गुजरात में पोलियो उन्मूलन अभियान

 गांधीनगर की श्रमयोगी माताओं के बच्चों को मुख्यमंत्री ने पिलाई दो बूंद जिंदगी की

 राज्य में 86.34 बच्चों के टीकाकरण का महाभिया

 मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को समग्र गुजरात में पोलियो उन्मूलन अभियान का प्रारंभ करवाते हुए पोलियो की तरह कुपोषण से गुजरात को मुक्त कराने का आह्वान किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने गांधीनगर में श्रमयोगी माताओं के बच्चों को पोलियो रोधी टीका की बूंद पिलाई। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार और समाज ने साथ मिलकर पोलियो उन्मूलन अभियान को सफल बनाया है।

राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग और माता-पिता की जागृति के लिए उन्हें श्री मोदी ने अभिनंदन दिया। इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री जयनारायण व्यास ने कहा कि पोलियो रोधी सघन टीकाकरण अभियान के चलते वर्ष 2007 के बाद राज्य में पोलियो का एक भी माामला प्रकाश में नहीं आया है, यह गुजरात की जनता की जागृति और स्वास्थ्य विभाग के उत्कृष्ट कार्य का नतीजा है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा वर्ष में 19 फरवरी को आयोजित पोलियो रोधी टीकाकरण के प्रथम राउंड में 86.30 लाख बच्चों को पोलियो टीके का कवच प्रदान किया गया था, इसी तरह आज के दूसरे राउंड में 86.34 लाख बच्चों के टीकाकरण के लिए राज्य भर में 34,538 बूथ पर 1.38 लाख स्वास्थ्य कार्यकर्ता टीकाकरण के लिए अपनी सेवाएं देंगे। इसके लिए पोलियो रोधी टीके के एक करोड़ से अधिक डोज उपलब्ध करवाए गये हैं। वहीं सघन टीकाकरण अभियान के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से तटीय इलाकों और सुदुरवर्ती क्षेत्रों को शामिल करते हुए 3785 मोबाइल टीमें और बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन तथा एयरपोर्ट आदि के लिए 2816 ट्रांजिट टीमों का गठन किया गया है। इस अवसर पर स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव राजेश किशोर सहित उच्च  अधिकारी उपस्थित थे।

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प्रधानमंत्री ने सुव्यवस्थित मानकों से मानवीय आचरण के मार्गदर्शन को दर्शाने वाले एक संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
May 20, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। इसका अभिप्राय है कि श्रेष्ठ आचरण एक दीपक की तरह है जो न केवल एक व्यक्ति को बल्कि पूरे समाज को आलोकित करता है। श्री मोदी ने कहा कि इसी आदर्श को अपनाकर हमारे देश के लोग आज पूरे संयम, क्षमता और कर्तव्य परायणता के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा:

"श्रेष्ठ आचरण वह दीपक है, जिससे व्यक्ति के साथ-साथ समाज भी आलोकित होता है। इसी आदर्श को अपनाते हुए हमारे देशवासी आज पूरे संयम, सामर्थ्य और कर्तव्यनिष्ठा से राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।”

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।"

क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका निर्धारण व्यक्तिपरक राय या क्षणिक आवेग पर नहीं, बल्कि शास्त्र आधारित एक सुव्यवस्थित मानक के अनुसार होना चाहिए, जो आचरण को दिशा और अनुशासन प्रदान करता है। इसलिए, व्यक्ति को स्थापित मानकों की उस प्रणाली के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि उसका आचरण संतुलित, मान्य और सार्थक हो सके।