भारत का समुद्री पुनर्जागरण

Published By : Admin | October 30, 2025 | 14:56 IST

पीएम मोदी ने भारत के समुद्री क्षेत्र में हुए बदलाव और अपनी गौरवशाली समुद्री विरासत के साथ देश के नए जुड़ाव पर प्रकाश डालते हुए एक ब्लॉग लिखा। उन्होंने बताया कि कैसे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन इनिशिएटिव और अहम सुधारों ने अभूतपूर्व विकास को गति दी है। पीएम ने दुनियाभर के निवेशकों को भारत की तेजी से बढ़ती "ब्लू इकोनॉमी" का हिस्सा बनने के लिए भी आमंत्रित किया।

कल मैं मुंबई में था, जहाँ मैंने “Maritime Leaders Conclave” में हिस्सा लिया, जो “इंडिया मैरीटाइम वीक 2025” का एक हिस्सा है। मुंबई का भारत के समुद्री क्षेत्र से गहरा नाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के ऐतिहासिक संबंधों से लेकर आज के आधुनिक बंदरगाह ढांचे तक, यह शहर हमारे देश का एक अहम व्यापारिक केंद्र है। वहाँ मैंने प्रमुख सीईओ और उद्योग जगत के अन्य लोगों से मुलाकात की। इन चर्चाओं में भारत के बंदरगाह आधारित विकास को लेकर जो उत्साह दिखा, वह वास्तव में प्रेरणादायक था।

हम अपनी जड़ों से कट गए थे:

भारत की गौरवशाली समुद्री विरासत सर्वविदित है। हम हमेशा से जहाज बनाने और तटीय व्यापार के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। हम चोल और मराठों की भूमि हैं, जिनकी नौसैनिक शक्ति, व्यापारिक प्रभाव और रणनीतिक प्रतिभा प्रगति और शक्ति के मार्ग बने। उनकी दूरदर्शिता ने हमें दिखाया कि कैसे महासागर अवसरों के सेतु का काम कर सकते हैं।

लेकिन लगभग एक दशक पहले, जब हमने सरकार संभाली, तो भारत का समुद्री क्षेत्र पुराने कानूनों और सीमित क्षमता से जूझ रहा था। यह स्थिति हमें स्वीकार्य नहीं थी। इसलिए हमने इंफ्रास्ट्रक्चर, सुधारों और जनभागीदारी पर ध्यान दिया। पिछले ग्यारह वर्षों में इस क्षेत्र में बड़े बदलाव आए हैं। आज भारत का समुद्री क्षेत्र आधुनिक, वैश्विक भरोसे और राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक बन चुका है।

समुद्री विकास जिसने पैमाने को पुनर्परिभाषित किया:

इन आँकड़ों से सब कुछ स्पष्ट है —

भारत की बंदरगाह क्षमता 1,400 से बढ़कर 2,762 एमएमटीपीए हो गई है।

कार्गो हैंडलिंग 972 से बढ़कर 1,594 एमएमटी हो गई है, जिसमें से 855 एमएमटी केवल वित्त वर्ष 2024–25 में संभाली गई।

जहाजों के ठहराव का समय 93 घंटे से घटाकर 48 घंटे कर दिया गया है।

नेट सरप्लस 1,026 करोड़ रुपये से नौ गुना बढ़कर 9,352 करोड़ रुपये हो गया।

ऑपरेटिंग अनुपात 73% से घटकर 43% हो गया — यानी दक्षता का नया दौर शुरू हुआ है।

यह सब ऐसे ही नहीं हुआ है। हर जहाज़ और बंदरगाह के पीछे हमारे कुशल समुद्री कर्मचारी हैं। भारत का समुद्री कार्यबल 1.25 लाख से बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गया है, जो अब वैश्विक समुद्री कार्यबल का 12% है। भारत आज दुनिया में प्रशिक्षित नाविकों के शीर्ष तीन आपूर्तिकर्ताओं में से एक है।

शिपिंग और जलमार्ग - विकास के नए इंजन:

भारत की समुद्री शक्ति तटों और नदियों के पार फैल रही है।

भारतीय झंडा लगाए जहाजों की संख्या 1,205 से बढ़कर 1,549 हो गई, और बेड़े का सकल टन भार 10 मिलियन टन से बढ़कर 13.52 मिलियन टन हो गया। तटीय शिपिंग कार्गो लगभग दोगुना होकर 87 मिलियन टन से 165 मिलियन टन हो गया।

अंतर्देशीय जलमार्ग कार्गो में 710% की वृद्धि हुई, जो 2014 में 18 मिलियन टन से बढ़कर 2025 में 146 मिलियन टन हो गया। संचालित जलमार्गों की संख्या 3 से बढ़कर 32 हो गई, जबकि नौका और रो-पैक्स सेवाओं से 2024-25 में 7.5 करोड़ यात्री यात्रा कर चुके हैं।

आधुनिक पोर्ट, हरित भविष्य::

भारत के समुद्री क्षेत्र का दृष्टिकोण स्थायित्व और नवाचार पर आधारित है।

विझिंजम पोर्ट भारत का पहला गहरे पानी वाला ट्रांसशिपमेंट हब बन गया है। कांडला बंदरगाह देश की पहली ग्रीन हाइड्रोजन सुविधा का केंद्र है। जेएनपीटी ने अपनी क्षमता दोगुनी कर ली है और पोर्ट के इतिहास में सबसे बड़ा विदेशी निवेश आकर्षित किया है।

महाराष्ट्र के पालघर में लगभग ₹76,000 करोड़ के निवेश के साथ, वधावन पोर्ट प्रोजेक्ट, 20 मीटर की गहराई वाले डीप-ड्राफ्ट पोर्ट्स में से एक होगा। इसकी रेलवे और हाईवे कनेक्टिविटी, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर के नज़दीक होने से यह क्षेत्र लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और व्यापार के नए अवसर पैदा करेगा।

रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म:

सुधार ने समुद्री क्षेत्र में भारत की प्रगति को गति दी है।

बिल्स ऑफ लैडिंग बिल से लेकर भारतीय पोर्ट बिल (2025) तक, पाँच ऐतिहासिक बिल ने समुद्री शासन का आधुनिकीकरण किया है, व्यापार को सरल बनाया है, राज्यों को सशक्त बनाया है और भारत को वैश्विक मानकों से जोड़ा है।

इस विकास को तेजी देने के लिए, सरकार ने समुद्री क्षेत्र के लिए ₹70,000 करोड़ का विशेष पैकेज मंजूर किया है।

शिपबिल्डिंग सहायता योजना, समुद्री विकास कोष और शिपबिल्डिंग विकास योजना 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित करेगी और 2,500 से अधिक जहाजों के निर्माण में मदद करेगी। यह पहल भारत को शिपबिल्डिंग और समुद्री नवाचार में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल करेगी।

आइए, भारत में निवेश करें

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की भारत निवेश के लिए सबसे उपयुक्त ठिकाना है।

हमारे पास —

एक लंबा तटीय क्षेत्र है,
रणनीतिक वैश्विक व्यापार मार्ग हैं,
विश्वस्तरीय पोर्ट हैं,
ब्लू इकोनॉमी के लिए एक बड़ा और महत्वाकांक्षी विजन है।

हमारे पास बुनियादी ढांचा, नवाचार और स्पष्ट इरादे — तीनों हैं।
हमारे युवा नवाचार को नई उड़ान दे रहे हैं, और हमारा इकोसिस्टम तैयार है।

आइए, भारत की इस समुद्री यात्रा का हिस्सा बनिए।

Explore More
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी
India's electronics exports cross $47 billion in 2025 on iPhone push

Media Coverage

India's electronics exports cross $47 billion in 2025 on iPhone push
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
एक भारत, श्रेष्ठ भारत का जीवंत प्रतीक है काशी-तमिल संगमम
January 15, 2026

कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूं।

‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहां भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।

काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहां हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।

काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।

तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।

वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएं, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएं और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।

काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें....।

इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।

तेनकासी से काशी तक पहुंची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियां लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहां वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।

संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।

यहां मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहां सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।