अहमदाबाद

दि. २१/१२/२०११

 

सार्वजनिक अनुशासन के कार्यक्रम में विलंब से आया इसके बदले मैं आप सब से क्षमा चाहता हूँ और भाई राजीव गुप्ता को विश्वास दिलाता हूँ कि आपके पुस्तक के प्रकाशन के समाचार कल जरूर छ्पेंगे और प्रकाशक को भी विश्वास देता हूँ कि आपको किसी भी तरह के निजी खर्च के बग़ैर पब्लिसिटी मिलेगी। कारण, पुस्तक सार्वजनिक शिस्त का हो और मुख्यमंत्री ही अशिस्त करे तो वह चौखटा बने ही और सम्भव है कि विनोदभाई को अगले सप्ताह कुछ मसाला मिल जाए। मित्रों, मैं सुबह बिल्कुल अनुशासित ढंग में शुरु करता हूँ लेकिन मिलने आने वाले, काम लेकर आने वाले, महज दो-चार मिनट भी ज़्यादा लें तो शाम होते होते समय का पालन करना मुश्किल हो जाता है। इसके परिणाम आप सबको इंतज़ार करना पडा और कारण कितने भी हों लेकिन सच्चाई यही है कि मैं देरी से आया।

कई बार एक विचार मेरे मन में आता है कि भाई, एक विषय में, वेस्टर्न वर्ल्ड और हमारे लोगों में कहाँ फर्क पाया जाता है? उदा. हाइजीन, पर्सनल हाइजीन और सोशल हाइजीन। हमारे यहाँ ऐसे संस्कार हैं और ऐसी परम्पराएं रही हैं कि व्यक्तिगत और स्वास्थ्य के मामलों में बहुत जागरूकता हमारे सामाजिक जीवन के भीतर पडी हैं। कुछ चीज़ों को छूने का नहीं, कुछ चीज़ों को लेने का नहीं, भोजन के समय ऐसा करने का... इतने सारे नियमों को घर के अंदर हम सबने देखे हैं। पानी के उपयोग की बाबत में भी नियम देखे हैं, बर्तन के उपयोग के संबंध में... हर घर में इस प्रकार के नियम होते ही हैं और सदियों से यह परम्पराएं विकसित हुई हैं। स्नान करने का, रेग्युलर करने का... यह सारी चीज़ों का आग्रह, पर्सनल हाइजीन के मामलों में, हमारे यहाँ बिलकुल जन्मगत है। लेकिन सोशल हाइजीन के मामले में? कचरा कहीं भी फेंकना... उसमें हम जागरूक नहीं हैं। जब कि वेस्टर्न वर्ल्ड में? ज़रूरी नहीं है कि ऑफिस नहाकर जाना चाहिए और ज्यादातर लोग वहाँ शाम को आकर स्नान करते हैं। हमारे यहाँ स्नान, पूजा-पाठ करके कोई पवित्र काम करने जाना हो ऐसे तैयार होते हैं। मैं यहाँ कोई पश्चिम की आलोचना करने नहीं आया हूँ, बात को समझने के लिए उपयोग कर रहा हूँ। लेकिन सोशल हाइजीन में, सब नियमों का पालन करते हैं और इसके कारण यह स्वच्छता, कुछ बाबतों और इनके नॉर्म्स हमें सीखने जैसे लगें। अब अगर इन दोनों का कॉम्बिनेशन हो तो पर्सनल हाइजीन और सोशल हाइजीन दोनों की सुरक्षा बनी रहे।

जैसे यह एक बाबत है, वैसे ही यह शिस्त की बाबत है। हमारे यहाँ व्यक्तिगत जीवन के अंदर कितनी ही शिस्त क्यों न हो, लेकिन समूह में हम बिल्कुल अलग होते हैं। अभी मैं दो दिन पहले सूरत में था, मेरा सदभावना मिशन का कार्यक्रम चल रहा था। वहाँ सामने एक दूसरा कार्यक्रम चल रहा था। उनका यह रिवाज है, आज भी कुछ पैरेलल किसी पुस्तक का विमोचन हो रहा होगा... विजय, आपको कहता हूँ, लेकिन शायद किसी ने नहीं रखा होगा। वहाँ एक मंत्रीश्री के जन्मदिन की कुछ ४७ किलो की केक थी और उसकी लूट-मार के द्रश्य देखे टी.वी. पर, तो मुझे लगा कि अरे, यह जन्मदिन के साथ ऐसा? कारण क्या? यदि थोड़ा सा भी सार्वजनिक अनुशासन का अभाव न होता, तो वह द्रश्य कितना उत्तम होता और कितना गौरवपूर्ण होता, लेकिन वही घटना ने कैसा विचित्र रूप धारण कर लिया। हमारे यहाँ जहाँ धार्मिक मामले होते हैं वहाँ की विशेषता देखें। बहुत कम मंदिर होंगे जहाँ ‘जूते यहाँ उतारें’ ऐसा लिखा होगा, बहुत कम मंदिर होंगे। ज़माने के बदलने के साथ अब ऐसा लिखना पडता है, जैसे आज से ५० साल पहले, ‘शुद्ध घी की दुकान’ ऐसा बोर्ड मैंने तो नहीं पढ़ा था! ५० साल पहले हमारे यहाँ ऐसा नहीं था, लेकिन आज लिखना पडता है, ‘शुद्ध घी की दुकान’, क्योंकि बाजार में दूसरा अवेलेबल है। तो, ‘जूते यहाँ उतारें’ ऐसा कभी लिखना नहीं पडता था और अब स्थिति बदल चुकी है। वह जो था उसका कारण, संस्कार। कोई नोर्म्स लिखे नहीं थे। आप विचार करो कि हमारे यहाँ कुंभ का मेला होता है, उस कुंभ के मेलें में हर रोज़ गंगा के किनारे एक पूरा ऑस्ट्रेलिया इकठ्ठा होता है, आप विचार करो..! और फिर भी कोई बड़ी कैआटिक घटनाएं हमारे सुनने में नहीं आती हैं। और इसके मूल में वह जो धर्म-तत्व पड़ा है, जो कुछ उसे खींचता है, जो कुछ उसे बांधता है, उसे कहीं जोड़ता है और इसके कारण उस समग्र व्यवस्था में व्यवस्थापक कैटलिक एजेंट होते हैं, समाज स्वयं ही व्यवस्था का वहन करता है। और जहाँ व्यवस्था का वहन करने का सामर्थ्य हो, वहाँ व्यवस्था अपने आप फैलती है, अपने आप विकसित होती है। उसका स्केल कितना भी बड़ा हो, वह व्यवस्था विकसित होती जाती है, फैलती जाती है।

हमारे समाज जीवन के अंदर, कई बार हम कहते हैं कि दुनिया के अनेक देश जो हमारे बाद आजाद हुए, फिर भी आगे निकल गए। तो कारण क्या है? मुख्य कारण लगभग यही आता है कि एक समाज के रूप में उनमें डिसीप्लिन है। अभी मुझे एक मित्र मिले, वह जापान जा कर आये थे। अमीर परिवार के थे तो वहाँ की महंगी से महंगी होटेल के स्वीट में उनका बुकिंग था। लेकिन वहाँ सूचना थी कि २६ डिग्री टेम्परेचर से ज़्यादा रूम ठंडा नहीं हो सकेगा, कितना भी पेमेन्ट दो फिर भी यह नहीं होगा। क्यों? तो कहा कि सुनामी और अर्थक्वेक के बाद हमारे वहाँ पावर जनरेशन की जो समस्या खड़ी हुई है इसलिए एक राष्ट्र के रूप में हमने निर्णय लिया है कि सबको एनर्जी कन्सर्वेशन करने का। और इसके लिए २६ डिग्री से नीचे टेम्परेचर ले जाने के लिए किसी भी प्रकार से ऊर्जा का उपयोग नहीं करने का, इसलिए आपको २६ डिग्री में ही रहना होगा। और पूरा जापान इसका अमल करता है, मैं यह हाल ही की सुनामी के बाद की घटना कह रहा हूँ। हमारे यहाँ अगर गल्ती से भी ऐसा कोई निर्णय करें तो क्या हो उसकी आप कल्पना कर सकते हैं, साहब..! बाकी सारे समाचार गौण बन जाए, यही हेड्लाइन हो। काले झंडे, मोर्चे इसीके कार्यक्रम चलते हों। कारण? एक समाज के रूप में अनुशासन तभी आता है, जब एक समाज के रूप में जिम्मेदारी का तत्व प्रमुख होता है। सोशल रिस्पाँन्सबिलिटी के बग़ैर सोशल डिसप्लिन किसी को आवश्यक ही नहीं लगेगी और इसलिए सामाजिक जिम्मेदारी का वातावरण बनाना पडे। दुर्भाग्य से, देश आजाद होने के बाद हमारे यहाँ अधिकार के तत्व को महत्त्व ज्यादा मिला। देश आजाद हुआ तब तक पूरे देश का वातावरण था, फ़र्ज का। देशसेवा करना हमारा फ़र्ज है, स्वदेशी हमारा फ़र्ज है, शिक्षा हमारा फ़र्ज है, खादी पहनना हमारा फ़र्ज है। गांधीजी ने जब लोगों के मन में बिठा दिया था कि यह सब तो हमारे फ़र्ज का एक भाग है, हमें देश को आजाद कराना है। लेकिन, देश आजाद हो जाने के बाद हमें ऐसा लगा कि अब तो फ़र्जों का काल समाप्त हो गया है, अब तो अधिकारों का काल है। और इसके कारण हमारी पूरी सोच अधिकार के आसपास है और इसके कारण परिणाम यह हुआ है कि हर चीज़ में ‘मेरा क्या?’ हमारी पूरी रचना ही ऐसी बनी है कि कुछ भी हो, पहला सवाल उठता है मन में कि ‘मेरा क्या?’ और ‘मेरा क्या?’ का अगर पॉज़िटिव जवाब नहीं मिलता है, तो तुरंत ही मन जवाब देता है कि ‘तो फिर मुझे क्या?’। जब तक ‘मेरा क्या?’ का उत्तर मिलने वाला है, तब तक उसे धीरज है, लेकिन जिस दिन नकारात्मक उत्तर मिल गया, उसी पल उसकी आत्मा कह उठती है, “मुझे क्या? फोड़ो भाई, आपका है, करना...” और यही अशिस्त को जन्म देता है।

शिस्त कोई आपके बोलने-चालने का, डिसीप्लिन के दायरे का विषय नहीं है। शिस्त समाज की विकास यात्रा की ओर देखने के द्रष्टिकोण का एक हिस्सा है। आप पूरी इस विकास यात्रा को किस द्रष्टिकोण से देखते हैं, इसके आधार पर होता है। एक माँ-बाप अपने बच्चों को कैसे संस्कार देना चाहते हैं, उसके आधार पर तय होता है कि बच्चों को किस प्रकार की शिस्त में आप पालन करना चाहते हैं। माँ-बाप घर में हो, किसी का टेलीफोन आए, पिताजी घर में हो और पिताजी कहे कि, “ऐसा कह दो कि पापा बाहर गये हैं”, फिर पापा अपेक्षा करे कि मेरा बेटा झूठ न बोले, इम्पॉसिबल। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ तब मेरे दिमाग में मेरा बेटा नहीं होता है, मेरे दिमाग में सामने वाले का टेलिफोन होता है और इसके कारण, एकाकी थिंकिंग होने के कारण, मैं मेरी पूरी परिस्थिति पर इसका प्रभाव क्या पड सकता है इसका अनुमान तक नहीं कर सकता। ज्यादातर लोगों को बस में जाते हमने देखे होंगे। अकेला पैसेन्जर होता है तो वह क्या करता होता है? कोई हो तो खिड़की में से प्राकृतिक सुंदरता को देखे या हरियाली... लेकिन ज्यादातर क्या करते हैं? बस की सीट में, यहाँ कोई बाकी नहीं होगा... और इसके फ़ोम में से छोटी-छोटी-छोटी कतरन बाहर निकाले। साहब, यहाँ से वडोदरा उतरे तब तक दो इंच का गड्ढा बना दे। किसी का नुकसान करना चाहता था? नहीं। उसमें कोई स्पेशल एन्टर्टेन्मेन्ट था? नहीं। लेकिन एक स्वभाव का, संस्कार का अभाव। और उसे ऐसा लगता ही नहीं था कि यह मेरी संपत्ति है और इसलिए उसे दो इंच का गड्ढा बना देने में कुछ होता नहीं था। बिल्कुल नई बस रखी हो, बढ़िया बस रखी हो तो ड्राइवर को भी ऐसे गर्व होता होगा और वह बस अच्छी तरह से चलाता हो और फिर भी शाम को जब वह डिपो में पहुँचे तब कई सीट ऐसी होती हैं जिसमें दो-दो इंच के गड्ढे बने हो। यह सहज बात है। मैं कई बार नौजवानों को कहता हूँ कि भाई, हम चिल्ला चिल्ला कर बोलते हैं, “भारत माता की जय, भारत माता की जय... वंदे मातरम...” सब करते हैं, फिर? तुरंत ही पिचकारी मारते हैं। यही भारत माता पर गुटका खा कर तुरंत ही पिचकारी मारते हैं। उसे वह पता नहीं है कि जिस भारत माता का जय-जयकार कर रहा हूँ उसी पर ही पिचकारी मार कर गन्दगी कर रहा हूँ, क्या इसकी मुझे खबर है? लेकिन अगर उसे कोई यदि इस रेन्ज में बात समझाये तो उसे लगे कि हाँ, यार! छोटी छोटी बातें होती हैं, देशभक्ति इस से भी प्रकट हो सकती है। देशभक्ति प्रकट करने के लिए कोई भगत सिंह के रास्ते ही जाना पड़े ऐसा ज़रुरी नहीं है, भाई। मैं इतनी छोटी छोटी चीज़ें करके भी देशभक्ति, समाजभक्ति, पितृभक्ति, मातृभक्ति, गुरुभक्ति सब कुछ कर सकता हूँ।

कई बार नकारात्मकता... मैं एक बार एक कार्यक्रम में मुंबई गया था, दस एक साल हुए होंगे। और मेरे आश्चर्य के बीच कार्यक्रम के प्रवेशद्वार पर ही बचपन में मुझे जिन्हों ने पढ़ाया था वे मेरे शिक्षक खड़े थे और मैंने उन्हें ३५-४० साल बाद देखा होगा। मुझे बराबर याद आया कि हाँ, वही है। और सहज रूप से मैंने उन्हें प्रणाम किए,
पाँव छुए। सहज ही, यानी मुझे उसमें कुछ सोचने जैसा अवसर ही नहीं था। लेकिन उस दिन वह न्यूज़ बन गए। अब पैर छूना भी कोई न्यूज़ होता है, भाई? मेरे मन में वैसे आनंद होता है कि भाई मुख्यमंत्री की नम्रता देखो, ऐसा-वैसा, सब कुछ... लेकिन मुझे मन में प्रश्न होता है कि क्या यह न्यूज़ है, भाई? क्या इस राज्य में या इस देश में किसी भी नागरिक को उसके गुरुजन मिले तब उसके पाँव छूने के संस्कार सहज हो, लेकिन जब वह न्यूज़ बन जाते हैं तब एहसास होता है कि यह सब कैसे बंद हो गया है..! यह सहज प्रक्रियाएं, करने जैसी प्रक्रियाएं हमारे यहाँ जैसे आजकल गुनाह बन गया है। मुझे याद है हमारे गवर्नर साहब थे नवल किशोर शर्माजी, वैसे तो वे कांग्रेस के आदमी हैं, लेकिन मुझे सहज रूप से जब भी मैं जाऊं तब उनके पैर छूने का मन हो। सहज, मेरे क्रम में। लेकिन मुझे इतना सचेत रहना पडता था कि ये फोटोग्राफर बाहर जाए उसके बाद मैं मेरी विधि करुं। यह रहस्य आज खोल रहा हूँ। वरना साहब, जैसे अपराध हो गया हो..! राज्य का मुख्यमंत्री, वह इस प्रकार झुके? मित्रों, ये सारी जो बातें हैं, एक ऐसी विकृति धारण की है हमारे यहाँ जो कई बार हमारे संस्कार, हमारी शिस्त, हमारी जो परंपराएं हैं, इनके सामने संकट पैदा करने का जैसे एक योजनाबद्ध तरीके से प्रयास चालू है। और हम फिर विचलित हो जाते हैं, हमें भी डर लगने लगे। सार्वजनिक जीवन के अंदर यदि विकास की यात्रा करनी हो, व्यक्ति के जीवन में भी विकास करना हो, तो शिस्त बहुत ही काम में आती है।

शिस्त का दूसरा रूप है, ऑर्गनाइज़्ड होना। ज्यादातर लोग वैसे शिस्तबद्ध हों, लेकिन ज्यादा ऑर्गनाइज़्ड न हों और इसके कारण उनकी शिस्त हमें अक्सर ऐसे कष्ट देती है। हमारी शिस्त ऐसी नहीं होनी चाहिए कि दूसरों को कष्ट दे। आप मेले में चल रहे हो और फिर एक-दो, एक-दो करके चलो तो क्या हो? आपको तुरंत बाहर निकाले कि भाई, परेड करनी हो तो मैदान में जाओ। मेले में तो मेले की तरह ही चलना पडे आपको,
हल्के
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फुल्के होकर चलना पडे। तो मित्रों, ऑर्गनाइज़्ड होना और शिस्त का यह जो रूप पकड लिया है न वह तो इसका छोटा सा अंश है, पूर्णतया
जीवन के द्रष्टिकोण का एक हिस्सा, उस रूप में शिस्त को कैसे देखा जाता है।

 


मित्रों, ट्राइबल लोगों का अगर अध्ययन किया हो, बहुत प्रेरणा लेने जैसा है। आजकल बायो-फ्यूअल के लिए जैट्रोफा के उपयोग की चर्चा है न, इस विज्ञान में तो अभी अभी से जैट्रोफा की चर्चा चली है। हमारे डांग में जाओ, वहाँ आदिवासी भाईयों रात्रि गमन के दौरान जैट्रोफा का क्या अदभुत उपयोग करते हैं और कितना सिस्टमैटिक तरीके से करते हैं वह शिस्त देखने जैसी होती है और आज भी वह परंपरा है। एक तो, आदिवासी जब स्थानांतरण करते हों तब सब लाइन में ही चलते हैं। साथ साथ चले लेकिन हम जिस प्रकार गपशप करते हुए, कंधे टकराते हुए चलते हैं वैसे वे लोग नहीं चलेंगे। एक के पीछे दूसरा, दूसरे के पीछे तीसरा। मैंने उसमें से एक को पूछा था कि यह प्रणाली कैसे विकसित हुई होगी? उसका जो उत्तर था साहब, वो समझने जैसा था। सच है या झूठ उसकी कुछ मैंने जांच नहीं की है, लेकिन उसने जो उत्तर दिया वो मैं आपको कहता हूँ। उसने कहा कि साहब, हम जंगल में चल रहे हों, सांप या और कुछ हो तो पहले आदमी को ही फेस करना पडे, बाकी सब सुरक्षित रहे। अगर हम पूरी टोली चलें तो संभव है कि अनेक लोगों को नुकसान हो। यह शायद हमारी इस परंपरा में से ही विकसित हुआ होगा। जैट्रोफा का कैसे करते हैं? काँटा ले, काँटे में वह जैट्रोफा का बीज लगाए और उसे जलाए और चलें, उसकी रोशनी में चले। एक का पाँच-सात मिनट की दूरी पर ख़त्म हो तो दूसरे के हाथ में काँटा हो ही, वह तुरंत उसी से जला दे। दस लोग चलते हों, एक के बाद एक इतने डिसीप्लिन्ड तरीके से, माचिस की एक ही तीली से उनके जैट्रोफा के बीज की रोशनी में पूरी यात्रा इतने सिस्टमैटिक ढंग से पूर्ण करते हैं..! इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने अपनी नीड में से एक फारमूला डेवलप की, जिसे अनुशासित किया और उसे जीवन के सालों तक चलाते रहे। कई बार इन सब बातों को हमारे समाज जीवन के रूप में कितना स्वीकार करते हैं इसके उपर निर्भर रहता है।

 

आज भी हमारे यहाँ मर्यादा नाम की चीज़ की ऊंचाई कितनी है? बहुत कम लोग अंदाजा लगा सकते हैं। आप बस में चढ़ने के लिए लाइन में खड़े हो, धक्का-मुक्की चल रही हो और कोई दूसरा आदमी खिड़की में से अपना रूमाल डालके सीट पर रख दे, आप अंदर बराबर धक्का-मुक्की करके, कपडे फ़ट जाए, पसीना हुआ हो और अंदर चढ़े हों, लेकिन वह आकर कहे कि मैंने रूमाल रखा हुआ है तो आप खड़े हो जाते हो। यह आपने देखा होगा..! उसने सिर्फ खिड़की में से रूमाल डाला है, उसने कोई कसरत नहीं की है। कारण? मर्यादा के संस्कार वैसे के वैसे पड़े होते हैं। मित्रों, समाज जीवन का इस प्रकार निरीक्षण करें तो कितने अदभुत अदभुत उदाहरण देखने को मिलते हैं और इसलिए शिस्त का जितना महत्त्व है उतना ही ऑर्गनाइज़्ड होना भी सफलता के लिए बहुत ज़रुरी है।

कई लोगों की शिस्त पूरे वातावरण के लिए बोझ बन जाती है। शिस्त ऐसी हो ही नहीं सकती कि जो बोझ बढ़ाए, शिस्त हमेशा सरलता देती है। आप ऐसे धीर-गंभीर चेहरा रख कर हमेशा चौबीस घंटे रहते हो साहब, इससे कुछ शिस्त नहीं आती है। शिस्त बोझ न बन जाए, शिस्त आल्हादक बन जाए, एक उत्साह के साथ हो और इसलिए शिस्त के उस रूप को जो पकड़ता है वही टीम फॉर्म कर सकता है, वही टीम से काम ले सकता है। जो शिस्त को सख्त नियमों में बाँधता है वह कभी भी टीम बना नहीं सकता। और इसलिए सार्वजनिक जीवन को भी मर्यादाओं की आवश्यकता होती है। इसमें वैल्यू एडिशन होना चाहिए, मूल्य वृद्धि होनी चाहिए। और नैतिक अधिस्थान और मूल्य में गहनता आए तो ही मूल्य वृद्धि होती है, अन्यथा संभव नहीं होता है। और इसलिए शिस्त को इस रूप में देखना चाहिए कि भाई, नियत कार्य समय पर करता है कि नहीं, इतने तक ही सीमित नहीं है।

कई लोग ऐसे हैं कि माँ कहती हो कि बेटे, अब तुम्हें सो जाना है। बेटा कहता है कि नहीं मां, मुझे कल इम्तिहान है। माँ कहती है कि बेटे, तुम बीमार हो, ज्यादा बीमार पड़ जाओगे, कल भी जागा था... अब एक अर्थ में अशिस्त है, लेकिन दूसरे अर्थ में अपने काम के लिए उसका डिवोशन है। वो शायद शिस्त से अधिक ऊंचाई रखता है और इसलिए इन दोनों को तौल नहीं सकते कि भाई, तुमने तुम्हारी मां की बात नहीं मानी। माँ ने बहुत अच्छा खाना बनाया हो और् बेटा कहे कि मुझे खाना नहीं है। कारण? मैं खाना खाऊंगा तो रात को मुझे नींद आएगी, मुझे पढ़ना है। और इसलिए माँ के जज़्बात को ठुकराकर भी, खाने को इनकार करके भी, वह पढ़ने में मशगूल रहे वह उसकी प्रतिबद्धता है। तो शिस्त की ऊंचाई से देखें तो शायद शिस्त लाई जा सकती है लेकिन मेरी शिस्त को तुमने माना नहीं और इसलिए तू निकम्मा है ऐसा स्टैन्ड अगर मां लेती है तो शायद न तो मां को संतोष होगा, न बेटे को संतोष होगा और न ही दोनों की विकास यात्रा में एक दूसरे के पूरक बन पायेंगे। और इसलिए इस ह्यूमन साइकी को किस प्रकार से लेते हैं इसके आधार पर शिस्त को जोड़ सकते हैं। शिस्त को आप उस अर्थ में नहीं ले सकते। अभी जो बाहर का उदाहरण कहा, मुझे तो अभी याद नहीं है कि क्या हुआ था क्योंकि मुझे तो रूटीन में कई बार ऐसा करना होता होगा। लेकिन यह कुछ भुजाओं का बल नहीं है मित्रों, भुजा के बल से नहीं होता है, भावना और प्रेम के एक वातावरण से वह स्थापित होता है।

मित्रों, शिस्त की पहली शर्त है, अपनत्व। अपनेपन का भाव ही शिस्त ला सकता है। आप जब तक अपनेपन के भाव की अनुभूति न करवाओ, तब तक आप शिस्त नहीं ही ला सकते। समाज जीवन में भी शिस्त लानी हो तो अपनेपन का भाव ज़रूरी होता है, अपनत्व का भाव ज़रूरी होता है और जहाँ अपनत्व हो वहाँ शिस्त स्वाभाविक होती है। कई बार आदमी को लक्ष्य जोड़ता है। थियेटर के अंदर शांति बनाये रखने के लिए कहना नहीं पडता, कारण? सबका इन्टरेस्ट है कि शांति रखें तो लाभ मिले और इसलिए शांति बनी रहती है और इसमें अगर कोई थोड़ी भी गड़बड़ करे तो पन्द्रह लोग ऐसे परेशानी से देखने लगे। इसका अर्थ यह हुआ कि यह जो स्वाभाविक अपेक्षाएं पड़ी होती हैं, जिसके कारण अपना हित बना रहता हो, खुद की कोई एक सीमित इच्छा भी बनी रहती हो, तो वह भी आदमी को शिस्त में बाँधती है। कैसा भी अशिस्त करने वाला इंसान हो, लेकिन इसमें उसे शिस्त बाँधती है। और इसलिए कैसे हालात हैं इसके आधार पर होता है। इसलिए मित्रों, शिस्त को किसी चौखट में देखें और उसी प्रकार से मूल्यांकन करें तो शायद वह सामर्थ्य नहीं आ सकता।

 

हम एक समाज के रूप में... हममें अनेक शक्तियाँ पडी हैं, अपार शक्तियों का भंडार है, मित्रों। हमारी पूरी परिवार व्यवस्था, अभी शायद इसके उपर ज्यादा अध्ययन हुए नहीं हैं, लेकिन फ़ैमिली नाम की जो इन्स्टिटूशन है, शायद उस से बड़ी अनुशासन की संरचना और कहीं नहीं होगी। अदभुत व्यवस्था है। किसी कानून में लिखी हुई व्यवस्था नहीं है, लेकिन अदभुत व्यवस्था है। हाँ, जहाँ इसका धावन हुआ होगा, वहाँ अस्त-व्यस्त भी हुआ होगा। लेकिन जहाँ थोड़ा सा भी बना रहा होगा, तो उसका आनंद भी होगा। इस फ़ैमिली इन्स्टिटूट के अंदर हमारे यहाँ जो चीज़ें हैं इनके विस्तार की ज़रूरत है। जो अनुशासन मेरे परिवार के विकास का और आनंद का कारण बना है, वह मेरे परिवार से विस्तृत होकर मेरे समाज में आए, मेरे समाज से विस्तृत होकर मेरे गाँव में आए, मेरे गाँव से विस्तृत होकर मेरे राज्य में आए और मेरे राज्य से विस्तृत होकर मेरे देश का हिस्सा बने और यदि इस क्रम को हम आगे बढ़ाएंगे तो मैं मानता हूँ कि ‘इक्कीसवीं सदी, हिंदुस्तान की सदी’, यह जो सपना लेकर हम चल रहे हैं, इसकी मूलभूत आवश्यकता पूरी करने का एक आधार बन सकता है।

 

भाई राजीव गुप्ता को अभिनंदन देता हूँ, जिनकी मातृभाषा गुजराती नहीं है और फिर भी पुस्तक गुजराती में लिखा है इसके लिए सबसे पहले अभिनंदन और छोटे-छोटे इनके रोज़ाना कार्यों में से उन्हों ने अनुभव लिए हैं। मैं भी आते जाते ज़रूर इसे
पढूंगा, आप भी पढ़ना। मेरे लिए नहीं कहता हूँ लेकिन प्रकाशक खुश हो गए...

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Text of PM’s address at the News18 Rising Bharat Summit
February 27, 2026
Developed nations are eager to sign trade deals with India because a confident India is rising beyond doubt and despair: PM
In the last 11 years, a new energy has flowed into the nation's consciousness, India is determined to regain its rightful strength: PM
India's Digital Public Infrastructure has today become a subject of global discussion: PM
Today, every move India makes is closely watched and analysed across the world, the AI Summit is a clear example of this: PM
Nation-building never happens through short-term thinking; It is shaped by a long-term vision, patience and timely decisions: PM

इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।

नमस्कार!

नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।

साथियों,

सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।

लेकिन साथियों,

बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।

साथियों,

जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।

साथियों,

दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?

साथियों,

एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।

साथियों,

जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।

साथियों,

अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।

साथियों,

AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।

साथियों,

कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।

साथियों,

मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।

साथियों,

देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।

साथियों,

लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।

साथियों,

कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।

और साथियों,

हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।

साथियों,

राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।

साथियों,

मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।

साथियों,

यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।

साथियों,

21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।