4 मार्च, 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के जामनगर स्थित एक अभूतपूर्व वन्यजीव बचाव, पुनर्वास और संरक्षण केंद्र ‘वनतारा’ का उद्घाटन किया। रिलायंस जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स के भीतर 3,500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला वनतारा अपनी तरह की दुनिया की सबसे बड़ी फैसिलिटी है, जो 2,000 से अधिक प्रजातियों के 1.5 लाख से अधिक बचाए गए, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त जानवरों को आश्रय प्रदान करता है। वनतारा केवल एक आश्रय स्थल नहीं है, बल्कि एथिकल एनिमल वेलफेयर और इकोलॉजिकल सस्टेनेबिलिटी के प्रति भारत की विकसित होती प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
अपने दौरे में, प्रधानमंत्री मोदी ने सेंटर के उदार दृष्टिकोण, विशेष रूप से हाथियों को बचाने और पुनर्वास के प्रयासों पर प्रकाश डाला, साथ ही समाज से वन्यजीवों के प्रति दयाभाव और रेस्पॉन्सिबिलिटी अपनाने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे का सबसे मार्मिक पहलू वनतारा में रेस्क्यू किए गए हाथियों की कहानियों पर उनका फोकस था।
प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी दुर्दशा के बारे में दर्दनाक कहानियाँ साझा कीं: एक हाथी पर एसिड अटैक हुआ था, दूसरे को उसके अपने महावत ने अंधा कर दिया था, और एक और हाथी को तेज़ रफ़्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी। वनतारा में, इन हाथियों के साथ बेमिसाल सम्मान और दयालुता से पेश आया जाता है। इस फैसिलिटी का एलीफैंट केयर सेंटर, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा एलीफैंट हॉस्पिटल कहा जाता है, उनकी ज़रूरतों के हिसाब से अत्याधुनिक तकनीक से लैस है।
हाइड्रोलिक सर्जिकल प्लेटफॉर्म और विशेष लिफ्टिंग उपकरण से लेकर कस्टम-डिज़ाइन किए गए एंडोस्कोप तक, यह सेंटर स्ट्रेस-फ्री मेडिकल प्रोसीजर्स को सुनिश्चित करता है। एक हाइड्रोथेरेपी तालाब आर्थराइटिस को कम करता है, एक हाइपरबेरिक ऑक्सीजन चैंबर घाव भरने में सहायता करता है, और एक स्पेशलाइज़्ड फुट केयर यूनिट पुरानी समस्याओं का समाधान करती है। आयुर्वेदिक उपचार और एक्यूपंक्चर उनके स्वास्थ्य में सुधार को और बेहतर बनाते हैं, जो पुनर्वास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है। पीएम मोदी ने इस गहन देखभाल की सराहना की और इसे मानव व प्रकृति के सह-अस्तित्व का एक आदर्श मॉडल बताया।
वनतारा की प्रतिबद्धता हाथियों से कहीं आगे तक फैली हुई है। सैंक्चुरी ने 200 से ज़्यादा हाथियों, 300 बिग कैट्स प्रजाति के जानवरों (जिनमें तेंदुए, बाघ, शेर और जगुआर शामिल हैं), 300 शाकाहारी जानवरों जैसे हिरण और 1,200 से ज़्यादा सरीसृपों जैसे मगरमच्छ, सांप और कछुओं को बचाया है। हर जानवर की कहानी वनतारा के मिशन को पुष्ट करती है कि वह सिर्फ़ जीवित रहने की सुविधा ही नहीं देता, बल्कि सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर भी देता है।
वनतारा की एक खासियत इसकी चेन-फ्री फिलॉसफी है। पारंपरिक चिड़ियाघरों या जानवरों को बांधकर रखने वाले बाड़ों के विपरीत, वनतारा स्ट्रेस-फ्री वातावरण को प्राथमिकता देता है। सैंक्चुरी का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर भी उतना ही क्रांतिकारी है। इसका 1 लाख वर्ग फुट का हॉस्पिटल और मेडिकल रिसर्च सेंटर MRI, CT स्कैन, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी और ब्लड प्लाज्मा सेपरेटर जैसे उन्नत उपकरणों से लैस है।
अपने दौरे के दौरान पीएम मोदी ने एक एशियाई शेर का MRI और एक तेंदुए को हाईवे एक्सीडेंट के बाद लाइफ सेविंग सर्जरी करवाते हुए देखा। इस फैसिलिटी में वाइल्डलाइफ एनेस्थीसिया, कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, डेंटिस्ट्री और इंटरनल मेडिसिन के लिए विशेष विभाग शामिल हैं, जिनमें पशु चिकित्सकों की एक ग्लोबल टीम कार्यरत है।
प्रधानमंत्री मोदी का दौरा एक रस्मी उद्घाटन से कहीं ज़्यादा था; यह वनतारा के मिशन और वैश्विक संरक्षण में भारत की व्यापक भूमिका का एक जीवंत प्रदर्शन था। जानवरों के साथ उनका इंटरेक्शंस भावनात्मक और प्रतीकात्मक दोनों ही था। उन्होंने एशियाई शेर के शावकों, फैसिलिटी में पैदा हुए एक सफ़ेद शेर के शावक और एक क्लाउडेड तेंदुए के शावक को आहार दिया, जिससे लुप्तप्राय प्रजातियों की अगली पीढ़ी के पोषण में सेंटर की सफलता का प्रदर्शन हुआ।
उन्होंने केचप और चटनी नामक ओरंगुटानों के साथ खेला, जिन्हें भीड़भाड़ वाली परिस्थितियों से बचाया गया था और चिकित्सीय जकूज़ी का आनंद लेते हुए हाथियों के साथ घुलमिल गए। अन्य मुख्य आकर्षणों में जिराफ़ को खाना खिलाना, ओकापी को थपथपाना और दो सिर वाले सांप व दो सिर वाले कछुए जैसी दुर्लभ प्रजातियों को देखना शामिल था।
प्रधानमंत्री मोदी ने रेस्क्यू किए गए तोतों को वापस जंगल में छोड़ा, जो उनकी उड़ान प्रकृति के संतुलन को बहाल करने के वनतारा के अंतिम लक्ष्य का प्रतीक है। केंद्र के कर्मचारियों, डॉक्टरों, केयरगिवर्स और वर्कर्स के साथ उनकी बातचीत ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पीछे मानवीय प्रयासों पर और ज़ोर दिया।
वनतारा की स्थापना भारत में एथिकल एनिमल वेलफेयर और इकोलॉजिकल सस्टेनेबिलिटी पर बढ़ते जोर के अनुरूप है। सेंटर की पहल जैसे कि कैराकल और एशियाई शेर जैसी गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए ब्रीडिंग प्रोग्राम्स; बायोडाइवर्सिटी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हैं। दुनिया में सबसे बड़ी 75 कस्टम-इंजीनियर्ड एलीफैंट एम्बुलेंस का इसका फ्लीट इसके प्रोएक्टिव रेस्क्यू एफर्ट्स का उदाहरण है।
पीएम मोदी की यात्रा ने वैश्विक संरक्षण में अग्रणी के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत किया। वनतारा के काम को उजागर करके, उन्होंने प्रकृति के प्रति सह-अस्तित्व और दयालुता की आवश्यकता पर ध्यान आकर्षित किया, जो एक ऐसा संदेश है जो सीमाओं से परे गूंजता है। सैंक्चुरी; इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंजरवेशन ऑफ़ नेचर (IUCN) और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) जैसी इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशंस के साथ सहयोग करती है, अपने ऑपरेशंस में एडवांस्ड रिसर्च ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेस को इंटीग्रेट करती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान जो विचार व्यक्त किए, उनमें एक गहरी अपील थी: समाज को गैरजिम्मेदारी को त्यागकर करुणा को अपनाना चाहिए। यह आह्वान वनतारा के सिद्धांतों को प्रतिध्वनित करता है, जिसे अनंत अंबानी ने “चिड़ियाघर” के बजाय “सेवालय” के रूप में वर्णित किया है। मनोरंजन-केंद्रित सुविधाओं के विपरीत, वनतारा; पुनर्वास, बचाव, संरक्षण और संवर्धन को प्राथमिकता देता है, जो एक ऐसा मॉडल पेश करता है जिसका अन्य देश अनुकरण कर सकते हैं।
इस सैंक्चुरी को कॉर्पोरेट कैटेगरी में एनिमल वेलफेयर के लिए भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘प्राणी मित्र’ नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया जाना इसके प्रभाव को और पुष्ट करता है। पीएम मोदी की यात्रा ने इस विजन को प्रमुखता दी, जहां बचाए गए हाथी, शेर के शावक और ओरंगुटान केंद्र में रहे, जिनके जीवन पूरी तरह बदल चुके हैं।
दुनिया जब आवास विनाश, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, तो वनतारा आशा की किरण दिखाता है। यह एक सुरक्षित आश्रय के रूप में खड़ा है जहाँ वन्यजीवों को न केवल बचाया जाता है बल्कि उनका सम्मान भी किया जाता है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य के भारत के प्राचीन लोकाचार को दर्शाता है। पीएम मोदी के शब्दों और वनतारा के कार्यों से यह स्पष्ट है कि जानवरों के प्रति दयालुता एक विकल्प नहीं है, बल्कि एक कर्तव्य है जिसे हम सभी साझा करते हैं।
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है: राइजिंग भारत समिट में पीएम मोदी
February 27, 2026
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विकसित देश भारत के साथ व्यापार समझौते(ट्रेड डील) करने को उत्सुक हैं, क्योंकि आत्मविश्वासी भारत हताशा और निराशा से ऊपर उठकर निस्संदेह आगे बढ़ रहा है: पीएम
पिछले 11 वर्षों में देश की चेतना में एक नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है, भारत अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने के लिए दृढ़ संकल्पित है: पीएम
भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना आज वैश्विक चर्चा का विषय बन चुका है: पीएम
आज भारत के हर कदम पर विश्व भर में बारीकी से नजर रखी जाती है और उसका विश्लेषण किया जाता है; एआई शिखर सम्मेलन इसका स्पष्ट उदाहरण है: पीएम
राष्ट्र-निर्माण कभी आज की सुविधा से नहीं होता; यह बड़े विजन,धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है: पीएम
इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।
नमस्कार!
नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!
आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।
साथियों,
सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।
लेकिन साथियों,
बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।
साथियों,
जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।
साथियों,
दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?
साथियों,
एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।
साथियों,
जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।
साथियों,
अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।
साथियों,
AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।
साथियों,
कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।
साथियों,
मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।
साथियों,
देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।
साथियों,
लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।
साथियों,
कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।
और साथियों,
हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।
साथियों,
राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।
साथियों,
मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।
साथियों,
यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।
साथियों,
21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।