जैसे ही भारत ने वैक्सीन की 95 करोड़ खुराक के आंकड़े को पार किया और रिकॉर्ड समय में 100 करोड़ कोविड टीकाकरण खुराक देने के ऐतिहासिक माइलस्टोन के करीब है, जिस तीव्र गति, स्कैल और सेफ्टी के साथ अभियान चलाया गया, उसे पूरी दुनिया ने नोटिस किया है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने अब तक जितनी खुराकें दी है, उससे दोगुना टीके लगाकर भारत उसे पीछे छोड़ने में कामयाब रहा है। पिछले सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति दिन औसतन 948,921 डोजेज दी गईं, जबकि भारत ने प्रति दिन औसतन लगभग 60 लाख खुराकें दीं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 83.9% पात्र आबादी ने एक डोज ली है। अमेरिका के एक महीने बाद टीकाकरण शुरू करने के बावजूद, शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की 71 प्रतिशत वयस्क आबादी को कोविड-19 टीके की कम से कम एक खुराक दी जा चुकी है। वैश्विक स्तर पर नवीनतम टीकाकरण दर औसतन प्रति दिन 2,83,58,130 खुराक है। इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया में रोजाना लगने वाली 21% वैक्सीन अकेले भारत में दी जा रही है।
विशेष रूप से भारत को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उन्हें देखते हुए ये छोटी या महत्वहीन उपलब्धियां नहीं हैं। अतीत में, विश्वस्तर पर विकसित की गई वैक्सीन को भारत पहुंचने में दशकों लग जाते थे। समय का अंतराल आमतौर पर कई वर्षों से लेकर कई दशकों के बीच होता था। इसके बाद पात्र आबादी को टीका लगाने में भी एक और दशक लग जाता था। उदाहरण के लिए : इनएक्टिवेटेड (Inactivated) पोलियो वैक्सीन 1955 में जोनास साल्क द्वारा विकसित किया गया था और एक अटेन्यूएटेड (Attenuated) लाइव ओरल पोलियो वैक्सीन अल्बर्ट सबिन द्वारा विकसित किया गया था और 1961 में व्यावसायिक उपयोग में आया था, लेकिन भारत में पोलियो के खिलाफ टीकाकरण की शुरुआत 1985 में टीकाकरण पर विस्तारित कार्यक्रम(Expanded Programme on Immunization) के साथ हुई थी। 1999 तक, इसने केवल 60% शिशुओं को ही कवर किया और यह एक टीका है जिसे इंजेक्शन नहीं, बल्कि बूंदों द्वारा दिया गया था। अब, इसकी तुलना कोविड 19 वैक्सीन से करें, जो विश्व स्तर पर और भारत दोनों में लगभग समान अवधि (कुछ महीने आगे पीछे) में विकसित की गई। भारत को दिसंबर 2020 तक दो मेड-इन-इंडिया टीके मिले, अर्थात् एक कोविशील्ड और दूसरी पूरी तरह से स्वदेशी रूप से विकसित कोवैक्सिन। निस्संदेह दुनिया में टीकाकरण का सबसे बड़ा अभियान 16 जनवरी 2021 को शुरू हुआ।
शुरुआत में लोगों के मन में आशंका थी। दुर्भाग्य से जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोगों ने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से राजनीति को महामारी से ऊपर रखा और टीके से झिझक के संदेहों में ईंधन देना जारी रखा। वे कोरोना विरोध से ज्यादा मोदी विरोधी से प्रेरित नजर आए, लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने हमारे लाखों हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स और वैज्ञानिकों को प्रेरित करते हुए लोगों के साथ सीधे संवाद करने और टीकों को लेकर जागरूकता और विश्वास पैदा करने का एक अनूठा तरीका अपनाया। नतीजतन, भारत में जनवरी में शुरू हुआ टीकाकरण अभियान, जिसमें टीके की हिचकिचाहट 60% आंकी गई थी, अब वयस्क भारतीय आबादी में सिर्फ 7% पर है।
वैक्सीन असमानता और भेदभाव एक और उचित डर था जो राष्ट्रीय अभियान की सफलता में बाधा बन सकता था। अमीर और गरीब के बीच इनकम के अंतर को देखते हुए कई लोगों ने सोचा कि कोविड 19 के खिलाफ लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण और उपयोगी उपकरण टीके भी कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास होंगे और गरीब महंगे टीकों तक नहीं पहुंच पाएंगे। इस मुद्दे को हल करने के लिए केंद्र सरकार ने, न केवल 18+ से ऊपर के सभी को मुफ्त टीके देने का निर्णय लिया, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से एक कड़ा संदेश भी भेजा जब वैक्सीन लगवाने वाला पहला व्यक्ति, भारत का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री या स्वास्थ्य मंत्री या फिर कोई अमीर बिजनेसमैन नहीं था, बल्कि दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के 34 वर्षीय सफाई कर्मचारी मनीष कुमार था। मनीष को भारत में कोरोना की पहली खुराक देने से, न केवल मजबूत छवि बनी, बल्कि यह कई मायनों में इस अभियान को लोकतांत्रिक बनाने के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। भारत में जिस तरह हर नागरिक बगैर किसी जाति, पंथ और वर्ग के एक वोट का हकदार है, उसी प्रकार प्रत्येक भारतीय, जीवन रक्षक टीकों के रूप में हकदार था।
कुछ राज्य सरकारें, विशेष रूप से विपक्षी पार्टियों से संबंधित सरकारों ने शुरू में वैक्सीन अभियान का इस्तेमाल तुच्छ राजनीति के लिए करने की कोशिश की, लेकिन आज वैक्सीन अभियान के पक्ष में भारी राष्ट्रीय जनसमर्थन ने उन्हें पीछे जाने के लिए मजबूर कर दिया। आज, कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कई देश-राज्यों की तुलना में तेजी से टीके लगा रहे हैं। उत्तर प्रदेश ने 11.35 करोड़ टीके लगाने में कामयाबी हासिल की है और महाविकास अघाड़ी द्वारा शासित महाराष्ट्र 8.60 करोड़ खुराक के साथ दूसरे स्थान पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल ने 6.22 करोड़ डोज के आंकड़े को पार कर लिया है। राजनीतिक मतभेद एक तरफ रखकर, कोरोना के खिलाफ लड़ाई में राज्य, वास्तव में एक यूनियन के रूप में एक साथ आए हैं। सितंबर के मध्य तक हिमाचल प्रदेश उन पहले राज्यों में शामिल हो गया जहां सभी पात्र वयस्कों को एक खुराक का टीका लगाया जा चुका था। गोवा और सिक्किम जैसे राज्य, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव, लद्दाख और लक्षद्वीप जैसे केंद्र शासित प्रदेश भी एक खुराक के साथ 100% वयस्क आबादी का टीकाकरण करने में कामयाब रहे।
जब अभियान शुरू हुआ तो पहली दस करोड़ खुराक देने में 85-86 दिन लगे। इसके बाद, गति में तेजी से वृद्धि हुई है और पिछले कुछ हफ्तों में, 10 करोड़ वैक्सीन खुराक के आंकड़े को पूरा होने में औसतन लगभग 11-13 दिन लगे हैं। 17 सितंबर को, जो कि पीएम मोदी का जन्मदिन था, भारत में एक ही दिन में 2.5 करोड़ टीके लगाए गए। यह लगभग एक ही दिन में न्यूजीलैंड की पूरी आबादी को 4 बार टीका लगाने के बराबर है!
यह केंद्र सरकार की प्लानिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव विजन, राज्यों द्वारा कॉर्डिनेशन और कार्यान्वयन, लाखों हेल्थकेयर वर्कर्स के समर्पण के बिना संभव नहीं हो सकता था, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के लोगों ने पूर्ण भागीदारी की, वो भी ऐसे समय में जब सोशल डिस्टेंसिंग नियम का पालन किया जा रहा है, भारत और दुनिया को जबरदस्त नुकसान पहुंचाने वाले इस विदेशी दुश्मन को हराने के लिए पीएम मोदी के नेतृत्व में एकजुट होने के मूल्य को समझा है। यह भी साबित करता है कि जब राष्ट्रीय हित या जनहित की बात आती है तो भारत के लोग जन अभियान में एकजुट होने से कभी कतराते नहीं हैं।
लेखक का नाम : शहजाद पूनावाला
डिस्कलेमर :
यह आर्टिकल पहली बार टाइम्स ऑफ इंडिया में पब्लिश हुआ था।
यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।


