भगवान जगन्नाथ सामाजिक न्याय और सद्भाव के प्रतीक: प्रधानमंत्री मोदी #मन_की_बात
भारत की विविधता ही इसकी ताकत: मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी
स्वच्छता अब सरकार का कार्यक्रम नहीं है। यह आज एक ‘जन आंदोलन’ बन गया है: पीएम मोदी #मन_की_बात
1975 में आपातकाल हमारे लोकतंत्र की सबसे काली रात थी: मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी
हमारे सभी प्रयास लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में होने चाहिए: प्रधानमंत्री #मन_की_बात
#मन_की_बात: प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, योग ने पूरे विश्व को एकीकृत किया है
मंगल मिशन का 1000 दिन पूरा होना अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है: मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी
खेल से टीम वर्क की भावना विकसित होती है। यह व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को निखारता है: पीएम मोदी #मन_की_बात

मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | मौसम बदल रहा है | इस बार गर्मी भी बहुत रही | लेकिन अच्छा हुआ कि वर्षा ऋतु समय पर अपने नक्शेक़दम पर आगे बढ़ रही है | देश के कई भागों में झमाझम बारिश से मौसम सुहाना हो गया है | बारिश के बाद ठण्डी हवाओं में पिछले दिनों की गर्मी से राहत का अनुभव रहा है | और हम सबने देखा है कि जीवन में कितनी ही आपाधापी हो, कितना ही तनाव हो, व्यक्तिगत जीवन हो, सार्वजनिक जीवन हो, बारिश का आगमन ही हमारी मनःस्थिति को भी बदल देता है |

आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा देश के कई भागों में बहुत ही श्रद्धा और उल्लासपूर्वक देशवासी मनाते हैं | अब तो विश्व के भी कुछ भागों में भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा का उत्सव सम्पन्न होता है | और भगवान जगन्नाथ जी के साथ देश का ग़रीब जुड़ा हुआ है | जिन लोगों ने डॉ0 बाबा साहेब आम्बेडकर का अध्ययन किया होगा, उन्होंने देखा होगा कि भगवान जगन्नाथ जी का मन्दिर और उसकी परंपराओं की वो बड़ी तारीफ़ करते थे, क्योंकि उसमें सामाजिक न्याय, सामाजिक समरसता अंतर्निहित थे | भगवान जगन्नाथ ग़रीबों के देवता हैं | और बहुत कम लोगों को पता होगा, अंग्रेज़ी भाषा में एक शब्द है juggernaut और उसका मतलब होता है, ऐसा भव्य रथ जिसे कोई रोक नहीं सकता | और इस juggernaut के dictionary meaning में भी ये पाया जाता है कि जगन्नाथ के रथ के साथ में से ही ये शब्द का उद्भव हुआ है | और इसलिए हम समझ सकते हैं कि दुनिया ने भी जगन्नाथ की इस यात्रा को अपने-अपने तरीक़े से किस प्रकार से माहात्म्य स्वीकार किया है | भगवान जगन्नाथ जी की यात्रा के अवसर पर मैं सभी देशवासियों को शुभकामनायें देता हूँ और भगवान जगन्नाथ जी के श्रीचरणों में प्रणाम भी करता हूँ |

भारत की विविधता ये इसकी विशेषता भी है, भारत की विविधता ये भारत की शक्ति भी है | रमज़ान का पवित्र महीना सब दूर इबादत में पवित्र भाव के साथ मनाया | अब ईद का त्योहार है | ईद-उल-फ़ितर के इस अवसर पर मेरी तरफ़ से सबको ईद की बहुत-बहुत शुभकामनायें | रमज़ान महीना पुण्य दान का महीना है, ख़ुशियों को बाँटने का महीना है और जितनी खुशियाँ बाँटते हैं, उतनी खुशियाँ बढ़ती हैं | आइए, हम सब मिलकर के इन पवित्र उत्सवों से प्रेरणा लेकर के ख़ुशियों के ख़ज़ानों को बाँटते चलें, देश को आगे बढ़ाते चलें |

रमज़ान के इस पवित्र महीने में उत्तर प्रदेश के बिजनौर के मुबारकपुर गाँव की एक बड़ी प्रेरक घटना मेरे सामने आयी | क़रीब साढ़े तीन हज़ार हमारे मुसलमान भाई-बहनों के परिवार वहाँ उस छोटे से गाँव में बसते हैं, एक प्रकार से ज़्यादा आबादी हमारे मुस्लिम परिवार के भाइयों-बहनों की है | इस रमज़ान के अन्दर गाँववालों ने मिलकर के शौचालय बनाने का निर्णय लिया | और इस व्यक्तिगत शौचालय के अन्दर सरकार की तरफ़ से भी सहायता मिलती है और उस सहायता की राशि क़रीब 17 लाख रुपये उनको दी गई | आपको जानकर के सुखद आश्चर्य भी होगा, आनंद होगा | रमज़ान के इस पवित्र महीने में वहाँ हमारे सभी मुसलमान भाइयों-बहनों ने सरकार को ये 17 लाख वापस लौटा दिए | और ये कहा कि हम हमारा शौचालय, हमारे परिश्रम से, हमारे पैसों से बनाएँगे | ये 17 लाख रुपये आप गाँव की अन्य सुविधाओं के लिए खर्च कीजिए | मैं मुबारकपुर के सभी ग्रामजनों को रमज़ान के इस पवित्र अवसर को समाज की भलाई के अवसर में पलटने के लिए बधाई देता हूँ | उनकी एक-एक चीज़ भी बड़ी ही प्रेरक है | और सबसे बड़ी बात है, उन्होंने मुबारकपुर को खुले में शौच से मुक्त कर दिया | हम जानते हैं कि हमारे देश में तीन प्रदेश ऐसे हैं सिक्किम, हिमाचल और केरल, वो पहले ही खुले में शौच से मुक्त घोषित हो चुके हैं | इस सप्ताह उत्तराखण्ड और  हरियाणा भी ODF घोषित हुए | मैं इन पाँच राज्यों के प्रशासन को, शासन को और जनता-जनार्दन को विशेष रूप से आभार प्रकट करता हूँ इस कार्य को परिपूर्ण करने के लिये |

हम भली-भाँति जानते हैं कि व्यक्ति के जीवन में, समाज के जीवन में कुछ भी अच्छा करना है, तो बड़ी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है | अगर हमारी handwriting ख़राब है, अगर उसको ठीक करना है, तो लंबे अरसे तक बहुत जागरूक रहकर के प्रयास करना पड़ता है | तब जाकर के शरीर की, मन की आदत बदलती है | स्वच्छता का भी विषय ऐसा ही है | ऐसी बुरी आदतें हमारे स्वभाव का हिस्सा बन गई हैं | हमारी आदतों का हिस्सा बन गई हैं | इससे मुक्ति पाने के लिये अविरत रूप से हमें प्रयास करना ही पड़ेगा | हर किसी का ध्यान आकर्षित करना ही पड़ेगा | अच्छी प्रेरक घटनाओं का बार-बार स्मरण भी करना पड़ेगा | और मुझे खुशी है कि आज स्वच्छता ये सरकारी कार्यक्रम नहीं रहा है | ये जन समाज का, जन-सामान्य का एक आन्दोलन बनता चला जा रहा है | और शासन में बैठे हुए लोग भी जब जनभागीदारी से इस काम को आगे बढाते हैं, तो कितनी ताक़त बढ़ जाती है |

पिछले दिनों एक बहुत ही उत्तम घटना मेरे ध्यान में आई, जो मैं आपके सामने ज़रूर कहना चाहूँगा | ये घटना है आन्ध्र प्रदेश के विजयनगरम ज़िले की | वहाँ के प्रशासन ने जनभागीदारी से एक बड़ा काम हाथ में लिया | 10 मार्च सुबह 6 बजे से लेकर के 14 मार्च सुबह 10 बजे तक | 100 घंटे का non stop अभियान | और लक्ष्य क्या था ? एक सौ घंटे में 71 ग्राम पंचायतों में दस हज़ार घरेलू शौचालय बनाना | और मेरे प्यारे देशवासियो, आप जानकर के ख़ुश हो जाएँगे कि जनता-जनार्दन ने और शासन ने मिलकर के 100 घंटे में दस हज़ार शौचालय बनाने का काम सफलतापूर्वक पूर्ण कर दिया | 71 गाँव ODF हो गए | मैं शासन में बैठे हुए लोगों को, सरकारी अधिकारियों को और विजयनगरम ज़िले के उन गाँव के नागरिकों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ कि आपने परिश्रम की पराकाष्ठा करते हुए बड़ा प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है |              

इन दिनों ‘मन की बात’ में लगातार मुझे जनता-जनार्दन की तरफ़ से सुझाव आते रहते हैं I NarendraModiApp पर आते रहते हैं, MyGov.in पर आते हैं,  चिट्ठियों से आते हैं, आकाशवाणी पर आते हैं I

श्रीमान प्रकाश त्रिपाठी ने emergency को याद करते हुए लिखा है कि 25 जून को लोकतंत्र के इतिहास में एक काला कालखंड के रूप में उन्होंने प्रस्तुत किया है I प्रकाश त्रिपाठी जी की लोकतंत्र के प्रति ये जागरूकता सराहनीय है और लोकतंत्र एक व्यवस्था ही है, ऐसा नहीं है, वो एक संस्कार भी है I Eternal Vigilance is the Price of Liberty I  लोकतंत्र के प्रति नित्य जागरूकता ज़रूरी होती है और इसलिये लोकतंत्र को आघात करने वाली बातों को भी स्मरण करना होता है और लोकतंत्र की अच्छी बातों की दिशा में आगे बढ़ना होता है I 1975 - 25 जून - वो ऐसी काली रात थी, जो कोई भी लोकतंत्र प्रेमी भुला नहीं सकता है I कोई भारतवासी भुला नहीं सकता है I एक प्रकार से देश को जेलखाने में बदल दिया गया था I विरोधी स्वर को दबोच दिया गया था I जयप्रकाश नारायण सहित देश के गणमान्य नेताओं को जेलों में बंद कर दिया था I न्याय व्यवस्था भी आपातकाल के उस भयावह रूप की छाया से बच नहीं पाई थी I अख़बारों को तो पूरी तरह बेकार कर दिया गया था I आज के पत्रकारिता जगत के विद्यार्थी, लोकतंत्र में काम करने वाले लोग, उस काले कालखंड को बार-बार स्मरण करते हुए लोकतंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहे हैं और करते भी रहने चाहिए I उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी भी जेल में थे l जब आपातकाल को एक वर्ष हो गया, तो अटल जी ने एक कविता लिखी थी और उन्होंने उस समय की मनःस्थिति का वर्णन अपनी कविता में किया है I 

झुलसाता जेठ मास,

शरद चाँदनी उदास,

झुलसाता जेठ मास,

शरद चाँदनी उदास,

सिसकी भरते सावन का,

अंतर्घट रीत गया,

एक बरस बीत गया,

एक बरस बीत गया ||

 

सीखचों में सिमटा जग,

किंतु विकल प्राण विहग,

सीखचों में सिमटा जग,

किंतु विकल प्राण विहग,

धरती से अम्बर तक,

धरती से अम्बर तक,

गूंज मुक्ति गीत गया,

एक बरस बीत गया,

एक बरस बीत गया ||

 

पथ निहारते नयन,

गिनते दिन पल-छिन,

पथ निहारते नयन,

गिनते दिन पल-छिन,

लौट कभी आएगा,

लौट कभी आएगा,

मन का जो मीत गया,

एक बरस बीत गया ||

 

लोकतंत्र के प्रेमियों ने बड़ी लड़ाई लड़ी और भारत जैसा देश, इतना बड़ा विशाल देश, जब मौका मिला तो भारत के जन-जन की रग-रग में लोकतंत्र कैसा व्याप्त है, चुनाव के माध्यम से उस ताक़त का प्रदर्शन कर दिया I जन-जन की रग-रग में फैला हुआ ये लोकतंत्र का भाव ये हमारी अमर विरासत है I इस विरासत को हमें और सशक्त करना है I

मेरे प्यारे देशवासियो, हर हिंदुस्तानी आज विश्व में सिर ऊँचा कर-कर के गौरव महसूस कर रहा है I 21 जून, 2017 - पूरा विश्व योगमय हो गया I पानी से पर्वत तक लोगों ने सवेरे-सवेरे सूरज की किरणों का स्वागत योग के माध्यम से किया I कौन हिंदुस्तानी होगा, जिसको इस बात का गर्व नहीं होगा I ऐसा नहीं है कि योग पहले होता नहीं था, लेकिन आज जब योग के धागे में बंध गए हैं, योग विश्व को जोड़ने का कारण बन गया है I दुनिया के क़रीब-क़रीब सभी देशों ने योग के इस अवसर को अपना अवसर बना दिया I चीन में The Great Wall of China उस पर लोगों ने योग का अभ्यास किया, तो Peru में World Heritage Site माचू पिच्चू पर समुद्र तल से 2400 मीटर ऊपर लोगों ने योग किया I फ़्रांस में एफिल टॉवर के साये में लोगों ने योग किया I UAE में Abu Dhabi में 4000 से अधिक लोगों ने सामूहिक योग किया I अफगानिस्तान में, हेरात में India Afghan Friendship Dam सलमा बाँध पर योग कर के भारत की दोस्ती को एक नया आयाम दिया I सिंगापुर जैसे छोटे से स्थान पर 70 स्थानों पर कार्यक्रम हुए और सप्ताह भर का उन्होंने एक अभियान चलाया है I UN ने अंतराष्ट्रीय योग दिवस के 10 Stamps निकाले I उन 10 Stamps को release किया I UN Headquarter में Yoga Session with Yoga Masters का आयोजन किया गया I UN के staff, दुनिया के diplomats हर कोई इसमें शरीक़ हुआ I

इस बार फिर एक बार योग ने विश्व रिकॉर्ड का भी काम किया | गुजरात में अहमदाबाद में क़रीब-क़रीब 55 हज़ार लोगों ने एक साथ योग करके एक नया विश्व रिकॉर्ड बना दिया | मुझे भी लखनऊ में योग के कार्यक्रम में शरीक़ होने का अवसर मिला | लेकिन पहली बार मुझे बारिश में योग करने का सद्भाग्य प्राप्त हुआ | हमारे सैनिकों ने जहाँ minus 20, 25, 40 degree temperature होता है उस सियाचिन में भी योग किया | हमारे Armed Forces हों, BSF हो, ITBP हो, CRPF हो, CISF हो, हर कोई अपनी ड्यूटी के साथ-साथ योग को अपना हिस्सा बना दिया है | इस योग दिवस पर मैंने कहा था कि तीन पीढ़ी, क्योंकि ये तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस था, तो मैंने कहा था कि परिवार की तीन पीढ़ियाँ एक साथ योग करते हुए उसकी फ़ोटो share कीजिये | कुछ TV channel ने भी इस बात को आगे बढ़ाया था |  मुझे इस पर काफ़ी फ़ोटो मिले, उसमें से कुछ selected photographs NarendraModiApp पर compile करके रखे गए हैं | जिस प्रकार से पूरे विश्व में योग की चर्चा हो रही है, उसमें एक बात अच्छी उभर कर के आ रही है कि योग से आज की जो health conscious society है, वो fitness से अब wellness की ओर जाने की दिशा में क़दम रख रही है और उनको लग रहा है कि fitness का महत्व है ही है, लेकिन wellness के लिए योग उत्तम मार्ग है |

(साउंड बाइट #)

“Respected Prime Minister Sir, मैं डॉक्टर अनिल सोनारा अहमदाबाद, गुजरात से बोल रहा हूँ | सर, मेरा एक सवाल है कि recently केरल में हमने आपको सुना था कि different-different places पे जो bouquet as a gift हम देते हैं, उसकी जगह kind of good books हमको देनी चाहिए as a memento | इस चीज़ का आपने शुरुआत गुजरात में अपने कार्यकाल में भी करवाया था, सर, लेकिन अभी in recent days हमें ये ज़्यादा देखने को नहीं मिल रहा है | So can we do something ? हम क्या इस चीज़ के बारे में कुछ कर नहीं सकते, जिससे ये देशव्यापी तौर पे इस चीज़ का  implementation हो सके, सर ?” 

पिछले दिनों मुझे एक बहुत ही मेरे प्रिय कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला | केरल में अच्छा कार्यक्रम चलता है कुछ वर्षों से, P. N. Panicker Foundation के द्वारा चलता है और लोगों को किताबें पढ़ने की आदत बने, लोग किताब पढ़ने की ओर जागरूक हों, इसलिये reading day, reading month celebration किया जाता है | तो मुझे उसके शुभारम्भ में जाने का मौका मिला | और वहाँ मुझे ये भी बताया गया कि हम bouquet नहीं, book देते हैं | मुझे अच्छा लगा | अब मुझे भी जो चीज़ मेरे ध्यान से हट गई थी, उसका पुनः स्मरण हो गया | क्योंकि जब मैं गुजरात में था, तो मैंने सरकार में एक परंपरा बनाई थी कि हम bouquet नहीं देंगे, book देंगे या तो हाथ-रुमाल, handkerchief उसी से स्वागत करेंगे | और खादी का handkerchief, ताकि खादी को भी बढ़ावा मिले | जब तक मैं गुजरात में था, हम सब की आदत बन गई थी, लेकिन यहाँ आने के बाद मेरी वो आदत छूट गई थी | लेकिन केरल गया, तो फिर से एक बार वो जागरूक हो गई | और मैंने तो अभी सरकार में फिर से नीचे सूचना देना भी शुरू कर दिया है | हम भी धीरे-धीरे एक स्वभाव बना सकते हैं | और bouquet की आयुष बहुत कम होती है | एक बार हाथ में लिया, फिर छोड़ देते हैं | लेकिन अगर book देते हैं, तो एक प्रकार से घर का हिस्सा बन जाता है, परिवार का हिस्सा बन जाता है | खादी का रुमाल दे कर के भी स्वागत करते हैं, तो कितने ग़रीब लोगों को मदद मिलती है | ख़र्चा भी कम हो जाता है और सही रूप से उसका उपयोग भी होता है | और जब मैं ये बात कह रहा हूँ, तो ऐसी चीज़ों का कितना ऐतिहासिक मूल्य होता है | मैं गत वर्ष जब UK गया था, तो London में Britain की Queen, Queen Elizabeth ने मुझे भोजन पर निमंत्रित किया था | एक मातृसहज वातावरण था | बड़े प्यार से उन्होंने भोजन भी कराया, लेकिन बाद में उन्होंने मुझे एक बड़े ही आदर के साथ भावात्मक स्वर में एक छोटा-सा खादी का और धागे से बुना हुआ एक handkerchief दिखाया और उनकी आँखों में चमक थी, उन्होंने कहा कि जब मेरी शादी हुई थी, तो ये  handkerchief महात्मा गाँधी ने मुझे भेंट में भेजा था शादी की शुभकामना के रूप में | कितने साल हो गए, लेकिन Queen Elizabeth ने महात्मा गाँधी के द्वारा दिया हुआ ये handkerchief संभाल के रखा हुआ है | और मैं गया, तो उन्होंने इस बात का बड़ा आनंद था कि वो मुझे वो दिखा रही थीं | और जब मैं देख रहा था, तो उनका आग्रह रहा कि नहीं, मैं उसको छू कर के देखूँ | महात्मा गाँधी की एक छोटी सी भेंट उनके जीवन का हिस्सा बन गई, उनके इतिहास का हिस्सा बन गई | मुझे विश्वास है कि ये आदतें रातों-रात नहीं बदलती हैं और जब कभी ऐसी बात करते हैं, तो आलोचना का भी शिकार होना होता है | लेकिन उसके बावजूद भी ऐसी बातें करते रहनी चाहिए, प्रयास करते रहना चाहिए | अब मैं ये तो नहीं कह सकता हूँ कि मैं कहीं जाऊँगा और कोई bouquet  ले के आ जाएगा, तो उसको मना कर दूँगा, ऐसा तो नहीं कर पाऊँगा | लेकिन फिर भी आलोचना भी होगी, लेकिन बात करते रहेंगे, तो धीरे-धीरे सुधार भी होगा |

मेरे प्यारे देशवासियो, प्रधानमंत्री के नाते अनेक प्रकार के काम रहते हैं | फ़ाइलों में डूबे रहते हैं, लेकिन मैंने मेरे लिये एक आदत विकसित की है कि मुझे जो चिट्ठियाँ आती हैं, उसमें से रोजाना कुछ चिट्ठियाँ मैं पढ़ता हूँ और उसके कारण मुझे सामान्य मानव से जुड़ने का एक अवसर मिलता है | भाँति-भाँति की चिट्ठियाँ आती हैं, अलग-अलग प्रकार के लोग चिट्ठियाँ लिखते हैं | इन दिनों एक ऐसी चिट्ठी मुझे पढ़ने का अवसर मिला, मुझे लगता है कि मुझे ज़रूर आपको बताना चाहिए | दूर-सुदूर दक्षिण में, तमिलनाडु में, मदुराई की एक housewife अरुलमोझी सर्वनन - उन्होंने मुझे एक चिट्ठी भेजी | और चिट्ठी क्या थी, उन्होंने लिखा कि मैंने अपने परिवार में बच्चों की पढ़ाई वगैरह के ध्यान में रह के कुछ-न-कुछ economical activity करने की दिशा में सोचा, तो परिवार को थोड़ी आर्थिक मदद हो जाए | तो मैंने ‘मुद्रा’ योजना से, बैंक से पैसे लिए  और बाज़ार से कुछ सामान ला करके supply करने की दिशा में कुछ काम शुरू किया | इतने में मेरे ध्यान में आया कि भारत सरकार ने Government E-Marketplace नाम की कोई व्यवस्था खड़ी की है | तो मैंने ढूँढ़ा, ये क्या है, कुछ लोगों से पूछा | तो मैंने ख़ुद को भी उसमें register करवा दिया | मैं देशवासियों को बताना चाहता हूँ, आपको भी मौका मिले, तो आप Internet पर E-GEM – ‘ई जी ई एम’ - उसको visit कीजिए | एक बड़ी नयी प्रकार की व्यवस्था है | जो भी सरकार में कोई चीज़ supply करना चाहता है, छोटी-छोटी चीज़ें भेजना चाहता है - बिजली के बल्ब भेजना चाहता है, dustbin भेजना चाहता है, झाड़ू भेजना चाहता है, chair भेजना चाहता है, table भेजना चाहता है, बेचना चाहता है, वो उसमें अपना नाम register करवा सकता है | वो क्या quality का माल है उसके पास, वो उसमें लिखकर के रख सकता है, कितने में वो बेचेगा, वो लिख सकता है और सरकार के department को compulsory है कि उन्होंने उस पर visit करना होगा, देखना होगा कि ये supply करने वाले quality compromise न करते हुए सस्ते में कौन पहुँचाता है | और फिर उसको order करना होता है | और उसके कारण बिचौलिये ख़त्म हो गए | सारी transparency आ गई | interface नहीं होता है, technology के माध्यम से ही सब होता है | तो E-GEM के अन्दर जो लोग registry करवाते हैं, सरकार के सभी department उसको देखते रहते हैं | बीच में बिचौलिये नहीं होने के कारण चीज़ें बहुत सस्ती मिलती हैं | अब ये अरुलमोझी मैडम ने सरकार की इस website पर वो जो-जो सामान दे सकती हैं, उसका सारा registry करवा दी | और मज़ा ये है कि उन्होंने मुझे जो चिट्ठी लिखी है, वो बड़ी interesting है | उन्होंने लिखा कि एक तो मुझे ‘मुद्रा’ से पैसे मिल गए, मेरा कारोबार शुरू हो गया, E-GEM के अन्दर मैंने मैं क्या दे सकती हूँ, वो सारी सूची रख दी और मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय से order मिला, PMO से | अब मेरे लिए भी ये नयी ख़बर थी, PMO ने क्या मँगवाया होगा, तो उसने लिखा है कि PMO ने मेरे से दो thermos ख़रीदे | और 1600 रुपये का मुझे payment भी मिल गया | ये है empowerment | ये है entrepreneurship को बढ़ावा देने का अवसर | शायद अरुलमोझी जी ने मुझे चिट्ठी न लिखी होती, तो मेरा भी शायद इतना ध्यान नहीं गया होता कि E-GEM की व्यवस्था से दूर-सुदूर एक गृहिणी छोटा सा काम कर रही है, उसका माल प्रधानमंत्री कार्यालय तक ख़रीदा जा सकता है | यही देश की ताक़त है |  इसमें transparency भी है, इसमें empowerment भी है, इसमें entrepreneurship भी है | Government E-Marketplace - GEM | मैं ज़रूर चाहूँगा कि जो इस प्रकार से सरकार को अपना माल बेचना चाहते हैं, वो उससे ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ें | मैं मानता हूँ Minimum Government and Maximum Governance  का एक बेहतरीन उदहारण है ये और इसका लक्ष्य क्या है minimum price और maximum ease, efficiency and  transparency |

मेरे प्यारे देशवासियो, एक तरफ़ हम योग को लेकर के गर्व करते हैं, तो दूसरी तरफ़ हम Space Science में हमारी जो सिद्धियाँ हैं, उसके लिए भी गर्व कर सकते हैं | और ये ही तो भारत की विशेषता है कि अगर हमारे पैर योग से जुड़े हुए ज़मीन पर हैं, तो हमारे सपने दूर-दूर आसमानों के उन क्षितिजों को पार करने के लिये भी हैं | पिछले दिनों खेल में भी और विज्ञान में भी भारत ने बहुत-कुछ करके दिखाया है | आज भारत केवल धरती पर ही नहीं, अंतरिक्ष में भी अपना परचम  लहरा रहा है | अभी दो दिन पहले ISRO ने ‘Cartosat-2 Series Satellite’ के साथ 30 Nano Satellites को launch किया | और इन satellites में भारत के अलावा फ्राँस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन, अमेरिका - ऐसे क़रीब-क़रीब 14 देश इसमें शामिल हैं | और भारत के इस nano satellite अभियान से खेती के क्षेत्र में, किसानी के काम में, प्राकृतिक आपदा के संबंध में काफ़ी कुछ हमें मदद मिलेगी | कुछ दिन पहले इस बात का हम सब को बराबर याद होगा, ISRO ने ‘GSAT-19’ का सफ़ल launch किया था | और अब तक भारत ने जो satellite launch किये हैं, उसमें ये सबसे ज़्यादा वज़नदार heavy satellite है | और हमारे देश के अख़बारों ने तो इसकी हाथी के वज़नों के साथ तुलना की थी, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि कितना बड़ा काम अंतरिक्ष के क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों ने किया है | 19 जून को ‘मार्स मिशन’ के एक हज़ार दिन पूरे हुए हैं | आप सबको पता होगा कि जब ‘मार्स मिशन’ के लिये हम लोग सफलतापूर्वक orbit में जगह बनाई थी, तो ये पूरा mission एक 6 महीने की अवधि के लिये था | उसकी life 6 महीने की थी | लेकिन मुझे ख़ुशी है कि हमारे वैज्ञानिकों के इस प्रयासों की ताक़त ये रही कि 6 महीने तो पार कर दिये - एक हज़ार दिन के बाद भी ये हमारा ‘मंगलयान मिशन’ काम कर रहा है, तस्वीरें भेज रहा है, जानकारियाँ दे रहा है, scientific data आ रहे हैं, तो समय अवधि से भी ज़्यादा, अपने आयुष से भी ज़्यादा काम कर रहा है | एक हज़ार दिन पूरा होना हमारी वैज्ञानिक यात्रा के अन्दर, हमारी अंतरिक्ष यात्रा के अन्दर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है |

इन दिनों sports में भी हम देख रहे हैं कि हमारे युवाओं का रुझान बढ़ता चला जा रहा है |  अब ये नज़र आने लगा है कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी हमारी युवा पीढ़ियों को अपना भविष्य दिखने लगा है और हमारे खिलाड़ियों के कारण, उनके पुरुषार्थ के कारण, उनकी सिद्धि के कारण देश का भी नाम रोशन होता है | अभी हाल ही में भारत के बैडमिंटन खिलाड़ी किदाम्बी श्रीकांत ने इंडोनेशिया ओपन में जीत दर्ज़ कर देश का मान बढ़ाया है | मैं इस उपलब्धि के लिए उनको और उनके कोच को ह्रदय से बधाई देता हूँ | मुझे कुछ दिन पहले एथलीट पी. टी. उषा जी के Usha School of Athletics के Synthetic Track के उद्घाटन समारोह में जुड़ने का अवसर मिला था | हम खेल को जितना बढ़ावा देंगे, sports, sportsman spirit भी लेकर आता है | खेल व्यक्तित्व के विकास के लिए भी बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा करता है | overall personality development में खेल का माहात्म्य बहुत है | देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है | अगर हमारे परिवार में भी बच्चों को खेल की रुचि है, तो उनको अवसर देना चाहिए | उनको मैदान में से उठा करके, कमरे में बंद करके, किताबों के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए | वो पढ़ाई भी करें, उसमें भी आगे बढ़ सकते हैं, तो बढ़ें, लेकिन अगर खेल में उसका सामर्थ्य है, रुचि है, तो स्कूल, कॉलेज, परिवार, आस-पास के लोग - हर किसी को उसको बल देना चाहिए, प्रोत्साहित करना चाहिए | अगले Olympic के लिए हर किसी को सपने संजोने चाहिए |

फिर एक बार मेरे प्यारे देशवासियो, वर्षा ऋतु, लगातार उत्सवों का माहौल, एक प्रकार से ये कालखंड की अनुभूति ही नयी होती है | मैं फिर एक बार आप सब को शुभकामनायें देते हुए अगले ‘मन की बात’ के समय फिर कुछ बातें करूँगा | नमस्कार |

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September 08, 2026
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भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी, यहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल, इस कार्यक्रम में ऑनलाइन हमारे साथ अनेक राज्यों के महानुभाव जुड़े हैं। महाराष्ट्र के गवर्नर जिष्णु देव वर्मा जी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डणवीस जी, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे जी, डिप्टी सीएम श्रीमती सुनेत्र पवार जी, अन्य मंत्रीगण, सांसदगण, विधायकगण और वहां पर भी इकट्ठे हुए लाखों नागरिक भाई-बहन। यहां मंच पर उपस्थित केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी अश्विनी वैष्णव, उपमुख्यमंत्री, युवा नेता हर्ष संघवी, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, उपस्थित अन्य जनप्रतिनिधिगण, गुजरात के मेरे प्यारे भाइयों और बहनों।

और खास इसलिए के मेरे ब़डौदा के महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी का ये मैदान अलग-अलग फील्ड में काम करने वाले सभी साथियों का साथ और विकास का ये उत्सव, यहां सबकुछ एक साथ हो रहा है।

साथियों,

आज मैं विकसित भारत की यात्रा को और गति देने के लिए आपके बीच आया हूं। थोड़ी देर पहले यहां देश के विकास से जुड़े हज़ारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और लोकार्पण हुआ है। मैं देश की जनता को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। इस विकास पर्व पर आप सभी ने जिस सेवा भाव से और सेवा भाव के साथ पूरे वडोदरा शहर में स्वच्छता से स्वागत अभियान चलाया है, इसके लिए मैं वड़ोदरा के हर एक नागरिक को ह्दय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं, उनकी सराहना करता हूं। और ये जो आपने रंग दिखाया ना, मैं कल एक वीडियो देख रहा था, सीना चौड़ा हो गया, वाह! क्या ये मेरा वडोदरा है? और अब तो गणेशोत्सव की तैयारी, बाद में नवरात्रि। और गणेशोत्सव और नवरात्रि पूरा गुजरात का ध्यान वडोदरा पर होता है। और आज आपने, मैं देख रहा था पिछले एक सप्ताह से हर परिवार में वातावरण बन गया है स्वच्छता का। मुझे लगता है कि इस बार जब गणेश जी पधारेंगे ना, सारे आशीर्वाद वड़ोदरा पर बरसने वाले हैं।

साथियों,

इस वर्ष लाल किले से मैंने विकसित भारत के लिए संकल्प की सप्तधारा का आह्वान किया है। इस सप्तधारा में एक धारा गतिशक्ति की भी है। विकसित भारत के लिए हमें ऐसी कनेक्टिविटी चाहिए, जो सुगम भी हो और जमाने के हिसाब से जरा तेज भी हो। वड़ोदरा तो गतिशक्ति यूनिवर्सिटी का शहर है। आज यहां से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की आखिरी कड़ियां भी जुड़ गई हैं। आज 2800 किलोमीटर से अधिक का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट पूरा हो गया। ये 21वीं सदी के भारत के लिए बहुत ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुआ है।

साथियों,

ये डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इस बात का साक्षी है कि बीते 12 साल में देश की काम करने की संस्कृति कैसे बदली है। इस डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर 2004 में विचार शुरू हुआ था। यानी, यहां मैं सारे नौजवान देख रहा हूं, जब इसका विचार शुरू हुआ, आप में से बहुत लोग होंगे जिनका जन्म भी नहीं हुआ होगा, उस समय शुरू हुआ था। 2006 में एक विशेष कंपनी बनाई गई इस काम को करने के लिए और फिर 2014 तक फाइलें ही यहां से वहां होती रहीं। फाइलें टेबल पर यात्रा कर रही थी और दुर्भाग्य देखिए, इन फाइलों को भी कोई डेडिकेटेड कॉरिडोर नसीब नहीं हुआ, फाइल को भी नहीं नसीब हुआ। फाइलें अटकती थीं, लटकती थीं, भटकती थीं। और 2014 में वड़ोदरा के और गुजरात के और देश के लोगों ने मुझे गुजरात से निकाल करके दिल्ली भेज दिया। पहले वाली सरकार 2000 तक रही। आपने मुझे भेजा और उनकी विदाई हुई, और सच्चाई ये थी कि सात-आठ वर्ष में, जरा मेरे नौजवान सुन लीजिए, ये याद रखिए, सात-आठ वर्ष में एक किलोमीटर फ्रेट कॉरिडोर पर भी काम पूरा नहीं हो पाया था। अगर उनके हिसाब से देश चलाते, तो पता नहीं आपके बाद तीन-चार पीढ़ियां आती, तो भी नहीं होता। भारत के लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को ट्रांसफॉर्म करने वाले प्रोजेक्ट की ये हालत करके रखी थी।

साथियों,

2014 के बाद आपने जो मुझे शिक्षा-दीक्षा दी थी, इस धरती ने मुझे जो सिखाया था, आपके पास से जो लेसन लेके मैं दिल्ली पहुंचा था, हमने वहां पहुंचते ही इसको गति देने का काम प्रारंभ कर दिया। 2800 किलोमीटर के कॉरिडोर का काम आज पूरा करके दिखाया। और आज ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, देश के व्यापार-कारोबार का मुख्य आधार बन रहा है।

साथियों,

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, तेजी से विकसित होते भारत की जीवन रेखा है। इसने भारत के ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर का कायाकल्प कर दिया है। पहले पैसेंजर ट्रेन जिस ट्रैक पर चलती थी, उसी ट्रैक पर मालगाड़ी भी चलती थी। यानि ट्रैवल और ट्रांसपोर्ट, दोनों धीमा था। लेकिन, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ने इस स्थिति को बदल दिया है। आज पूर्वी और पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर्स पर हर रोज़ 430 से ज्यादा मालगाड़ियां चलती हैं, प्रतिदिन 430 मालगाड़ी। और पहले जो मालगाड़ी, साढ़े 6 घंटे में 100 किलोमीटर का सफऱ तय करती थी और अब वही मालगाड़ी आधे से भी कम समय में 100 किलोमीटर का सफर तय कर लेगी। जिस जगह पर ट्रक से सामान भेजने में सामान्य तौर पर 30 घंटे लगते हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर यही दूरी 10-12 घंटे में पूरी हो जाती है। यानि, इस कॉरिडोर पर मालगाड़ी के चलने से ट्रक और ट्रेन में लगने वाला फ्यूल बचता है, किराया-भाड़ा का खर्च कम हुआ है, समय बचा है, पर्यावरण को फायदा हुआ है। यानि, इन्वेस्टमेंट एक ट्रैक पर किया और फायदे अनेक सारे हुए हैं।

साथियों,

इस फ्रेट कॉरिडोर से पूर्वी और पश्चिमी भारत के किसानों की उपज अब तेज़ी से बड़े बाज़ार तक पहुंच पा रही है। कई तरह के फूल, कई तरह की सब्जियां, कई तरह के फल, यानि जो चीजें मौसम के हिसाब से जल्दी खराब होती हैं, उनके लिए भी सही समय पर मंडियों और लोगों के बीच पहुंचने का रास्ता बना है। इससे किसान का बहुत बड़ा फायदा हुआ है।

साथियों,

ये फ्रेट कॉरिडोर एक और वजह से कमाल का है। हाल ही में JNPT मुंबई, JNPT पोर्ट से वड़ोदरा तक Double स्टैक Container मालगाड़ी का संचालन किया गया है। यानि डिब्बे के ऊपर एक और डिब्बा लगाकर मालगाड़ी को चलाया गया। इस मालगाड़ी के चलने से एक बार में ही 250 से अधिक ट्रकों के बराबर का सामान मुंबई से वड़ोदरा चला आया, 250 ट्रक। अब ये जो नाराज फूफा जी है, वो चिल्लाएंगे कि ट्रक वालों का क्या होगा? ट्रक कहां जाएंगे? जिन्होंने ट्रक खरीदा है, उनका क्या होगा? अब फूफा जी को काम मिल गया। यानि अब बड़ी मात्रा में सामान तेजी से देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच पाएगा।

साथियों,

फ्रेट कॉरिडोर के साथ-साथ अब भारत में रेल वहां भी पहुंच रही है, जहां इतने दशकों तक नहीं पहुंची थी। गुजरात हो, मध्य प्रदेश हो, महाराष्ट्र हो, यहां जो आदिवासी क्षेत्र हैं, वो भी इस प्रोजेक्ट के द्वारा रेल से जुड़ रहे हैं। पहले की सरकार में बजट में एक-दो ट्रेनों की घोषणा होती थी और उसके भी साल भर ढोल पीटे जाते थे। जबकि आज देश में साल भर एक के बाद एक नई ट्रेनें चलाई जा रही हैं। आज भी इस कार्यक्रम में कई नई ट्रेन शुरु हुई हैं। नई ट्रेन से वड़ोदरा, छोटा उदयपुर और अलीराजपुर के लोगों को बहुत सुविधा होगी।

साथियों,

रोड, रेल, मेट्रो, एयरपोर्ट, गैस पाइपलाइन, गरीबों का घर, जब देश में करोड़ों लोगों के लिए ये चीजें बनती हैं, तो इससे लोगों का जीवन आसान होता है और साथ ही छोटे से बड़े कामगार को रोजगार के लाखों-लाख अवसर मिलते हैं। आप रेलवे का ही देखिए, इस वर्ष का रेल बजट पौने तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है। जो 12 वर्ष पहले की तुलना में कई गुणा अधिक है। यानि रेलवे के आधुनिकीकरण पर हो रहा खर्च, हज़ारों हज़ार नए रोजगार बना रहा है। और ये रोजगार कंस्ट्रक्शन के दौरान तो बनता ही है। एक बार रोड, रेल, पाइपलाइन, पोर्ट, एयरपोर्ट बन गया, तो फिर उसके आसपास नए उद्योग लगना शुरू हो जाते हैं, नए बिजनेस आते हैं, ये फिर नए रोजगार बनाते हैं। वहां कुछ लोग, वो बेटी चित्र लेकर कब से खड़ी है, वो सज्जन भी कुछ कला लेकर के आए हैं। जरा हमारे साथी उसको कलेक्ट कर लें। ये आगे पहुंचा दीजिए, हां। एक और भी है कोई, हां, ले लीजिए। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

साथियों,

मैंने देश के सामने विकसित भारत की जिन सप्तधाराओं का विजन रखा है, उनमें एक धारा मैन्युफैक्चरिंग की भी है। और वड़ोदरा शहर, इसकी ताकत अच्छे से जानता भी है, समझता भी है। एजुकेशन, स्किल और इंडस्ट्री का कोलैब कैसे होता है, ये वड़ोदरा करीब डेढ़ सौ साल से इसका प्रतिबिंब है। दशकों पहले, यहां टेक्स्टाइल और टाइल्स के निर्माण से एक यात्रा शुरु हुई थी, जो बाद में ऑयल और पेट्रोकेमिकल्स के साथ आगे बढ़ी। पिछले दो-ढाई दशक में वड़ोदरा MSMEs का एक बड़ा हब बन गया है। और मुझे याद है, जब मैं नया-नया मुख्यमंत्री बना था, तो वड़ोदरा का मेरे पर स्पेशल अधिकार रहा है हमेशा, तो हर हफ्ते कोई ना कोई डेलीगेशन आता था। बस हमारे वड़ोदरा में कुछ मैन्युफैक्चरिंग का हो, मैन्युफैक्चरिंग का हो, क्योंकि यहां पर आते थे, तो या तो ज्योति या एलएमबी या तो जीएसएफसी, यही सब दिखता था और कुछ सुनता नहीं देता। आज कहां से कहां बदल गया है। अब तो ये शहर देश के पहले मेड इन इंडिया मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए भी जाना जा रहा है। C-295 एयरक्राफ्ट की पहली फ्लाइट यहां आसमान देख चुकी है। मैं वड़ोदरा के लोगों को ये गौरव पाने के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

जब देश की मैन्युफैक्चरिंग की बात हो रही है, तो मैं एक और आंकड़ा बताना चाहता हूं। बीते एक दशक में भारत रेल कोच-मेट्रो कोच बनाने का, रेल इंजन बनाने का भी एक बड़ा निर्माता बना है। 2014 के बाद से अब तक, भारत ने करीब 50 हज़ार, ये आंकड़ा सुनिए, 2014 के बाद भारत ने अब तक 50 हज़ार आधुनिक रेलवे कोच बनाए हैं। पुरानी सरकार 10 साल में 50 हजार टॉयलेट नहीं बना सकती थी। 50 हजार आधुनिक कोच तो किए ही हैं, करीब ढाई लाख वेगन, मालगाड़ी के लिए जो वेगन होते हैं, भारतीय रेल में जोड़े गए हैं, ढाई लाख।

साथियों,

अब भारत चिप से लेकर शिप तक, निर्माण की एक नई गाथा लिख रहा है। यानि पुर्जे भी हमारे और प्रोडक्ट भी हमारा, आत्मनिर्भरता की एक पूरी चेन भारत में ही बनेगी। और ये हम सोलर पावर के मामले में देख रहे हैं। जैसे कडाणा डैम पर जो फ्लोटिंग सोलर प्लांट का प्रोजेक्ट है, कुछ साल पहले तक देश में सोलर प्रोजेक्ट्स लगाने बहुत महंगे पड़ते थे। क्योंकि पीवी मॉड्यूल से लेकर, हर प्रकार का हार्डवेयर इंपोर्ट करना पड़ता था। लेकिन बीते वर्षों में हमने भारत में ही पीवी मॉड्यूल बनाने शुरु किए। और आज हम इसमें 200 गीगावॉट से ज्यादा की कैपेसिटी विकसित कर चुके हैं। और ऐसी ही आत्मनिर्भरता के कारण आज पीएम सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना का विस्तार हो रहा है। अब तक देश में 55 लाख परिवार अपने छत पर, टेरेस पर सोलर प्लांट लगा चुके हैं। और इसमें 11 लाख परिवार हमारे गुजरात के हैं। यहां इतने सारे परिवार, बिजली उत्पादक बन चुके हैं और इसके कारण, प्रोडक्शन से लेकर इंस्टॉलेशन और सर्विस तक, कितने ही युवाओं को रोजगार मिला है, कितने नए वेंडर्स आए हैं।

साथियों,

‘झूठ की गूंज’ से भरमाने वाले तो हर चौराहे पर मिल जाएंगे, लेकिन भारत का नौजवान सच की हुंकार से चलता है, सच की हुंकार के साथ चलता है, सच की हुंकार के लिए चलता है। हमारे युवा साथी ये देख रहे हैं कि आज देश में सोलर हो, विंड हो, हाइड्रो हो, न्यूक्लियर हो, सारे सेक्टर्स पर सरकार कितना फोकस से काम कर रही है।

साथियों,

आने वाले दौर में हर आधुनिक सेक्टर बिजली से ही चलेगा, इलेक्ट्रिक इकोसिस्टम पर निर्भर होगा। जैसे चिप इंडस्ट्री है, डेटा सेंटर और AI से जुड़ी इंडस्ट्री है, इनका खाद पानी बिजली ही है। इसलिए अगर हमें AI में दुनिया के सामने सुपर पावर बनना है, तो देश को उसकी तैयारी, उसका इकोसिस्टम भी बनाना होगा। यही काम भारत ग्राउंड पर कर रहा है। तभी किसी देश से यूरेनियम के लिए समझौते हो रहे हैं, किसी से क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर समझौते किए जा रहे हैं। ये सारी मेहनत देश के युवाओं का फ्यूचर सुरक्षित करने के लिए दिन-रात मेहनत करके की जा रही है, आपके भविष्य के लिए किया जा रहा है।

साथियों,

दुनिया तेज़ी से बदल रही है, तो दुनिया की ज़रूरतें भी बदल रही हैं और इसी प्रकार हमारी पढ़ाई-लिखाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। पहले फोकस सिर्फ डिग्री पर होता था, लेकिन अब डिग्री के साथ-साथ स्किल पर भी फोकस है, स्किल का महत्मय बढ़ रहा है। नौजवानों के पास स्किल हो और वो स्किल समय-समय पर अपग्रेड हो, एक बड़ी जरूरत बन गई है। और इसीलिए, आज हम अपनी शिक्षा नीति को, शिक्षण और ट्रेनिंग के संस्थानों को नए रूप में ढाल रहे हैं। और इसी भाव के साथ ही मैंने लाल किले से भी युवाशक्ति के लिए दो बड़ी घोषणाएं की हैं। पहली घोषणा, देश की पारंपरिक ज़रूरत से जुड़ी है। आप सब जानते हैं कि हमारे यहां लाखों नौजवान ऐसे हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। हर साल, हमारे मिडिल क्लास परिवारों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन बच्चों की कोचिंग पर खर्च हो जाता है। हमारी कोशिश है कि गरीब और मिडिल क्लास के ऐसे बच्चों की, परिवारों के पैसे की बचत हो। और इसीलिए अब सरकार स्टूडेंट्स को ऑनलाइन फ्री-कोचिंग व्यवस्था देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। और हिंदुस्तान के बेस्ट टीचर के द्वारा उनके कोचिंग हो। हमारे जो नौजवान, अपनी तैयारी कर रहे हैं, उनकी कोचिंग का ध्यान सरकार खुद रखेगी।

साथियों,

भारत के नौजवानों को AI में पारंगत होना उतना ही जरूरी है। हम चाहते हैं कि हमारे नौजवानों की पीढ़ी AI के लिए तैयार हो। ऐसा नहीं है, AI सीखने वालों की जरूरत सिर्फ आईटी सेक्टर में है, अगर कोई इस स्किल को जानता है, तो वो खेती के लिए नया AI solution बना सकता है। आरोग्य के क्षेत्र में technology विकसित कर सकता है। Manufacturing की productivity बढ़ा सकता है। Robotics में अपना startup शुरू कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि हमारे पास देश और दुनिया की इंडस्ट्री के लिए AI को समझने वाले और AI का इस्तेमाल करने वाले युवा हों। सरकार इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है।

साथियों,

भारत का ये कालखंड अभूतपूर्व है। ये भारत की युवाशक्ति का उत्कर्ष काल है, ये समय फिर भारत के जीवन में लौटकर नहीं आएगा। और इसलिए, हमें 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य को सर्वोपरि रखना है। हमें भारत को विकसित बनाकर ही रहना है। इसी आह्वान के साथ, एक बार फिर आप सभी को विकास कार्यों की बहुत शुभकामनाएं।

अब मेरा एक काम करना पड़ेगा वडोदरा वालों को, करेंगे? पक्के तौर पर? आप सबने वड़ोदरा को इतना स्वच्छ बना दिया, कितनी मेहनत करनी पड़ी। मैं देख रहा था, हमारे नौजवान दिन-रात सफाई में लगे हुए थे। लेकिन एक बार हम तय करें कि अब हम वडोदरा को गंदा होने ही नहीं देंगे। मैं खुद गंदगी नहीं करूँगा, ये संकल्प लें, तो वडोदरा गंदा होगा? वडोदरा गंदा होगा? तो दिवाली ऐसी चकाचक जाएगी या नहीं, नवरात्रि शानदार जाएगी या नहीं, गणेशोत्सव में चार चाँद लगेंगे या नहीं, तो इतना काम तो हो जाएगा।

शाबाश।

धन्यवाद।

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!