प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बाली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान आज सिंगापुर के प्रधानमंत्री महामहिम श्री ली सिएन लूंग से भेंट की। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष रोम में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री ली के साथ हुई अपनी भेंट को स्मरण किया।

दोनों प्रधानमंत्रियों ने भारत और सिंगापुर के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी तथा नई दिल्ली में सितंबर 2022 को आयोजित भारत-सिंगापुर मंत्रिस्तरीय गोलमेज वार्ता के उद्घाटन सत्र सहित नियमित होने वाली उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय तथा संस्थागत चर्चाओं पर गौर किया।

दोनों नेताओं ने दोनों देशों के बीच व्यापार तथा निवेश संपर्कों, खास तौर से फिन-टेक, नवीकरणीय ऊर्जा, कौशल विकास, स्वास्थ्य तथा फार्मा क्षेत्रों को विस्तार देने के विषयों पर अपने संकल्प को दोहराया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने सिंगापुर को आमंत्रित किया कि वह विभिन्न सेक्टरों में निवेश करे, जिनमें हरित अर्थव्यवस्था, अवसंरचना और डिजिटलीकरण शामिल हैं। इसके अलावा, भारत के राष्ट्रीय महत्व की सामाजिक व आर्थिक अवंसरना परियोजनाओं, परिसम्पत्ति मुद्रीकरण योजना और गति शक्ति योजना से लाभ उठाने के लिए भी सिंगापुर का आह्वान किया।

दोनों नेताओं ने हाल के वैश्विक और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में सिंगापुर की भूमिका की और 2021-2024 के दौरान आसियान-भारत सम्बन्धों में उसकी समन्वयकारी भूमिका की सराहना की। दोनों नेताओं ने भारत-आसियान बहु-आयामी सहयोग को और बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने की इच्छा दोहरायी।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने प्रधानमंत्री श्री ली को भविष्य के लिए शुभकामनायें दीं तथा उन्हें अगले वर्ष जी-20 शिखर सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए भारत पधारने का आमंत्रण दिया।

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प्रधानमंत्री ने सुव्यवस्थित मानकों से मानवीय आचरण के मार्गदर्शन को दर्शाने वाले एक संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
May 20, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। इसका अभिप्राय है कि श्रेष्ठ आचरण एक दीपक की तरह है जो न केवल एक व्यक्ति को बल्कि पूरे समाज को आलोकित करता है। श्री मोदी ने कहा कि इसी आदर्श को अपनाकर हमारे देश के लोग आज पूरे संयम, क्षमता और कर्तव्य परायणता के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा:

"श्रेष्ठ आचरण वह दीपक है, जिससे व्यक्ति के साथ-साथ समाज भी आलोकित होता है। इसी आदर्श को अपनाते हुए हमारे देशवासी आज पूरे संयम, सामर्थ्य और कर्तव्यनिष्ठा से राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।”

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।"

क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका निर्धारण व्यक्तिपरक राय या क्षणिक आवेग पर नहीं, बल्कि शास्त्र आधारित एक सुव्यवस्थित मानक के अनुसार होना चाहिए, जो आचरण को दिशा और अनुशासन प्रदान करता है। इसलिए, व्यक्ति को स्थापित मानकों की उस प्रणाली के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि उसका आचरण संतुलित, मान्य और सार्थक हो सके।