हम भारत के उस महान सपूत को श्रद्धांजलि देते हैं, जिनकी राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है: पीएम
जब सरकार, 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प वाली होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडों की बात का पुरज़ोर विरोध किया: पीएम
वे अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्र-निर्माण का मूल आधार संस्थानों का निर्माण है: पीएम
डॉ. मुखर्जी ने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक ताकत बने: पीएम

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर एक वीडियो संदेश के ज़रिए लोगों को संबोधित किया। पहले से तय यात्रा कार्यक्रम की वजह से खुद वहां मौजूद न हो पाने का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने इस खास मौके पर भौगोलिक दूरियों को मिटाने में डिजिटल संपर्क की अद्भुत ताकत पर ज़ोर दिया। श्री मोदी ने कहा, "तकनीक की मदद से मैं इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में आपके साथ जुड़ रहा हूं।"

पूरे देश और खासकर पश्चिम बंगाल के लिए इस दिन के विशेष ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए, उन्होंने राज्य के सबसे महान सपूतों में से एक को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। अपने संबोधन में उन्होंने एक ऐसे समर्पित देशभक्त की जीवंत तस्वीर पेश की, जिनका पूरा जीवन देश की अखंडता को बनाए रखने के लिए समर्पित था। श्री मोदी ने कहा, "आज देश की धरती भारत की अखंडता के लिए समर्पित एक दूरदर्शी नेता को श्रद्धापूर्वक याद कर रही है।"

इस सम्मानित नेता की स्थायी विरासत का ज़िक्र करते हुए, प्रधानमंत्री ने बताया कि कैसे दशकों पहले बोए गए बुनियादी विचार, आज सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों में फल-फूल रहे हैं। उन्होंने देश की आज की प्रगति की दिशा तय करने में इस मज़बूत वैचारिक ढांचे की अहम भूमिका को श्रेय दिया। श्री मोदी ने कहा, "आज हम उस विचार के बीज की सराहना कर रहे हैं, जो आधुनिक भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।"

बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ज़रूरी बातों का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने एक मज़बूत तालमेल के बारे में बताया, जो ज़मीन से जुड़ी बौद्धिक ताकत, नेक इरादे और पूरी लगन एक साथ मिलकर बनता है। उन्होंने प्रसिद्ध दूरदर्शी नेता के जीवन को इस सफल फ़ॉर्मूले का सबसे अच्छा उदाहरण और व्यावहारिक सबूत बताया। श्री मोदी ने कहा, "जब ये सभी कड़ियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं, तो संकल्प का पूरा होना तय होता है।"

125वीं जयंती के खास मौके पर, उन्होंने इस ऐतिहासिक नेता के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त की। अपने भाषण में कुछ देर के लिए ठहरकर, उन्होंने इस महान देशभक्त की अविस्मरणीय विरासत और बलिदानों के लिए उन्हें सम्मान दिया। श्री मोदी ने कहा, "इस मौके पर मैं डॉ. मुखर्जी को नमन करता हूँ और उन्हें श्रद्धांजलि देता हूँ।"

मौजूदा सरकार की 'राष्ट्र प्रथम' की सोच को ऐतिहासिक हस्तियों को सही सम्मान देने से जोड़ते हुए, प्रधानमंत्री ने इस जयंती के लिए चल रहे दो वर्षीय राष्ट्रीय उत्सव के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि पिछले साल जुलाई में शुरू हुआ यह उत्सव, उस दूरदर्शी नेता के रास्ते पर चलने और उनका सम्मान करने के लिए एक मिला-जुला और दीर्घ प्रयास है। श्री मोदी ने कहा, "जब 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है।"

प्रधानमंत्री ने कहा कि बंगाल में नई बनी राज्य सरकार ने इन राष्ट्रीय उत्सवों की भव्यता को काफी बढ़ा दिया है। उन्होंने खास तौर पर हाल ही में शानदार ढंग से आयोजित 'पश्चिम बंग दिवस' की सराहना की, जो उस क्षेत्र की समृद्ध विरासत के लिए एक सुंदर और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ सम्मान था। श्री मोदी ने कहा, "आज का कार्यक्रम भी अपनी विरासत के प्रति उसी सम्मान का एक हिस्सा है।"

संसद के अहम ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स का ज़िक्र करते हुए, प्रधानमंत्री ने 1947 के उस गंभीर संकट को याद किया, जब साज़िशों के ज़रिए पूरे बंगाल को देश से अलग करने की कोशिश की गई थी। उन्होंने उस वक्त इस नेता के मज़बूत राजनीतिक विरोध और जनमत तैयार करने के बेहतरीन कौशल की तारीफ़ की, जिससे राज्य का भारत में स्थायी विलय सुनिश्चित हो सका। श्री मोदी ने कहा, "जैसा कि डॉ. मुखर्जी ने कहा था, सुनहरे भविष्य की नींव सिर्फ़ राष्ट्रीय एकता के आधार पर ही रखी जा सकती है।"

इस ऐतिहासिक विरोध को आज की भू-राजनैतिक चुनौतियों से जोड़ते हुए, उन्होंने ऐसी विलक्षण राजनीतिक इच्छाशक्ति के स्थायी प्रभाव का ज़िक्र किया। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि अतीत की उन परिस्थितियों पर विचार करने से आज के हालात से निपटने के लिए ज़रूरी वैचारिक मज़बूती मिलती है। श्री मोदी ने कहा, "आज के हालात को देखते हुए हमें उस ज़बरदस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति का एहसास आज भी होता है।"

संपूर्ण राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्ष की बात करते हुए, प्रधानमंत्री ने देश की सीमाओं के भीतर दोहरी प्रशासनिक और प्रतीकात्मक व्यवस्था बनाए रखने के ख़िलाफ़ हुए कड़े ऐतिहासिक विरोध के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने शासन और राष्ट्रीय पहचान में एकरूपता की ज़ोरदार मांग वाले उस शक्तिशाली नारे को याद किया। श्री मोदी ने कहा, "उन्होंने देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडों की बात का कड़ा विरोध किया था।"

इस संघर्ष को सिर्फ़ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि समान अधिकारों की एक गंभीर पुकार बताते हुए, उन्होंने कश्मीर में इस एकता के मकसद के लिए किए गए सर्वोच्च त्याग को सम्मानपूर्वक याद किया। उन्होंने बेहद गर्व के साथ कहा कि मौजूदा सरकार ने अनुच्छेद 370 की बाधाओं को हमेशा के लिए खत्म करके इस विरासत का सही सम्मान किया है। उन्होंने कहा, "आज हमारी सरकार को गर्व है कि उस दीवार को गिराकर हमने डॉ. मुखर्जी का सपना पूरा किया है।"

एकजुट राष्ट्र के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, प्रधानमंत्री ने एक ऐसे समाज का ज़िक्र किया, जिसमें क्षेत्रीय भेदभाव न हो और जहाँ पूरब से पश्चिम तक समान अवसर बिना किसी रुकावट के उपलब्ध हों। उन्होंने एक मज़बूत ढाँचे की भी बात की, जिसमें अलग-अलग राज्यों की पहचान मिलकर एक साझा भविष्य के तहत देश की सामूहिक ताकत को और मज़बूत बनाती है। श्री मोदी ने कहा, "यह उसी राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विस्तार है, जिसे उन्होंने अपने जीवन से परिभाषित किया था।"

एकसमान कानूनी व्यवस्था के साकार होने का जश्न मनाते हुए, उन्होंने एकीकृत शासन मॉडल से मिली व्यापक प्रेरणा का भी ज़िक्र किया। उन्होंने देश के संविधान को बिना किसी अपवाद के हर जगह लागू होते देखकर महसूस होने वाले सामूहिक गर्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, "आज भारत का संविधान पूरे देश में पूरे गर्व और सम्मान के साथ लागू है।"

शिक्षा के अहम क्षेत्र की बात करते हुए, प्रधानमंत्री ने उस दूरदर्शी व्यक्ति की शुरुआती प्रशासनिक काबिलियत को याद किया, जब वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा उप-कुलपति बने थे। उन्होंने औपनिवेशिक सोच से पूरी तरह बाहर निकलकर, शैक्षणिक जगहों को सिर्फ़ प्रशासनिक बाधाओं से बदलकर, देश के भविष्य को बनाने वाले सक्रिय केंद्रों में बदलने की सोचे-समझे प्रयासों की तारीफ़ की। प्रधानमंत्री ने कहा, "वे अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्र-निर्माण का मूल आधार संस्थानों का निर्माण है।"

भाषा पर गर्व की बात करते हुए, उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के ज़रिए क्षेत्रीय आत्म-सम्मान को फिर से स्थापित करने की ऐतिहासिक कोशिशों पर ज़ोर दिया। उन्होंने इस मुख्य सोच को दोहराया कि सच्चा राष्ट्रीय आत्मविश्वास, देश की अपनी आत्मा और उसकी अपनी भाषाओं से गहराई से जुड़ा होना चाहिए। श्री मोदी ने कहा, "उनका मानना ​​था कि अगर भारत को एक आत्मविश्वासी राष्ट्र बनना है, तो उसकी शिक्षा को भारतीय आत्मा से जुड़ा होना चाहिए।"

शिक्षा से जुड़ी पुरानी सोच और आधुनिक नीति के बीच तालमेल बिठाते हुए, प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं पर दिए गए ज़ोर का ज़िक्र किया। उन्होंने व्यवस्था में हो रहे इस बड़े बदलाव को एक लंबे समय से चली आ रही राष्ट्रीय इच्छा के प्रशासनिक रूप से पूरा होने के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा, "डॉ. मुखर्जी ने स्थानीय भाषाओं को लेकर जो सपना देखा था, हमारी सरकार ने उसे पूरा किया है।"

आज़ाद भारत के पहले उद्योग मंत्री की आर्थिक दूरदर्शिता का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, सिंदरी फर्टिलाइज़र प्लांट, दामोदर वैली कॉर्पोरेशन और आईएफसीआई जैसे बड़े संस्थानों की स्थापना का उल्लेख किया। उन्होंने इन बुनियादी संस्थानों को दशकों तक देश के रेलवे, कृषि, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्रों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने का श्रेय दिया। प्रधानमंत्री ने कहा, "उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक ताकत बने।"

इन बड़े आधारभूत ढ़ांचों और अकादमिक परियोजनाओं के मकसद को नए नज़रिए से देखते हुए, प्रधानमंत्री ने समझाया कि इन्हें कभी भी सिर्फ़ फ़ैक्टरी या डिग्री देने वाली संस्थाओं के तौर पर नहीं देखा गया। इसके बजाय, उन्होंने एक गहरी सोच का ज़िक्र किया, जिसमें रिसर्च लैब और औद्योगिक संयंत्र राष्ट्रीय प्रगति के लिए समर्पित पवित्र स्थानों की तरह काम करते हैं। पीएम मोदी ने कहा, "उनके लिए, ये सभी राष्ट्र-निर्माण के साधना-केंद्र थे।"

विकास की इस व्यापक सोच का विस्तार से वर्णन करते हुए, उन्होंने ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, जो प्रतिभाओं को बढ़ावा दे, नवाचार को रफ्तार दे और आर्थिक आत्मनिर्भरता को पूरी तरह से मज़बूत करे। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त विरासत बनाने की यही भावना, आज भी राष्ट्रीय प्रगति के आधुनिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रही है। श्री मोदी ने कहा, "यही भावना आज विकसित भारत के लिए प्रेरणा है।"

युवा पीढ़ी से एक सशक्त अपील करते हुए, प्रधानमंत्री ने उनसे आग्रह किया कि वे एक एकजुट राष्ट्र के लिए चली आ रही ऐतिहासिक लड़ाई को देश की सर्वोच्च उत्कृष्टता के लिए एक आधुनिक अभियान में बदलें। उन्होंने युवाओं को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनने की बड़ी ज़िम्मेदारी मिलकर उठाने की चुनौती दी। प्रधानमंत्री ने ज़ोर देते हुए कहा, "हमें मिलकर 'विकसित भारत' के संकल्प को पूरा करना है।"

पुराने वक्त से जुड़ी एक अहम सलाह के साथ अपना संबोधन समाप्त करते हुए, उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे हर काम को पूरी गंभीरता, समर्पण और उसे पूरा करने के पक्के इरादे के साथ करें। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए इस वर्चुअल कार्यक्रम का समापन किया। श्री मोदी ने कहा, "आप जो भी काम शुरू करें, उसे पूरी गंभीरता से करें और अधूरा न छोड़ें।"

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जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्रीय नायकों को भी उचित सम्मान मिलता है: पीएम मोदी
July 06, 2026
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डॉ. मुखर्जी ने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक ताकत बने: पीएम

केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे सहयोगी अमित भाई शाह, गजेंद्र सिंह शेखावत, पश्चिम बंगाल के ऊर्जावान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, भाजपा के वरिष्ठ सदस्य, हम जैसे लाखों कार्यकर्ताओं की प्रेरणा, श्रीमान माखनलाल जी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, श्री शॉमिक भट्टाचार्य, उपस्थित जनप्रतिनिधिगण, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सबको मेरा नमस्कार!

मैं अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के कारण, इस समय प्रवास पर हूं। लेकिन टेक्नोलॉजी की मदद से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में आपसे जुड़ रहा हूं।

साथियों,

आज देश की धरती, पश्चिम बंगाल की धरती, अपने एक महान सपूत, एक महान देशभक्त, भारत की अखंडता के लिए समर्पित एक युगदृष्टा को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रही है। आज हम उस विचार बीज का गुणगान कर रहे हैं, जो वर्तमान समय में चारों तरफ फल-फूल रहा है। जो, आधुनिक भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

साथियों,

जहाँ जमीन से जुड़ी हुई वैचारिक शक्ति हो, साथ-साथ इरादे मजबूत हो और नीयत साफ़ हो और जब नए संकल्प के साथ संपूर्ण समर्पण हो और ये सारी कड़ियां जब आपस में जुड़ जाती हैं, तो संकल्प की सिद्धि होती ही होती है। और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ऐसा ही जीवन जी करके दिखाया है। मैं डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती के अवसर पर उन्हें नमन करता हूं, अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

साथियों,

आज का यह कार्यक्रम इस बात का भी साक्षी है कि जब राष्ट्र प्रथम के संकल्प वाली सरकार होती है, तो राष्ट्र नायकों को सम्मान भी मिलता है और उनके विजन पर चलने का भी प्रयास होता है। डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती को, हमारी सरकार दो वर्षों के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रही है। यह पिछले वर्ष 6 जुलाई को शुरू हुए थे और अगले साल 6 जुलाई तक चलेंगे। और अब तो बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस राष्ट्रीय सम्मान को, एक प्रेरणा पुरुष को याद करने में बंगाल ने अपने आप में रौनक बढ़ा दी है। कुछ दिन पहले ही 20 जून को भव्य तरीके से पश्चिम बंग दिवस का आयोजन किया गया था। यह बंगाल की धरती, बंगाल की विरासत को प्रणाम था। आज का यह कार्यक्रम अपनी विरासत के प्रति उसी सम्मान का हिस्सा है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार को इतने भव्य कार्यक्रम के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी का जीवन, एक विचार से जन-आंदोलन तक की परिणति का प्रेरक है। उन्होंने भारत में एक वैचारिक आंदोलन को जन्म दिया। आप देखिए, जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई थी, तब हर तरफ कांग्रेस का ही बोलबाला था, कांग्रेस का ही वर्चस्व दिखाई देता था। एक ऐसे दौर में, जब अलग विचार के लिए कोई जगह ही नहीं थी, बड़ी मुश्किल था पैर रखने के लिए भी जगह मिल जाए, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन सारी परिस्थितियों को चुनौती देते हुए एक नए विचार का साहस किया। यह केवल एक संगठन बनाने का निर्णय नहीं था, एक राजनीतिक दल को जन्म देने का काम नहीं था। यह लोकतंत्र में वैचारिक विविधता, राष्ट्रीय चिंतन और जनभागीदारी पर उनके अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थी। इसी विश्वास से भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ। और साथियों, कोई भी विचार केवल स्थापना से अमर नहीं होता। विचार तब अमर होता है, जब पीढ़ियाँ उसे अपने जीवन से सींचती हैं। भारतीय जनसंघ के उस छोटे से दीये को जलाए रखने के लिए लक्षावधि कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन खपा दिया। पल-पल, तिल-तिल, लाखों कार्यकर्ताओं के तप, त्याग और समर्पण ने, उस दीये की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज वह दीया अपने मूल स्वरूप में भले न दिखाई देता हो, भारतीय जनसंघ आज उसी रूप में भले न हो, लेकिन उस दीये का जो प्रकाश-पुंज था, वो आज करोड़ों देशवासियों के विश्वास का प्रकाश बनकर फैल रहा है। उसी प्रकाश का विस्तार आज पूरे देश में खिले हुए करोड़ों कमल के रूप में दिखाई देता है। कभी जो भारतीय जनसंघ था, वही आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बनकर जनसेवा कर रहा है।

साथियों,

अक्सर हम देखते हैं कि समय के साथ कुछ विचारों का आकर्षण फीका पड़ता जाता है। लेकिन आप सोचिए, यह कितना सशक्त विचार-बीज डॉक्टर मुखर्जी ने रोपा है कि आज इतने साल बाद भी उसका इतनी तेजी से विस्तार हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है, जब आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय जनता पार्टी की इस यात्रा का इतिहास लिखेंगी, इसका अध्ययन करेंगी, तब वह निश्चित रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों, उनके साहस और उनकी दूरदृष्टि का उल्लेख करेंगी। और मैं फिर कहूंगा, बंगाल के लिए तो यह डबल खुशी की बात है। एक तो डॉक्टर मुखर्जी की 125वीं जन्मजयंती और दूसरा, बंगाल में यह आयोजन, उनके विचार पुंज से निकली भाजपा सरकार में ये भव्य उत्सव हो रहा है। पश्चिम बंगाल की जनता की तरफ से अपने महान सपूत को ये बहुत ही आत्मीय श्रद्धांजलि है।

साथियों,

संसद में अपने एक भाषण में डॉक्टर मुखर्जी ने कहा था और यह डॉक्टर मुखर्जी का यह वाक्य आज भी हमें प्रेरणा देता है। डॉक्टर मुखर्जी ने पार्लियामेंट में कहा था- राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। और देखिए, आज देश गर्व से कह सकता है कि डॉक्टर मुखर्जी अंतिम सांस तक इसी विश्वास को वो जीते थे, उन्होंने इसे जीया था। 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, लगभग तय हो चुका था, तब एक और संकट सामने था। पूरे के पूरे बंगाल को ही भारत से अलग करने की साजिशें रची जा रही थीं। तब डॉक्टर मुखर्जी इन साजिशों के सामने चट्टान बनकर खड़े हो गए। उन्होंने जनमत तैयार किया, राजनीतिक संघर्ष किया और यह सुनिश्चित किया कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे और तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हुंकार भरी थी। उनके शब्द थे- कांग्रेस देश भाग कोरेछे, आमी पाकिस्तान के भाग कोरेछी। यानि कांग्रेस ने देश का बंटवारा किया, और मैंने पाकिस्तान का ही बंटवारा कर दिया।

साथियों,

यह जो हुंकार है, इसकी जो ताकत है, इसमें जिस बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति के दर्शन होते हैं, उसका एहसास हमें तब भी होता है, जब हम आज की परिस्थितियों को देखते हैं।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, एक भारत श्रेष्ठ भारत के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। और इसलिए, जब देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान की बात हुई, तो डॉक्टर मुखर्जी ने इसका भी जमकर विरोध किया। उन्होंने देश को मंत्र दिया- एक देशे दुई बिधान, दुई प्रोधान एबॉन्ग दुई निशान, आमरा कोखोनो मेने नेबो ना यानि "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान— नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।" यह केवल एक नारा नहीं था। यह समान अधिकार, समान संविधान और समान राष्ट्रीय चेतना का आह्वान था। उन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया, जेल गए और अंततः कश्मीर के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आज हमारी सरकार को इस बात का गर्व है कि आर्टिकल 370 की दीवार गिराकर हमने डॉक्टर मुखर्जी का सपना पूरा किया है।

साथियों,

आज जब हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, तो यह उसी राष्ट्रीय दृष्टि का विस्तार है, जिसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन से परिभाषित किया। एक ऐसा भारत-जहाँ उत्तर और दक्षिण के बीच कोई दूरी न हो, जहाँ पूर्व और पश्चिम, समान अवसरों के सहभागी हों, जहाँ हर राज्य अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भारत की सामूहिक शक्ति बने। जहाँ हर नागरिक एक ही संविधान, एक ही राष्ट्रीय भावना और एक ही भविष्य के संकल्प से जुड़ा हो। मुझे खुशी है कि डॉक्टर मुखर्जी की प्रेरणा से आज भारत का संविधान पूरे देश में आन-बान-शान के साथ लागू है और कोटि-कोटि देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है।

साथियों,

डॉक्टर मुखर्जी, इस बात को अच्छे से समझते थे कि संस्थाओं के निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का तत्व छुपा है। मात्र 33 वर्ष की आयु में डॉ. मुखर्जी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। लेकिन उन्होंने उस पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने विश्वविद्यालय को भारत के भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा को गुलामी की सोच के दायरे के बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने कहा- बोंगो-जातिर आत्तोशोम्मान पुनोर-उद्धार, एबॉन्ग मातृ-भाषार माध्योमे शिख्खार प्रोशार एई आमादेर प्रोधान लोक्खो होवा उचित! यानि बंगाल के लोगों का आत्मसम्मान लौटाना और मातृभाषा में पढ़ाई, यह हमारा प्रथम उद्देश्य है। उनका विश्वास था कि यदि भारत को आत्मविश्वासी राष्ट्र बनना है, तो उसकी शिक्षा भी भारतीय आत्मा से जुड़ी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया। आज हमें इस बात का भी गर्व है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया जा रहा है। जो सपना डॉक्टर मुखर्जी ने देखा था, वो हमारी सरकार ने पूरा किया है।

साथियों,

स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास का वृहद विजन रखा था। उन्होंने ऐसे राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी, जो आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक शक्ति बनें। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने भारत की रेल व्यवस्था को नई गति दी। सिंदरी फर्टिलाइजर प्लांट ने कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया। दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने ऊर्जा और सिंचाई का नया अध्याय लिखा। इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (IFCI) ने भारतीय उद्योगों को वित्तीय आधार दिया।

साथियों,

उनके लिए उद्योग, फैक्ट्रियां, यह केवल कुछ कल कारखाने नहीं थे। विश्वविद्यालय, केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं थे। रिसर्च इंस्टीट्यूशंस, केवल वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं थे। उनके लिए ये सभी, राष्ट्र निर्माण के साधना केंद्र थे। डॉक्टर मुखर्जी, ऐसी संस्थाओं के पक्षधर थे, जो टैलेंट को अवसर दें। ऐसी शिक्षा, जो इनोवेशन को प्रोत्साहन दे। ऐसे उद्योग, जो आत्मनिर्भरता का आधार बने। और ऐसी व्यवस्था, जो आने वाली पीढ़ियों को और अधिक सशक्त भारत सौंप सके। और यही स्पिरिट, आज विकसित भारत की भी प्रेरणा है।

साथियों,

आज के इस अवसर पर मैं, बंगाल के, पूरे देश के मेरे युवा साथियों से कहूंगा, डॉक्टर मुखर्जी ने एक भारत के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हम सबको श्रेष्ठ भारत के लिए जीना है, हमें मिलकर विकसित भारत का संकल्प सिद्ध करना है। हमें देश को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी आह्वान के साथ, एक बार फिर से मैं डॉक्टर मुखर्जी को नमन करता हूं। मैं उनके ही शब्दों में अपनी बात समाप्त करूंगा। यह डॉक्टर मुखर्जी के शब्द हैं, यह उनकी भाव भंगिमा है- जे काज एई हाते नाओ ना केनो, ता अत्योंतों गुरुत्तो शहोकारे कोरते होबे जो भी काम आरंभ करो, उसे पूरी गंभीरता से करो, तन्मयता से करो, पूरी निष्ठा से करो, कोई भी काम अधूरा ना छोड़ो, उसे जरूर पूरा करो। डॉक्टर मुखर्जी के शब्दों में यह प्रवाहित भावना के साथ, इनके ही इन शब्दों के साथ आप सभी को भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

बहुत-बहुत धन्यवाद!