यह देश, हमारी सरकार और हमारे बैंक, ये सब यहाँ के गरीबों के लिए हैं: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में ई-नौका योजना की शुरूआत की, नाव की सवारी का आनंद लिया
जन कल्याण वाली योजनाएं महत्वपूर्ण हैं न कि वोट बैंक को मजबूत करने वाली: प्रधानमंत्री
हम गरीबों को सशक्त कर रहे हैं ताकि इस देश का गरीब गरीबी के साथ अपनी लड़ाई में जीत हासिल कर सके: प्रधानमंत्री मोदी
ई-नौकाओं से प्रदूषण कम करने और इन नावों के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने वालों को ज्यादा पैसा कमाने में मदद मिलेगी: प्रधानमंत्री

आपने मुझे देश की सबसे बड़ी पंचायत में आशीर्वाद दे करके भेजा। आपने मुझे इतना भरपूर प्‍यार दिया, इतना भरपूर प्‍यार दिया है कि जो आज मुझे कार्य करने की प्रेरणा भी देता है ऊर्जा भी देता है। और इसके लिए मैं इस पवित्र धरती का आभारी हूं। यहां के लाखों-लाखों भाइयों बहनों का आभारी हूं, भोले बाबा का आभारी हूं, मां गंगा का आभारी हूं।

आज में सुबह बलिया में था और अभी काशी में अनेक कार्यक्रम करता-करता आप सबके बीच पहुंचा हूं। हमारे देश में दुर्भाग्‍य से राजनीति उस रूप में चलाई गई कि जिसमें हमेशा योजनाएं वही बनीं जिस योजनाओं से वोट बैंक मजबूत बनती रहे। देश का नागरिक मजबूत बने या ना बने, देश का गरीब मजूबत बने या न बने, हिन्‍दुस्‍तान के गांव, मोहल्‍ले, शहर मजबूत बने या न बनें, हिन्‍दुस्‍तान मजबूत बने या न बने लेकिन वोट बैंक मजबूत बनती रहनी चाहिए, यही कारोबार चला। अगर पहले निषाद भाइयों के वोट चाहिए तो क्‍या चर्चा हुआ करती थी, डीजल का थोड़ा दाम कम करो, एक रुपया कम करो जरा, निषाद लोग खुश हो जाएंगे तो वोट दे देंगे। कुछ ऐसी ही बातें हमेशा चलती रहीं। लेकिन जब तक हम समस्‍याओं की जड़ में नहीं जाते, और जड़ से समस्‍या का समाधान करने का प्रयास नहीं करते हैं तो आप चुनाव लड़ते जाएंगे, चुनाव जीतते जाएंगे लेकिन मेरा गरीब और गरीब बनता जाएगा और मुसीबत झेलता जाएगा। और इसलिए हमने जो भी योजनाएं बनाईं वो योजनाएं गरीब को वो ताकत देती हैं ताकि गरीब स्‍वयं गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए हिम्‍मत रखें, गरीब खुद ही अपने गरीबाई को खत्‍म करें, करीब खुद ही गरीबी को परास्‍त करके विजयी हो करे निकलें, उस दिशा में हम काम कर रहे हैं।

आपने देखा होगा, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, ये प्रधानमंत्री जन-धन योजना देश आजाद होने के बाद 70 साल होने आए हैं लेकिन इस देश के 40 प्रतिशत लोग जिन्‍हें बैंक का दरवाजा देखने का सौभाग्‍य नहीं मिला था, बैंक में खाता खोलने की बात तो छोड़ दीजिए उसने कभी सोचा नहीं था कि वो भी कभी बैंक में जा सकता है। हमने बीड़ा उठाया, क्‍या ये बैंक गरीबों के लिए होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? गरीबों का बैंकों पर हक होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? अगर गरीब बैंक से पैसा लेना चाहता है तो मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए? क्‍या गरीबों को अब भी साहूकारों के यहां जा करके ऊंचे ब्‍याज से पैसे लेने के लिए मजबूर होना पड़े वो अच्‍छी बात है क्‍या? और इसलिए भाइयो, बहनों हमने करीब 21 करोड़ से ज्‍यादा नागरिक इनके प्रधानमंत्री जन-धन योजना के बैंक एकाउंट खुलवा दिए और बैंक एकाउंट खुलने के समय हमने कहा था आप चिंता मत कीजिए आपके पास पैसे हैं कि नहीं हैं। बैंक वाले हमें कहते रहे साहब दस रुपया तो लेने दीजिए ये स्‍टेशनरी का खर्चा होता है, फार्म का खर्चा होता है, मुलाजिम का खर्चा होता है, ये मुफ्त में करेंगे तो बहुत घाटा हो जाएगा। मैंने कहा जो होगा सो होगा, गरीब के लिए बैंक होती है घाटा होगा तो गरीब के लिए मुझ मंजूर है। 

मैंने गरीबों के लिए कहा कि जीरो बैंलेस से बैंक एकाउंट खुलेगा, जीरो बैलेंस से। जीरो बैंलेस से बैंक एकाउंट खुलेगा और धन्‍यवाद, धन्‍यवाद भइया, इसका प्‍यार इतना बढ़ गया। हमने कहा जीरो बैंलेस होगा जीरो, एक नया पैसा नहीं होगा तो भी गरीब का बैंक का खाता खुलेगा। लेकिन इस देश का गरीब, जेब तो खाली होगा लेकिन उसका दिल कभी खाली नहीं होता है। जेब में पैसे नहीं होंगे लेकिन गरीब के मन की उदारता में कभी कटौती नहीं आती है। मोदी ने तो कह दिया था कि गरीबों को एक रुपया देने की जरूरत नहीं है खाता खुलवा दीजिए। लेकिन मेरे देश के गरीबों की अमीरी देखिए, अमीरों की गरीबी तो बहुत देखी, कभी गरीबों की अमीरी भी तो देखा करिए। और मैं आज सीना तान करके कह सकता हूं, सर उठा करके कह सकता हूं कि मेरे देश के गरीब कुछ भी मुफ्त का नहीं चाहते हैं। जीरो बैलेंस से एकाउंट खुलना था लेकिन मेरे देश के गरीबों ने 35 हजार करेाड़ रुपया बैंकों में जमा कराया, 35 हजार करोड़ रुपया।

जिस देश के गरीब ऐसी ऊंची भावना रखते हों, उन गरीबों के लिए जिंदगी खपाने का आनंद आएगा कि नहीं आएगा? उनके लिए काम करने का मजा आएगा कि नहीं आएगा? ऐसे गरीबों के लिए काम करें तो जीवन में संतोष मिलेगा कि नहीं मिलेगा? और इसलिए भाइयो, बहनों मुझे इतना आनंद इतना संतोष होता है, मेरे इन गरीब भाइयो, बहनों के लिए काम करता हूं, दिन-रात दौड़ने का मन करता रहता है। हमने प्रधानमंत्री जन-धन योजना में जो बैंक खाता खोलेगा लेकिन वो पड़ा रहने देना नहीं है, भले 5 रुपया है तो 5 रुपया जाना है, डालना है, निकालना है, डालना है, निकालना है। वो बैंक वाला मेहनत करेगा, करने दो। आप आदत डालो, बैंक में जाने की आदत डालो। बैंक वालों को भूलने मत दो। उनको भूलने मत दो। उनको याद रखना चाहिए कि देश गरीबों के लिए है, ये सरकार गरीबों के लिए है, ये बैंक भी गरीबों के लिए है। लेकिन अगर आप बैंक में जाना ही बंद कर दोगे तो वो तो भूल जाएगा। तो मेरी देश के सभी गरीबों से प्रार्थना है कि अपने जन-धन एकाउंट खोला है लेकिन महीने में एक दो बार बैंक में जाया करो। पांच, दस रुपया, पंद्रह रुपया रखते चलो कभी जरूरत पड़े तो निकालते चलो। बैंक में आप काम लेना सीखो। और अगर वो गया तो सरकार में गरीब अगर बैंक में खाता खोलता है तो उसका दो लाख रुपये का बीमा लिया है मेंने, दो लाख रुपये का बीमा। अगर उसके परिवार में कुछ हो गया तो दो लाख रुपया उसको तुरंत पहुंच जाएगा। ये व्‍यवस्‍था की है भाइयो। लेकिन ये तब होगा अगर हमारा गरीब बैंक में regular खाता चालू रखेगा। एक बार खोला, रखा, छोड़ दिया तो ये फायदा नहीं मिलगा। और इसलिए मैं आपका प्रतिनिधि हूं, सांसद के नाते आपने मुझे बिठाया है। मैं चाहता हूं मेरे बनारस में इसका सबसे ज्‍यादा फायदा लोग लें।

हमने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना लाए। ये मुद्रा योजना क्‍या है? हमारे देश में गरीब व्‍यक्ति उसको बेचारे को ज्‍यादा पैसे नहीं चाहिए। पांच सौ, हजार करोड़ रुपया नहीं चहिए उसको। उसको तो पांच हजार रुपया, दस हजार रुपया, पचास हजार रुपया, लाख रुपया, दो लाख रुपया। धोबी होगा, नाई होगा, प्रसाद बेचने वाला होगा, फूल बेचने वाला होगा, पूजा का सामान बेचने वाला होगा, गरीब आदमी, छोटा-छोटा काम करने वाला चाहे दूध बेचता हो, चाय बेचता हो, बिस्‍कुट बेचता हो, पकौड़े बेचता हो, उसको कभी पैसों की जरूरत होती है। बैंक के दरवाजे उसके लिए बंद हैं। तो बेचारा जाता है साहूकार के पास। और साहूकार के पास जा करके ऊंचे ब्‍याज से पैसा लेता है। और फिर ब्‍याज के चक्‍कर में ऐसा फंस जाता है, ऐसा फंस जाता है, रुपये तो जाते ही जाते हैं, लेकिन ब्‍याज देने का कभी बंद नहीं होता है और पूंजी तो जाती ही नहीं है और बेचारा गरीब नया अपना धंधा रोजगार विकसित नहीं कर सकता है। हमने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना बनाई और बैंक वालों को कहा यह देश गरीबों के लिए है, यह सरकार गरीबों के लिए है, यह बैंक भी गरीबों के लिए है। बिना गारंटी ऐसे छोटे-छोटे काम करने वाले जो लोग हैं, उनको बैंक से पैसा मिलना चाहिए, लोन मिलना चाहिए। और मेरे काशी के भाईयों-बहनों मुझे आपको यह बताते हुए गर्व होता है तीन करोड़ 30 लाख उससे भी ज्‍यादा लोगों को करीब-करीब सवा लाख करोड़ रुपये से ज्‍यादा दे दिया गया। कोई गारंटी केबिना दे दिया गया। और उसने अपने कारोबार को बढ़ा दिया, एक रिक्‍शा थी तो दो रिक्‍शा ले आया। एक टेक्‍सी थी तो दो टेक्‍सी ले आया। एक नौकर रखता था तो दो नौकर रख लिया, एक अखबार बैचता था तो चार अखबार बेचना शुरू कर दिया। 10 घरों में दूध देता था तो 20 घरों में दूध पहुंचाने लग गया। उसका कारोबार वो बढ़ाने लग गया। देश के इस आर्थिक काम में 60 percent से ज्‍यादा पैसे लाने वाले कौन है, जिसको बैंक का पैसा मिला है। दलित है, आदिवासी है, ओबीसी है, पिछड़ी जाति के लोग हैं और उसमें भी 22 प्रतिशत महिलाएं हैं। जिनको बैंकों ने लाखों रुपया दिया है। और मैंने बैंक वालों को पूछा, मैंने कहा भई क्‍या अनुभव है, नहीं-नहीं बोले साहब ये लोग समय पर आकर ब्‍याज दे जा रहे हैं। समय पर आ करके अपना हफ्ता दे जा रहे हैं। कभी उनको पूछना ही नहीं पड़ता है। मैंने कहा यही तो ईमानदार लोग हैं, उनके ऊपर भरोसा कीजिए देश आगे बढ़ जाएगा। भाईयों-बहनों विकास कैसे किया जा सकता है। इसका यह उदाहरण है।

आज मैंने बलिया में रसोईगैस गरीबों को देने की योजना का प्रांरभ किया। आपको मालूम है हमारे देश में रसोईगैस है तो अड़ोस-पड़ोस के लोगों कोदिखाते हैं देखो मेरे घर में रसोईगैस है। और जो केरोसिन से खाना पकाते हैं या मिट्टी के तेल से पकाते हैं या लकड़ी से पकाते हैं। उनके मन में रहता है इसके घर में तो रसोई का सिलेंडर आ गया, मेरे घर में कब आएगा। और बेचारे गरीब लोग, सामान्‍य लोग एक गैस का कनेक्‍शन लेने के लिए नेताओं के पीछे-पीछे दौड़ते हैं, अरे साहब कुछ करो न, एक-आध किसी को बता दो न मुझे गैस का कनेक्‍शन मिल जाए। यही चलता है कि नहीं चलता है? यही चला है कि नहीं.. और एक जमाना था ज्‍यादा दूर की बात नहीं कर रहा हूं कुछ ही साल पहले एमपी को 25 रसोईगैस के कूपन मिलते थे। एक साल में 25 और वो एमपी के घर लोग सुबह आते थे। साहब वो एक कूपन दे दो ना मुझे गैस का कनेक्‍शन लेना है। बेटे की शादी होने वाली है बहू शहर से आने वाली है। अगर गैस नहीं होगा तो शादी अटक जाएगी। हमें एक कनेक्‍शन दे दो। ऐसे दिन थे और यह नेता लोग कल आना, परसो आना। अगली बार देखेंगे, अभी खत्‍म हो गया। यही होता था कि नहीं होता था? भाईयों-बहनों और एमपी भी 25 गैस के कनेक्‍शन दिये तो बड़ा खुश हो जाता था, वाह, वाह क्‍या काम कर दिया है। भाईयों-बहनों वो भी एक सरकार थी जो 25 कनेक्‍शन के लिए बहुत बड़ा काम मानती थी और यह भी एक सरकार है। आपने बनाई हुई सरकार है यह। काशी वालों ने बिठाई हुई सरकार है यह। वो क्‍या कहते हैं, वो 25 कनेक्‍शन का काम देते थे। हमने निर्णय कर लिया तीन साल में पांच करोड़ परिवार को गैस का कनेक्‍शन दे देंगे।

भाईयों-बहनों यह काम में इसलिए कर रहा हूं कि गरीब मां जब लकड़ी का चूला जला करके खाना पकाती है, तो एक दिन में उसके शरीर में 400 सिगारेट का धुंआ जाता है। मुझे बताइये डॉक्‍टर कहते हैं दो सिगरेट पिओगे तो भी कैंसर हो जाएगा। कहते है कि नहीं कहते है? सिगरेट बंद करने के लिए डॉक्‍टर कहते हैं कि नहीं कहते हैं? यह मेरी गरीब माताओं का क्‍या होता होगा। क्‍या इन गरीब माताओं को मरने देना चाहिए? उनको बीमार होने देना चाहिए? उनके बच्‍चों को बीमार होने देना चाहिए? उनको इस मुसीबत से बाहर निकालना चाहिए कि नहीं चाहिए। अमीरों के लिए तो बहुत सरकारें आकर चली गई। अमीरों को देने वाली सरकार बहुत आकर गई। यह सरकार गरीबों को देने के लिए आई है। और इसलिए भाईयों-बहनों पांच करोड़ परिवारों को यह गरीब परिवार है जिनकी किसी नेता से जान-पहचान नहीं है। जिनके पास गैस का सिलेंडर लेने के लिए कनेक्‍शन लेने के लिए रिश्‍वत देने के लिए पैसे नहीं है। जिसका कोई नहीं है उसके लिए यह सरकार है मेरे भाईयों-बहनों।

और इसका परिणाम यह होगा उन माताओं की तबीयत तो अच्‍छी होगी, बच्‍चों की तबीयत अच्‍छी होगी। घर के अंदर अब उनको समय ज्‍यादा मिलेगा। अब लकड़ी जलानी नहीं पड़ेगी, लकड़ी लेने के लिए जाना नहीं पड़ेगा। और अपना बाकी समय में कुछ काम करना है, तो आराम से कर सकते हैं। यह काम करके दिया है भाई।

आज यहां आपने देखना मेरे मछुआरा भाईयों-बहनों को ई-बोट दे रहे हैं हम ई-बोर्ड। पहले चुनाव आता था तो मछुआरों को कितना डीजल देंगे, कितने में डीजल देंगे इसी की बातें हुआ करती थी। मेरे भाईयों-बहनों आज उसको इस संकट से हम बाहर कर रहे हैं। उसको उस मुसीबत से मुक्ति दिला रहे हैं। और हम ई-बोट देना शुरू कर रहे हैं। मैंने हमारे मछुआरे भाईयों से अभी मैं बात कर रहा था। मैंने उनको पूछा कि भई बताइये, दिनभर में कितना डीजल लेते हो उसने कहा साहब एक दिन में 10 लीटर डीजल लग जाता है और पांच-छह घंटे सवारी करते हैं और उसका खर्चा करीब होता है 500 रुपया। एक दिन का डीजल का खर्चा होता है पांच सौ रुपया। और उसके कारण बोट में ऐसी आवाज़ आती है ऐसी आवाज आती है वो टूरिस्‍ट बेचारा उसी से तंग हो जाता है उसको लगता है जल्‍दी उतर जाए तो अच्‍छा होगा। और वो मछुआरा भी अगर नाव में बैठ करके बताना चाहता है यह फलाना घाट है ढिकड़ा घाट है, यह दिखता है, ढिकड़ा वो दिखता है। उसको कुछ सुनाई नहीं देता है। टूरिस्‍ट को मजा नहीं आता है। अगर टूरिस्‍ट को मजा नहीं आएगा तो टूरिस्‍ट आएगा क्‍या? टूरिस्‍ट नहीं आएगा तो मछुआरों को रोजी-रोटी मिलेगी क्‍या? मेरे निशाद भाई-बहन कुछ कमाएंगे क्‍या? भाईयों-बहनों ई-बोट के कारण अब आवाज़ का नामो-निशान नहीं रहेगा। मैं अभी बोट में जाकर आया। तो मैंने उसको पूछा कि मशीन बंद तो नहीं कर दिया है। नहीं बोले मशीन चालू है, बिल्‍कुल आवाज़ नहीं आ रही है। बोले साहब बिल्‍कुल आवाज़ नहीं आ रही है। मुझे बताइये यह काशी के टूरिज्म को लाभ होगा कि नहीं होगा? ऐसे नहीं पूरे ताकत से बताओ। होगा कि नहीं होगा? अब देखना जो भी टूरिस्‍ट आएगा न वो पूछेगा ई-बोट कहां है, मुझे ई-बोट में बैठना है। जिसके पास ई-बोट नहीं है, वो मोदी को पकड़ेगा। मोदी जी जल्‍दी ई-बोट लाओ। यह होने वाला है। दूसरा, पहले उसको पांच सौ रुपया का डीजल भरना पड़ता था। अब उसकी बैटरी बोट के ऊपर छत बनाई है। उस छत के ऊपर सोलार पैनल लगेगी। इसलिए सोलार पैनल से उसकी बैटरी चार्ज हो जाएगी। उसको एक पैसे का खर्चा नहीं होगा। मुझे बताइये एक गरीब का रोज का पांच सौ रुपया बच जाए, ऐसा कभी आपने सोचा है।

सरकारें दस रुपया देंगे, दो रुपया कम करेंगे यही करती रही आज हमें एक निर्णय से मेरे गरीब मछुआरों को रोजागर पांच सौ रुपया बच जाएगा, भाईयों-बहनों। अब वो बच्‍चों को पढ़ाई करवा सकेगा कि नहीं करा पाएगा? मां बीमार है तो दवाई करेगा कि नहीं करेगा? अच्‍छा घर में कुछ लाना है तो ला पाएगा कि नहीं पाएगा? उसकी जिंदगी में बदल आएगा कि नहीं आएगा। अब वो गरीबी के खिलाफ लड़ पाएगा कि नहीं लड़ पाएगा? अब वो गरीबी को परास्‍त कर सकता है कि नहीं कर सकता? अब वो गरीबी को पराजित करके विजय की मुद्रा में जी सकता है कि नहीं जी सकता है? एक निर्णय कितना बड़ा परिवर्तन ला सकता है, यह आज देख रहे हैं आप।

आने वाले दिनों में और हमारे मछुआरे भाई-बहन। इस अपनी बोट को ई-बोट में convert करने जाएंगे, तो एक-दो दिन तो लगेगा। तो यह एक-दो दिन हमारा मछुआरा भूखे मरेगा क्‍या? कहां जाएगा, तो हमने कहा है कि तुम्‍हारी बोट जब repairing में आएगी उस समय हमें उपयोग करने के लिए एक बोट हमारी तरफ से मिलेगी दो दिन उसको चला लेना। गरीब मछुआरे की जिंदगी में कैसे बदलाव लाया जा सकता है यह मैंने आज उनको समझाया। मैंने कहा बोट में हम एक चार्जर भी लगाएंगे। मोबाइल फोन का चार्जर तो जो टूरिस्‍ट बैठेगा उसको अगर अपना मोबाइल फोन चार्ज करना है तो उसको नाव में ही जा जाएगा। यहां बैठेगा-उतरेगा तो वो खुश हो जाएगा। आज मोबाइल फोन का बैटरी चला गया तो जैसे जिंदगी चली गई। जैसे Heart बंद हो जाता है, ऐसा हो जाता है इंसान को। छोटी-छोटी चीजों का ध्‍यान रखते हुए आज यह ई-बोट की शुरूआत और हमारे देश में यह पहला प्रयोग है कि जहां सोलार से चलने वाली ई-बोट का बहुत बड़ा अभियान चलेगा, यह गंगा तट पर हजारों बोट है, हजारों मेरे भाई-बहन है। मेरे नाविक भाई-बहन हैं, मेरे केवट भाई-बहन है, मेरे मछुआरे भाई-बहन है। और इसलिए भाईयों-बहनों मेरे जीवन के लिए आज एक बड़े संतोष का काम मुझे मिला, करने का अवसर मिला। मुझे इतना आनंद है कि जब मेरे इन मछुआरे भाईयों-बहनों को, लेकिन मैं उनको कहूंगा कि अब पांच सौ रुपया बचेंगे तो क्‍या करोगे? सबको मालूम है कि क्‍या करेगा। वो नहीं करना है। यह पैसे बचेंगे, तो बच्‍चों की पढ़ाई के लिए बच्‍चों को दूध पिलाने के लिए खर्चा करना है और पीने के लिए नहीं है। वरना तो मेरा पुण्‍य कहा जाएगा और इसलिए मेरे भाईयों-बहनों यह ई-बोट आज कर रहे हैं। अभी दो-तीन दिन पहले आपने देखा होगा भारत ने आसमान में सात सेटेलाइट छोड़े हैं। सात सेटेलाइट, अरबों-खरबों रुपये का खर्च किया है। और उस सेटेलाइट से भारत की अपनी जीपीएस सिस्‍टम बनी है। अब आप जानते हैं हमारे देश की राजनीति कैसी है। इतना बड़ा काम हुआ हो, सात सेटेलाइट छोड़े हो, इतनी बड़ी बात बनी हो, तो राजनीति में हमारा मन करेगा कि नहीं करेगा? कि हम कहे कि भई इस योजना का नाम दीनदयाल उपाध्‍याय रख दो, इस सेटेलाइट का नाम श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी रख दो। आपने देखा है एक परिवार के कितने नाम है योजना पर। हमको भी मोह हो जाता हमें भी मुंह में पानी छूट जाता है यार। कोई अपने वाले का कर ले। कभी ये भी मन कर जाता कि किसी ऋषि मुनि का नाम दे दें। किसी संत का नाम दे दें। लेकिन मेरे प्‍यारे भाइयो, बहनों ये मोदी कुछ अलग मिट्टी का बना हुआ है। मैंने, मैंने मेरे किसी नेता के नाम पर इस योजना को नहीं रखा, न मेरे किसी परिवारजन के नाम पर नहीं रखा। मैंने इस योजना का नाम दिया नाविक, नाविक, नाविक नाम दिया है।

मेरे देश के करोड़ों, करोड़ों मछुआरे, उनको मैंने ये उत्‍तम से उत्‍तम श्रद्धांजलि दी है क्‍योंकि ये नाविक ही तो हैं जिसको कहीं जमीन नजर नहीं आती, लेकिन गहरे समंदर में छोटी नाव ले करके निकल पड़ता है। पानी के साथ जिंदादिली का खेल खेल लेता है। महीनों भर पानी में रह करके कहीं तट पर पहुंचता है और सदियों से करता आया है। ये नाविक ही तो है, और इसलिए हमने ये भारत की जीपीएस सिस्‍टम बनी है, उसका नाम रखा है नाविक। मेरे कोटि-कोटि मछुआरों को ये सरकार की बहुत बड़ी अंजलि है। बहुत बड़ा गौरव किया है और इसलिए दुनिया भी हमें। जब दुनिया भी पूछेगी नाविक क्‍या होता है तो हम समझाएंगे कि मेरे काशी में आओ बताऊं नाविक क्‍या होता है।

भाइयो, बहनों एक ऐसा काम किया है जो मेरे इस मछुआरा समाज को अमरत्‍व दे देता है, अमर बना देता है। ये काम करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है। इस E-Boat के द्वारा काशी के जीवन में एक आर्थिक क्रांति आने वाली है। आज मैंने र्इ-रिक्‍शाएं भी दीं, और इस बार तो ई-रिक्‍शा उनको दी हैं जो पैडल-रिक्‍शा चलाते थे उनकी पैडल-रिक्‍शा वापिस ले ली, ई-रिक्‍शा दे दी। और ई-रिक्‍शा के कारण काशी के जीवन को गति मिल जाएगी।

आने वाले दिनों में यहां के जीवन में बदलाव आएगा, पर्यावरण में बदलाव आएगा। काशी का विकास करने का मेरा एक सपना है, लेकिन उसमें मुझे एक छोटी सी मदद आपकी चाहिए, करोगे? करोगे? कहते तो हो, बाद में नहीं करते हो। अच्‍छा इस बार पक्‍का? इस बार पक्‍का? उधर से आवाज नहीं आ रही है, पक्‍का? पक्‍का? एक छोटा काम सफाई, स्‍वच्‍छता। अब मेरा काशी गंदा नहीं होना चाहिए। कर सकते हो कि नहीं कर सकते भाइयो? अगर एक बार हम फैसला कर लें कि हम काशी को गंदा नहीं होने देंगे, दुनिया भर के लोग यहां आते हैं, ऐसी साफ-सुथरी काशी देख के जाएं, हिन्‍दुस्‍तान का शानो-शौकत बढ़ जाएगा मेरे भाइयो-बहनों, ये काम हमें करना है। ये काम सरकार से नहीं करना है, हम भाई-बहन, नागरिक स‍बने करना है। अब हर-हर महादेव कह दिया तो हो जाएगा।

आप इतनी बड़ी संख्‍या में आए, ये नजारा अपने-आप में मां गंगा की गोद में एक ताकत देता है भाइयो, बहनों, बहुत ताकत देता है। मैं जब भी आपके पास आता हूं मेरी सारी थकान चली जाती है। एक नई ताकत ले करके जाता हूं। फिर दौड़ता हूं, फिर काम करता हूं, फिर आपके चरणों में आके बैठ जाता हूं, फिर ताकत लेके चला जाता हूं।

भाइयो, बहनों मैं आज मेरे सभी मछुआरे भाई, बहनों को ये E-boat की शुभ भेंट देते हुए बहुत ही गर्व महसूस कर रहा हूं। लेकिन मेरी अपेक्षा है, पैसे बहुत बचने वाले हैं, इन पैसों का उपयोग बच्‍चों के लिए करना। इन पैसों का उपयोग बच्‍चों की पढ़ाई के लिए करना। देखिए गरीबी से लड़ने का ये ही रास्‍ता है। हमें जो गरीबी मिली, हम विरासत में अपने बच्‍चों को गरीबी नहीं देंगे ये तो हर मां-बाप का संकल्‍प होना चाहिए।

भाइयो, बहनों में आपका बहुत आभारी हूं। और में इस योजना को बहुत आगे बढ़ाने के लिए देखते ही देखते सभी नाव हमारी E-boat बन जाएं और नाविक अब तो आसमान से हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। हर पर हमारे फोन पर हमें हमारा नाविक दिखेगा, उसको लेके आगे बढ़ें। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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21वीं सदी के इस दशक में भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है: ET Now ग्लोबल बिजनेस समिट में पीएम मोदी
February 13, 2026
Amid numerous disruptions, this decade has been one of unprecedented development for India, marked by strong delivery and by efforts that have strengthened our democracy: PM
In this decade of the 21st century, India is riding the Reform Express: PM
We have made the Budget not only outlay-focused but also outcome-centric: PM
Over the past decade, we have regarded technology and innovation as the core drivers of growth: PM
Today, we are entering into trade deals with the world because today's India is confident and ready to compete globally: PM

आप सभी का इस ग्लोबल बिजनेस समिट में, आप सबका मैं अभिनंदन करता हूं। हम यहां A Decade Of Disruption, A Century Of Change, इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। विनीत जी का भाषण सुनने के बाद मुझे लगता है कि मेरा काम बहुत सरल हो गया है। लेकिन एक छोटी request करूं, इतना सारा आपको पता है, तो कभी ET में तो दिखना चाहिए।

साथियों,

21वीं सदी का बीता दशक अभूतपूर्व डिसरप्शन का रहा है। ग्लोबल Pandemic, ग्लोब के अलग-अलग हिस्सों में तनाव, युद्ध और ग्लोब के संतुलन को हिला देने वाले Supply Chain Breakdowns, दुनिया ने एक दशक के भीतर काफी कुछ देख लिया। लेकिन साथियों, कहते हैं, संकट के समय ही किसी देश के सामर्थ्य पता चलता है और मुझे बहुत गर्व है, अनेक Disruptions के बीच भी भारत के लिए यह दशक, अभूतपूर्व डेवलपमेंट का रहा है, शानदार डिलीवरी का रहा है और डेमोक्रेसी को मजबूत करने वाला रहा है। जब पिछला दशक शुरू हुआ था, तो भारत ग्यारहवें नंबर की अर्थव्यवस्था था। इतनी उथल-पुथल में पूरी आशंका थी कि भारत और नीचे चला जाएगा, लेकिन आज भारत, बहुत तेजी के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने जा रहा है। और आप जिस Century Of Change की बात कर रहे हैं, उसका बहुत बड़ा आधार और यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं, इसका बहुत बड़ा आधार भारत ही होने जा रहा है। आज भारत, दुनिया की ग्रोथ में 16 परसेंट से ज्यादा योगदान दे रहा है। और मुझे विश्वास है, इस सेंचुरी के हर आने वाले साल में हमारा योगदान और भी बढ़ता रहेगा, निरंतर बढ़ता रहेगा। मैं वह मदान की तरह astrologer के रूप में नहीं आया हूं। भारत, दुनिया की ग्रोथ को ड्राइव करेगा, दुनिया की ग्रोथ का नया इंजन बनेगा।

साथियों,

दुनिया में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एक नई वैश्विक व्यवस्था बनी थी, एक नए वर्ल्ड ऑर्डर ने आकार लिया था। लेकिन सात दशक के बाद, वो व्यवस्था टूट रही है। दुनिया आज एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है। आखिर यह क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब जो व्यवस्था बनी थी, उसकी नींव One Size Fits All, इसी सोच पर टिकी थी। तब ये माना गया कि World Economy Core में होगी, Supply Chains मजबूत और विश्वसनीय हो जाएगी। इस व्यवस्था में नेशन्स को केवल कंट्रीब्यूटर्स के रूप में ही देखा गया। लेकिन आज, इस मॉडल को चुनौती मिल रही है। यह अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। आज हर देश को यह पता चल रहा है कि उसे अपनी रज़ीलियन्स खुद बनानी होगी।

साथियों,

आज दुनिया जिसकी चर्चा कर रही है। उसको भारत ने 2015 में, आज से 10 साल से पहले, 2015 में ही अपनी नीति का हिस्सा बना लिया था। दस साल पहले जब नीति आयोग बना, तो उसके फाउंडिंग डॉक्यूमेंट में ही भारत ने अपना विजन क्लीयर कर दिया था और विजन यह कि भारत किसी दूसरे देश से कोई सिंगल डेवलपमेंट मॉडल इंपोर्ट नहीं करेगा। हम भारत के विकास के लिए भारतीय अप्रोच को लेकर ही चलेंगे। इस नीति ने भारत को अपने हिसाब से, अपनी रिक्वायरमेंट के हिसाब से, अपने हित में फैसले लेने का आत्मविश्वास दिया और यह एक बड़ा कारण है कि डिसरप्शन के दशक में भी भारत की इकोनॉमी कमजोर नहीं पड़ी, निरंतर मजबूत होती गई।

साथियों,

आज 21वीं सदी के इस दशक में भारत Reform Express पर सवार है और इस Reform Express की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हम इसे compulsion में नहीं, बल्कि conviction के साथ, Reform के कमिटमेंट के साथ गति दे रहे हैं। यहां तो बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में बड़े-बड़े expert बैठे हैं, अर्थजगत के दिग्गज बैठे हैं। आपने भी 2014 से पहले का दौर देखा है। जब तक हालात मजबूर न कर दें, जब तक कोई संकट न आ जाए, जब कोई और रास्ता न बचे, तब मजबूरन रिफॉर्म्स किए जाते थे। आप याद करिए, 1991 का रिफॉर्म्स भी तब हुआ, जब देश पर दिवालिया होने का खतरा आ गया था। जब देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। पहले की सरकारों का यही तरीका था, वो reforms compulsion में ही किया करती थीं। जब 26/11 का आतंकी हमला हुआ, कांग्रेस सरकार की कलई खुल गई, तो NIA का गठन किया गया। जब पावर सेक्टर बर्बाद हो गया, ग्रिड फेल होने लगे, तब मजबूरी में कांग्रेस को पावर सेक्टर में याद आई।

साथियों,

ऐसी एक लंबी सूची है, जो याद दिलाती है कि जब compulsion में, मजबूरी में reform होता है, तो न सही नतीजे मिलते हैं, न देश को सही परिणाम मिलते हैं।

साथियों,

आज मुझे गर्व है कि बीते 11 वर्षों में हमने पूरे conviction के साथ रिफॉर्म किए हैं और यह रिफॉर्म Policy में हुए हैं, Process में हुए, Delivery में हुए और इतना ही नहीं, Mindset में भी reform हुआ है। क्योंकि साथियों, अगर पॉलिसी बदले, लेकिन प्रोसेस वही रहे, माइंडसेट वही रहे, डिलीवरी ठीक से ना हो, तो रिफॉर्म्स सिर्फ और सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। इसलिए हमने पूरे सिस्टम को बदलने के लिए ईमानदारी से कोशिश की है।

साथियों,

मैं प्रोसेस की बात करूं, तो एक साधारण लेकिन बहुत जरूरी प्रोसेस है, कैबिनेट नोट्स का। यहां कई लोगों को अंदाजा होगा कि पहले की सरकारों में एक कैबिनेट नोट बनने में ही कुछ महीने लग जाते थे, महीने। अब इस स्पीड से देश का विकास कैसे होता? इसलिए हमने इस process को बदला। हमने डिसीजन मेकिंग को time-bound और technology-driven बनाया। हमने यह तय कर दिया कि इस अफसर की टेबल पर यह कैबिनेट नोट इतने घंटे से ज्यादा रहेगा ही नहीं। या तो रिजेक्ट करो या निर्णय लो और इसका नतीजा आज देश देख रहा है।

साथियों,

मैं आपको रेलवे ओवर ब्रिज के अप्रूवल का भी उदाहरण दूंगा। पहले R.O.B का एक डिजाइन अप्रूव कराने के लिए कई वर्ष लग जाते थे, कई सारी क्लीयरेंस की ज़रूरत थीं, कई जगह चिट्ठियां लिखनी पड़ती थीं और यह मैं प्राइवेट के लिए नहीं कह रहा हूं, सरकार को। हमने इसको भी बदला और आज देखिए कितनी तेजी से रोड और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। विनीत जी ने बहुत विस्तार से इस बात को बताया।

साथियों,

एक बड़ा Interesting उदाहरण बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का है। अब बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर देश की security से जुड़ा हुआ होता है। आप कल्पना कर सकते हैं, एक समय था, जब बॉर्डर एरियाज़ में एक साधारण सी सड़क बनाने के लिए भी कुछ परमिशन दिल्ली से लेनी पड़ती थी। जिला स्तर पर निर्णय लेने के यानी इसके सामने एक प्रकार से उसका कोई अधिकारी ही नहीं थे, दीवार ही दीवार थीं, वो निर्णय नहीं कर सकता था और इसलिए तो दशकों बाद भी हमारे देश में बॉर्डर इंफ्रा इतना बेहाल रहा। 2014 के बाद हमने इस प्रोसेस में भी रिफॉर्म किया, हमने स्थानीय प्रशासन को Empower किया और आज हम देश के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से डेवलप होते देख रहे हैं।

साथियों,

बीते दशक में भारत के जिस Reform ने दुनिया में हलचल मचा दी है, वो है UPI, भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम। यह सिर्फ एक App नहीं है, यह policy, process और delivery के एक शानदार कन्वर्जेंस का प्रमाण है। जो लोग कभी बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़े बेनिफिट्स के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, UPI देश के ऐसे नागरिकों को सर्व कर रहा है। यह जो डिजिटल इंडिया है, डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जनधन आधार मोबाइल की ट्रिनिटी है, यह रिफॉर्म किसी compulsion से नहीं हुआ, यह हमारा कन्विक्शन था। और कन्विक्शन यह था कि जिन लोगों तक पहले की सरकारें कभी नहीं पहुंची, हमें ऐसे नागरिकों का इंक्लूजन करना है। जिसे कोई नहीं पूछता, उसे मोदी पूजता है। और इसलिए यह रिफॉर्म्स किए गए हैं और आज भी हमारी सरकार इसी सोच के साथ चल रही है।

साथियों,

भारत का यह जो नया मिज़ाज है, वो हमारे बजट में भी रिफ्लेक्ट होता है। पहले जब बजट की चर्चा होती थी, तो फोकस सिर्फ Outlay पर होता था। कितना पैसा आवंटित हुआ, क्या सस्ता हुआ, क्या महंगा हुआ और उस दिन टीवी देखेंगे, तो पूरी टीवी एक ही यानी इनके लिए, बजट मतलब इंकम टैक्‍स ऊपर गया कि नीचे गया, इसके आगे उनको देश दिखता ही नहीं है। और होता क्‍या था, कितनी नई ट्रेनें घोषित हुईं, यही चलता रहता था, उन घोषणाओं का बाद में क्या हुआ, कोई पूछने वाला ही नहीं था। और इसलिए हमने बजट को Outlay के साथ-साथ Outcome सेंट्रिक बनाया।

साथियों,

बजट में एक और बड़ा बदलाव आया है। 2014 से पहले Off-Budget Borrowing पर बहुत अधिक चर्चा होती थी। लेकिन अब Off-Budget Reforms की चर्चा होती है। बजट से बाहर, नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म्स हुए, प्लानिंग कमीशन की जगह नीति आयोग बनाया, आर्टिकल 370 की दीवार गिरा दी, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया, नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया।

साथियों,

बजट में घोषित हों, या बजट से बाहर, रिफॉर्म एक्सप्रेस लगातार गति पकड़ रही है। अगर मैं पिछले एक साल की ही बात करूं तो हमने Ports & Maritime सेक्टर में Reform किया, शिप बिल्डिंग इंडस्ट्री के लिए अनेक Initiative लिए, जन-विश्वास एक्ट के तहत रिफॉर्म्स को और आगे बढ़ाया, Energy Security के लिए Shanti Act बनाया, लेबर कानूनों से जुड़े रिफॉर्म्स को लागू किया, भारतीय न्याय संहिता लेकर आए, वक्फ कानून में Reform किया गया है, गांव में रोजगार के लिए नया G RAM G कानून बनाया, ऐसे अनेक Reforms साल भर होते रहे हैं।

साथियों,

इस साल के बजट ने रिफॉर्म एक्सप्रेस को और आगे बढ़ाया है। वैसे तो बजट के बहुत सारे आयाम हैं, लेकिन मैं दो Important फैक्टर्स की बात करूंगा। Capex और Technology, बीते वर्षों की भांति इस बजट में भी, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को बढ़ाकर करीब 17 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। और आप जानते हैं कि कैपेक्स का मल्टीप्लायर effect कितना बड़ा होता है। इससे देश की कैपेसिटी और प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। अनेकों सेक्टर्स में बहुत बड़ी संख्या में जॉब क्रिएशन भी होती है। पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप का निर्माण, देश के टीयर-2, टीयर-3 शहरों के लिए सिटी इकोनॉमिक रीजन्स का निर्माण और सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, ऐसे बजट अनाउंसमेंट्स, सही मायने में युवाओं पर, देश के फ्यूचर पर, यह इन्वेस्टमेंट हैं।

साथियों,

बीते दशक में हमने टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को ग्रोथ का कोर ड्राइवर माना है। इसी सोच के साथ, देश में स्टार्टअप कल्चर, हैकाथॉन कल्चर, उसको हमने प्रमोट किया। आज देश में, दो लाख से अधिक स्टार्टअप, रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स हैं और यह डायवर्स सेक्टर्स में काम कर रहे हैं। हमने युवाओं को प्रोत्साहित किया, देश में रिस्क टेकिंग कल्चर को पुरस्कृत करने का भाव जगाया और परिणाम हमारे सामने है। इस साल का बजट, हमारी इसी प्राथमिकता को और मजबूत करता है। विशेष तौर पर बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर और AI जैसे सेक्टर के लिए, इस बजट में महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं।

साथियों,

आज जब देश की आर्थिक ताकत बढ़ी है, तो हम राज्यों को भी उतना ही ज्यादा सशक्त कर रहे हैं। मैं एक और आंकड़ा आपको देना चाहता हूं। 2004 से 2014, 10 साल, इस दरमियान राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के तौर पर 18 लाख करोड़ रुपए के आसपास ही मिले थे, 2004 से 2014 तक। जबकि 2014 से लेकर 2025 तक, राज्यों को 84 लाख करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। अगर मैं इस साल बजट में प्रस्तावित लगभग 14 लाख करोड़ का आंकड़ा और जोड़ दूं, तो हमारी सरकार में राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के करीब-करीब 100 लाख करोड़ रुपए मिलने तय हुए हैं। यह राशि केंद्र सरकार की तरफ से अलग-अलग राज्य सरकारों को मिली है, ताकि वो अपने यहां विकास के कार्यों को आगे बढ़ा सकें।

साथियों,

आजकल आप लोग भारत के FTA’s यानि फ्री ट्रेड डील्स पर काफी चर्चा कर रहे हैं और मैं यहां enter हुआ, वहीं से शुरू हो गए लोग। दुनियाभर में इसका एनालिसिस हो रहा है। लेकिन मैं आज इसका एक और इंटरेस्टिंग एंगल आपको बताता हूं, मीडिया को जो चाहिए, वो तो इसमें नहीं होगा शायद, लेकिन हो सकता है कि कुछ काम में आ जाए। और मैं पक्का मानता हूं, जो बात मैं कहने जा रहा हूं, आपने भी इसके बारे में विचार नहीं किया होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि आज इतने सारे विकसित देशों के साथ फ्री-फ्री ट्रेड डील्स हो रहे हैं, क्या यही काम 2014 से पहले क्यों नहीं हो पाए? देश वही, युवा शक्ति वही, सरकारी सिस्टम वही, तो बदला क्या? बदलाव, सरकार के विजन में आया है, नीति और नीयत में बदलाव आया है, भारत के सामर्थ्य में बदलाव आया है।

साथियों,

आप ज़रा सोचिए, फ्रेजाइल फाइव इकोनॉमी जब थी, तब कौन हमारे साथ डील करता? गांव में भी गरीब की बेटी को कोई रईस के परिवार वाला शादी करता है क्या? वो उसको छोटा मानता है, हमारा भी यही हाल था भाई दुनिया में। जब देश पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा था, चारों तरफ घोटाले और घपले थे, तब कौन भारत पर भरोसा कर पाता? 2014 से पहले भारत में मैन्युफैक्चरिंग का बेस बहुत कमजोर था और जिसके कारण, पहले की सरकारें भी डरती थी, एक तो कोई आता नहीं था और जरा सा भी कोई कोशिश करें, तो यह लोग भी डरते थे और डर यह था कि अगर विकसित देशों के साथ डील हो गई, तो वो हमारे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, वो यहां अपने प्रोडक्ट डंप करने लगेंगे, हताशा-निराशा के उस माहौल में 2014 से पहले यूपीए सरकार सिर्फ चार देशों के साथ ही कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट कर पाई थी। जबकि, बीते दशक में भारत ने जो ट्रेड डील्स की हैं, उनमें दुनिया के 38 कंट्री कवर होते हैं, 38 कंट्री। और यह दुनिया के अलग-अलग रीजन्स में हैं। आज हम इसलिए दुनिया के साथ ट्रेड डील्स कर रहे हैं क्योंकि आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है। आज का भारत, दुनिया के साथ कंपीट करने के लिए तैयार है। बीते 11 वर्षों में भारत ने मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम देश में विकसित किया है। इसलिए, आज भारत समर्थ है, सशक्त है और इसलिए दुनिया भी हम पर भरोसा करती है। यही बदलाव हमारी Trade Policy में आए Paradigm Shift का आधार बने और यही Paradigm Shift विकसित भारत की हमारी यात्रा का अनिवार्य स्तंभ बना है।

साथियों,

आज हमारी सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ देश के हर नागरिक को विकास में सहभागी बनाते हुए कार्य कर रही है। जो विकास की दौड़ में पीछे छूट गया, हम उसके विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। पहले की सरकारों ने दिव्यांग जनों के लिए सिर्फ घोषणाएं कीं, हम भी उसी रास्ते को जारी रख सकते थे, लेकिन ये सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है। आप में से शायद जो बातें मैं बता रहा हूं, आप जिस लेवल के लोग हैं, शायद उसमें फिट नहीं बैठती होगी। हमारे दिव्यांग जनों के लिए जैसे हमारे यहां Language में बिखराव है ना, Sign Language का भी वही हाल था जी। तमिलनाडु में जाओ तो एक Sign Language, उत्तर प्रदेश में जाओ तो दूसरी, गुजरात में जाओ तो तीसरी, असम में जाओ तो चौथी, अगर यहां का दिव्‍यांग असम गया, तो बेचारा समझ ही नहीं पाता था। अब यह कोई बड़ा काम तो नहीं था। अगर संवेदनशील सरकार होती है ना, तो उसको यह काम छोटा नहीं लगता है। और देश ने पहली बार Indian Sign Language को institutionalise किया, common किया, व्यवस्था बनाई है। ऐसे ही, देश की Transgender community कब से अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी। हमने उनके लिए भी कानून बनाकर उन्हें सम्मान से जीने का कवच दिया है। बीते दशक में ही देश की करोड़ों बहनों को तीन-तलाक की कुरीति से मुक्ति मिली, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण पक्का हुआ।

साथियों,

आज सरकारी मशीनरी की सोच भी बदली है, उसमें संवेदनशीलता आई है। सोच का अंतर क्या होता है, यह हम जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज देने वाली स्कीम में भी देखते हैं। विपक्ष के कुछ लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं और कुछ अखबारों में जरा छपता भी ज्यादा है। कोई मजाक उड़ाता है कि जब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल ही गए हैं, तो उनको मुफ्त राशन क्यों मिलता है? अजीबोगरीब सवाल है। अगर आप बीमार हैं, अस्पताल में गए और अस्पताल से आपको छुट्टी मिली, तो भी डॉक्टर कहता है कि सात दिन तक यह-यह संभालना, पंद्रह दिन तक यह-यह संभालना, कहता है कि नहीं कहता है? गरीबी से बाहर निकले हैं, लेकिन यह सवाल पूछ रहे हैं कि निकले हैं, तो फिर अनाज क्यों देते हो? ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग, यह नहीं सोचते कि सिर्फ गरीबी से बाहर निकालना काफी नहीं होता, बल्कि जो व्यक्ति नियो मिडिल क्लास में आया है, वो फिर गरीबी के चंगुल में न फंस जाए, यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है। इसलिए उसे आज अनाज मुफ्त की सुविधा मिल रही है, यह आवश्यक है। बीते वर्षों में केंद्र सरकार ने इस योजना पर लाखों करोड़ रुपए खर्च किए हैं, इससे गरीब और नियो मिडिल क्लास को बहुत बड़ा संबल मिला है।

साथियों,

सोच का एक और फर्क हम अपने आसपास भी देखते हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि ये मोदी 2047 की बात क्यों करता है? 2047 में विकसित भारत बनेगा, नहीं बनेगा, किसने देखा? हम रहें या ना रहें, उससे हमारा लेना देना क्या है? अब देखिए, यह सोच है और यह बड़े-बड़े लोगों की सोच है, यह कोई मैं अपने शब्द नहीं बता रहा हूं।

साथियों,

जिन लोगों ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, लाठियां खाईं, कालापानी की सज़ाएं पड़ी, फांसी के तख्त पर चढ़ गए, अगर वो भी यही सोचते कि आजादी पता नहीं कब मिले, हम क्यों आज आजादी के लिए लाठी खाएं, तो सोचिए, क्या उस सोच के साथ देश कभी आजाद हो पाता क्या? जब राष्ट्र प्रथम का भाव हो, जब देश हित सर्वोपरि हो, तो हर निर्णय देश के लिए होता है, हर नीति देश के लिए बनती है। हमारी सोच स्पष्ट है, विजन साफ है, हमें देश को विकसित बनाने के लिए निरंतर काम करना है। 2047 तक हम रहें न रहें, लेकिन यह देश रहेगा, इस देश की संतानें रहेंगी। इसलिए हमें और इसलिए हमें अपना आज खपाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का कल सुरक्षित रहे, उज्ज्वल रहे। मैं आज अपनी आज बो रहा हूं क्योंकि कल की पीढ़ी को फल खाने को मौका मिले।

साथियों,

दुनिया को अब डिसरप्शन के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा। समय के साथ इनके नेचर में बदलाव आएगा, लेकिन यह तय है कि अब व्यवस्थाएं बहुत तेजी से बदलेंगी। AI से जो Disruption हो रहे हैं, वो तो आप देख ही रहे हैं। आने वाले समय में AI और भी क्रांतिकारी बदलाव लेकर आने वाली है, भारत इसके लिए भी तैयार है। कुछ ही दिनों में भारत में ग्लोबल AI इम्पैक्ट समिट होने जा रही है। दुनिया के अनेक देश, दुनियाभर के टेक लीडर्स, इस समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रहे हैं। सभी के साथ मिलकर, हम एक बेहतर विश्व बनाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। इसी भरोसे के साथ, एक बार फिर इस Summit के लिए आप सभी को बहुत सारी मेरी शुभकामनाएं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!