My heartfelt feelings in an open letter to Annaji

Published By : Admin | April 11, 2011 | 06:56 IST

आदरणीय अण्णाजी,

सादर प्रणाम.

नवरात्रि के मेरे आठवें उपवास पर आज सुबह पांच बजे आपको यह पत्र लिखने के लिए प्रेरित हुआ हूं।

आप जब दिल्ली में अनशन पर बैठे थे, उन्हीं दिनों नवरात्रि के मंगल अवसर पर शक्ति-उपासना के मेरे भी उपवास चल रहे थे। और मुझे सहज आनंद भी था कि मां जगदम्बा की कृपा से परोक्ष रूप से आपके इस उम्दा उद्देश्य का मैं भी सहयात्री बना हूं।

नवरात्रि के उपवास और चुनावों की भागदौड़ के बीच असम में मां कामाख्या देवी के दर्शन का मुझे अवसर मिला। आपके उपवास जारी थे, इसलिए स्वाभाविक रूप से ही, मां कामाख्या देवी के समक्ष आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना का भाव मुझमें प्रकट हुआ। इसमें भी किसी सद्शक्ति का ही आशीर्वाद होगा, ऐसा मेरा मानना है।

केरल के चुनाव दौरे से कल रात 2 बजे वापस गांधीनगर लौटा। कल ही केरल में मुझे उत्साहवर्धक समाचार मिले कि गुजरात के विकास और मेरे लिए आपने अच्छे भाव जताए हैं।

आपके इस आशीर्वाद के लिए मैं आपका आभारी हूं।

आदरणीय अण्णाजी, आपके प्रति मेरा आदर दशकों पुराना है। राजनीति की दुनिया में प्रवेश करने से पूर्व मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में कार्यरत था। उस वक्त आरएसएस के राष्ट्रीय स्तर के जो भी अग्रणी आते, वह हमारी बैठक में आपके ग्राम विकास के कार्यों का अनुसरण करने और आपके प्रेरक कार्यों की जानकारी अवश्य देते थे। इसका मेरे मन पर गहरा असर पड़ा। पूर्व में मुझे आपके दर्शन का सौभाग्य भी हासिल हुआ।

गुजरात और मेरे बारे में अच्छी भावना व्यक्त करते हुए सार्वजनिक तौर पर दृढ़तापूर्वक जो हिम्मत आपने दिखलाई है, इसके लिए पूरा गुजरात आपका आभारी है। आपकी इस हिम्मत में, आपकी सत्यनिष्ठा और सैनिक जैसी प्रतिबद्घता के दर्शन हुए हैं। इसी वजह से आपके मंतव्य को व्यापक रूप से स्वीकृति मिली है।

आपने मेरी प्रशंसा की है, लेकिन इससे मैं अहंकारी न हो जाऊं, कोई भूल न कर बैठूं, ऐसा आशीर्वाद भी आप मुझे दें, आपसे यह आग्रह है।

आपके आशीर्वाद ने मुझे सच्चा और अच्छा करने की नई हिम्मत दी है। इसके साथ ही मेरी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। आपके बयान के कारण देश के करोड़ों युवक-युवतियां बड़ी अपेक्षा रखेंगे। ऐसे में मेरी कोई छोटी सी भूल भी सभी को निराश न कर दे, और मैं निरंतर जागृत रहूं, ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें।

आदरणीय अण्णाजी, इस नाजुक घड़ी में मुझे कहना चाहिए कि मैं एक अत्यन्त सामान्य परिवार से आया एक आम आदमी हूं। मेरे परिवार में दूर-दूर तक भी किसी के राजनीति या सत्ता के साथ लेश मात्र भी सम्बंध नहीं है। एक मनुष्य के तौर पर मैं कभी सम्पूर्ण होने का भ्रम नहीं रखता। मुझमें भी मानव सहज कमियां हो सकती हैं। गुण भी हो सकते हैं और अवगुण भी।

परन्तु मैं प्रार्थना करता रहता हूं कि मुझे निरन्तर मां जगदम्बा का आशीर्वाद मिलता रहे, जिससे मेरे अवगुण या मेरी कमियां मुझ पर हावी न हो जाए। सदैव बेहतर करने की इच्छा के साथ, गुजरात के विकास को समर्पित होकर गरीब के आंसू पोंछने में मुझे आप जैसे बुजुर्गों का आशीर्वाद मिलता रहे, ऐसी कामना है।

आदरणीय अण्णाजी, आप तो गांधी के रंग में रंगे हुए एक फौजी हैं। कल केरल के मेरे चुनाव दौरे में आपके द्वारा मुझे आशीर्वाद दिए जाने की खबर आई, उसी पल मेरे मन में एक शंका जाग उठी कि अब अण्णाजी की बन आई। गुजरात विरोधी स्थापित हितों के लिए काम करने वाली एक टोली आप पर टूट पड़ेगी। आपके त्याग, तपस्या और सत्यनिष्ठा को दाग लगाने के लिए इस मुद्दे का दुरुपयोग करेगी। मेरे और गुजरात के नाम पर आपको गलत साबित करने का कोई भी मौका वह जाया नहीं करेगी।

दुर्भाग्य से मेरी आशंका सही साबित हुई। फिर एक बार पूरी टोली मैदान में आ गई है। नवरात्रि के पावन पर्व पर मैं मां जगदम्बा को प्रार्थना करता हूं, कि आपकी सत्यनिष्ठा को आंच भी न आए।

आप तो जानते ही होंगे कि गुजरात के बारे में सच बोलने वाले, अच्छा बोलने वाले छोटे-बड़े सभी पर कैसे-कैसे मानसिक अत्याचार करने का फैशन हो गया है।

भूतकाल में केरल के कुनुर क्षेत्र के साम्यवादी पार्टी के मुस्लिम सांसद श्री पी. अबदुल्ला कुट्टी ने सार्वजनिक तौर पर गुजरात के विकास कार्यों की सराहना की थी तो ऐसे सीनियर नेता को पार्टी से बाहर कर दिया गया।

इस सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन ने गुजरात के टूरिज्म विकास के लिए निःशुल्क उम्दा सेवा दी तो यह टोली श्री बच्चन के पीछे पड़ गई। चारों ओर हल्ला मचाकर उन पर गुजरात के साथ सम्बंध तोड़ने के लिए दबाव बनाया गया। दुष्प्रचार की आंधी चलाई। मुंबई के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में निमंत्रण होने के बावजूद उनको प्रवेश नहीं दिया गया।

गुजरात के अग्रणी गांधी विचारक श्री गुणवंतभाई शाह गुजरात की गौरव गाथा के पक्ष में स्पष्ट बात करते हैं इसलिए उनको भी अछूत बनाने के प्रयास होते रहे हैं।

दारुल उलुम देवबंद संस्था के प्रमुख के रूप में निर्वाचित गुजरात के श्री मौलाना गुलाम वस्तानवी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि, गुजरात में बहुत विकास हो रहा है, और यहां धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। विकास का फल सभी को मिलता है। यह कहने के साथ ही उन पर जैसे आसमान फट पड़ा। स्थापित हितों की टोली ने उनको परेशान कर डाला।

हाल ही में भारतीय सेना के एक उच्च अधिकारी, गोल्डन कटार डिवीजन के जी.ओ.सी. मेजर जनरल आई.एस. सिंघा ने गुजरात के विकास की प्रशंसा की। तब भी इसी टोली ने कोहराम मचा डाला और उनके खिलाफ अनुशास्नात्मक कार्यवाही करने की मांग तक कर डाली।

यह तो कुछ ही उदाहरण हैं। लेकिन गुजरात की सही दिशा की विकासयात्रा ऐसे स्थापित हितों की टोली की आंख की किरकिरी बनी है। गुजरात का नाम आने के साथ ही झूठ और दुष्प्रचार की आंधी चलाई जाती है।

आदरणीय अण्णाजी, गुजरात के छह करोड़ नागरिक और भाई-बहन नहीं चाहते कि यह टोली आपको भी दुखी करे।

मुझे अब भी डर है कि यह टोली आपको आफत में डालेगी ही। प्रभु आपको शक्ति दे।

देश के लिए आपके त्याग और तपस्या को आदरपूर्वक नमन करता हूं।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य दे और दीर्घायु दे जिससे मेरे जैसे अनेकानेक लोगों को आपका मार्गदर्शन मिलता रहे, यही प्रार्थना है।

आपका

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महात्मा ज्योतिराव फुले: भारत के दिव्य पथ-प्रदर्शक
April 11, 2026

आज 11 अप्रैल हम सभी के लिए बहुत विशेष दिन है। आज भारत के महान समाज सुधारकों में से एक और पीढ़ियों को दिशा दिखाने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले की जन्म-जयंती है। इस वर्ष यह अवसर और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके 200वें जयंती वर्ष का शुभारंभ भी हो रहा है।

महान समाज सुधारक महात्मा फुले का जीवन नैतिक साहस, आत्म चिंतन और समाज के हित के लिए अटूट समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। महात्मा फुले को केवल उनकी संस्थाओं या आंदोलनों के लिए ही याद नहीं किया जाता, बल्कि उन्होंने लोगों के मन में जो आशा और आत्मविश्वास जगाया, उसका व्यापक प्रभाव हम आज भी महसूस करते हैं। उनके विचार देशवासियों के लिए प्रेरणापुंज हैं।

महात्मा फुले का जन्म 1827 में महाराष्ट्र में एक बहुत साधारण परिवार में हुआ। लेकिन शुरुआती चुनौतियां कभी उनकी शिक्षा, साहस और समाज के प्रति समर्पण को नहीं रोक पाईं। उन्होंने हमेशा यह माना कि चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, इंसान को मेहनत करनी चाहिए, ज्ञान हासिल करना चाहिए और समस्याओं का समाधान करना चाहिए, न कि उन्हें अनदेखा करना चाहिए। बचपन से ही महात्मा फुले बहुत जिज्ञासु थे और अपनी उम्र के अन्य बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक पुस्तकें पढ़ते थे। वो कहते भी थे, “हम जितना ज्यादा सवाल करते हैं, उनसे उतना ही अधिक ज्ञान निकलता है।” साफ है कि बचपन से मिली जिज्ञासा उनकी पूरी यात्रा में बनी रही।

महात्मा फुले के जीवन में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मिशन बनी। उनका मानना था कि ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है, जिसे सभी के साथ साझा किया जाना चाहिए। जब समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, तब उन्होंने लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए स्कूल खोले। वे कहते थे, “बच्चों में जो सुधार मां के माध्यम से आता है, वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अगर स्कूल खोले जाएं, तो सबसे पहले लड़कियों के लिए खोले जाएं।” उन्होंने शिक्षा को न्याय और समानता का माध्यम बनाया।

शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण हमें आज भी बहुत प्रेरित करता है। पिछले एक दशक में भारत ने युवाओं के लिए रिसर्च और इनोवेशन को बहुत प्राथमिकता दी है। एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रयास किया गया है, जिसमें युवा सवाल पूछने, नई चीजें सीखने और इनोवेशन के लिए प्रेरित हों। ज्ञान, कौशल और अवसरों में निवेश करके भारत अपने युवाओं को देश की प्रगति का आधारस्तंभ बना रहा है।

अपने शैक्षिक ज्ञान और बौद्धिकता से महात्मा फुले ने कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों की गहरी जानकारी हासिल की। वे कहते थे कि किसानों और मजदूरों के साथ अन्याय समाज को कमजोर करता है। उन्होंने देखा कि सामाजिक असमानताएं खेतों और गांवों में लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं। इसलिए उन्होंने गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए।

महात्मा फुले ने कहा था, “"जोपर्यंत समाजातील सर्वांना समान अधिकार मिळत नाहीत, तोपर्यंत खरे स्वातंत्र्य मिळत नाही” यानी जब तक समाज के सभी लोगों को समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक सच्ची आजादी नहीं मिल सकती। इसी विचार को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना की। उनका सत्यशोधक समाज, आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण समाज सुधार आंदोलनों में से एक था। यह आंदोलन सामाजिक सुधार, सामुदायिक सेवा और मानवीय गरिमा को बढ़ावा देने में अग्रणी रहा था। यह महिलाओं, युवाओं और गांवों में रहने वाले लोगों की पुरजोर आवाज बना। यह आंदोलन उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि समाज की मजबूती के लिए न्याय, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रगति जरूरी है।

उनका व्यक्तिगत जीवन भी साहस की मिसाल रहा। लगातार लोगों के बीच रहकर काम करने का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा। लेकिन गंभीर बीमारी भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकी। एक गंभीर स्ट्रोक के बाद भी उन्होंने अपना काम और समाज के लिए संघर्ष जारी रखा। उनका शरीर कमजोर हुआ, लेकिन समाज के प्रति उनका समर्पण कभी नहीं डगमगाया। आज भी करोड़ों लोग उनके जीवन के इस पहलू से प्रेरणा लेते हैं।

महात्मा फुले का स्मरण, सावित्रीबाई फुले के सम्मानजनक उल्लेख के बिना अधूरा है। वह स्वयं भारत की महान समाज सुधारकों में से एक थीं। भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में शामिल सावित्रीबाई ने लड़कियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में बेहद अहम भूमिका निभाई। महात्मा फुले के निधन के बाद भी उन्होंने इस कार्य को जारी रखा। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने मरीजों की इतनी सेवा की कि वह स्वयं भी इस बीमारी की शिकार हो गईं और उनका निधन हो गया।

भारतभूमि बार-बार ऐसी महान विभूतियों से धन्य होती रही है, जिन्होंने अपने विचार, त्याग और कर्म से समाज को मजबूत बनाया है। उन्होंने बदलाव का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्वयं बदलाव का माध्यम बने। सदियों से हमारे देश में समाज सुधार की आवाज उन्हीं लोगों से उठी है, जिन्होंने पीड़ा को भाग्य नहीं माना, बल्कि उसे खत्म करने के प्रयासों में जुटे रहे। महात्मा ज्योतिराव फुले भी ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे।

मुझे 2022 में पुणे की अपनी यात्रा याद है, जब मैंने शहर में महात्मा फुले की भव्य प्रतिमा पर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। उनके 200वें जयंती वर्ष की शुरुआत पर हम उनके विचारों को अपनाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। हमें शिक्षा के प्रति अपने संकल्प को मजबूत करना होगा। अन्याय के प्रति संवेदनशील बनना होगा और यह विश्वास रखना होगा कि समाज अपने प्रयासों से ही खुद को बेहतर बना सकता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति को जनहित और नैतिक मूल्यों से जोड़कर भारत में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। यही कारण है कि आज भी उनके विचार करोड़ों लोगों में नई उम्मीद जगाते हैं। महात्मा ज्योतिराव फुले 200 साल बाद भी केवल इतिहास का नाम नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के मार्गदर्शक बने हुए हैं।