Talking about Wikileaks cable about him Shri Modi on Tuesday mentioned, ‘Wikileaks cables are accurate. I am glad to learn that America admits Modi is incorruptible’. He informed media that the cable presents an honest account of his talk on human right issue with the American official.
He said, ‘I am a person involved with the pride of India. I clearly said America cannot preach us about human rights violations. I counted all the incidents where the U.S. has abused human rights'
Hon'ble CM's take on Wikileaks cable about him
In a cable sent by Michael S Owen, dated November 2, 2006, presents Shri Modi as a 'no-nonsense, effective administrator who has reduced corruption in public life in Gujarat'. It presents Gujarat as a progressive state. Talking about Gujarat’s progress he said, ‘Gujarat is developing speedily, and America also has believed that Gujarat can develop rapidly’.
He noted cable mentioned him fairly and said he was a 'good Indian leader'. He said, ‘to say a person in non-corrupt is one thing but the report that America has sent mentions me as 'un-corruptible' based on interactions with people’.
‘On one side it is being said, 'Indian government is completely corrupt'. Then there are reports by America and WikiLeaks, which refer to the state of Gujarat where the leader is un-corruptible,' he added
सदन की ओर से, मेरी तरफ से, मैं श्रीमान हरिवंश जी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं और शुभकामनाएं भी देता हूं। राज्यसभा उपसभापति के रूप में लगातार तीसरी बार निर्वाचित होना, यह अपने आप में इस सदन का आपके प्रति जो गहरा विश्वास है और बीते हुए कालखंड में आपके अनुभव का जो सदन को लाभ मिला है, सबको साथ लेकर चलने का आपका जो प्रयास रहा है, उसको एक प्रकार से सदन ने आज एक मोहर लगा दी है और यह अपने आप में यह एक अनुभव का सम्मान है, एक सहज कार्य शैली का सम्मान है और एक सहज कार्य शैली की स्वीकृति भी है। हमने सबने हरिवंश जी के नेतृत्व में सदन की शक्ति को और अधिक प्रभावी होते हुए भी देखा है और मैं कह सकता हूं कि केवल सदन की कार्यवाही का संचालन ही नहीं, वह अपने जीवन के जो भूतकाल के अनुभव हैं, उसको भी बहुत ही सटीक तरीके से सदन को समृद्ध करने में उपयोग लाते हैं। उनका यह अनुभव पूरी कार्यवाही को, संचालन को और सदन के माहौल को और अधिक परिपक्व को बनाता है। मुझे विश्वास है, उपसभापति जी का नया कार्यकाल उसी भावना, संतुलन और समर्पण के साथ आगे बढ़ेगा और हम सबके प्रयासों से सदन की गरिमा को नई ऊंचाई प्राप्त होगी।
आदरणीय सभापति जी,
हरिवंश जी का जन्म यूपी के गांव में हुआ और सहज रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण उन्हें अपने गांव के विकास में विद्यार्थी काल से भी कुछ ना कुछ करते रहे। उनकी शिक्षा-दीक्षा काशी में हुई और इन सारे विषयों पर मुझे भूतकाल में बोलने का अवसर मिला, तो मैं काफी कुछ कह चुका हूं। इसलिए मैं आज इसको दोहराता नहीं हूं। एक बात का उल्लेख आज जरूर मैं करूंगा, आज 17 अप्रैल है और 17 अप्रैल 1927, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती भी है और विशेषता यह है कि आज 17 अप्रैल को आप जब तीसरी बार इस दायित्व को संभालने जा रहे हैं और वह भी चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर और चंद्रशेखर जी के साथ आपका जुड़ाव, उनके प्रति आपका लगाव और एक प्रकार से आप उनके सहयात्री रहे, उनके पूरे कार्यकाल में, तो यह एक अपने आप में एक बहुत ही बड़ा सुयोग है। अपने चंद्रशेखर जी के जीवन पर किताबें भी लिखी हैं और चंद्रशेखर जी के एक वृहद जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बहुत बड़ा काम भी आपने किया है और इसलिए आपके लिए एक बहुत बड़ा विशेष अवसर बन जाता है कि चंद्रशेखर जी की जन्म जयंती पर आपके तीसरा कार्यकाल का प्रारंभ हो रहा है। हरिवंश जी का सार्वजनिक जीवन केवल संसदीय कामों तक सीमित नहीं रहा है। पत्रकारिता के उच्च मानदंड, यह आज भी आदर्श के रूप में रेखांकित किए जाते हैं। लंबा जीवन पत्रकारिता का रहा है, लेकिन पत्रकारिता में भी उन्होंने उच्च मानदंड को हमेशा आधार माना। हम सब जानते हैं, उनके लेखनी में धार है, लेकिन उनकी वाणी में और व्यवहार में सौम्यता और शिष्टता भरी-भरी रहती है, यह अपने आप में और मैं जब गुजरात में था, तब भी मैं उनकी लेखों को पढ़ने की मेरी आदत रही थी और मैं देखता था कि वह अपना पक्ष बड़ी दृढ़ता के साथ रखते थे और मैं अनुभव करता था कि उसमें काफी अध्ययन के बाद उसका निचोड़ उसमें प्रकट होता था। पत्रकारिता में भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का उनका निरंतर प्रयास रहा और एक सफल प्रयास भी रहा और हम देखते हैं, सदन में भी चाहे पॉलिसी हो या प्रोसेस हो, उन बातों का कहीं ना कहीं छाया हमें हमेशा नजर आती है और यह हम सबके लिए सुखद अनुभव है। वह समाज की वास्तविकताओं के साथ गहरे जुड़ाव के साथ काम करने वाले व्यक्ति रहे हैं। मैं तो कहूंगा, जो चाहे लोकसभा हो या राज्यसभा हो, जो नए सांसद आते हैं, जो हरिवंश जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं, बहुत कुछ बातें करके उनसे जान सकते हैं, क्योंकि जब वह पत्रकारिता में थे, तो उनकी कॉलम चलती थी, हमारा सांसद कैसा हो, हमारा पार्लियामेंट मेंबर कैसा हो, तब उनको शायद पता नहीं होगा, कभी उनको ही बैठना पड़ेगा। लेकिन वह लिखते थे और वह बातों में बहुत व्यापकता रहती थी। सदन की गरिमा और बैठने वाले सदस्य का दायित्व, अब उसके आचार विचार को लेकर भी बहुत गहरा उनका अध्ययन रहता था और उन बातों का उपयोग आज हमारे सदन के साथी, उनके साथ बैठकर के बहुत कुछ जान सकते हैं, सीख सकते हैं। समय की पाबंदी एक डिसिप्लिन लाइफ में और अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीरता, यह आपकी विशेषता रही है और शायद इसी के कारण आप सर्व स्वीकृत व्यक्तित्व आपका विकसित हुआ है। हमने देखा होगा जब से वह राज्यसभा के सदस्य बने हैं, मैं कह सकता हूं कि पूर्ण समय वह सदन में होते हैं। सभापति जी की अनुपस्थिति में सदन को संभालने का काम तो करते ही हैं, लेकिन बाकी समय भी यहां कमेटी का कोई भी व्यक्ति बैठा हो, तो भी वह सदन में हमेशा अपनी मौजूदगी रहती है। हर बात को सुनते हैं, उस समय सदन का जो संचालन करते हैं, उनके कार्य को भी देखते हैं और यह इसके पीछे उनको अपना जो दायित्व है, उसके प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता है, उसके कारण यह संभव होता है और यह हम सबके लिए सीखने जैसा है और मैंने देखा है कि वह पूरा समय इन चीजों के लिए वह खपा देते हैं।
आदरणीय सभापति जी,
उपसभापति के तौर पर सदन को कैसे चलाया, सदन में सदस्य के तौर पर क्या योगदान दिया, इस बारे में हम स्वाभाविक रूप से एक सकारात्मक चर्चा करते रहते हैं। लेकिन सदन के बाहर, जनता के बीच वह कैसे अपने लोकतांत्रिक और सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं, यह भी हम सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके लिए सचमुच में ध्यान आकर्षित करने वाले विषय हैं और हमें उसको देखना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि काम सराहनीय तो है ही हैं, अनुकरणीय भी हैं। हमारा देश युवा देश है और मैंने देखा है कि हरिवंश जी ने अपने समय का उपयोग सबसे ज्यादा युवाओं के बीच में बिताना पसंद किया है। युवाओं में लगातार गंभीर विषयों पर जागरूकता बने, एक प्रकार से लोक शिक्षा का काम निरंतर चलता रहे, यह अपने आप में वह लगातार करते रहते हैं, तो देश भर में उनका भ्रमण रहता है। वह मीडिया की नजरों में बहुत ज्यादा रहने का उनका शौक नहीं है, लेकिन भ्रमण और कार्यक्रमों की संख्या उनकी लगातार चलती रहती है। 2018 में, जब उन्होंने राज्यसभा के उपसभापति की भूमिका निभानी शुरू की, उसके बाद जो मेरी जानकारी है, कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज में 350 कार्यक्रम किए हैं। यह एक बहुत बड़ा काम है। देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजेस में 350 से अधिक कार्यक्रम, जाना-आना, उनके साथ बैठना, बातें करना, उसके लिए विषयों की तैयारी करना, यह अपने आप में बहुत बड़ा, एक प्रकार से आपने बृहतस्य के रूप में इस काम को किया है और युवाओं से ही जुड़ने के लक्ष्य को आपने जरा भी ओझल नहीं होने दिया है। और विकसित भारत का सपना युवाओं के लिए भी क्यों होना चाहिए, इस मूल विषय को अलग-अलग तरीके से जिस प्रकार से विद्यार्थियों का मूड हों, वह बताते रहते हैं। विद्यार्थियों में, युवा पीढ़ी में एक आत्मविश्वास कैसे पैदा हो, निराशा से वह हमेशा-हमेशा बाहर रहें, इन सारे विषयों की चर्चा वह करते हैं। उनके कुछ ऐतिहासिक रेफरेंस के साथ बात करते हैं कि हम ऐसे क्या कारण हैं कि हम जितनी तेजी से जाना चाहिए था, आगे नहीं जा पाए, अब अवसर क्या आया है, सारी बातें हो और देश इतनी बड़ी छलांग लगा सकता है, उसका आत्मविश्वास भरने का काम उनके द्वारा होता है। आजकल देश में लिटरेचर फेस्टिवल, एक बड़ा सिलसिला चला है और अब तो वह टीयर-2, टीयर-3 सिटीज़ तक भी वह सिलसिला चला है। लिटरेचर फेस्टिवल्स में भी हरिवंश जी का अक्सर जाना होता है और उस समाज का, उस तबके को भी वह अपने विचारों से प्रभावित करते रहते हैं, प्रेरित करते रहते हैं।
आदरणीय सभापति जी,
मैंने उनके जीवन का एक प्रसंग जो सुना है, शायद हो सकता है, सार्वजनिक तौर में मेरी जानकारी सटीक ना भी हो। मैंने सुना है कि 1994 में हरिवंश जी पहली बार विदेश यात्रा की और वह अमेरिका गए। जब अमेरिका गए, तो अपने सारे कार्यक्रमों के अलावा उनसे पूछा गया कि आप कहीं और जाना चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं। तो उन्होंने आग्रह से कहा कि मैं जरूर यह विकसित देश है, तो मैं उसकी यूनिवर्सिटी को देखना-समझना चाहता हूं और वहाँ की ऐसी कौन सी शिक्षा और कल्चर है, जिसके कारण यह देश इतना आगे बढ़ रहा है और उन्होंने काफी समय अपने निर्धारित कार्यक्रमों के सिवाय वह पहली अमेरिका की यात्रा में सिर्फ और सिर्फ यूनिवर्सिटीज में बिताया, उसका अध्ययन करने का काम किया। यानी यह जो ललक थी उनके मन में, यह अगर यह विकसित देश की यूनिवर्सिटी से जो निकलता है, तो हिंदुस्तान की यूनिवर्सिटीज़ भी ऐसी हों, ताकि विकसित भारत का सपना वहीं से रेखांकित किया जा सके।
आदरणीय सभापति जी,
MPs को MPLAD फंड के संबंध में तो काफी चर्चा रहती है और एक बड़ा प्रसंगी का विषय भी रहता है MPs में और कभी-कभी तो यह भी संघर्ष रहता है कि MPLAD फंड इतना है और वहां उधर एमएलए फंड ज्यादा है, उसकी चर्चा रहती है। लेकिन एमपी फंड का उपयोग कैसे हो, MPLAD जो फंड की बातें हैं, उसमें हरिवंश जी के विचारों को तो मैंने स्वयं भी सुना है, मैं प्रभावित हूं इससे, लेकिन हमारी भी कुछ मजबूरी रही है। शायद हम उनकी अपेक्षा के अनुसार उसको कर नहीं पाए हैं, क्योंकि सबको ऐसे विषय में साथ लेना जरा कठिन होता है। लेकिन उन्होंने खुद की उस जिम्मेदारी को कैसे निभाया है, मैं समझता हूं वह भी हम लोगों ने, उन्होंने यह MPLAD फंड था, जो अपने जो विचार हैं, उसके विचार को भी नीचे धरातल पर उतारने के लिए उपयोग किया, शिक्षा क्षेत्र और युवा पीढ़ी, यह उसके सारे केंद्र में रहा, MPLAD फंड उन्होंने इस्तेमाल करने के लिए एक मिसाल पेश की है। उन्होंने विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थानों में ऐसे अध्ययन केंद्र स्थापित किया और उसका प्रभाव लंबे अरसे तक रहने वाला है और उसमें भी उन्होंने प्रोजेक्ट ओरिएंटेड, समस्या के समाधान को केंद्र में रखा। जैसे लुप्त होती जा रही भारतीय भाषाओं, उनके संरक्षण के लिए उन्होंने आईआईटी पटना में एक अध्ययन केंद्र के लिए MPLAD फंड का उपयोग किया, तो उस काम को वह लगातार वहां हो रहा है। एक और उन्होंने काम किया, जो बिहार में कुछ क्षेत्र हैं, जहां भयावह भूकंप की घटनाएं रोज घटती रहती हैं, नेपाल में भी एक छोटा सा भूकंप आ जाए, तो भी उस क्षेत्र का प्रभावित करता है। इस काम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से सेंटर फॉर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग के रूप में एक स्टडी सेंटर रिसर्च के लिए खुलवाया है। यानी वह स्टडी का काम करना, रिसर्च करना, उस पर लगातार काम कर रहा है। हम जानते हैं कि जैसा मैंने कहा है, जय प्रकाश जी का गांव सिताब दियारा हरिवंश जी वहीं हैं और वहां गंगा और घाघरा दो नदी के बीच में एक गांव है, तो हमेशा ही जल के कारण जो कटाव की समस्या रहती है, वो गांव परेशान रहता है और नदी धारा भी बदलती रहती है, तो विनाश भी बहुत होता रहता है। उसको भी ध्यान में रखते हुए उन्होंने MPLAD फंड से इसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उन्होंने पटना की आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी में एक नदी अध्ययन केंद्र खुलवाया है। पटना के ही चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्था में वो बिजनेस इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर बनवा रहे हैं। एआई के इस दौर में मगध विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर बनाया है। यानी MPLAD फंड का एक निर्धारित दिशा में काम कैसे किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण आपने प्रस्तुत किया है।
आदरणीय सभापति जी,
हम सभी ने अनुभव किया है कि लोग जब अपने गांव से स्थानांतरण करते हैं, एक दूसरे शहर में जाते हैं, तो जीवन में एक प्रकार से गांव से कट जाते हैं। हरिवंश जी का जीवन आज भी गांव से जुड़ा रहता है, अपने गांव से जुड़ा रहता है। वह लगातार वहां के सुख दुख के साथी बन करके वह अपना जो भी कंट्रीब्यूशन कर सकते हैं, वह करते रहते हैं।
आदरणीय सभापति जी,
जिस संसद की नई इमारत में बैठे हैं, उसका जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब मुझे उनके साथ निकट से काम करने का अवसर आया। और मैं अनुभव कर रहा था कि जो विचार मेरे मन में आते थे, मैं हरिवंश जी से कहता था, हम ऐसा करें तो कैसा होगा, दो दिन में वो बराबर परफेक्ट उसको लेकर आते थे, कहीं नामकरण करना है, उसके पहचान इस सदन की कैसे बने, तो काफी कुछ कंट्रीब्यूशन सदन के निर्माण में, उसकी आर्ट गैलरी में, विभिन्न द्वार के नाम रखने हों, यानी हर प्रकार से मेरे एक साथी के रूप में हम दोनों को और मुझे बड़ा आनंददायक रहा वो अनुभव काम का।
आदरणीय सभापति जी,
हरिवंश जी के सदन को चलाने की कुशलता को तो हम भली भांति देखे हैं, लेकिन साथ-साथ उन्होंने राज्यों की विधानसभाएं, विधान परिषदें और वहां जो प्रीसाइडिंग ऑफिसर्स हैं, उनको भी कैसे मदद रूप होना, उनके लिए किस प्रकार से आवश्यक उनके ट्रेनिंग के लिए काम किया जाना, उसके लिए भी काफी समय दिया और उन्होंने लगातार उनके लिए समय दिखाया। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन में भी उन्होंने भारत की डेमोक्रेटिक व्यवस्था की छाप छोड़ने में बहुत बड़ी सक्रिय भूमिका निभाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि 21वीं सदी का यह दूसरा क्वार्टर यह सदन को बहुत कुछ कंट्रीब्यूट करना है। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने में, विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में, मुझे विश्वास है कि सदन के द्वारा बहुत कुछ होगा और उसके कारण पीठाधीश सबका दायित्व बहुत बड़ा होता है। हम सबका बड़े विश्वास से मैं कह सकता हूं कि सभी साथी आप जो चाहते होंगे, उसको पूरा करने के लिए सहयोग करते रहेंगे और आपके काम को कठिनाइयों में ना परिवर्तित करें इसके लिए ताकि आप ज्यादा आउटकम दे सकते हैं और मुझे विश्वास है सब लोग इसको करेंगे और मैंने पहले भी कहा था कि हरि कृपा पर है सब कुछ और हरि तो यहां के भी है, हरि वहां के भी है और हरि यही बैठेंगे। तो हरि कृपा बनी रहे। इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं।