प्रदूषणमुक्त भविष्य के लिए जलशक्ति और ऊर्जाशक्ति का अनोखा समन्वय

प्रिय मित्रों

अक्षय तृतीया के अवसर पर मैं अपने किसान मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं। उम्मीद करता हूं कि यह दिन हम सभी के जीवन में आनंद और समृद्घि लेकर आए।

 

आज इस अवसर पर मैं आपके साथ गुजरात की जलशक्ति के ऊर्जाशक्ति के साथ समन्वय की अनोखी पहल को लेकर चंद बातें करना चाहता हूं। आज, हम देश का सर्वप्रथम कैनाल-टॉप (नहर आधारित) सोलर पावर प्लांट राष्ट्र को समर्पित करने जा रहे हैं। आज तक इस ख्वाब को हकीकत में तब्दील करना असंभव माना जाता था। लेकिन आज यह मूर्त स्वरूप ले चुका है। गुजरात ने असंभव को संभव कर दिखाया है। एक मेगावाट के इस सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट का निर्माण सरदार सरोवर परियोजना की साणंद शाखा नहर पर किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत एक मेगावाट बिजली उत्पादित होगी।यह जानकर आपस भी आश्चर्य करेंगे कि इस प्रोजेक्ट के चलते प्रति किलोमीटर प्रति वर्ष एक करोड़ लीटर पानी की बचत भी होगी जो अन्यथा वाष्पी करण से उड़जाता |विद्युत और जल दोनों तरह की सुरक्षा प्रदान करने का सामथ्र्य इस प्रोजेक्ट में है। नतीजतन, आने वाली पीढिय़ों के लिए एक स्वच्छ विश्व के निर्माण में यह प्रोजेक्ट मददगार साबित होगा।

अभी कुछ दिनों पूर्व ही हमने गुजरात के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि समान ऐतिहासिक प्रोजेक्ट को साकार किया है। 19 अप्रैल, 2012 के दिन एक ओर जहां वैैज्ञानिकों ने अग्नि-5 मिसाइल का सफल प्रक्षेपण कर देश को गौरवांवित किया, वहीं दूसरी ओर इसी दिन गुजरात ने 600 मेगावाट की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता राष्ट्र को अर्पित कर पुन:प्राप्य ऊर्जा के क्षेत्र में एक नये अध्याय की शुरूआत की। एशिया के इस सबसे बड़े सोलर पार्क के उद्घाटन के लिए जब मैं चारणका जा रहा था, तब एक वर्ष पहले का वह दिन मेरे स्मृति-पटल पर उभर आया जब हम इस पार्क के शिलान्यास के सिलसिले में यहां आए थे। इसके बाद तो कई परिबलों की ओर से इस प्रोजेक्ट के विकास को रोकने के लिए योजनाबद्घ प्रयास किये गए और इसके समर्थन में अत्यंत सामान्य कहे जाने वाले कारणों को पेश किया गया। आज एक वर्ष बाद इसी स्थान पर खड़े रह कर मैं देख सकता हूं कि गुजरात के लोगों ने ऐसे स्थापित हितों को माकूल जवाब दे दिया है। आज स्थिति यह है कि देश के कुल सौर ऊर्जा उत्पादन में 66 फीसदी योगदान गुजरात का है। गुजरात और उसके बाशिंदों के लिए यह सचमुच ही गौरव के पल हैं।

मित्रों, ज्यादातर पश्चिमी देशों के बरक्स हमारे राज्य पर सूर्य देव की भरपूर कृपा बरसती है। सूर्य देव की इन किरणों में ही विकास के विपुल अवसर मौजूद हैं, जो हमें विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इससे पूर्व, वर्ष 2009 में एक साहसिक कदम उठाते हुए गुजरात ने अपनी सौर ऊर्जा नीति की घोषणा की। 500 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाली इस सौर ऊर्जा नीति के लिए करीब 85 डेवलपरों के साथ 968.5 मेगावाट की खरीद व्यवस्था पर हस्ताक्षर किये गए।

इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के साथ-साथ जमीन को लेकर भी सवाल उठे। चारणका स्थित गुजरात सोलर पार्क सौर ऊर्जा क्षेत्र के विकास के लिए एक मुकम्मल माहौल प्रदान करता है। 5,000 एकड़ क्षेत्र में फैला यह सोलर पार्क एशिया का सबसे विशाल सोलर पार्क तो है ही साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की अत्याधुनिक बुनियादी सुविधाओं से लैस भी है। उच्च सोलर रेडियेशन वाली इस जगह में बंजर भूमि का इस्तेमाल भी समझदारी के साथ किया गया है। 2011 की मुसलाधार बारिश भी सरकार और डेवलपरों के उत्साह को ठंडा न कर सकी। 28 जनवरी की निर्धारित तारीख को प्रोजेक्ट पूर्ण कर लिया गया। इस प्रोजेक्ट के जरिए उत्तर गुजरात के लोगों के जीवन की जो कायापलट हुई है, उसे तो वही जान सकता है जो इससे रू-ब-रू होगा।

इस प्रकार की पहल आगे चलकर एक उत्तम वित्तीय दूरदर्शिता साबित होगी | 25 वर्ष के समय काल में यह 600 मेगा वाट का प्रोजेक्ट 24000 मिलियन यूनिट्स बिजली पैदा करेगा | यदि इतना ही उत्पादन कोयले के जरिए हासिल करना हो तो 12000 मिलियन किलो ग्राम कोयले की जरूरत होती, और 90,000 मिलियन रुपयों की विदेशी मुद्रा हमारे कोष से खर्च करनी पड़ेगी| इस प्रकार इस तरह के प्रोजेक्ट निश्चित रूप से सभी के लिए लाभदायी है |

यह जानकर आपस भी आश्चर्य करेंगे कि इस प्रोजेक्ट के चलते प्रति किलोमीटर प्रति वर्ष एक करोड़ लीटर पानी की बचत भी होगी जो अन्यथा वाष्पी करण से उड़जाता |

कई लोग हमसे सवाल करते हैं कि गुजरात के पास जरूरत से ज्यादा बिजली होने के बावजूद पुन:प्राप्य ऊर्जा के लिए 2000 करोड़ रुपये का खर्च क्यों किया जा रहा है? इस सवाल का जवाब बेहद आसान है। आज हम गुजरात में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग को विस्तारित करने के लिए प्रतिबद्घ हैं। बाढ़ और अकाल से लेकर भूकंप तक की अनेक प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होनेे के बाद हम जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों से अच्छी तरह से वाकिफ हुए हैं।

राज्य के बच्चों के उज्जवल और तंदुरुस्त भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हम अपने वर्तमान का निवेश कर रहे हैं। हम अपने पीछे एक ऐसा इतिहास छोड़े जा रहे हैं, जिसे कोई इतिहासकार मिटा नहीं सकता। आपको यह जानकर खुशी होगी कि गुजरात सरकार विश्व की उन चार सरकारों में से एक है जिन्होंने जलवायु परिवर्तन के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की है। मेरे लिए क्लाइमेट चेन्ज के बजाय क्लाइमेट जस्टिस एक बड़ा मुद्दा है। दुनिया के गरीबों से जुड़ा हुआ यह चिंता का मुद्दा है, जो क्लाइमेट चेन्ज से सर्वाधिक प्रभावित हैं। आगामी पीढिय़ों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए विकास के कदम बढ़ाने को गुजरात प्रतिबद्घ है।

आम तौर पर हम अपना घर किराए पर देते हैं। लेकिन क्या हम यह सोच सकते हैं कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब हम घर की छत भी किराए पर दे सकेंगे? गुजरात सरकार ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के जरिए गांधीनगर फोटोवोल्टेक रूफ-टॉप (छत आधारित) कार्यक्रम शुरू किया है। अब शहर के निवासियों को अपने घर की छत पर ही सौर ऊर्जा के उत्पादन का अवसर मिलेगा। इससे अतिरिक्त आय का बंदोबस्त भी होगा। गांधीनगर को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने का हमारा सपना है। हम गुजरात के अन्य शहरों में भी रूफ-टॉप नीति के विस्तार की मंशा रखते हैं।

जब किसी स्थान पर बड़े पैमाने पर विकास हो रहा हो, उस स्थिति में अनुसंधान और कौशल्य निर्माण को कैसे छोड़ा जा सकता है? हम चाहते हैं कि गुजरात को सोलर हब बनाने और भविष्य की पीढ़ी को ऊर्जा की समस्या के महत्वपूर्ण उपाय सुझानेे के लिए हमारे युवा नये अनुसंधानों के साथ आगे आएं। वर्ष 2008 में पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी (पीडीपीयू) ने स्कूल ऑफ सोलर एनर्जी की शुरूआत की थी। जो अपने तरह की सर्वप्रथम संस्था है। हम जीईआरएमआई अनुसंधान और सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में अन्य अनुसंधानों को सक्रिय सहयोग प्रदान कर रहे हैं।

क्या हम स्थानीय स्तर पर बिना कौशल्य वाले युवाओं के बगैर कई सोलर ऊर्जा संयंत्रों का संचालन कर सकेंगे? हरगिज नहीं। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) की पहल के जरिए इस क्षेत्र में अनुसंधान और प्रशिक्षण को और भी ऊंचे स्तर पर ले जाया जाएगा। हमने करीब 6 सोलर आईटीआई लेबोरेटरी की स्थापना तो कर ही दी है और विद्यार्थियों की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है।

आज हम ह्रक्कश्वष्ट-ओपेक जैसे ऑयल उत्पादन करने वाले देशों का संगठन देखते हैं। भविष्य में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सभी देशों की अगवानी करने से भारत को रोकने वाला कोई नहीं है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट की अगवानी के साथ भारत सौर ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। इस प्रकार के कदम से वैश्विक स्तर पर दीर्घकालिक ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

इसके निष्कर्ष के रूप में मुझे चीफ सीएटल्स के शब्द याद आ रहे हैं, च्च्हमने अपने पूर्वजों से इस धरती को विरासत में हासिल नहीं किया है, हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।ज्ज् महात्मा गांधी ने भी कुछ ऐसी ही बात कही थी। इस प्रकार के प्रोजेक्ट्स से 9000 करोड़ रुपये का निवेश आएगा साथ ही 30,000 लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। लेकिन इस प्रोजेक्ट का महत्व इससे कहीं ज्यादा है। हमारे पास अनगिनत फैक्ट्रियां हैं, परन्तु यदि कोयला और गैस ही नहीं होंगे तो इनका क्या उपयोग? जब इस परम्परागत ऊर्जा का अभाव होगा तब हम सूर्य शक्ति और पुन:प्राप्य ऊर्जा के अन्य स्रोतों की तरफ मुडेंग़े। पर्यावरण पर विपरीत असर न हो और हमारे बच्चे स्वस्थ्य जीवन बिताएं, इसे सुनिश्चित करने के गुजरात के प्रयासों को उस वक्त समग्र विश्व याद करेगा।

नरेन्द्र मोदी

 

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भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन
July 06, 2026

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।