कृषि महोत्सव: कृषि क्रांति का उद्घोष प्रत्येक किसान के द्वार पर

 

गुजरात गर्मी से बराबर तप रहा है। 40 से 45 डिग्री की झुलसा देने वाली तपिश में दिन में पक्षी भी नजर नहीं आ रहे। आग उगलते आसमान के इस मौसम में गुजरात सरकार खेती और पशुपालन विकास के लिए कृषि महोत्सव के जरिए गांवों की खाक छान रही है।

ऐसी भीषण गर्मी में सरकार के लगभग एक लाख छोटे-बड़े कर्मचारी सुबह 7 से रात्रि 9 बजे तक पूरे महीने कठोर परिश्रम कर रहे हैं। अधिकारी, जागृत प्रगतिशील किसान, कृषि वैज्ञानिक सभी साथ मिलकर कृषि क्रांति को और भी आधुनिक और उपकारक बनाने को पसीना बहा रहे हैं।

लोकतंत्र के मूलभाव समान लोकभागीदारी का यह कृषि महोत्सव सरकार, किसान और कृषि वैज्ञानिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने वाला अद्भुत कार्यक्रम है, जिसके विविधलक्षी सुफल भी मिले हैं।

गत आठ वर्षों से निरंतर आयोजित होने वाला कृषि महोत्सव प्रति वर्ष पूरे एक महीने तक चलता है। प्राय: सरकार की योजनाओं और दृष्टि में कोई कमी नहीं रहती, लेकिन उसे अमलीजामा पहनाने में ही बड़ी चूक हो जाती है।

लेकिन... गुजरात की सरकार ने उत्तम योजनाओं का बेहतरीन तरीके से अमलीकरण कर सुशासन की नई मिसाल कायम की है।

आम तौर पर जहां, सरकार की सोच या विचार भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाते, ऐसे में योजनाएं भला कैसे अपना रास्ता बनाएं? ऐसी अनेक योजनाएं किस तरह से साकार हो सकती हैं?

सुशासन को लेकर गुजरात ने अपनी एक अलग और अनोखी पहचान स्थापित की है। योजनाओं के क्रियान्वयन का और निश्चित लक्ष्य को पार करने का सुनियोजित रोड मैप तैयार किया है और यही उसकी सफलता है। कृषि महोत्सव भी इसमें शुमार है।

भारत की कृषि विकास दर 3 फीसदी के आसपास हिचकोले खा रही है। वहीं, गुजरात ने बीते समूचे दशक के दौरान मुसलसल 11 फीसदी कृषि विकास दर हासिल कर दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है।

गुजरात जैसे सूखे प्रदेश ने बारहमासी नदियों के अभाव और विशेषकर बारिश आधारित खेती के बावजूद कृषि क्रांति में तरक्की की सफल छलांग लगाई है। इसकी वजह कृषि महोत्सव के जरिए योजनाओं का क्रियान्वयन है।

कृषि महोत्सव के साथ-साथ पशु स्वास्थ्य मेले भी आयोजित किये जा रहे हैं। करीबन ढाई करोड़ मवेशियों के ईलाज का यह सघन प्रयास है। गंभीर बीमारी से पीडि़त पशु का उपचार हो या पशु रसीकरण (टीकाकरण) का अभियान हो, गरीब किसान के पशुओं की देखभाल का यह सफल प्रयोग है। अर्थव्यवस्था के नजरिए को दरकिनार कर सोचें तो, जीवदया का या फिर मुक पशु की सेवा का संतोष भी अनोखा होता है।

नतीजा यह कि, दूध उत्पादन में केवल दस वर्ष में ही 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी भी कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभ्यास करने वालों के लिए सुखद आश्चर्य के समान है।

यदि देश को समृद्घि की दहलीज पर खड़ा करना है तो गांवों और किसानों को यकीनन समृद्घ बनाना होगा। मुझे श्रद्घा है कि, गुजरात की यह पहल और उसकी सफलता विकास के लिए कटिबद्घ सभी लोगों में एक नया विश्वास पैदा करेगी।

इसके साथ दी गई लिंक के जरिए आप गुजरात के कृषि विकास और पशुपालन क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों का विस्तार से अध्ययन कर सकते हैं।

आपका,

नरेंद्र मोदी

Gujarat Fast Track Krushi Mahotsav

Realizing Gram Swaraj by Boosting Milk Economy in Gujarat
Harnessing Jal Shakti for a 'Panidar Gujarat'
Gujarat's Krishi Shakti: Strengthening the Nation

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एक भारत, श्रेष्ठ भारत का जीवंत प्रतीक है काशी-तमिल संगमम
January 15, 2026

कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूं।

‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहां भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।

काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहां हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।

काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।

तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।

वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएं, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएं और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।

काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें....।

इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।

तेनकासी से काशी तक पहुंची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियां लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहां वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।

संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।

यहां मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहां सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।