मित्रो,

19 नवंबर, 2014 की शाम को म्यांमार, आस्ट्रेलिया और फिजी की मेरी यात्रा का समापन हुआ। वापसी के दौरान, मैं पिछले 10 दिनों की अपनी यात्रा के बारे में सोच रहा था। मैं यह सोच रहा था कि हमनें क्या हासिल किया, भारत को इससे क्या प्राप्त होगा और इसलिए मैंने तय किया कि मुझे अपने ब्लॉग के माध्यम से ये बातें आप तक पहुंचानी चाहिए।

हमें इस इस यात्रा की historic uniqueness को समझना होगा।

आस्ट्रेलिया के मामले में, आस्ट्रेलिया की यह द्वीपक्षीय यात्रा पिछले 28 वर्षों के दौरान, भारत के प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। वहीं फिजी की यह द्वीपक्षीय यात्रा पिछले 33 वर्षों के दौरान, भारत के प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। जहां एक ओर IT और Communication Revolution की वजह से संसार छोटा हो गया है वहीं दूसरी ओर हम लगभग पिछले तीन दशकों से इन देशों की यात्रा नहीं कर सके। ये दोनों देश अपने आप में महत्वपूर्ण हैं।

मेरा विचार है कि इसमें बदलाव अवश्य किया जाना चाहिए।

मैं कुल पांच Summits में शामिल हुआ। इसमें से एक Summit में Pacific Islands के नेताओं के साथ फिजी में मैंने मुलाकात की थी। यह Summit हमारे द्वारा आयोजित थी। इन सभी Summits में मैंने 38 देशों के नेताओं के साथ मुलाकात की थी। 20 Bilateral Meetings में शामिल हुआ था। यहां पर मुझे विश्व के हर हिस्से के नेताओं से मुलाकात करने का अवसर मिला था। ये सभी बैठकें Frank, Comprehensive और fruitful रही थीं। इन बैठकों में कई मुद्दों पर हमारे बीच सार्थक बातचीत हुई। साथ ही मैं कई Business Leaders से भी मिला।

इन Bilateral Meetings के दौरान, मैंने यह पाया कि संपूर्ण विश्व भारत की ओर नए आदर और बेहद उत्साह से देख रहा है। मैंने यह भी पाया कि global community भारत के साथ engage होने के लिए काफी गंभीर है।

हमने प्रत्येक नेता के साथ इस बात पर चर्चा की, कि कैसे हम अपने संबंधों को और अधिक extensive, diverse और wide-ranging बना सकते हैं? इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह था कि व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा दिया जाए और भारत में और अधिक उद्योग लगाए जाएं। जिन नेताओं से मेरी मुलाकात हुई उनमें से ज्यादातर नेता हमारे "Make in India" initiative के प्रति बहुत उत्साही थे। साथ ही वो भारत में उपलब्ध extensive और diverse opportunities का लाभ उठाना चाहते हैं। मैं इसे एक ऐसे सकारात्मक लक्षण के रूप में देख रहा हूं, जिससे भारत के युवाओं को कई अवसर प्राप्त होंगे और उन्हें सही exposure मिलेगा। यह उनके सुनहरे भविष्य की नींव है। ऐसा exposure आज आवश्यक हो गया है। यहां हमें इस बात को भी ध्यान में रखना है कि संसार विकसित हो रहा है। विश्व के कुछ नेताओं ने "Next Gen Infrastructure और Smart Cities" बनाने की हमारी योजनाओं के प्रति भी गहरी रूचि दिखाई है।

इस यात्रा के दौरान मुझे आस्ट्रेलिया और फिज़ी के सांसदों को सम्बोधित करने का अवसर मिला।

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मैं विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र से संबंध रखता हूं और मुझे उन देशों की यात्रा करने में हमेशा खुशी होती है जहां प्रजातंत्र सफल रहा है। मुझे इन पवित्र देशों से अपने विचार बांटने में भी खुशी होती है। दो प्रजातंत्रों के संबंधों से गहरे कोई और संबंध नहीं हो सकते। इससे जहां एक ओर मुझे इन देशों के वृहत्तर राजनैतिक नेतृत्व तक पहुंचने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर इससे सहयोग के नए क्षेत्र भी खुले। मैं एक बार पुन: कहना चाहूंगा कि इन देशों के राजनीतिज्ञ भारत के प्रति बहुत अधिक आशावादी हैं।

भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार आस्ट्रेलिया और फिज़ी की Parliaments को सम्बोधित किया है। मुझे यह बताया गया कि फिज़ी की Parliament को पहली बार विश्व के किसी नेता ने सम्बोधित किया है। यह एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि global community की नजरों में भारत के 125 करोड़ लोगों के प्रति कितना सम्मान है।

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G-20 Summit में, भारत ने World Community के सामने existence और repatriation of black money का मामला प्रमुखता से रखा।

मुझे इस बात की खुशी है कि world community ने इसे गंभीरता से लिया। वास्तव में, यह मामला किसी एक देश को ही प्रभावित करने वाला नहीं है, बल्कि काले धन की समस्या में वह ताकत है जो विश्व-शांति और सामंजस्य को भंग कर सकती है। इसके अलावा, काला धन Terrorism, Money Laundering और Narcotics Trade को भी बढ़ावा देता है। ऐसे प्रजातंत्रों के रूप में जो विधि के शासन के प्रति वचनबद्ध हैं, तो हमारी यह बाध्यता बन जाती है कि हम इस बुराई का मिलजुल कर सामना करें। और इन मुद्दों को उठाने के लिए G-20 Summit से बेहतर और कोई अवसर नहीं था। हमारे प्रयासों के फलस्वरूप इस मामले को दर्शाने वाला आधिकारिक घोषणापत्र (official communique) तैयार करने में सफलता मिली।

ASEAN Summit, ASEAN देशों के नेतृत्व के साथ engage होने का एक अवसर था। इसमें हमने इस बात पर चर्चा की कि कैसे हम group of nations के रूप में और एक देश के रूप में - दोनों ही प्रकार से अपना engagement बढ़ा सकते हैं?

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मेरा यह विचार है कि ASEAN और भारत मिलकर सहयोग के नए क्षेत्र तलाश सकते हैं। हमारे बीच सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध होने के साथ-साथ हमारे पास हमारे युवावर्ग का जोश और ऊर्जा भी है।

मैंने मलेशिया के प्रधानमंत्री Razak के साथ affordable housing के बारे में बातचीत की। ब्रुनेई के सुल्तान के साथ energy issues के बारे में और सिंगापुर के प्रधानमंत्री Lee Hsien Loong के साथ urban development के मुद्दों पर बातचीत की।

फिजी में Pacific Island Nations के नेताओं से मेरी मुलाकात हुई। यह क्षेत्र हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इन सभी देशों के साथ मजबूत द्वीपक्षीय संबंधों के लिए उठाए गए महत्वपूर्ण और ठोस कदमों से मैं बहुत प्रसन्न हूं। इन देशों के लिए हम बहुत कुछ कर सकते हैं और इन देशों से हम बहुत कुछ सीख भी सकते हैं।

मैं जहां कहीं भी गया लोगों ने मेरा बेहद गर्मजोशी से स्वागत किया। मैं तीनों देशों के नेताओं - राष्ट्रपति Thein Sein, प्रधानमंत्री Abbott और प्रधानमंत्री Bainimarama का अत्यंत आभारी हूं।

मैंने उनके साथ जो व्यक्तिगत मुलाकातें कीं उनमें अपने संबंधित देशों के साथ संबंधों को आगे बढाने की महत्वपूर्ण बातें शामिल थी।

राष्ट्रपति Thein Sein के साथ मुख्य रूप से 3Cs अर्थात culture, commerce and connectivity के बारे में बात हुई थी। प्रधानमंत्री Abbott के साथ energy, culture और security के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बातचीत हुई और हम nuclear energy के मुद्दे पर बेहद सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रहे हैं। Security Cooperation की रूपरेखा आस्ट्रेलिया के साथ हमारे बढ़ते सुरक्षा संबंधों का सटीक प्रमाण है। आस्ट्रेलिया की कंपनियों को भारत आने का न्यौता देने के लिए अगले वर्ष ‘Make in India’ नामक रोड शो किया जाएगा। आस्ट्रेलिया के business leaders के साथ मुलाकात के दौरान मैंने देखा कि वे भारत में निवेश करने के लिए इच्छुक और उत्सुक हैं और इस संदर्भ में यह रोड शो निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण होगा।

व्यक्तिगत तौर पर मैंने यह महसूस किया कि भारतीय समुदाय से जो स्नेह मिला वो दिल को छू लेने वाला था। चाहे वह म्यांमार में हो, आस्ट्रेलिया में हो या फिजी में, उन्होंने जिस गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मैंने देखा कि उन्हें भारत पर और भारत में हो रहे परिवर्तन पर गर्व हो रहा था। मुझे उनकी आंखों में सपने और आशाएं दिखाई दीं। जैसा कि मैंने सिड़नी में भारतीय समुदाय के कार्यक्रम के दौरान कहा था, हम उनकी अपेक्षाओं से पूर्ण रूप से अवगत हैं और उनके सपनों का भारत बनाने के लिए हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे।

जब मैंने आस्ट्रेलिया और फिजी में visa-on-arrival facilities तथा OCI और PIO के विलय की घोषणा की तो हमारे मूल के लोगों के चेहरों पर बेहद प्रसन्नता थी। अपने मूल के लोगों को अपनी विकास यात्रा का अभिन्न हिस्सा बनाना हमारा उद्देश्य है और पिछले कुछ महीनों में हमने इसी दिशा में प्रयास किए हैं। हम एक ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जहां हमारे मूल के लोगों को भी यह आभास हो कि वे भी भारत के विकास में अपना सहयोग कर सकते है। यह भी एक कारण है, जिसके लिए मैंने अप्रवासी भारतीयों से अपने विचारों और राय को www.mygov.in पर साझा करने का आग्रह किया है।

मुझे आइकोनिक मेलबर्न क्रिकेट ग्रांउड का स्नेहपूर्ण स्वागत याद आता है। यह प्रधानमंत्री Abbott की महानता थी कि वे विशेषतौर पर मेलबर्न पहुंचे और स्वागत की मेजबानी की, जिसमें कपिल देव, सुनील गावस्कर, वी वी एस लक्ष्मण, एलन बार्डर, स्टीव वॉ, डीन जोंस और ग्लैन मैकग्रा जैसे क्रिकेट की महान हस्तियां शामिल हुईं।

दोस्तों, पिछले कुछ दिनों में मेरे द्वारा की गई पूर्व की यात्रा यादगार रही जो मुझे याद दिलाती रहेगी कि दुनिया को भारत से क्या अपेक्षाएं हैं !

मुझे उनकी आंखों में आशा की चमक दिखाई दी कि भारत एक शांत, स्थिर और विकसित वैश्विक समुदाय का मुकाम हासिल करने में अपनी भूमिका अदा करेगा।

मुझे अपने ऊर्जावान नौजवानों की एक छवि भी नजर आई, जो तेजी से बदल रही दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है।

मेरा स्पष्ट रूप से यह मानना है कि भारत दुनिया के मंच पर सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

दुनिया भारत को एक नए जोश के साथ देख रही है।

हमें अपने साझा मूल्यों और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नई प्रतिबद्धता को परस्पर बढाने की आवश्यकता है।

हम मिलकर ही, भारत और दुनिया के बेहतर भविष्य की कहानी लिखेंगे। आपका,

नरेन्द्र मोदी

यात्रा के संबंध में अधिक जानकारी

म्यांमार

राष्ट्रपति थेन सेन के साथ द्विपक्षी वार्ता

आंग सान सू की के साथ बैठक

भारतीय समुदाय द्वारा स्वागत

प्रधानमंत्री की म्यांमार यात्रा के वीडियो

भारत-आसियान शिखर बैठक में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन वक्तव्य

जी20

भाषण और हस्तक्षेप

भाषणों का मूलपाठ

जी20 द्विपक्षीय/रीट्रीट्स

ऑस्ट्रेलिया

क्वींसलैंड यूनीवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलॉजी

ब्रिस्बेन और मेलबॉर्न में ऑस्ट्रेलियाई उद्योगपतियों को संबोधन

टोनी एबॉट के साथ बैठक

ऑस्ट्रेलिया के राजनीतिक नेताओं के साथ बैठक

ऑस्ट्रेलियाई संसद में संबोधन

भारतीय समुदाय का कार्यक्रम

युद्ध स्मारक

प्रधानमंत्री की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के वीडियो

फिजी

स्वागत समारोह

संसद में संबोधन

विश्वविद्यालय में संबोधन

प्रधानमंत्री की फिजी यात्रा के वीडियो

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भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन
July 06, 2026

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।