"Prime Minister made his first foreign trip to the Himalayan Kingdom of Bhutan Reaffirmed commitment to develop cooperation and enhance bilateral ties"

प्रधानमंत्री ने अपना पहला विदेश दौरा हिमालयी साम्राज्यभूटान का किया। उन्होंने सहयोग विकसित करने और द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने की प्रतिबद्धता एक बार फिर दोहराई।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का भूटान दौरा

दिन : 02

लोग, जिनसे भेंट हुई: ताशिछोद्ज़ोंग में भूटान नरेश जिग्मे खैसर नामग्येल वांगचुक और रानी जेटसन पेमा; प्रधानमंत्री श्री शेरिंग तोबगे

भूटान भारत के सर्वाधिक मैत्रीपूर्ण पड़ोसी देशों में एक रहा है। भले ही वह हिमालय के लिए प्रेम हो, सांस्कृतिक विरासत या मूल्य हों, भारत और भूटान ने बहुत लंबे समय से करीबी रिश्ते निभाए हैं। दोनों देश अपनी विदेश नीति, रक्षा और वाणिज्य जैसे कई क्षेत्रों में रिश्ते निभाते हैं। भारत सरकार इस हिमालयी साम्राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में सहयोग के लिए हमेशा आतुर रही है। भारत के प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत भूटान की अद्वितीय आर्थिक उन्नति और उसकी तरक्‍की एवं खुशहाली से प्रसन्न होता है। प्रधानमंत्री ने भूटान के विकास कार्यों में अपना सतत सहयोग जारी रखने की भारत की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 15-16 जून 2014 के बीच हुए 2-दिवसीय दौरे ने दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत बना दिया। भूटान की शांति, खुशहाली और प्रगति की शुभकामना करते हुएश्री मोदी ने कहा,‘‘भारत भूटान की तरक्की और खुशी से जुड़ा हुआ है और हमेशा जुड़ा रहेगा। ये दोनों देश एक दूसरे के लिए बने हैं। हमारे पासपोर्ट्स के रंग अलग अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति और मूल्य समान रहेंगे।’’ वे थिम्पु में शाही सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

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थिम्पु पहुँचने पर हज़ारों छात्रों और शिक्षकों ने श्री मोदी का भव्य स्वागत किया। उन्होंने ट्वीट करके कहा,‘‘प्राइमरी स्कूल के छात्रों द्वारा गाए स्वागत गीत ने मेरे दिल को छू लिया।’’

भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत सरकार की ओर से मिली पूंजी से बनी सुप्रीम कोर्ट इमारत का उद्घाटन किया।

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श्री मोदी ने भूटान नरेश जिग्मे खेसर नेंग्येल वांगचुक और रानी जेटसन पेमा से भी मुलाकात की। इस दौरे पर उनके साथ विदेश मंत्री श्रीमति सुषमा स्वराज, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत दोवल और विदेश सचिव सुश्री सुजाता सिंह भी थे।

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(ANI Photo)

उनके इस दौरे को दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की ओर एक महान कदम माना जा रहा है। श्री मोदी का स्वागत करते हुए, भूटान के प्रधानमंत्री श्री श्रिंग टॉग्बे ने कहा,‘‘वे बहुत ही स्नेहशील व्यक्ति हैं और उनको काफी ज्ञान है और वे भूटान के हितैषी हैं। वे हमारे नरेशों को बहुत आदर की नज़र से देखते हैं। वे भारत-भूटान संबंधों के विवरणों को अच्छी तरह जानते हैं और इसीलिए उद्देश्य एवं आशा की भावना जागती है।’’ उन्होंने ट्वीट किया,‘‘ PM@narendramodi का दौरा सफल रहा : हमारे संरक्षक देवताओं; हमारे नरेशों के नेतृत्व; हमारी जनता के सौभाग्य को धन्यवाद।

 ‘‘यह हमारे राष्ट्र के लिए एक महान संदेश है और यह हमारी विदेश नीति के लिए बहुत अच्छा है,’’ श्री किरेन रिजिजु (गृह राज्यमंत्री) ने कहा। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री किन्ली दोरजी ने कहा, ‘‘यह बेहद उत्साहजनक है। इस दौरे ने इतिहास रच दिया।’’

भूटान निवासियों ने मोदी के लिए एक अपवाद बनाया

भारतीय प्रधान मंत्री के दौरे के दौरान, उन्होंने भूटान संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया । इस असाधारण संबोधन को भूटान के लोगों का बहुत अच्छा प्रति रेस्‍पोंस मिला । हालांकि बधाई देने के संकेत के तौर पर भूटान के लोग तालियाँ नहीं बजाते, लेकिन उन्होंने प्रधान मंत्री मोदी के लिए एक अपवाद बनाया । उनका मानना है कि तालियाँ केवल बुरी आत्माओं को दूर भगाने के लिए बजाई जाती हैं ।लेकिन सोमवार को भूटान की संसद के संयुक्त सत्र में श्री मोदी के उत्साहवर्धक भाषण के बाद उन्होंने तालियाँ बजाई। स्रोत:– https://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-06-16/news/50624019_1_bhutan-parliament-prime-minister-narendra-modi-mps

मेरे पहले विदेशी दौरे के लिए भूटान एक स्वाभाविक पसंद था ।

अपने दौरे की पूर्व संध्या पर पीएम नरेन्द्र मोदी ने समझाया कि उन्होंने अपने पहले विदेशी दौरे के तौर पर भूटान को क्यों चुना । उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ‘‘अनूठे और खास संबंधों’’ के कारण अपनी पहली मंजिल के तौर पर भूटान ‘‘स्वाभाविक पसंद’’ था । ‘‘आम हितों और साझी खुशहाली से बंधे, भारत और भूटान का एक अनूठा और खास रिश्ता है जो भूगोल, इतिहास और संस्कृति के बंधनों द्वारा कूट रचित है । इसलिए प्रधानमंत्री के तौर पर मेरे पहले विदेशी दौरे की मंज़िल के रूप में भूटान एक स्वाभाविक पसंद है,’’ पीएम ने कहा । उनके अनुसार, भूटान के साथ हाइड्रोपॉवर सहकार्य ‘‘हर हाल में जीत दिलाने वाला सहकार्य और समूचे क्षेत्र के लिए एक आदर्श है।’’ दौरे के दौरान, उन्होंने 600 मेगावॉट क्षमता वाले खोलोन्ग्चु हाइड्रोपॉवर परियोजना की नींव भी रखी। ‘‘भूटान और भारत एक बहुत ही खास रिश्ता है जिसकी परख समय के साथ हो चुकी है। इसलिए, मेरे पहले विदेशी दौरे के लिए भूटान एक स्वाभाविक पसंद था।’’

यह बात गौरतलब है कि मोदी के शपथ समारोह में आमंत्रित सात राष्‍ट्रों  के नेताओं में से एक भूटान के प्रधानमंत्री भी थे।

हिमालय की गोद में बसे राष्ट्र में मोदी के दौरे की मुख्यझलकियाँ

  1. दोनों देशों ने हाइड्रोपॉवर सहकार्य में 10,000 मेगावॉट का लक्ष्य हासिल करने की अपनी कटिबद्धता को दोहराया।
  2. भूटान के सुप्रीम कोर्ट का उद्घाटन और भारत एवं भूटान के संयुक्त उपक्रम, 600 मेगावॉट खोलोन्ग्चु हाइड्रोपॉवर परियोजना की नींव रखी गई।
  3. भारतीय प्रधान मंत्री ने दूध के पाउडर, गेहूँ, खाद्य तेल, अनाजों और गैर-बासमती चावलके निर्यात पर लगी पाबंदी से भूटान को छूट सहित अनेक उपायों और रियायतों की घोषणा की।
  4. दोनों देशों ने उनके बीच मुक्त व्यापार व्यवस्था और दोतरफा व्यापार के विस्तार के बारे में चर्चा की।
  5. प्रधानमंत्री ने भूटान और नेपाल से सटे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के साथ वार्षिक पहाड़ी खेल उत्सव के विचार पर भी ज़ोर दिया।
  6. श्री मोदी ने भूटान के छात्रों को भारत में शिक्षा के लिए दी जा रही छात्रवृत्ति दुगुनी करने की घोषणा की (अब 2 करोड़ रुपये) ।
  7. भारत भूटान को डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने में सहयोग भी देगा जिससे भूटान के युवा बीस लाख पुस्तकों और पत्रिकाओं तक पहुँच सकेंगे।
  8. प्रधानमंत्री ने भूटान में बी2बी संबंधों की जरूरत पर भी प्रकाश डाला । उन्होंने दोतरफा संबंधों या उनके कहे अनुसार ‘‘भारत टू भूटान रिलेशन्स’’ के विस्तार की घोषणा की।
  9. श्री मोदी ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की बजाय ‘सकल राष्ट्रीय खुशी’ पर ज़ोर देने की भूटान की अनूठी विलक्षणता पर बात की और कहा कि इसे मापने के मापदंडों में से एक यह भी हो सकता है कि उसका ‘‘भारत जैसा पड़ोसी’’ है।

Source - https://timesofindia.indiatimes.com/India/10-key-points-of-PM-Narendra-Modis-Bhutan-visit/articleshow/36663977.cms https://www.hindustantimes.com/india-news/pm-narendra-modi-arrives-to-a-grand-welcome-in-bhutan/article1-1229665.aspx bhutan5

Prime Minister received a ceremonial welcome on his arrival. (PTI Photo) प्रधानमंत्री के आगमन पर उनको उत्साहपूर्ण स्वागत मिला। (पीटीआईफोटो)

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जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम मोदी
July 06, 2026
हम भारत के उस महान सपूत को श्रद्धांजलि देते हैं, जिनकी राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है: पीएम
जब सरकार, 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प वाली होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडों की बात का पुरज़ोर विरोध किया: पीएम
वे अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्र-निर्माण का मूल आधार संस्थानों का निर्माण है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक ताकत बने: पीएम

केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे सहयोगी अमित भाई शाह, गजेंद्र सिंह शेखावत, पश्चिम बंगाल के ऊर्जावान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, भाजपा के वरिष्ठ सदस्य, हम जैसे लाखों कार्यकर्ताओं की प्रेरणा, श्रीमान माखनलाल जी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, श्री शॉमिक भट्टाचार्य, उपस्थित जनप्रतिनिधिगण, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सबको मेरा नमस्कार!

मैं अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के कारण, इस समय प्रवास पर हूं। लेकिन टेक्नोलॉजी की मदद से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में आपसे जुड़ रहा हूं।

साथियों,

आज देश की धरती, पश्चिम बंगाल की धरती, अपने एक महान सपूत, एक महान देशभक्त, भारत की अखंडता के लिए समर्पित एक युगदृष्टा को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रही है। आज हम उस विचार बीज का गुणगान कर रहे हैं, जो वर्तमान समय में चारों तरफ फल-फूल रहा है। जो, आधुनिक भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

साथियों,

जहाँ जमीन से जुड़ी हुई वैचारिक शक्ति हो, साथ-साथ इरादे मजबूत हो और नीयत साफ़ हो और जब नए संकल्प के साथ संपूर्ण समर्पण हो और ये सारी कड़ियां जब आपस में जुड़ जाती हैं, तो संकल्प की सिद्धि होती ही होती है। और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ऐसा ही जीवन जी करके दिखाया है। मैं डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती के अवसर पर उन्हें नमन करता हूं, अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

साथियों,

आज का यह कार्यक्रम इस बात का भी साक्षी है कि जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्र नायकों को सम्मान भी मिलता है और उनके विजन पर चलने का भी प्रयास होता है। डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती को, हमारी सरकार दो वर्षों के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रही है। यह पिछले वर्ष 6 जुलाई को शुरू हुए थे और अगले साल 6 जुलाई तक चलेंगे। और अब तो बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस राष्ट्रीय सम्मान को, एक प्रेरणा पुरुष को याद करने में बंगाल ने अपने आप में रौनक बढ़ा दी है। कुछ दिन पहले ही 20 जून को भव्य तरीके से पश्चिम बंग दिवस का आयोजन किया गया था। यह बंगाल की धरती, बंगाल की विरासत को प्रणाम था। आज का यह कार्यक्रम अपनी विरासत के प्रति उसी सम्मान का हिस्सा है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार को इतने भव्य कार्यक्रम के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी का जीवन, एक विचार से जन-आंदोलन तक की परिणति का प्रेरक है। उन्होंने भारत में एक वैचारिक आंदोलन को जन्म दिया। आप देखिए, जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई थी, तब हर तरफ कांग्रेस का ही बोलबाला था, कांग्रेस का ही वर्चस्व दिखाई देता था। एक ऐसे दौर में, जब अलग विचार के लिए कोई जगह ही नहीं थी, बड़ी मुश्किल था पैर रखने के लिए भी जगह मिल जाए, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन सारी परिस्थितियों को चुनौती देते हुए एक नए विचार का साहस किया। यह केवल एक संगठन बनाने का निर्णय नहीं था, एक राजनीतिक दल को जन्म देने का काम नहीं था। यह लोकतंत्र में वैचारिक विविधता, राष्ट्रीय चिंतन और जनभागीदारी पर उनके अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थी। इसी विश्वास से भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ। और साथियों, कोई भी विचार केवल स्थापना से अमर नहीं होता। विचार तब अमर होता है, जब पीढ़ियाँ उसे अपने जीवन से सींचती हैं। भारतीय जनसंघ के उस छोटे से दीये को जलाए रखने के लिए लक्षावधि कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन खपा दिया। पल-पल, तिल-तिल, लाखों कार्यकर्ताओं के तप, त्याग और समर्पण ने, उस दीये की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज वह दीया अपने मूल स्वरूप में भले न दिखाई देता हो, भारतीय जनसंघ आज उसी रूप में भले न हो, लेकिन उस दीये का जो प्रकाश-पुंज था, वो आज करोड़ों देशवासियों के विश्वास का प्रकाश बनकर फैल रहा है। उसी प्रकाश का विस्तार आज पूरे देश में खिले हुए करोड़ों कमल के रूप में दिखाई देता है। कभी जो भारतीय जनसंघ था, वही आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बनकर जनसेवा कर रहा है।

साथियों,

अक्सर हम देखते हैं कि समय के साथ कुछ विचारों का आकर्षण फीका पड़ता जाता है। लेकिन आप सोचिए, यह कितना सशक्त विचार-बीज डॉक्टर मुखर्जी ने रोपा है कि आज इतने साल बाद भी उसका इतनी तेजी से विस्तार हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है, जब आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय जनता पार्टी की इस यात्रा का इतिहास लिखेंगी, इसका अध्ययन करेंगी, तब वह निश्चित रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों, उनके साहस और उनकी दूरदृष्टि का उल्लेख करेंगी। और मैं फिर कहूंगा, बंगाल के लिए तो यह डबल खुशी की बात है। एक तो डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती और दूसरा, बंगाल में यह आयोजन, उनके विचार पुंज से निकली भाजपा सरकार में ये भव्य उत्सव हो रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता की तरफ से अपने महान सपूत को ये बहुत ही आत्मीय श्रद्धांजलि है।

साथियों,

संसद में अपने एक भाषण में डॉक्टर मुखर्जी ने कहा था और यह डॉक्टर मुखर्जी का यह वाक्य आज भी हमें प्रेरणा देता है। डॉक्टर मुखर्जी ने पार्लियामेंट में कहा था- राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। और देखिए, आज देश गर्व से कह सकता है कि डॉक्टर मुखर्जी अंतिम सांस तक इसी विश्वास को वो जीते थे, उन्होंने इसे जीया था। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, लगभग तय हो चुका था, तब एक और संकट सामने था। पूरे के पूरे बंगाल को ही भारत से अलग करने की साजिशें रची जा रही थीं। तब डॉक्टर मुखर्जी इन साजिशों के सामने चट्टान बनकर खड़े हो गए। उन्होंने जनमत तैयार किया, राजनीतिक संघर्ष किया और यह सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे और तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हुंकार भरी थी। उनके शब्द थे- कांग्रेस देश भाग कोरेछे, आमी पाकिस्तान के भाग कोरेछी। यानि कांग्रेस ने देश का बंटवारा किया, और मैंने पाकिस्तान का ही बंटवारा कर दिया।

साथियों,

यह जो हुंकार है, इसकी जो ताकत है, इसमें जिस बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति के दर्शन होते हैं, उसका एहसास हमें तब भी होता है, जब हम आज की परिस्थितियों को देखते हैं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, एक भारत श्रेष्ठ भारत के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। और इसलिए, जब देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान की बात हुई, तो डॉक्टर मुखर्जी ने इसका भी जमकर विरोध किया। उन्होंने देश को मंत्र दिया- एक देशे दुई बिधान, दुई प्रोधान एबॉन्ग दुई निशान, आमरा कोखोनो मेने नेबो ना यानि "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान— नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।" यह केवल एक नारा नहीं था। यह समान अधिकार, समान संविधान और समान राष्ट्रीय चेतना का आह्वान था। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया, जेल गए और अंततः कश्मीर के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आज हमारी सरकार को इस बात का गर्व है कि आर्टिकल 370 की दीवार गिराकर हमने डॉक्टर मुखर्जी का सपना पूरा किया है।

साथियों,

आज जब हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, तो यह उसी राष्ट्रीय दृष्टि का विस्तार है, जिसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन से परिभाषित किया। एक ऐसा भारत-जहाँ उत्तर और दक्षिण के बीच कोई दूरी न हो, जहाँ पूर्व और पश्चिम, समान अवसरों के सहभागी हों, जहाँ हर राज्य अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भारत की सामूहिक शक्ति बने। जहाँ हर नागरिक एक ही संविधान, एक ही राष्ट्रीय भावना और एक ही भविष्य के संकल्प से जुड़ा हो। मुझे खुशी है कि डॉक्टर मुखर्जी की प्रेरणा से आज भारत का संविधान पूरे देश में आन-बान-शान के साथ लागू है और कोटि-कोटि देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, इस बात को अच्छे से समझते थे कि संस्थाओं के निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का तत्व छुपा है। मात्र 33 वर्ष की आयु में डॉ. मुखर्जी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। लेकिन उन्होंने उस पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने विश्वविद्यालय को भारत के भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा को गुलामी की सोच के दायरे के बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने कहा- बोंगो-जातिर आत्तोशोम्मान पुनोर-उद्धार, एबॉन्ग मातृ-भाषार माध्योमे शिख्खार प्रोशार एई आमादेर प्रोधान लोक्खो होवा उचित! यानि बंगाल के लोगों का आत्मसम्मान लौटाना और मातृभाषा में पढ़ाई, यह हमारा प्रथम उद्देश्य है। उनका विश्वास था कि यदि भारत को आत्मविश्वासी राष्ट्र बनना है, तो उसकी शिक्षा भी भारतीय आत्मा से जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया। आज हमें इस बात का भी गर्व है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया जा रहा है। जो सपना डॉक्टर मुखर्जी ने देखा था, वो हमारी सरकार ने पूरा किया है।

साथियों,

स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास का वृहद विजन रखा था। उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक शक्ति बनें। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने भारत की रेल व्यवस्था को नई गति दी। सिंदरी फर्टिलाइजर प्लांट ने कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया। दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने ऊर्जा और सिंचाई का नया अध्याय लिखा। इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (IFCI) ने भारतीय उद्योगों को वित्तीय आधार दिया।

साथियों,

उनके लिए उद्योग, फैक्ट्रियां, यह केवल कुछ कल कारखाने नहीं थे। विश्वविद्यालय, केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं थे। रिसर्च इंस्टीट्यूशंस, केवल वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं थे। उनके लिए ये सभी, राष्ट्र निर्माण के साधना केंद्र थे। डॉक्टर मुखर्जी, ऐसी संस्थाओं के पक्षधर थे, जो टैलेंट को अवसर दें। ऐसी शिक्षा, जो इनोवेशन को प्रोत्साहन दे। ऐसे उद्योग, जो आत्मनिर्भरता का आधार बने। और ऐसी व्यवस्था, जो आने वाली पीढ़ियों को और अधिक सशक्त भारत सौंप सके। और यही स्पिरिट, आज विकसित भारत की भी प्रेरणा है।

साथियों,

आज के इस अवसर पर मैं, बंगाल के, पूरे देश के मेरे युवा साथियों से कहूंगा, डॉक्टर मुखर्जी ने एक भारत के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हम सबको श्रेष्ठ भारत के लिए जीना है, हमें मिलकर विकसित भारत का संकल्प सिद्ध करना है। हमें देश को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी आह्वान के साथ, एक बार फिर से मैं डॉक्टर मुखर्जी को नमन करता हूं। मैं उनके ही शब्दों में अपनी बात समाप्त करूंगा। यह डॉक्टर मुखर्जी के शब्द हैं, यह उनकी भाव भंगिमा है- जे काज एई हाते नाओ ना केनो, ता अत्योंतों गुरुत्तो शहोकारे कोरते होबे जो भी काम आरंभ करो, उसे पूरी गंभीरता से करो, तन्मयता से करो, पूरी निष्ठा से करो, कोई भी काम अधूरा ना छोड़ो, उसे जरूर पूरा करो। डॉक्टर मुखर्जी के शब्दों में यह प्रवाहित भावना के साथ, इनके ही इन शब्दों के साथ आप सभी को भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

बहुत-बहुत धन्यवाद!