परिपूर्ण करने का एक उत्तम माध्यम है।

एक बार मैं चाइना में एक सेमीनार के लिए गया था और चाइना में आप ज्यादा लोकतंत्र-लोकतंत्र करो तो थोड़ा अनकम्फर्टेबल माहोल पैदा होता है। तो वहाँ मुझे पूछा गया कि मोदी जी, बताइए कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या है? ऐसा मुझे वहाँ पूछा गया था। अब अचानक इतना बड़ा सवाल आ गया था और वो भी चाइना में आया था, तो एक छोटा सा हल्का-फुल्का जवाब मेरे दिमाग से निकला था। मैंने कहा लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि गलती को ठीक करने का उत्तम अवकाश लोकतंत्र में मिलता है। आपने किसी को शासन दे दिया और लगा कि भाई ये गलती हो गई है, पाँच साल में आपको दोबारा निर्णय करने का अवसर मिलता है, गलती ठीक करने का मौका मिलता है। ये अपने आप में लोकतंत्र की बहुत बड़ी ताकत होती है और ये वही ताकत है जो हमें जहाँ हैं वहाँ से ऊपर जाने का सामर्थ्य देती है..!

मित्रों, हमारे देश में कई प्रकार की एनीवर्सरीज मनाई जाती हैं, जयंतियाँ मनाई जाती हैं और कुछ की तो साहब तीन-तीन पाँच-पाँच दिन चलाई जाती है..! नाना कौन थे, दादा कौन थे, पिता कौन थे, पता नहीं क्या-क्या बताते हैं..! कुछ घटनाएं ऐसी है जो बार-बार याद करवाई जाती है। मैं हैरान था, कल जब 26 जून गई, जिस 26 जून को हिन्दुस्तान के लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया था, जिस मीडिया की स्वतंत्रता की बात हम सरेआम करते हैं उसे दबोच दिया गया था, व्यक्ति के अधिकारों का हनन हो गया था, देश का मीडिया लेट चुका था, घुटनों के बल बैठने की बजाए लेट चुका था..! वो दिन थे..! लेकिन मैं हैरान हूँ, मैं सोच रहा था कि 25 और 26 जून को कुछ पुराने लोगों के इन्टरव्यू आएंगे, कुछ बात आएगी, कुछ चर्चाएं होंगी... लेकिन मित्रों, यदि इस देश में किसी एक दिन को सर्वाधिक याद करने की आवश्यकता है तो जितना महत्व 26 जनवरी का है उतना ही महत्व 26 जून का है, जब लोकतंत्र में हमें मिले हुए अधिकारों को छीन लेने का प्रयास हुआ था, इस देश की आत्मा को रौंद डाला गया था..! और मित्रों, हमारे यहाँ कहा है, ‘राष्ट्रयम् जाग्रयम् वयम्’, ऐसे विषय होते हैं जिन पर निरंतर जागना आवश्यक होता है। ये किताब उस कार्य की पूर्ति के लिए एक अच्छा माध्यम बनी है। अंग्रेजी में कहते हैं, इटरनल विजिलेंस इज़ द प्राइस ऑफ लिबर्टी’..! और यही तो घटनाएं है जो हमारी लोकतंत्र की ओर और श्रद्धा बढ़ाती हैं। जब लोकतंत्र नहीं होता है, लोकतंत्र छीन लिया जाता है तो हालत क्या होती है इसका परिचय उन घटनाओं का बार-बार स्मरण करने से होता है। मित्रों, कोई करे या ना करे, जो लोकतंत्र की साधना करने वाले लोग हैं, जो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले लोग हैं, जो लोकतंत्र के लिए समर्पित लोग हैं, उन सबका दायित्व बनता है कि इस कार्य को हमें हर पल जीवित रखना चाहिए, चेतनवंत रखना चाहिए, निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और उसमें इस प्रकार से विनय जी के प्रयास एक अच्छा अवसर देते हैं और इसलिए भी मैं विनय जी का अभिनंदन करता हूँ, उनकी बधाई करता हूँ..!

मित्रों, महाराष्ट्र की धरती पर आया हूँ तब लोकमान्य तिलक का वो मंत्र जिसने देश को एक शक्ति दी थी, उसका स्मरण आना स्वाभाविक है। लोकमान्य तिलक ने कहा था, ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्घ अधिकार है’..! मित्रों, स्वराज्य पाने के लिए कितने लोगों ने बलिदान दिए, स्वराज्य पाने के लिए क्या कुछ नहीं झेला और स्वराज्य आने से क्या हो जाएगा ऐसे सवालिया निशान भी कुछ कम नहीं लगाए गए थे और उसके बावजूद भी स्वराज्य के लिए लोगों ने आहूती दी और लोकमान्य तिलक का वो मंत्र आज भी गूंजता है, ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्घ अधिकार है’..! मित्रों, देश की आजादी को आज इतना समय हो गया, स्वराज्य के लिए जिन्होंने बलिदान दिया, हमें स्वराज्य तो मिला लेकिन सुराज मिला क्या..? सुशासन मिला क्या..? स्वराज के साथ सुशासन की भी यात्रा चली होती, स्वराज्य के साथ सुराज की आशा चली होती तो मित्रों, हमारे बाद आजाद हुए देश आज तरक्की करके हमसे आगे ना चले जाते..! एक सौ बीस करोड़ का देश आज दुनिया में सर्वाधिक ऊंचाई पर बैठा होता, लेकिन हमने वो मौका खो दिया और तब जा कर के लोकमान्य तिलक से प्रेरणा ले कर के हमें भी संकल्प करना चाहिए। अगर उन्होंने कहा था कि स्वराज्य मेरा जन्म सिद्घ अधिकार है तो हिन्दुस्तान के सवा सौ करोड़ नागरिक ललकार करें, ‘सुराज हमारा जन्म सिद्घ अधिकार है’..! इस भावना को जगाने की बहुत आवश्यकता है। कुछ लोगों को लगता है और कभी-कभी कोई मिलता है तो कहता है, अरे यार, क्या करें, हमारे यहाँ तो डेमोक्रेटिक सिस्टम ही ऐसा है..! मित्रों, ऐसा नहीं है, हमें लोकतंत्र को दोष देने का कोई कारण नहीं है। यही कानून, यही व्यवस्थाएं, यही नियम, यही मुलाजिम, यही फाइलें, यही दफ्तर... उसके बावजूद भी देश को आगे बढ़ाया जा सकता है, ये मेरा विश्वास है, दोस्तों..! मैं मेरे गुजरात एक्सपीरियंस से कह सकता हूँ मित्रों, ये जो चारों तरफ निराशा का माहौल है कि अब कुछ नहीं हो सकता, दुनिया डूब गई, शायद पिछले जन्म में कुछ पाप किये होंगे इसलिए यहाँ पैदा हुए हैं...! मित्रों, मैं ऐसा निराशावादी इंसान नहीं हूँ। यह बहुरत्ना वसुंधरा है, यह सामर्थ्य शाली देश है। 1200 साल गुलामी झेलने के बाद भी अगर उठ खड़ा हुआ है तो उसके भीतर भी कुछ ताकत है उसका अहसास करने की आवश्यकता है..!

मित्रों, हमारे यहाँ जब गुड गवर्नेंस की बात होती है, सुराज की बात होती है तो पहले ये समझना होगा कि आखिरकार हम सरकार को समझते क्या हैं और सरकार वाले अपने आप को क्या समझते हैं..! सारी गड़बड़ वहीं होती है..! मित्रों, लोकतंत्र में जो शासन व्यवस्था है वे शासक नहीं है, यह पहली शर्त है उसकी, वे रूलर्स नहीं हैं, ये पहली शर्त है उसकी। वे सेवक हैं, ये मूलभूत बात लोकतंत्र में समझनी होती है। और मित्रों, लोकतंत्र में जनता शासन में बैठे हुए लोगों को शासक के भाव से देखने के बजाय उनको सेवक के भाव से देखें और शासन में बैठे हुए लोग भी अपने आप को सेवक के रुप में प्रस्तुत करें, ये लोकतंत्र की पहली शर्त है, उसको भुला दिया गया है..! सरकार का काम डंडा चलाना ही है क्या? लोगों से टैक्स कलेक्ट करना ही है क्या? यही सत्ता या सरकार की व्यवस्था है..? अगर ये सोच रही तो मित्रों, हम सच्चे अर्थ में लोकतंत्र की भावना को समझ नहीं पाए हैं, चाहे वो शासन में बैठे हों या जनता में वोट देने का काम करने वाले सामान्य नागरिक हों। मित्रों, जिन दिनों ब्रिटिशर्स राज करते थे और आजाद होने के बाद हमारी सरकारें आने लगी, उन दोनों में फर्क क्या है..? इस मूलभूत फर्क को समझने की आवश्यकता है। अंग्रेज शासन करते थे तो उस शासन व्यवस्था का अल्टीमेट ऐम क्या था..? उनका अल्टीमेट ऐम ये था कि ब्रिटिशरों का ‘यावत चंद्र दिवाकरो’ यहाँ राज रहे। यहाँ चीजें ऐसी हो जिससे अनरेस्ट पैदा ना हो और वो मजबूत होते चले जाएं..! ये उनका मूलभूत आधार था। लोकतंत्र और स्वराज्य आने के बाद हमारी सरकारों का काम, शासन व्यवस्था का काम सत्ता में बैठे हुए लोगों को मजबूत करने का नहीं है, उनका काम है जनता को मजबूत करना, समाज व्यवस्थाओं को मजबूत करना..! ब्रिटिशरों का इरादा वो होगा, लेकिन हमारे लिए तो लोकशक्ति को मजबूत करना ही उसका मूलभूत सिद्घांत होना चाहिए..! मित्रों, हमारे यहाँ दो शब्द हैं और उन शब्दों का अर्थ भी हम भूल गए हैं..! कभी-कभी हम कहते हैं कि भाई, आजकल क्या करते हो? तो वो जवाब देता है कि जॉब है।

मित्रों, सरकार में कभी भी जॉब शब्द का उपयोग नहीं होता था। कोई प्राइवेट नौकरी करता है तो वो जॉब करता है ऐसा माना जाता था, क्योंकि वो कंपनी की भलाई के लिए काम करता था। कंपनी का विकास हो, कंपनी का मुनाफा हो उसके लिए वो काम करता था..! लेकिन जो गवर्नमेंट में काम करता था उसके लिए शब्द था, सर्विस करता है..! देखिए, ये मूलभूत बात है। हम भी कभी ये बोलते हैं, लेकिन हम कम्पेरिजन करेंगे तो पता चलेगा कि कितना बड़ा आसमान-जमीन का अंतर है। सरकार में काम करने वाला सर्विस करता है, सर्वन्ट है। कंपनी में काम करने वाला दो करोड़ रुपया कमाता होगा, लेकिन जॉब करता है। मित्रों, जॉब और सर्विस में बहुत बड़ा अंतर है, इस मूल भावना को तब हम जी कर के सीखते हैं जब हम खुद लोकतंत्र की विभावनाओं को हर रूप में अगर पचाते हैं..! मित्रों, सरकार किसके लिए है, आखिरकार सरकार किसके लिए है..? अगर मान लीजिए, मुकेश अंबानी बीमार हुए, उनको सरकार की जरूरत है..? हिन्दुस्तान के, दुनिया के टॉपमोस्ट डॉक्टर आकर के खड़े हो जाएंगे। लेकिन एक गरीब बीमार हुआ तो उसे सरकार की जरूरत पड़ती है। सरकार गरीबों की बेली होती है, गरीबों की आशा होती है, आकांक्षा होती है। ये सरकार का मूलभूत एलीमेंट होना बहुत जरूरी होता है। मित्रों, महात्मा गांधी की एक बात बहुत समझने जैसी है। गांधी ने एक बहुत बढ़िया बात कही थी। यदि आप सरकार में बैठे हो और अगर आपको कोई निर्णय करना है लेकिन आप दुविधा में हो, करूँ या ना करूँ, मेरा निर्णय सही है या नहीं है... तो महात्मा गांधी ने बहुत अच्छा रास्ता दिखाया था। उन्होंने कहा था कि किसी गरीब को याद करना, उसके चेहरे का स्मरण करना और निर्णय करते समय सोचना कि क्या मेरा निर्णय उसके लिए खुशी का कारण बनेगा और यदि लगता है कि बनेगा, तो आपका निर्णय सही है..!

मित्रों, ये सरकार या शासन नाम की जो व्यवस्था है उसकी ये मूलभूत आवश्यकता रहती है और इसलिए उसको करना चाहिए..! मित्रों, हमारे देश की हालत कैसी है..! जब सारे विश्वास टूट जाए, सारे सहारे टूट जाए, तब एक जगह ऐसी होनी चाहिए जहाँ उसे भरोसा हो। रात को सो जाए तो उसको विश्वास होना चाहिए कि नहीं-नहीं, चिंता नहीं, सरकार है..! उसे विश्वास होना चाहिए। मित्रों, आज स्थिति क्या है, आपको भरोसा है..? आजादी के साठ साल के बाद भी..? कभी-कभी आपने देखा होगा, आप एस.एम.एस. करते हो किसी को, फिर फोन लगा कर पूछते हो मेरा एस.एम.एस. मिला..? क्यों..? मित्रों, पहले हम पूरा भरोसा करते थे। जब डाकिया आता था तो इंतजार करते थे कि डाकिया आएगा। एक जमाना था..! डाकिया आने का मतलब पूरे गाँव में, पूरे मौहल्ले में एक अच्छी खबर का माहौल रहता था कि हाँ भाई, कुछ खबर लेकर के आया है..! आज डाकखाने में आपको डाक डालने की इच्छा होती है..? इच्छा क्या, हिम्मत होती है..? आपको शक होता है कि मेरी डाक पहुंचेगी कि नहीं..! तो आप क्या करते हैं, कूरियर का सहारा लेते हैं..! कल्पना कीजिए मित्रों, ये कूरियर व्यवस्था का पनपना, इसको कोई एफीशियेन्सी कहता होगा, एक पहलू हो सकता है लेकिन साथ ही आपकी इस पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्ववास का भी प्रतिबिंब है। आपका भरोसा टूट चुका है। आप कहिए मित्रों, गरीब से गरीब आदमी भी, आपकी गाड़ी का ड्राइवर, आप जरा उसे पूछ लेना आपको समय मिले तो, कि उसके बच्चों की पढ़ाई का क्या है..! यहाँ बैठे हुए कईयों के ड्राइवर ऐसे होंगे जिस ड्राइवर ने कहीं से कर्ज लिया होगा और कर्ज लेकर के अपने बच्चे को अच्छी स्कूल में पढ़ाने के लिए उसने खर्च किया होगा। आप पूछो यार, तुम ड्राइवर हो, सरकारी स्कूल में क्यों नहीं भेजते हो अपने बच्चे को..? तो कहता है कि नहीं-नहीं, मुझे उसकी जिंदगी बिगाड़नी नहीं है..!

मित्रों, मैं उदाहरण छोटे दे रहा हूँ लेकिन इसको गंभीरता से लेने की आवश्कता है। सरकार की स्कूल है, सरकार का बजट है, टीचर्स है, सबकुछ है... जनता को भरोसा नहीं है। उसको डर लगता है कि कही बच्चा बिगड़ तो नहीं जाएगा..! लोग बच्चा बिगाड़ने के लिए स्कूल भेजते हैं क्या..? फिर बोलेगा, कर्ज किया है, प्राइवेट में भेजूंगा, वहाँ बच्चा बिगड़ तो नहीं जाएगा..! मित्रों, ये जो समस्या है, ये जो मन:स्थिति है, ये मन:स्थिति अपने आप में हमारे देश में गवर्नेंस कैसा हो, सरकार कैसी हो, शासक कैसे हो, उनके सामने सवालिया निशान लगाता है। मैंने एक बार मजाक में कहा था। भारत सरकार ने एक पोस्टल स्टैम्प निकाला था, श्री कृष्ण और अर्जुन वाला, अर्जुन के रथ को श्री कृष्ण चला रहे हैं और उस पर ‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते’ श्लोक लिखा था। तो जब उसका लांचिग हुआ था तो मैं तब ऑडियंस में बैठा था। मैं तब छोटा था, तो देखने गया था, पोस्टल स्टैम्प वगैरा का कार्यक्रम था। बाद में मुझे मजाक सूझी। मैंने कहा देखिए, भारत सरकार कितना सच बोलती है। बोले कैसे..? मैंने कहा, एक पोस्टल स्टैम्प लगाओ, डाक में डाल दो लेकिन पहुंचेगा इसकी गांरटी नहीं। कर्मण्ये वाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन..! कभी-कभी सरकार भी सच बोल देती है..! मित्रों, आज हालत कैसी है, जो मेरी उम्र के लोग हैं, आपने आज से चालीस साल पहले कभी बाजार में ‘शुद्घ घी की दुकान’ ऐसा बोर्ड पढ़ा था..? आज मित्रों, आज हालत कैसी है बताइए, उसको लिखना पड़ता है ‘शुद्घ घी की दुकान’..! मित्रों, सार्वजनिक जीवन में डिटोरेशन कैसा आया है..! वरना शासन है, कानून है और अशुद्घ बेचने का किसी को अधिकार नहीं है, फिर भी उसको लिखना पड़ता है, ‘शुद्घ घी की दुकान’..! मित्रों, ये बातें हैं जिसके कारण फिर से सोचना पड़ता है। अच्छा, हम लोगों का भी स्वभाव कैसा है? लोकतंत्र में हम कहाँ खड़े हैं..! मैं सरकारों की आलोचना करूं तो आप ताली बजा कर मजा करते हैं, अब मैं थोड़ी आपकी बात करता हूँ..! अपनी तो बात मैंने बता दी। बुरा नहीं लगेगा ना..? कहीं नाराज मत हो जाना, मुझे बहुत काम करने बाकी हैं..! आपका पच्चीस साल पुराना स्कूटर होगा, हॉर्न के सिवाय सब बजता होगा, टायर पर कोई डिजाइन नहीं होगी, कोई नामोनिशान नहीं होगा, लेकिन टायर चलता होगा..! लेकिन जब आप घर से निकलते होंगे तो कितना बारीकी से सफाई करते हो..! बराबर घिस-घिस कर सफाई करते हो ना..! पच्चीस साल पुराना स्कूटर है, हर प्रकार की आवाज आती है..! लेकिन जब सरकारी बस में बैठते हो, नई बस रखी हो, ब्रांड न्यू... वो पच्चीस साल पुराना टूटा-फूटा स्कूटर आपको अपना लगता है, ये बस आपको अपनी नहीं लगती है, सरकारी लगती है..! 

मित्रों, ये भेद खत्म करना चाहिए। वो बस भी आपकी है, सरकार आप हैं..! और लोकतंत्र की इस भावना के अभाव के कारण क्या होता है..? यहाँ बैठा हुआ कोई इसमें से बचा हुआ नहीं होगा, जो मैं बोल रहा हूँ..! मैं अच्छे से अच्छा ज्योतिष हूँ..! आपके चेहरे से कहता हूँ, जो मैं कहने वाला हूँ वो पुण्य कार्य आप सबने किया है, कोई बाकी नहीं होगा ये मैं दावे से कहता हूँ..! आप बस में बैठे होंगे, दो-तीन घंटे की सफर होगी, साथ में कोई मित्र नहीं होगा, खिड़की में देखते-देखते थक गए होंगे... फिर क्या किया होगा, सीट के अंदर उंगली डाली होगी और उस फार्म यूं-यूं करते करते करते दो इंच का उसमें गड्ढा कर दिया होगा..! मेरा ज्योतिष सही है ना..? क्यों..? क्योंकि स्कूटर आपका है, बस सरकार की है..! मित्रों, ये जो अंतर है, इस अंतर को मिटाए बिना सुराज नहीं आ सकता..! ये हम सबका है, ये हमारा अपना है, मित्रों..! और जिस दिन ये अपनेपन का भाव बन जाएगा, तब हमारा लोकतंत्र इतना पुख्ता हो जाएगा कि हमारा गवर्नेंस अपने आप चलने लग जाएगा..! ये बदलाव, ये परिवर्तन लाने की आवश्कता है और हमें ये करना होगा..! जब सरकार पर भरोसा नहीं होता है तो हालत कैसी होती है..? कौन ऐसी सरकार पर भरोसा करेगा..! आपको याद होगा, बाबा रामदेव को चार मिनिस्टर एयरपोर्ट पर लेने को गए थे। कितना भरोसा हुआ होगा उनको..! और दूसरे दिन चार पुलिस वाले उठा कर ले गए..! आप देखिए, ये चिटफंड कब चालू हुआ..? उसका बैंक पर से भरोसा उठ गया..! उसको लगा कि बैंक से मुझे जितना रिफंड मिलना चाहिए, जितनी मुझे कमाई होनी चाहिए, वो होगी की नहीं होगी..! शक पैदा हुआ और उसका परिणाम क्या आया? यार, एसा करो, चिटफंड में डालो, पहचान वाला है, वो अपना पड़ौसी का बेटा ऐजेंट है..! चलिए कुछ कमाई ज्यादा हो जाएगी और आदमी वहाँ फंस जाता है। जब इस प्रकार की व्यवस्थाएं बनती हैं, तो उन व्यवस्थाओं के कारण... अब देखिए, आपको ऑपरेशन करवाना है और आपको ऑपरेशन थियेटर में ले गए हैं, सीरियस नेचर का ऑपरेशन है, तो आप पहले क्या पूछते हैं कि भाई जनरेटर तो है ना, वरना आधे ऑपरेशन पर लाइट गुल..! मित्रों, अगर शासन की इस प्रकार की दशा हो जाएगी, तो मैं नहीं मानता हूँ कि देश सुराज का जो सपना देख रहा था, वो सुराज का सपना पूरा होगा..!

मित्रों, शासन की भी मानसिकता देखिए..! आज की शासन व्यवस्था में बैठे लोगों को जनता पर ट्रस्ट है क्या..? ये मैं एक ऐसी बात को छेड़ रहा हूँ जिस पर बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है। अगर शासन में बैठे हुए लोगों को जनता के प्रति विश्वास नहीं है तो मित्रों, ये कारोबार कभी नहीं चल सकता। और आज स्थिति ऐसी है कि शासन में बैठे हुए लोगों को, चाहे वो शासक हो या प्रशासक हो, उनको जनता जर्नादन पर विश्वास की जो एकदम अबाधितता चाहिए उसका अभाव नजर आ रहा है। आप किसी भी इनकम टैक्स वाले को ले लो, वो सब व्यापारियों को चोर समझते हैं..! बात सही है ना..? क्यों..? मित्रों, ये मूलभूत बातें हैं..! विश्वास क्यों नहीं है..? अगर कोई कानून की गलती करता है तो ठीक है, उसके लिए दंड होना चाहिए। लेकिन सामान्य नागरिक को आप चोर समझ कर उसके साथ व्यवहार करोगे तो ये जो डिस्ट्रस्ट है वो कभी भी किसी को पनपने नहीं देता है। मित्रों, छोटी-छोटी बात मैं बता रहा हूँ लेकिन ओवरऑल लोकतंत्र के लिए शासक, प्रशासक और जनता जनार्दन, इन तीनों के बीच में किस प्रकार का रिलेशन होना चाहिए, वो विधा पिछले साठ साल में डेवलप नहीं हुई है..! उसको ऐसा ही लगता है कि सब कानून तोड़ने वाले हैं। आपने देखा होगा, एक पार्किंग में आपने स्कूटर पार्क किया हो, तभी आपने कुछ लोग देखे होंगे जो बिना कारण स्कूटर को डंडा मारते हैं। देखा है ना..? मैं कभी हैरान हो जाता हूँ कि क्यों ऐसा करते हैं..! क्योंकि उसको लगता है कि मेरा जो रुतबा है उसकी देखने वाले को अनुभूति होनी चाहिए..!

मित्रों, जनता के प्रति ट्रस्ट होना, विश्वास होना ये गुड गवर्नेंस की पहली शर्त है। और दूसरा, जैसे जनता के लिए ट्रस्ट होना चाहिए, विश्वास होना चाहिए वैसे जो शासन में बैठे हैं उनके मन का भाव कैसा होना चाहिए..? महात्मा गांधी जो एक ट्रस्टीशिप के सिद्घांत की बात करते थे। मैं मानता हूँ, शासक का भी भूमिका उस ट्रस्टीशिप की विभावना से भरी हुई होनी चाहिए। उसको लगता है कि भाई, मैं एक ट्रस्टी के नाते यहाँ बैठा हूँ, मुझे इस अमानत को संभालना है, संवारना है, और उसको जितनी शक्ति, सामर्थ्य देकर आगे बढ़ा सकता हूँ, बढ़ाना चाहिए। मैं मालिक नहीं हूँ, मुझे इस संपदा को नष्ट करने का अधिकार नहीं है। ये अगर हमारे भीतर भाव नहीं होगा तो ये ट्रस्ट और ट्रस्टीशिप की जुगलबंदी के बिना लोकतंत्र को हम फलदायी नहीं कर सकते..!और लोकतंत्र को फलदायी करना है तो इसकी चिंता करनी पड़ेगी..! दूसरी बात है मित्रों, लोकतंत्र की पहली शर्त है कि व्यवस्थाएं व्यक्ति आधारित विकसित नहीं होनी चाहिए। हमारे साठ साल की शासन व्यवस्था का एक परिणाम ये आया है कि हमने चीजों को व्यक्ति आधारित बना दिया है। एक परिवार इधर-उधर हो जाएगा तो देश घुल जाएगा..! 120 करोड़ का देश ऐसा है क्या..? आप नहीं रहोगे तो कुछ नहीं होगा, ऐसा है क्या..? और इसलिए मित्रों,लोकतंत्र की पहली शर्त होती है आपके हर आइडियाज को इंस्टीट्युशनलाइज़ करना चाहिए, हर अच्छी प्रेक्टिस को इंस्टीट्युशनलाइज़ करना चाहिए, इंस्टीट्यूशन्स का नेटवर्क खड़ा करना चाहिए। आप हो या ना हो, आप रहो या ना रहो, सरकार ये रहे या दूसरी रहे, आज ये चुन कर के आए, कल दूसरे चुन कर के आए, लेकिन इंस्टीट्यूशनल नेटवर्क, इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क, इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म जितना स्ट्रांग होगा उतनी ही शासन व्यवस्था ठीक चलेगी। 

मित्रों, व्यक्ति के बिगड़ने की संभानाएं रहती हैं, व्यक्ति के फिसलने की संभावनाएं रहती हैं तब बचने का आधार रहता है ये मैकेनिज्म, ये इंस्टीट्युशनलाइज़ व्यवस्था, ये इसे बचाती हैं। आप मुझे बताइए, आप घर में तिजोरी पर ताला लगाते हैं, क्यों लगाते हैं? आपने जहाँ पैसे रखे हैं, वहाँ ताला लगाते हैं, क्यों..? क्या चोर के लिए ताला तोड़ना मुश्किल है क्या..? वो तो पूरी तिजोरी ही उठा कर ले जाएगा..! फिर भी क्यों लगाते हो? मित्रों, आप इसलिए नहीं लगाते हो कि चोर से बचोगे, आप इसलिए लगाते हो कि आपके बेटे की आदत खराब ना हो। घर में बच्चों की आदत खराब ना हो इसलिए आपने घर में मैकेनिज्म खड़ा किया है, इसलिए आपने एक व्यवस्था को विकसित किया है ताकि बच्चों के संस्कार खराब ना हो। कहीं उसको दोस्तों के कारण दो-पाँच रूपया उठाने का मन कर ना जाए, इसलिए हम करते हैं..! चोरों से तो कुछ बचाना नहीं है भाई, वो तो पूरी तिजोरी उठा कर ले जाएगा..! और इसलिए मैं मानता हूँ कि हम इंस्टीट्यूशन्स को जितना स्ट्रेन्थन करेंगे उतना ही हमारा लोकतंत्र उपकारक होगा, गवर्नेंस में लोकतंत्र की पूरी विभावना का प्रगटीकरण होगा। लेकिन दुर्भाग्य से साठ साल का अनुभव देखिए, हमने क्या किया है..! दिल्ली में बैठे हुए शासक, जहाँ भी उन्हें अवसर मिला है उन्होंने सबसे पहले काम किया है इंस्टीट्यूशन्स को तोड़ना, डिवेल्यूएशन करना..! अब देखिए, हिन्दुस्तान में पंडित नेहरू के जमाने से प्लानिंग कमिशन नाम का एक इंस्टीट्यूशन खड़ा हुआ, उसकी एक सेन्टटी खड़ी हुई..! प्लानिंग कमीशन सब राज्यों के साथ मिल बैठ करके, विचार करके राज्य और केन्द्र के बीच सेतु बन कर अपना काम करने की कोशिश करता था। लेकिन लोकतंत्र में जिनका भरोसा नहीं है उन्होंने क्या किया, उसको बिन उपयोगी, ऐसे ही गड्ढे में डाल कर रख दिया और बदले में क्या किया, एडवाइजरी कमेटी के नाम पर एन.ए.सी. का निर्माण किया और सारे आर्थिक निर्णय, पाँच फाइव स्टार एक्टीविस्ट एन.जी.ओ. के द्वारा होने लगे। और फिर एक प्रधानमंत्री दूसरे प्रधानमंत्री को ऑफिश्यली बताने लगे कि ये करो और ऑफिशियल प्रधानमंत्री करने लग गए..! रुकावट के लिए खेद है, पहुंचने में बड़ी देर हुई..!

मित्रों, आप मुझे बताइए, इतनी बड़ी प्लानिंग कमीशन, पिछले साठ साल से विकसित हुई इंस्टीट्यूशन को बिलकुल नाकाम कर दिया। एन.ए.सी. बना दी..! अब देखिए, धारा 356, देश के फेडरल स्ट्रक्चर को सुरक्षित रखना और देश एक दिशा में चले इसलिए इस धारा का उपयोग करने की बजाए सैकड़ों बार शासनों को नष्ट करने के लिए उस धारा का उपयोग हुआ..! सी.बी.आई...! मैं तो हैरान हूँ किस प्रकार से सी.बी.आई. का दुरूपयोग ये लोग कर सकते हैं..! ये मेरे साथ ना गुजरी होती तो मुझे पता ही ना चलता कि इतना दुरूपयोग करते हैं ये..! कोई डर नहीं, कोई परवाह नहीं और दिल्ली में बैठे हुए शासक जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जय-पराजय को झेलने का सामर्थ्य नहीं रखते वो सी.बी.आई. के सहारे हिन्दुस्तान की राजनैतिक शक्तियों को परास्त करने पर लगे हैं..! हो सकता है सी.बी.आई. के माध्यम से आज दो-चार लोगों को परेशानी होती होगी, लेकिन सी.बी.आई. का दुरूपयोग करने से आप हिन्दुस्तान के लोकतांत्रिक फेब्रिक को तहस-नहस कर रहे हो इस बात को कांग्रेस के मित्र समझते नहीं हैं। उनका अपना निजी स्वार्थ है..! इन दिनों तो क्या हुआ, आई.बी. और सी.बी.आई. आमने-सामने... बताइए..! सी.बी.आई. आई.बी. का इन्ट्रोगेशन कर रहा है, आई.बी. को पूछ रहा है, ये तुम्हारे इन्फार्मर कौन है, बताओ..! वो कहता है मैं नहीं बता सकता हूँ। वो कहेते हैं कि नहीं, बताओ..! मित्रों, किसी देश में ऐसा होता है क्या..? इन इंस्टीट्यूशन्स को तोड़ना यही उनका काम है..! ये किस प्रकार से करते हैं..? मुझे याद है, मैंने वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट किया, लोग इन्वेस्टमेंट के लिए आए। लेकिन क्योंकि गुजरात सरकार उनको पसंद नहीं है, तो उन्होंने क्या किया, जो लोग हमारे यहाँ वाइब्रेंट समिट में इन्वेस्ट करने आए उनको भारत सरकार ने इनकम टैक्स की नोटिस भेजी। आप कल्पना कर सकते हो और दूसरी तरफ वो आज चिल्ला रहे हैं, एफ.डी.आई., एफ.डी.आई., कोई इन्वेस्टमेंट नहीं आ रहा है, मैन्यूफैक्चरिंग नहीं हो रहा है, स्लो-डाउन हो गया है..! आप इसी प्रकार से इंस्टीट्यूशन्स का दुरूपयोग करोगे, इंस्टीट्यूशन्स को तोड़ते रहोगे तो मैं नहीं मानता हूँ कि कभी भी देश का भला हो सकता है..! आपको एक पुरानी घटना याद होगी। यहाँ इलेक्शन कमीशन की काफी बातें हुई इसलिए यहाँ उल्लेख करता हूँ।

हिन्दुस्तान के इलेक्शन कमीशन ने 1983 में कहा था कि आसाम में चुनाव करने के हालात नहीं हैं। मित्रों, श्रीमती इंदिरा गांधी ने इलेक्शन कमीशन की उस बात को नहीं माना, उन्होंने चुनावी राजनीति का फायदा उठाने के लिए आसाम में चुनाव थोप दिया और परिणाम ये हुआ कि आजाद हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा नेल्ली का हत्याकांड हुआ था, अगर इतिहास किसी को मालूम हो..! क्यों..? आपने इंस्टीट्यूशन की इज्जत नहीं की, आपने इंस्टीट्यूशन का माहात्म्य नहीं समझा। एक इंस्टीट्यूशन आपको कहती है तो आप दूसरी इंस्टीट्यूशन के साथ टकराव करने के लिए लग गए और उसके कारण मित्रों, कितना बड़ा प्रहार हुआ है..! मित्रों, भारत का संविधान फेडरल स्ट्रक्चर को लेकर के चल रहा है। यहाँ पर कोई बड़ा भाई, कोई छोटा भाई नहीं है। सब राज्य मिल कर के देश को चलाते हैं और देश में एक सुशासन की ब्यवस्था खड़ी करने की आंकाशा के साथ चलते हैं। लेकिन आज जितनी लड़ाई दिल्ली सरकार पाकिस्तान के साथ करती है उससे ज्यादा लड़ाई वो अपने नापंसद राज्यों के साथ करती है। मित्रों, कोई देश इस प्रकार से चल सकता है..? अगर आप फेडरल स्ट्रक्चर का रिस्पेक्ट लेटर और स्पिरिट से नहीं करोगे तो हिन्दुस्तान की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो जाएगा। और इसलिए मित्रों, जब हम शासन और लोकतंत्र की बात करते हैं तो इन बातों के महत्व को भी हमें समझना होगा, ये मेरा स्पष्ट मत है। मित्रों, एक बात और भी है। कभी-कभी अच्छा काम हुआ हो तो हमारे अफसर क्या बोलते थे कि नहीं-नहीं, हमें काम करने के लिए बहुत अनुकूलता है, कोई पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस नहीं है। इसका मतलब सब बर्बाद हम ही कर रहे हैं क्या..? और आप किसी भी अफसर को मिलिए, आराम से अफसर लोग ये बताते हैं कि हम काम कर रहे है क्योंकि पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस नहीं है..! मित्रों, मैं समझता हूँ कि इस बात को बहुत गहराई से समझने की आवश्यकता है। वी आर इन अ डेमोक्रेटिक सेट-अप..! हमने पॉलिटिकल सिस्टम, इलेक्टेड बॉडी को स्वीकार किया हुआ है। उसको अगर हम इन्टरफेयरेंस मानेंगे तो हम लोकतंत्र की मूल भावना को ही नहीं समझ पाए हैं। और इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि शासन में जो लोग आते हैं उनका काम है नीतियाँ बनाना और प्रशासन में जो लोग हैं उनका काम है उसका इम्पलीमेंटेशन करना।लेकिन ये जो झगड़ा है पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस का, मैं समझता हूँ उसको सही अर्थ में राजनेताओं को भी और ब्यूरोक्रेसी को भी समझने की आवश्कयता है।मैं इस बात का पक्षकार हूँ कि पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस की जरूरत नहीं है, लेकिन पॉलिटिकल इन्टरवेंशन की बहुत जरूरत होती है..! आज दिल्ली चल नहीं रहा है, क्या कारण है..? बाबू बैठे हैं..! अगर पॉलिटिकल लीडरशिप होती, जो इस धरती से निकल कर आई होती, तो निर्णय करने की हिम्मत होती, दोस्तों..! सिर्फ पॉलिसी बनाने से नहीं होता..! और इसलिए मित्रों, इस बारीक भेद रेखा को समझने की आवश्कता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस हार्म्स द प्रोसेस ऑफ गुड गवर्नेंस, व्हाइल पॉलिटिकल इन्टरवेंशन केटेलाइज़िस द प्रोसेस एंड एन्करेज़िस पीपल्स पार्टीसिपेशन। मित्रों, पॉलिटिकल इन्टरवेंशन का कल्चर विकसित करना गुड गवर्नेंस के लिए आवश्यक है। और जितनी मात्रा में पॉलिटिकल इन्टरफेयरेंस की जगह पर पॉलिटिकल इन्टरवेंशन बढ़ेगा, उतना हमारा, सारे समाज का विश्वास भी बढ़ेगा, ट्रस्टीशिप के सिद्घांत का पालन भी होगा, निर्णयों का अमलीकरण भी होगा, आखिरी से आखिरी व्यक्ति को जो लाभ मिलना चाहिए, वो लाभ भी मिलेगा। मित्रों, दूसरी बात है, कभी-कभी लोग कहते हैं कि ब्यूरोक्रेसी काम नहीं करती है..!

मैं ये मानता हूँ कि छोटे-मोटे काम नहीं होते होंगे, मैं इसका इंकार नहीं करता हूँ, लेकिन अगर लीडरशिप में विज़न हो, लीडरशिप में पॉलिटिकल विल हो तो एक दिशा निर्धारित करते हैं और कोई ब्यूरोक्रेट, मेरे अनुभव से कहता हूँ, कोई ब्यूरोक्रेट आपके आड़े नहीं आता है। उसकी क्षमता कम-अधिक होगी, लेकिन अगर आपके पास विज़न है, आपके पास लीडरशिप क्वालिटी है, आपकी स्ट्रेटजी परफेक्ट है, अगर आप टाइम बाउंड काम करते हैं तो आप निश्चित रूप से परिणाम ला सकते हैं। और इसलिए ये कहना कि ब्यूरोक्रेसी काम नहीं करती, सरकारी मुलाजिम काम नहीं करते... छोटे-मोटे काम की शिकायत मैं समझ सकता हूँ, लेकिन कुल मिला कर के अगर गति देनी है तो सब लेवल पर जैसे-जैसे लीडरशिप पनपती जाती है, वो गुड गवर्नेंस की बहुत बड़ी एसेट बन जाती है। तो जितना महत्व इंस्टीट्यूशनलाइजेशन का है उतना ही महत्व लीडरशिप क्वालिटी का भी है। जितना महत्व हम लीडरशिप क्वालिटी को देंगे, उतना मैं समझता हूँ लाभ होगा..! कभी-कभी क्या होता है, जनता और सरकार के बीच खाई पैदा हो जाती है। उस खाई को जितना ज्यादा मिटाएंगे, उतना परिणाम मिलता है और आप देखिए, उससे लाभ मिलता है और इसलिए गुड गवर्नेंस के लिए सबसे बड़ी बात होती है कि वो जनता से हमेशा निकट होना चाहिए, सारी निर्णय प्रक्रिया में जनता जर्नादन का होना बहुत जरूरी होता है। अगर हम जनता जर्नादन को छोड़ कर के, फाइव स्टार एक्टिविस्टों के घेरे में रह कर के, मीडिया कुछ लिख देगा उसके डर में रह कर के निर्णयों को करते जाएंगे, तो हम कभी परिणाम नहीं ला सकते। लेकिन अगर हम एक सुव्यवस्थित रूप से उसका एक मैकेनिज्म डेवलप करें और मैं कहता हूँ कि जनता की भागीदारी अगर बढ़ानी है तो इन्फॉर्म करो, कन्सल्ट करो, कन्सेंट लो और डिसाइड करो। इन अगर चार स्टेजिज पर हम कोई भी निर्णय प्रक्रिया को इस प्रेासेस से निकालते हैं तो आपको परिणाम मिलता है..!

दूसरी एक बात मित्रों, सरकार अगर ये मानती है कि हम सारा खेल कर देंगे... लोकतंत्र में लोक भागीदारी का जो महत्व है, हर पल आपको लोक भागीदारी करनी चाहिए। आप देखिए, हमारे यहाँ सरकार का एक स्वभाव होता है, वे लोग कोई भी निर्णय करते हैं तो बड़ा सीक्रेट रखते हैं। एक डिपार्टमेंट दूसरे डिपार्टमेंट को पता नहीं चलने देता..! कभी-कभी तो एक चेम्बर में बैठा हुआ दूसरी चेम्बर तक को पता नहीं चलने देता, जैसे कोई बड़ा मिरेकल करने वाले हों। और सारे खतरे उसी में होते हैं। हमने गुजरात में सब अलग कर दिया। हमने कहा कि सब कुछ खोल दो भाई, सारे दरवाजे खोल दो, नो सीक्रेसी..! और क्या किया, मान लीजिए हम कोई पॉलिसी ला रहे हैं। पहले क्या करते थे, पॉलिसी लाते थे तो बहुत सीक्रेट रखते थे। अचानक से पॉलिसी आती थी। हमने क्या किया, हम पॉलिसी ड्राफ्ट को ऑनलाइन रखते हैं और लोगों को कहते हैं कि इसमें आपको जो जोड़ना है, तोड़ना है, लिखना है, लिखो..! लोगों के विचार आने लगे। सरकारी मुलाजिम की उतनी कोई विधा होती है ऐसा नहीं होता। उसको जो समझ है, उसने बेचारे ने बनाया, लेकिन लोग जुडते हैं, इन्टरेस्टिड ग्रुप जुड़ते हैं, क्रॉस सेक्शन ऑफ सोसायटी जुड़ती है और उसमें से जो निकलता है तो हमारी कई गलतियाँ दूर हो जाती हैं, कई कमियाँ दूर हो जाती हैं, कई नई-नई चीजें हमको मिलती हैं और उसके बाद जो पॉलिसी हमको मिलती है वो पॉलिसी सर्वग्राही बनती है, सर्वमान्य बनती है, सर्व स्वीकृत बनती है और हमें उसे इम्पलीमेंट करने में कोई तकलीफ नहीं होती है। और इसलिए मित्रों, जनता जर्नादन के साथ जितनी हमारी ओपननेस रहती है, उतना अच्छा रहेता है। दूसरा

मित्रों, जन भागीदारी..! देखिए, जनता पर भरोसा करते हैं तो कितना परिणाम मिलता है। मैं आपको उदारण दूं। 2001 में गुजरात में भयंकर भूंकप आया। गुजरात मौत की चादर ओढे सोया था। हमें रिकंस्ट्रक्शन करना था और दुनिया के अंदर पहली बार गुजरात ने एक नया मॉडल लिया। उस मॉडल में हमने क्या किया, हमने जनता पर भरोसा किया। हमने पहले तय किया गाँव में स्कूल बनाने का, तो हमने गाँव के अंदर स्कूल बनाने की गाँव के लोगों की कमेटियाँ बना दी। कमेटियाँ बना कर के उनको कैसी स्कूल होनी चाहिए उसकी डिजाइन बना कर दे दी। उनकी जो पुरानी स्कूल थी उसमें से क्या रखना, क्या नहीं रखना इसका निर्णय कर दिया। मैटेरियल बैंक बना दिया और गाँव के जो लड़के थे उनको, क्योंकि मैसिव की बहुत जरूरत थी, उनकी ट्रेनिंग की। उनको सुपरविजन के नाते सरकारी एक व्यवस्था कर ली। इंजीनियरिंग के स्टूडेंट को ले आए हम, कि भाई तुम जरा इन छोटे-छोटे कामों का सुपरविजन करो। और हमने जनता को पैसा दिया। मैं आपको बताता हूँ क्या अनुभव आया..! समय से पहले स्कूलों का बांधकाम पूरा हुआ। तीन कमरे सोचे थे तो चार कमरे बनाए। क्वालिटी तो कोई कह नहीं सकता कि सरकारी क्वालिटी है।

मित्रों, उत्तम प्रकार का उन्होंने कन्स्ट्रक्शन किया और इतना ही नहीं, ये करने से जो पैसे बच गए तो वे खुद भूकंप पीड़ित लोग थे, उनके भी घर टूट गए थे, उसके बावजूद भी बचे हुए पैसे सरकार में जमा करवाए..! सलाम करे मित्रों, इन जनता जर्नादन को सलाम करें..! अगर हम लोकतंत्र में उन पर भरोसा करते हैं तो कैसे काम करके देते है उसका उदाहरण है। मित्रों, हमारे यहाँ काम करने के लिए एन.जी.ओ. आए थे, कई सारे फाइव स्टार एक्टिवीस्ट आए, अच्छे एन.जी.ओ. आए, डेडिकेटिड एन.जी.ओ., सब प्रकार के दुनिया भर के लोग हमारे पास आए कि हम काम करना चाहते हैं। ये एन.जी.ओ. ने क्या कहा कि हम मकान बनाएंगे, सरकार का जो फंड है वो हमको देदो..! मित्रों, सरकार ने क्या किया, हमने एन.जी.ओ. को कहा कि तुम जनता पर भरोसा करो यार, वो तुमको अच्छा काम करके देंगे। उन्होंने जनता पर भरोसा नहीं किया। सरकार ने जनता पर भरोसा किया और इसका परिणाम ये आया कि हजारों-लाखों मकान समय से पहले बन गए, काम तेजी से चलने लगा..! अभी हमें यूनाइटेड नेशन का अवार्ड मिला है। किस बात के लिए..? मित्रों, हमने जनता पर भरोसा किया। हमारे यहाँ पानी के डिस्ट्रीब्यूशन की जो व्यवस्था है, तो हमने गाँव की महिलाओं की पानी समिति बनाई और हमने तय किया कि पानी समिति में पुरूष कोई नहीं होगा। क्योंकि पानी का मूल्य क्या होता है वो महिला सबसे ज्यादा जानती है, क्योंकि तीन-तीन किलोमीटर से पानी उठाके लाने के दिन उस बेचारी ने देखे हैं, तो वो उस पानी के मूल्य को बहुत समझती है। तो हमने पूरे गुजरात में पानी समितियाँ बनाई और ‘वास्को’ नाम का हमारा एक काम चालू किया और उसमें पानी वितरित करने का काम बहने करती हैं, पानी का टैक्स कलेक्शन वो करती हैं, कहीं पर टेक्नीकल फॉल्ट आया तो उसे ठीक करने का काम भी वो करती है। मित्रों, इतना परफैक्ट पानी डिस्ट्रिब्यूशन के काम को वो चलाती है, यूनाइटेड नेशन ने उसको अवार्ड दिया है। सरकार ने उन पर भरोसा किया..!

मित्रों, लोक भागीदारी लोकतंत्र में जितनी ज्यादा होती है उतना हमें परिणाम मिलता है। मित्रों, लोक भागीदारी की ताकत क्या होती है..! मैंने अपने मन से एक काम अपने सिर पर लिया हुआ है कन्या शिक्षा का और मैं सरकार तो बड़े मन से चलाता हूँ, लेकिन ये काम में विशेष समय मैं देता हूँ। हर वर्ष मैं 13-14-15 जून 40-45 डिग्री टेंपेरेचर के बीच भी गुजरात के गाँवों में जाता हूँ। घर-घर जा कर के बच्चियों को स्कूल ले जाने का काम करता हूँ। मित्रों, आम तौर पर कोई मुख्य मंत्री, कोई मंत्री किसी गाँव में जाएगा तो आप देखना गाँव वालों को पता चलेगा कि फलाना मंत्री फलानी तारीख को आने वाला है तो गाँव वाले इक्कठे होते हैं, मैमोरेंडम तैयार करते हैं कि क्या-क्या मांगेगे..! मित्रों, मुझे 12 साल हो गए, आपको जानकार के आश्चर्य होगा, मैं गाँव में जाता हूँ, कार्यक्रम में जाता हूँ, मुझे कोई मेमोरेंडम नहीं देता है, लोग मुझे चैक देते हैं मित्रों, आप हैरान होंगे..! सरकार टैक्स कलेक्शन के लिए जाए तो सरकार को लोग टैक्स नहीं देते हैं, मैं एक ऐसा इंसान हूँ जिसको लोग चैक देते हैं..! मोदी जी, आप आए हैं, कन्या शिक्षा के लिए मेरी तरफ से इतना..! अभी इस बार मैं ये 13-14-15 जून को बच्चियों की शिक्षा के लिए गाँव में घूम रहा था, तो एक सज्जन आए, उसने मुझे 51,000 रूपया दिया। मैंने उससे पूछा कि आप क्या करते हो, क्योंकि कोई इक्यावन हजार दान देता है तो कुछ अच्छी ही स्थिति वाला आदमी होगा। मैंने उसको पूछा आप क्या करते हो, तो कहने लगा साब, मैं बस में कन्डक्टर हूँ..! किसी ने कल्पना की है मित्रों, जन भागीदारी की ताकत क्या होती है। एक बस का कंडक्टर इमानदारी से कन्याओं की शिक्षा के लिए जब पूरा राज्य मेहनत कर रहा है तो उसको भी लगता है कि मैं इक्यावन हजार रुपये का चैक मुख्यमंत्री आए हुए हैं उनको दूँ..! ये मेरे रोज के अनुभव हैं, मित्रों..! और इसलिए ये ट्रस्ट एंड ट्रस्टीशिप, ये जन भागीदारी को जितनी मात्रा में हम बढ़ाएंगे, उतनी मात्रा में हम गुड गवर्नेंस को आगे बढ़ा सकते हैं।

मित्रों, कभी-कभी मेरे मन में विचार आता है कि महात्मा गांधी ये रामराज्य की बात क्यों करते थे, उन्होंने तो देखा नहीं था..! लेकिनहमारे देश में जो सेक्यूलरिज्म के ठेकेदार हैं उनका बड़ा प्रोब्लम है, वो वही चीज समझते हैं जो उनको समझनी हो, वही चीज सुनते हैं जो उनको सुननी हो..! एक बार ट्रेन में एक महात्मा जा रहे थे, उसी ट्रेन में एक मौलवी थे, उसी ट्रेन में एक भी पहलवान था। तीनों ऐसे ही एक ट्रेन में सफर कर रहे थे और बातें चली तो महात्मा जी ने कहा कि देखिए, ये ट्रेन जो चल रही है उसकी आवाज में भी ईश्वर स्मरण हो रहा है। तो मौलवी ने पूछा कि कैसे? तो बोले, मुझे तो सुनाई दे रहा है ‘राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है’..! मुझे ऐसा सुनाई दे रहा है। तो मौलवी ने कहा अच्छा, तो मौलवी ने थोड़ा ट्रेन की आवाज में कान लगाया। तो बोला मुझे दूसरा सुनाई दे रहा है, ‘या अल्लाह वाह तेरी कुदरत, या अल्लाह वाह तेरी कुदरत’..! तो वो पहलवान वहाँ बैठा था उसने कहा मुझे भी सुनाई दे रहा है। तो बोले क्या? ‘कर कसरत खा रबड़ी, कर कसरत खा रबड़ी’..! ट्रेन वही, ट्रेन की आवाज वही, लेकिन एक को एक सुनाई देता है, दूसरे को दूसरा सुनाई देता है क्योंकि उसके मन का रिसिविंग सेंटर वो होता है..! तो मैं ये जो बोल रहा हूँ, हमारे सेक्यूलरिज्म के ठेकेदारों को वही सुनाई देगा जो उन्होंने जिंदगी भर सुनने की आदत डाली है। महात्मा गांधी रामराज्य की बात करते थे। सेक्यूलरों ने अब क्या किया, राम का राज्य..! महात्मा गांधी ने राम का राज्य नहीं कहा है, महात्मा गांधी ने रामराज्य की बात की है और मित्रों, गुड गवर्नेंस की बात करते हैं तब मैं कहूंगा कि एक बार इस रामराज्य की कल्पना क्या है उसका अध्ययन करने की मैं आप सबको रिक्वेस्ट करता हूँ। गांधी को ये बात कहाँ से सूझी होगी..! और कुछ लोगों को लगता है कि रामराज्य की बात करना मतलब सेक्यूलरिज्म खतरे में, अब सेक्यूलरिज्म संकट में आ गया..! मित्रों, मैं कल देख रहा था। अभी-अभी हमारे प्रधानमंत्री जो बातें बोलते हैं, न्यूट्रीशियन की बात बोलते हैं, बाल मृत्यु दर की बात बोलते हैं, आई.एम.आर., एम.एम.आर., सब बात बोलते हैं..! इन दिनों आप ये सब पॉपूलर टर्मिनोलॉजी सुनते हो। आप देखिए, रामायण में क्या बातें हैं और एक शासन कैसा हो उसका क्या उदाहरण है..! रामायण में लिखा है मित्रों, राम राज बैठे त्रिलोका, हर्षित भये गए सब सोका। बयरू न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई..! मित्रों, आज सब कहते हैं कि कोई भेद-भाव नहीं होना चाहिए, शासन कैसा होना चाहिए। मित्रों, इसका मतलब क्या होता है, ऐसा शासन जिसमें विषमता ना हो, ऊंच-नीच ना हो, गरीब और अमीर के बीच भेदभाव ना हो, ऐसा शासन होना चाहिए, ये रामराज्य की परिकल्पना है..! अब मुझे बताइए कि ऐसा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए..? और यदि ऐसा हो तो उसे रामराज्य कहना कोई कॉम्यूनल है क्या..? इतना ही नहीं मित्रों, उन्होंने एक जगह पर बड़ा मजेदार कहा है। आज जो चर्चा होती है ना माल न्यूट्रीशियन की, दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा। सब नर करही परस्पर प्रीति, चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति..! शासन में, समाज में ऐसी अवस्था होनी चाहिए कि जनता जनार्दन के बीच परस्पर प्रेम का माहौल हो, एक-दूसरे के प्रति दुर्भावना का, जैलेसी का माहोल नहीं होना चाहिए। आगे उन्होंने कहा है, चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति..! हर एक को अपने धर्म का पालन करना चाहिए। धर्म का मतलब हमारे यहाँ ड्यूटी है, शिक्षक धर्म का पालन करो, मातृ धर्म का पालन करो, पितृ धर्म का पालन करो, रिक्षा ड्राइवर के धर्म का पालन करो... ये हमारे यहाँ चलता है। अगर आप अपनी जो जिम्मेवारी है, अपनी जो डयूटी है, उसका अगर पालन करोगे तो हर एक के सुख की उसमें गारंटी है, ये रामराज्य में कहा है। माता मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर के लिए रामराज्य में कहा गया है, मित्रों। महात्मा गांधी को रामराज्य क्यों पसंद आया था..? आज भी हमारे यहाँ माता मृत्यु दर की चर्चा होती है। उन्होंने कहा था, अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा, सब सुंदर सब बिरुज शरीरा..!अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा। बालकों, माताओं के आरोग्य के प्रति चिंता करने वाली शासन व्यवस्था होनी चाहिए और समाज की व्यवस्था आरोग्यप्रद होनी चाहिए। आगे उन्होंने कहा, सब सुंदर सब बिरूज शरीरा। सभी निरोगी और बलशाली हो और शरीर सुंदर, सौष्ठव वाला हो, ऐसे समाज की रचना करने का काम शासन का और शासन व्यवस्था का होना चाहिए।

शिक्षा के संबंध में रामराज्य में क्या कहा था..! मैं सारा ह्यूमन डेवलपमेंट इन्डेक्स का ही बोल रहा हूँ और किसी चीज को हाथ नहीं लगाया है। आज जो पश्चिम की दुनिया एच.डी.आई. की बात करती है, उस एच.डी.आई. की बात मैं आपको समझाना चाहता हूँ। रामराज्य में कहा है, सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी..! हमारे यहाँ तो सिर्फ क्या कहते हैं कि सबको अक्षर ज्ञान दो, पढ़ना-लिखना आता हो..! रामराज्य में क्या कहा था, सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी..! शिक्षा पर इतना भार था कि हर नागरिक पंडित बनना चाहिए, वहाँ तक उसकी शिक्षा होनी चाहिए, नर हो या नारी हो..! आप कल्पना कर सकते हो। आज समाज में जो सो कॉल्ड ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की चर्चा होती है, उसके जो मूलभूत आधार हैं वो रामराज्य में पूरी परिभाषा तुलसीदास ने उस जमाने में की हुई है, मित्रों..! और तभी मुझे लगता है कि महात्मा गांधी के मन में ये जो कल्पना आई थी, ये कल्पना का कारण भी यही था और इसी के कारण महात्मा गांधी ने ये कहा था..! मित्रों, कुछ बातें हैं जो गवर्नेंस में रिफार्म होनी चाहिए, ये मैं आज आग्रह से कहना चाहता हूँ। मित्रों, आज शासन की व्यवस्था कैसी है..? आज शासन व्यवस्था ऐसी है कि आप कुछ करो और गलती हो जाए तो इसका तो हिसाब मांगा जाता है, लेकिन कुछ ना करो तो गलती ध्यान में ही नहीं आती है, तो आपसे कोई हिसाब ही नहीं मांगेगा। देखिए, ये गुड गवर्नेंस के सामने कौन सी रुकावटें हैं, और उसे रिफार्म करने की आवश्यकता है। और इसलिए मैं कहता हूँ, इन गवर्नमेंट टू डे, देयर इज ओन्ली अकाउन्टीबिलीटी ऑफ कमीशन, नो अकाउन्टीबिलिटी ऑफ ओमीशन, वी विल हैव टू चेंज दिस..! इतना ही नहीं मित्रों, आज कल सरकार क्या कर रही है..? कानून बनाती है, एक्ट..! मैंने बीच में कहा था कि हमें तुम्हारे एक्ट नहीं, एक्शन चाहिए..!

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यूपी के विकास की नई लाइफ लाइन बनेगा गंगा एक्सप्रेसवे: हरदोई में पीएम मोदी
April 29, 2026
यह परिवर्तनकारी अवसंरचना परियोजना उत्तर प्रदेश में कनेक्टिविटी को बढ़ाएगी और विकास को गति देगी : प्रधानमंत्री
जैसे मां गंगा हजारों वर्षों से उत्तर प्रदेश और इस देश की जीवनरेखा रही है, वैसे ही आधुनिक प्रगति के इस युग में उनके पास से गुजरने वाला यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के विकास की नई जीवनरेखा बनेगा : प्रधानमंत्री
हाल ही में, मुझे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे को राष्ट्र को समर्पित करने का अवसर मिला : प्रधानमंत्री
मैंने तब कहा था कि ये उभरते एक्सप्रेसवे विकासशील भारत के भाग्य को आकार देने वाली जीवनरेखाएं हैं और ये आधुनिक मार्ग आज भारत के उज्ज्वल भविष्य का संकेत दे रहे हैं : प्रधानमंत्री
गंगा एक्सप्रेसवे न केवल उत्तर प्रदेश के एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ेगा, बल्कि यह एनसीआर की असीम संभावनाओं को भी करीब लाएगा : प्रधानमंत्री

भारत माता की जय।

गंगा मइया की जय।

गंगा मइया की जय।

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, यहां के मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, बृजेश जी पाठक, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगी जितिन प्रसाद जी, पंकज चौधरी जी, यूपी सरकार के मंत्रीगण, सांसद और विधायकगण, अन्य जनप्रतिनिधि और विशाल संख्या में पधारे हुए मेरे प्यारे भाइयों और बहनों।

सर्वप्रथम, मैं भगवान नरसिंह की इस पुण्य भूमि को प्रणाम करता हूं। यहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर मां गंगा कृपा बहाती हुई गुजरती है। इसलिए, ये पूरा क्षेत्र ही तीर्थ से कम नहीं है। और मैं मानता हूं यूपी को एक्सप्रेसवे का ये वरदान, ये भी मां गंगा का ही आशीर्वाद है। अब आप कुछ ही घंटों में संगम भी पहुंच सकते हैं, और काशी में बाबा के दर्शन करके भी वापस आ सकते हैं।

साथियों,

जैसे मां गंगा हजारों वर्षों से यूपी की और इस देश की जीवन रेखा रही है, वैसे ही आधुनिक प्रगति के इस दौर में, उनके समीप से गुजरता ये एक्सप्रेसवे, ये यूपी के विकास की नई लाइफ लाइन बनेगा। ये भी अद्भुत संयोग है कि पिछले चार-पांच दिनों में, मैं मां गंगा के सानिध्य में ही रहा हूं। 24 अप्रैल को मैं जब बंगाल में था, तो मां गंगा के दर्शन किए थे, और फिर कल तो मैं काशी में था। आज सुबह ही फिर बाबा विश्वनाथ, मां अन्नपूर्णा और मां गंगा के दर्शन करने का सौभाग्य मिला है। और अब मां गंगा के नाम पर बने इस एक्सप्रेसवे के लोकार्पण का अवसर मिला है। मुझे खुशी है कि यूपी सरकार ने इस एक्सप्रेसवे का नाम मां गंगा के नाम पर रखा है। इसमें विकास का हमारा विजन भी झलकता है, और हमारी विरासत के भी दर्शन होते हैं। मैं यूपी के करोड़ों लोगों को गंगा एक्सप्रेसवे की बधाई देता हूं।

साथियों,

आज लोकतंत्र के उत्सव का भी एक अहम दिन है। बंगाल में इस समय दूसरे चरण का मतदान हो रहा है, और जो खबरें आ रही हैं, उनसे पता चलता है कि बंगाल में भारी मतदान हो रहा है। पहले चरण की तरह ही जनता वोट देने के लिए बड़ी संख्या में घरों से निकल रही हैं, लंबी-लंबी का कतारों की तस्वीरें सोशल मीडिया में छाई हुई हैं। पिछले 6-7 दशक में जो नहीं हुआ, जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी, वैसे निर्भीक वातावरण में बंगाल में इस बार वोटिंग हो रही है। लोग भय मुक्त होकर वोट दे रहे हैं। ये देश के संविधान और देश के मजबूत होते लोकतंत्र का पुण्य प्रतीक है। मैं बंगाल की महान जनता का आभार व्यक्त करता हूं कि वो अपने अधिकार के प्रति इतनी सजग है, बड़ी संख्या में वोटिंग कर रही है। अभी वोटिंग खत्म होने में कई घंटे बाकी हैं, मैं बंगाल के जनता से आग्रह करूंगा कि लोकतंत्र के इस पर्व में ऐसे ही उत्साह से भाग लें।

साथियों,

कुछ समय पहले जब बिहार में चुनाव हुए, तो बीजेपी एनडीए ने प्रचंड जीत दर्ज की थी, एक इतिहास रच दिया था। अभी-अभी कल ही गुजरात में महा नगरपालिका, नगर पालिका, जिला पंचायतें, नगर पंचायतें, तहसील पंचायत, इन सबके चुनाव के नतीजे आए हैं। और आप मेरे उत्तरप्रदेश वासियों को खुशी होगी, 80 से 85 प्रतिशत नगर पालिका और पंचायतों को भाजपा ने जीत ली है। और मुझे विश्वास है कि इन पांच राज्यों के चुनाव में भी भाजपा ऐतिहासिक जीत की हैट्रिक लगाने जा रही है। 4 मई के नतीजे, विकसित भारत के संकल्प को मजबूत करेंगे, देश के विकास की गति को नई ऊर्जा से भरेंगे।

साथियों,

देश के तेज विकास के लिए हमें तेजी से आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का भी निर्माण करना है। दिसम्बर 2021 में गंगा एक्सप्रेसवे का शिलान्यास करने मैं शाहजहाँपुर आया था। अभी 5 साल से भी कम समय हुआ है, और आप देखिए, देश के सबसे बड़े एक्सप्रेसवेज में शुमार यूपी का सबसे लंबा ग्रीन कॉरिडॉर एक्सप्रेसवे, ये 5 साल के भीतर-भीतर बनकर तैयार हो गया है। आज

हरदोई से इसका लोकार्पण भी हो रहा है। यही नहीं, एक ओर गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण पूरा हुआ है, तो साथ ही, इसके विस्तार की योजना पर काम भी शुरू हो गया है। जल्द ही, गंगा एक्सप्रेसवे, मेरठ से आगे बढ़कर हरिद्वार तक पहुंचेगा। इसके और बेहतर उपयोग के लिए फ़र्रुख़ाबाद लिंक एक्सप्रेसवे का निर्माण कर, इसे अन्य एक्सप्रेसवे से भी जोड़ा जाएगा। ये है, डबल इंजन सरकार का विजन! ये है भाजपा सरकार के काम करने की स्पीड! ये है, भाजपा सरकार के काम का तरीका!

भाइयों-बहनों,

कुछ ही दिन पहले मुझे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के लोकार्पण का अवसर मिला था। तब मैंने कहा था कि ये नए बनते एक्सप्रेसवे, विकसित होते भारत की हस्तरेखाएं हैं और ये आधुनिक हस्तरेखाएं, आज भारत के उज्ज्वल भविष्य का जयघोष कर रही हैं।

साथियों

अब वो दौर चला गया, जब एक सड़क के लिए दशकों तक इंतज़ार करना पड़ता था! एक बार घोषणा हो गई, तो वर्षों तक फाइलें चलतीं थीं! चुनाव के लिए पत्थर लग जाता था, उसके बाद सरकारें आती रहतीं थीं, जाती रहतीं थीं, लेकिन, काम का कुछ अता-पता नहीं लगता था। कभी-कभी तो पुराने फाइलें ढूंढने के लिए बड़े-बड़े अफसरों को दो-दो साल तक मेहनत करनी पड़ती थी। डबल इंजन सरकार में शिलान्यास भी होता है, और तय समय में लोकार्पण भी होकर के रहता है। इसलिए ही, आज यूपी के एक्सप्रेसवेज़ से भी ज्यादा रफ्तार अगर कहीं है, तो वो यूपी के विकास की रफ्तार ही है।

साथियों,

ये एक्सप्रेसवे केवल एक हाइस्पीड सड़क नहीं है। ये नई संभावनाओं का, नए सपनों का, नए अवसरों का गेटवे है। गंगा एक्सप्रेसवे करीब 600 किलोमीटर लंबा है। पश्चिमी यूपी में मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, सम्भल और बदायूँ। मध्य यूपी में शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली। पूर्वी यूपी में प्रतापगढ़ और प्रयागराज, इनके आस पास के दूसरे जिले, गंगा एक्सप्रेसवे, इससे इन इलाकों के करोड़ों लोगों का जीवन बदलेगा।

साथियों,

इन क्षेत्रों को गंगा जी और उनकी सहायक नदियों की उपजाऊ मिट्टी का वरदान मिला है। लेकिन, पहले की सरकारों ने जिस तरह किसानों की उपेक्षा की, उसके कारण किसान परेशानियों में ही घिरकर के रह गए! यहाँ के किसानों की फसलें बड़े बाज़ारों तक नहीं पहुँच पाती थीं। कोल्ड स्टोरेज की कमी थी। लॉजिस्टिक्स का अभाव था। किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलता था। अब उन कठिनाइयों का समाधान भी तेजी से होगा। गंगा एक्सप्रेसवे से कम समय में बड़े बाज़ारों तक पहुँच मिलेगी। यहाँ खेती के लिए जरूरी इनफ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा। इससे हमारे किसानों की आय बढ़ेगी।

साथियों,

गंगा एक्सप्रेसवे यूपी के एक छोर को दूसरे छोर से तो जोड़ता ही है। ये NCR की असीम संभावनाओं को भी करीब लाएगा। गंगा एक्सप्रेसवे पर गाड़ियाँ तो दौड़ेंगी ही, इसके किनारे नए औद्योगिक अवसर विकसित होंगे। इसके लिए हरदोई जैसे दूसरे जिलों में इंडस्ट्रियल कॉरिडॉर विकसित किए जा रहे हैं। इससे हरदोई, शाहजहाँपुर, उन्नाव समेत सभी 12 जनपदों में नए उद्योग आएंगे। अलग-अलग सेक्टर्स जैसे फार्मा, टेक्सटाइल आदि के क्लस्टर्स विकसित होंगे। युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार होंगे।

साथियों,

हमारे ये युवा मुद्रा योजना और ODOP जैसी योजनाओं, उसकी ताकत से खुद भी नए-नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैं। यहाँ छोटे उद्योग, MSMEs को बढ़ावा मिल रहा है। बेहतर कनेक्टिविटी की सुविधा से उनके लिए भी नए रास्ते खुलेंगे। मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री, संभल का handicraft, बुलंदशहर के सिरेमिक, हरदोई का हैंडलूम, उन्नाव का लेदर, प्रतापगढ़ के आंवला प्रॉडक्ट्स, ये सब बड़े स्केल में देश दुनिया के मार्केट में पहुंचेगे। लाखों परिवारों की इससे आमदनी बढ़ेगी। आप मुझे बताइए, क्या पुरानी सपा सरकार में हरदोई, उन्नाव जैसे जिलों में इंडस्ट्रियल कॉरिडॉर बनाने की कल्पना तक हो सकती थी क्या? हमारे हरदोई से भी एक्सप्रेसवे गुजरेगा, ये कोई सोच सकता था क्या कभी? ये काम केवल भाजपा सरकार में ही संभव है।

साथियों,

पहले यूपी को पिछड़ा और बीमारू प्रदेश कहा जाता था। वही उत्तर प्रदेश, आज 1 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनने के लिए आगे बढ़ रहा है। ये एक बहुत बड़ा लक्ष्य है। लेकिन, इसके पीछे उतनी ही बड़ी तैयारी भी है। क्योंकि, यूपी के पास इतनी असीम क्षमता है। देश की इतनी बड़ी युवा आबादी का potential यूपी के पास है। इस ताकत का इस्तेमाल हम यूपी को manufacturing हब बनाने के लिए कर रहे हैं। यूपी में नए उद्योग और कारखाने लगेंगे, यहाँ जब बड़ी मात्रा में निवेश आएगा, तभी यहाँ आर्थिक प्रगति के दरवाजे खुलेंगे, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

भाइयों-बहनों,

इसी विज़न को केंद्र में रखकर बीते वर्षों में लगातार काम हुआ है। आप सब खुद भी महसूस कर रहे हैं, जिस यूपी की पहचान पहले पलायन से होती थी, आज उसे इन्वेस्टर्स समिट और इंडस्ट्रियल कॉरिडॉर के लिए जाना जा रहा है। यूपी की इन्वेस्टर समिट में देश और दुनिया से कंपनियाँ आतीं हैं। यूपी में हजारों करोड़ रुपए का निवेश हो रहा है। आज अगर भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता है तो, उसमें बहुत बड़ा योगदान यूपी का है। आज भारत जितने मोबाइल बना रहा है, उसमें आधे मोबाइल हमारे यूपी में बन रहे हैं। अभी कुछ ही हफ्ते पहले, मैंने नोएडा में सेमीकंडक्टर प्लांट का शिलान्यास भी किया है।

साथियों,

आप सब जानते हैं, AI के इस दौर में, सेमीकंडक्टर कितनी बड़ी फील्ड बनती जा रही है। यूपी उसमें भी लीड लेने के लिए आगे बढ़ रहा है। भविष्य में असीम अवसरों वाला बहुत बड़ा क्षेत्र

यूपी के लोगों के लिए खुल रहा है।

साथियों,

उत्तर प्रदेश का औद्योगिक विकास आज भारत की सामरिक ताकत भी बन रहा है। आज देश के दो डिफेंस कॉरिडॉर्स में से एक यूपी में है। बड़ी-बड़ी डिफेंस कंपनियाँ यहाँ अपनी फ़ैक्टरी लगा रहीं हैं। ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें, जिनका लोहा दुनिया मानती है, आज वो यूपी में बन रहीं हैं। रक्षा उपकरणों के निर्माण में जो छोटे-छोटे पार्ट्स चाहिए होते हैं, उनकी सप्लाइ के लिए MSMEs को काम मिलता है। इसका बहुत बड़ा लाभ उत्तर प्रदेश के MSME सेक्टर को हो रहा है। छोटे-छोटे जिलों में भी अब युवा बड़े-बड़े उद्योगों से जुड़ने का सपना देख सकते हैं।

साथियों,

आज उत्तर प्रदेश इतनी तेज गति से विकास कर रहा है, क्योंकि, यूपी ने पुरानी सियासत को भी बदला है, और नई पहचान भी बनाई है। आप याद करिए, एक समय यूपी की पहचान गड्ढों से होती थी। आज वही यूपी, देश में सबसे ज्यादा एक्सप्रेसवेज वाला प्रदेश बन चुका है। पहले यहाँ पड़ोस के जिले तक जाना भी बड़ा मुश्किल था। लेकिन आज उत्तर प्रदेश में 21 एयरपोर्ट हैं, 5 इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं। अब तो नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी हो चुका है। गंगा एक्सप्रेसवे से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट कुछ ही घंटों की दूरी पर है।

भाइयों-बहनों,

हमारा उत्तर प्रदेश भगवान राम और भगवान कृष्ण की धरती है। लेकिन, पिछली सरकारों ने अपनी करतूतों के कारण अपराध और जंगलराज को यूपी की पहचान बना दिया था। यूपी के माफियाओं पर फिल्में बनतीं थीं। लेकिन, अब यूपी की कानून व्यवस्था का देश भर में उदाहरण दिया जाता है।

भाइयों बहनों,

संसाधनों का बंदरबाँट करने वाले जिन सपाइयों के हाथ से सत्ता गई है, उन्हें यूपी की ये प्रगति

पसंद नहीं आ रही है। वो एक बार फिर यूपी को पुराने दौर में धकेलना चाहते हैं। वो एक बार फिर, समाज को बांटना और तोड़ना चाहते हैं।

साथियों,

समाजवादी पार्टी विकास विरोधी भी है और नारी विरोधी भी है। अभी बीते दिनों देश ने एक बार फिर सपा और काँग्रेस जैसी पार्टियों का असली चेहरा देखा है। केंद्र की NDA सरकार संसद में नारीशक्ति वंदन संशोधन लेकर आई थी। अगर ये संशोधन पास हो जाता, तो, साल 2029 के चुनाव से ही महिलाओं को विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण मिलता! बड़ी संख्या में हमारी माताएँ बहनें सांसद विधायक बनकर दिल्ली-लखनऊ पहुँचती। वो भी, किसी और वर्ग की सीटें कम हुये बिना! लेकिन, सपा ने इस संशोधन बिल के खिलाफ वोट किया।

साथियों,

इस बिल से सभी राज्यों की सीटें भी बढ़तीं। हमने संसद में साफ साफ कहा था, सभी राज्यों की सीटें एक ही अनुपात में बढ़ेंगी। लेकिन यूपी को गाली देकर पॉलिटिक्स करने वाली DMK जैसी पार्टियां, उन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि यूपी की सीटें क्यों बढ़ेंगी? आप देखिए, समाजवादी पार्टी संसद में उन्हीं के सुर में सुर मिला रही थी। ये सपा वाले यहाँ से आपके वोट लेकर संसद जाते हैं, और, संसद में यूपी के लोगों को गाली देने वालों के साथ खड़े होते हैं। इसीलिए, यूपी के लोग कहते हैं, समाजवादी पार्टी कभी सुधर नहीं सकती है। ये लोग हमेशा महिला विरोधी राजनीति ही करेंगे। ये हमेशा तुष्टीकरण और अपराधियों के साथ खड़े होंगे। सपा कभी भी परिवारवाद और जातिवाद से ऊपर नहीं उठ सकती। ये लोग हमेशा विकास विरोधी राजनीति ही करेंगे। यूपी को सपा और उसके सहयोगियों से सावधान रहना है।

साथियों,

आज देश एक ही संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है- विकसित भारत का संकल्प! इस संकल्प को पूरा करने में उत्तर प्रदेश की बहुत बड़ी भूमिका है। आप सब देख रहे हैं, आज पूरी दुनिया कैसे

युद्ध, अशांति और अस्थिरता में फंसी हुई है। दुनिया के बड़े-बड़े देशों में हालात खराब हैं। लेकिन, भारत विकास के रास्ते पर उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। बाहर के दुश्मनों को ये पसंद नहीं आ रहा। भीतर बैठे कुछ लोग भी सत्ता की भूख में भारत को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे हैं। फिर भी, हम न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि, विकास के नए-नए कीर्तिमान भी गढ़ रहे हैं। हम आत्मनिर्भर भारत अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। हम आधुनिक से आधुनिक इनफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे हैं। गंगा एक्सप्रेसवे इसी दिशा में एक और मजबूत कदम है। मुझे विश्वास है, गंगा एक्सप्रेसवे, जिन संभावनाओं को हमारे दरवाजे तक लेकर आएगा, यूपी के लोग अपने परिश्रम और अपनी प्रतिभा से उन्हें साकार करके रहेंगे। इसी संकल्प के साथ, आप सभी को एक बार बहुत-बहुत बधाई। बहुत-बहुत धन्यवाद!

भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

वंदे मातरम।

वंदे मातरम।

वंदे मातरम।

वंदे मातरम।

वंदे मातरम।

बहुत-बहुत धन्यवाद!