भारत शनिवार, 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनायेगा
प्रधानमंत्री मोदी 31 अक्टूबर को संसद मार्ग स्थित सरदार पटेल की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करेंगे
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नई दिल्ली के राजपथ पर “एकता की दौड़” को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे
नई दिल्ली में कई सरकारी कार्यालयों में राष्ट्रीय एकता की शपथ ली गई

 

राष्‍ट्र कल ‘राष्‍ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती मनाएगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी प्रात: 7:30 बजे नई दिल्ली में संसद मार्ग पर सरदार पटेल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे।

प्रधानमंत्री इसके बाद ‘एकता के लिए दौड़’ हेतु राजपथ पर उपस्‍थि‍त जन समुदाय को संबोधि‍त करेंगे। वह इस मौके पर एकत्रित लोगों को एकता की शपथ दिलाएंगे।

प्रधानमंत्री कल प्रात: 8:15 बजे के आसपास विजय चौक के लॉन से सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर "एकता के लिए दौड़" को झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इसमें भागीदारी स्वैच्छिक है और ‘एकता के लिए दौड़’ में स्कूली बच्चों एवं खिलाड़ियों सहित बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।

राष्‍ट्रीय एकता दिवस से पहले आज नई दिल्ली में भारत सरकार के कई कार्यालयों में राष्ट्रीय एकता की शपथ दिलाई गई। इस तरह के समारोह राज्‍यों और विदेश में भी आयोजित किए जा रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर केंद्रीय मंत्री भी इन समारोहों में भाग ले रहे हैं।

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प्रधानमंत्री ने करुणा और संतोष का महत्व बताने वाला संस्कृत सुभाषितम साझा किया
August 24, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि करुणा आत्म-सम्मान लाती है और संतोष सच्ची खुशी लाता है। यह भावना समाज में सहयोग और सद्भाव के बंधन को और मजबूत करती है।

श्री मोदी ने एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया-

“कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः।
उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥”

यह सुभाषितम् बताता है कि आत्म-सम्मान दूसरों पर दया या करुणा दिखाने से प्राप्त होता है। जीवन में अपने भाग्य पर संतुष्ट रहने से लालच पर काबू पाया जाता है। व्यक्ति को परिश्रम और उद्यमिता से आलस्य, सशंयात्‍मक तर्क और अनिर्णय पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा;

“करुणा से आत्म-सम्मान और संतोष से सच्ची खुशी मिलती है। इसी भाव से समाज में सहयोग और सद्भाव की डोर और सशक्त होती है।

कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः।
उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥”