प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद इकोनॉमिक पैकेज और रिफॉर्म्स को लेकर खबरें जरुर बनीं, लेकिन एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह भी था, जिस पर कई लोगों ने गौर नहीं किया होगा, लेकिन फिर भी यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि आगे आने वाला समय कैसा होगा। मैं 2001 में कच्छ भूंकप के बाद मोदी के काम के बारे में बात कर रहा हूं।
हम सभी जानते हैं कि 26 जनवरी 2001 की उस भयावह सुबह के बाद कच्छ के लोगों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने इस इलाके के दुखद समाचार के बारे में उल्लेख किया, जो गुजरात के सबसे पिछड़े इलाकों में से था। हालांकि, अगला दशक कच्छ की प्रगति का दशक बन गया। इसके पीछे का कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी का अनूठा अप्रोच था।
जब कच्छ में भूकंप आया था तब हर कोई जितना संभव हो उतना दूर भाग रहा था, वहीं एक व्यक्ति ग्राउंड जीरो पहुंच कर लोगों की मदद करने को बेताब था। मोदी तब भाजपा के एक महासचिव थे। इसी वर्ष बाद में जब उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला, तो उनका सर्वोच्च प्राथमिकता कच्छ का पुनर्निर्माण और बचाव कार्यों को सुव्यवस्थित करना था। नये मुख्यमंत्रियों के पास आमतौर पर "हनीमून पीरियड" होता है, लेकिन नियति के पास मोदी के लिए अलग योजना थी।
मोदी ने ये सब कैसे किया? उत्तर बहु-आयामी अप्रोच में है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात लीक से अलग हटकर सोचना, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और सहायता करना है।
उस समय एक प्रमुख चुनौती घरों की कमी थी। गांव के बाद गांव और शहर के बाद शहर नष्ट हुए घरों को देखा जा सकता था। साथ ही राजमिस्त्री की भी भारी कमी थी। गुजरात सरकार ने तेजी से काम किया और लोकल समुदायों को जोड़ा, छोटी टीमें बनाई गईं, प्रत्येक टीम को किट दिया गया और घरों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया। धीरे-धीरे आवास की चुनौती दूर हो गई। घरों की संख्या में वृद्धि हुई। घर पहले की तुलना में बड़े थे और उन्हें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार भी बनाया गया था।
इसकी तुलना लातूर (महाराष्ट्र) में भूकंप के बाद के परिदृश्य से करें, जहां भूकंप के कई साल बाद भी आवास अपर्याप्त थे और शौचालय निर्माण कार्यक्रम में कमियां थीं।
मोदी ने जिस दूसरे विषय पर जोर दिया वह था स्कूलों का निर्माण। उन्होंने कहा कि चाहे जो हो जाए, हमें स्कूली आधारभूत संरचना को पटरी पर लाने की जरूरत है। पीढ़ियों तक कच्छ के लोगों को उनके भाग्य पर छोड़ दिया था। यह एक ऐसा जिला था जो अपनी मरुभूमि और पाकिस्तान के साथ बॉर्डर (रेगिस्तान और पाकिस्तान) के लिए जाना जाता था। भूकंप के बाद मोदी कच्छ की इस धारणा को बदलने के लिए संकल्पित थे। मुख्यमंत्री के रूप में इस क्षेत्र के अपने पहले दौरे पर मोदी ने कहा था कि वे कच्छ को पाकिस्तान से जोड़ने की इस नैरेटिव को बदलना चाहते हैं।
मोदी ने तब कच्छ को कृषि क्षेत्र के रूप में विकसित करने की कल्पना की थी। भूकंप के बाद के वर्षों में कच्छ ने आम, खजूर और अनार का निर्यात करना शुरू किया। एक विस्तृत सिंचाई नेटवर्क स्थापित किया गया और धीरे-धीरे नर्मदा का पानी इस क्षेत्र में पहुंच गया।
पहले कच्छ जाने के लिए किसी को मनाना काफी मुश्किल था। तब लोग पूछते थे "वहां देखने के लिए क्या है?" फिर कच्छ रण उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें कच्छ की संस्कृति, परंपराओं और व्यंजनों का प्रदर्शन किया गया। स्थानीय हस्तशिल्प उद्योग को भी बढ़ावा दिया गया। इसने एक आर्थिक पुनरुत्थान में योगदान दिया। डेयरी और सहकारी समितियां, जिसपर कुछ लोगों को दबदबा था, बड़े पैमाने पर कच्छ में आईं। सड़कों, रेलवे और राजमार्ग बुनियादी ढांचे की बुनियादी बाधाओं को ठीक किया गया और रिकॉर्ड गति से काम किया गया।
किसी ने भी नहीं सोचा था कि एक दशक से भी कम समय में कच्छ, भारत के सबसे समृद्ध और प्रगतिशील जिलों में से एक होगा।
ये मोदी ही थे जिन्होंने कच्छ में अपने काम के जरिए एक प्रकार से भारत के आपदा प्रबंधन तंत्र को फिर से खड़ा किया। उन्होंने उन प्रक्रियाओं को स्थापित किया, जिनसे सरकारों को आपदाओं का सामना करना आसान हो गया। कच्छ भूकंप से पहले आपदा प्रबंधन आमतौर पर कृषि विभाग का एक विषय था- क्योंकि आपदाओं की हमारी परिभाषा कभी बाढ़ और सूखे से परे नहीं थी। 2003 में गुजरात विधानसभा ने गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम पारित किया, इस प्रकार आपदा प्रबंधन के लिए एक कानूनी और नियामक ढांचा बनाने वाला पहला राज्य बन गया। इसके बाद गृह मंत्रालय आपदा प्रबंधन पर नियंत्रण रखने और आपदाओं का मुकाबला करने में शामिल कई बारीकियों पर विचार करने लगा। यूपीए सरकार ने इसका अनुसरण किया और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 पारित किया। इस अधिनियम (एक्ट) ने गुजरात की तरह एनडीएमए बनाने के लिए प्रावधान स्थापित किए।
अभी हाल ही में जब मोदी ने कोविड के बाद के युग में स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन क्षेत्रों को फिर से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया, तो इसने मुझे कच्छ में उनके कामों की याद दिला दी। जो योजनाएं बनाई जा रही हैं, वे दीर्घकालिक उपाय हैं, जिनका उद्देश्य केवल क्षति को ठीक करना नहीं है, बल्कि भविष्य में इसी तरह की चुनौतियों के खिलाफ राष्ट्र को तैयार करना है।
मोदी के कच्छ का अनुभव आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि यह उम्मीद जगाता है कि सबसे विनाशकारी स्थितियों का भी सही तरह के नेतृत्व कर आशाजनक अवसर पैदा किया जा सकता है। यह इस बात की भी झलक देता है कि मोदी संकटों के समय में किस तरह से शासन कला (स्टैट्स्मन्शिप) प्रदान कर सकते हैं। वे पुनर्निर्माण के अल्पकालिक विचारों से ऊपर उठते हैं। वे केवल मरम्मत नहीं करते हैं, वे सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से विकास प्रक्षेपवक्र (डेवलपमेंट ट्रजेक्टरी) को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने इसे कच्छ में किया और निश्चित रूप से वे अब करेंगे।
लेखक का नाम : शशिरंजन यादव
डिस्कलेमर :
यह आर्टिकल पहली बार The Indian Express में पब्लिश हुआ था।
यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।


