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विश्व मंच पर

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से भारत को जबर्दस्त लाभ मिला है।

26 मई 2014 को सत्ता में आने के बाद से भारत सरकार ने ऐसी विदेशी नीति अपनाई है जिसमें पूरे विश्व को सक्रिय रूप से एक साथ लेकर चलने और साथ-ही-साथ विश्व के सभी देशों को भारत में निवेश करने के लिए आमंत्रित करने की नीति निर्धारित है।

26 मई 2014 को जब प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री शपथ ले रहे थे, वहां इस अवसर पर सार्क देशों के प्रमुख उपस्थित थे। उनमें राष्ट्रपति करजई (अफ़गानिस्तान), प्रधानमंत्री तोबगे (भूटान), राष्ट्रपति यामीन (मालदीव), प्रधानमंत्री कोइराला (नेपाल), प्रधानमंत्री नवाज शरीफ (पाकिस्तान) और राष्ट्रपति राजपक्षे (श्रीलंका) शामिल थे। प्रधानमंत्री शेख हसीना जापान के एक पूर्व-निर्धारित दौरे पर थीं, इसलिए बांग्लादेश की तरफ से वहां की संसद के अध्यक्ष यहाँ आये थे। अगले दिन प्रधानमंत्री ने इन नेताओं के साथ व्यापक द्विपक्षीय वार्ता की।

श्री मोदी ने सार्क देशों के प्रति अपनी सोच और प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराया है। पदभार संभालने के बाद वे अपने पहले विदेशी दौरे के तौर पर भूटान गये थे जहाँ उन्होंने भूटान की संसद को संबोधित किया और भारत-भूटान सहयोग को मजबूत करने के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये। वे 2014 में द्विपक्षीय यात्रा पर नेपाल जाने वाले पहले प्रधानमंत्री बने जहाँ फिर से मूल ध्येय भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत बनाना था। भारत-श्रीलंका संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री ने मार्च 2015 में श्रीलंका का दौरा किया। इससे एक महीने पहले राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना जनवरी 2015 में श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभालने के बाद अपनी पहली यात्रा के तौर पर भारत आये थे।

प्रधानमंत्री ने पहले ही वर्ष में में कई महत्वपूर्ण शिखर सम्मलेन का दौरा किया है। जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री ने फ़ोर्टालेज़ा (ब्राजील) में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया जहाँ उन्होंने ब्रिक्स देशों के लिए आगे रोडमैप बनाने के लिए ब्रिक्स नेताओं से मुलाकात की। इस संबंध में एक प्रमुख विकास यह हुआ है कि ब्रिक्स बैंक का गठन किया गया है और एक भारतीय को इस बैंक का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया है।

सितंबर 2014 में प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया जिसमें उन्होंने वैश्विक शांति के महत्व पर बल दिया और उन तरीकों पर प्रकाश डाला जिससे भारत दुनिया में अपना योगदान दे सकता है। उन्होंने विश्व से एकजुट होकर किसी एक दिन को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में चिह्नित करने का आह्वान किया। दिसंबर 2014 में उनका यह आह्वान सफल हुआ जब 177 राष्ट्रों ने एक साथ मिलकर 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव पारित किया। निश्चित रूप से इससे दुनिया भर में योग बहुत लोकप्रिय होगा।

नवंबर 2014 में प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लिया जहाँ उन्होंने दुनिया के कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठक की। जी-20 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने काले धन को देश में वापस लाने पर काफी जोर दिया और काले धन की बुराइयों का भी उल्लेख किया। शिखर सम्मेलन में विचार-विमर्श के दौरान यह हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण था जो यह दिखाता है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है।

उसी महीने, प्रधानमंत्री ने म्यांमार में आसियान शिखर सम्मेलन में भाग लिया जहाँ फिर से उन्होंने कई एशियाई नेताओं से मुलाकात की। उनसे मिलने वाले सभी नेता सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को लेकर बहुत उत्साहित थे। नवंबर 2014 में एक दूसरा महत्वपूर्ण आयोजन था, नेपाल के काठमांडू में सार्क शिखर सम्मेलन जहाँ फिर से प्रधानमंत्री ने सार्क नेताओं के साथ बैठक की।

श्री मोदी ने दुनिया के हर क्षेत्र पर काफी ध्यान दिया है। मार्च 2015 में उनका तीन देशों, सेशेल्स, मॉरिशस और श्रीलंका का दौरा हिंद महासागर पर केंद्रित था। सेशेल्स में प्रधानमंत्री ने भारत की मदद से स्थापित किये गए तटीय रडार परियोजना का उद्घाटन किया। वे बाराकुडा के शुरू होने के समारोह में भी शामिल हुए जो भारत-मॉरीशस सहयोग की एक और निशानी है।

अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री ने फ्रांस, जर्मनी और कनाडा का दौरा किया। यह यात्रा यूरोपीय देशों और कनाडा के साथ सहयोग को बेहतर बनाने के उद्देश्य से की गई थी। फ्रांस में परमाणु ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में ठोस प्रगति सहित रिकार्ड 17 समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए। जर्मनी में प्रधानमंत्री और चांसलर मर्केल ने संयुक्त रूप से हनोवर मेले का उद्घाटन किया और प्रधानमंत्री ने रेलवे के आधुनिकीकरण के बारे में जानने के लिए बर्लिन में एक रेलवे स्टेशन का भी दौरा किया। जर्मनी में कौशल विकास पर भी विशेष रूप से ध्यान दिया गया। कनाडा में आर्थिक संबंधों, ऊर्जा और यहां तक कि सांस्कृतिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित था। कनाडा की उनकी यात्रा ऐतिहासिक थी क्योंकि यह 42 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली कनाडा यात्रा थी।

प्रधानमंत्री ने भारत के पूर्वी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत बनाने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। उन्होंने अगस्त 2014 में जापान की एक महत्वपूर्ण यात्रा की जहाँ दोनों देश उद्योग, प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों और सरकार के स्मार्ट शहर परियोजना में बड़े पैमाने पर सहयोग करने पर सहमत हुए। मई 2015 में प्रधानमंत्री चीन गये जहाँ शियान में उनका विशेष स्वागत किया गया। यह पहला मौका था जब विश्व के किसी नेता का बीजिंग से बाहर स्वागत किया गया। वे मंगोलिया भी गये और मंगोलिया की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने दक्षिण कोरिया का दौरा किया जहाँ उन्होंने शीर्ष मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से मुलाकात की, एक शिपयार्ड का दौरा किया और निवेशकों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया।

पिछले एक वर्ष के दौरान भारत ने भी विश्व के शीर्ष नेताओं का स्वागत किया है। जनवरी 2014 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि के तौर पर भारत आये। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा ने संयुक्त रूप से भारतीय और अमेरिकी व्यापार जगत के प्रमुखों को संबोधित किया और व्यापक वार्ता की। प्रधानमंत्री टोनी एबट ने सितंबर 2014 में भारत का दौरा किया और इसी महीने राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भारत दौरे पर आये जहाँ प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में उनका स्वागत किया। दिसंबर 2014 में रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत के महत्वपूर्ण दौरे पर आये जिसके दौरान परमाणु और व्यापारिक संबंधों के बारे में बड़े पैमाने पर चर्चा हुई।

श्री मोदी प्रशांत द्वीप समूह के देशों के साथ अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। नवंबर 2014 में अपनी फिजी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने प्रशांत द्वीप के सभी देशों के नेताओं से मुलाकात की और सभी ने इस क्षेत्र के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने के विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बाद में इस वर्ष अफ्रीकी देशों के नेता दिल्ली में होने वाले शिखर सम्मलेन में भाग लेंगे। पिछले एक वर्ष में प्रधानमंत्री ने अरब के नेताओं से मुलाकात कर अरब देशों, एक ऐसा क्षेत्र जो हमेशा से भारत का अच्छा मित्र रहा है, के साथ भारत के संबंधों को मजबूत बनाने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की है।

जब भी प्रधानमंत्री विदेशी दौरे पर जाते हैं, उनका कार्यक्रम विभिन्न बैठकों और महत्वपूर्ण यात्राओं से परिपूर्ण होता है जिसका मुख्य उद्देश्य देश में बुनियादी संरचना को बदलना और यहाँ निवेश को बढ़ाना है। सभी यात्राओं में ऊर्जा, विनिर्माण, निवेश, कौशल विकास और बुनियादी सुविधाओं जैसे विषयों पर चर्चा एवं विचार-विमर्श एक आम बात रही है और प्रत्येक यात्रा भारत के लोगों के लिए कुछ नया एवं उत्साहवर्धक परिणाम लेकर आती है।

योग के लिए संपूर्ण विश्व एक साथ

योग ने दुनिया को एकजुट किया, भारत के प्रयासों का सार्थक परिणाम।

सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर पूरे विश्व को एक साथ आने का आह्वान किया था। यह भारत में योग की गौरवशाली परंपरा के प्रति एक विशेष सम्मान होगा। 

दिसंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।  177 देशों ने एक साथ 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में घोषित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया। सभी महाद्वीपों में फैले दुनिया भर के 177 देश इसमें शामिल थे। 

21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाये जाने से दुनिया भर में योग की लोकप्रियता और अधिक बढ़ेगी। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं निरंतर योग करते रहे हैं और वे इसे ज्ञान, कर्म और भक्ति का एक अद्भुत संगम बताते हैं जो ‘रोग मुक्ति’ और ‘भोग मुक्ति’ प्राप्त करने का एक साधन है। यहाँ तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विशेष रूप से योग विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया था ताकि युवाओं के बीच योग को और अधिक लोकप्रिय किया जा सके।

प्रवासी भारतीयों के साथ संबंधों को एक नई दिशा

अपनों के साथ संबंधों को मजबूत बनाने के लिए कार्यरत

वे भारत से गये हैं लेकिन भारत के प्रति उनका प्यार अभी भी बना हुआ है। प्रवासी भारतीय विश्व के सबसे सक्रिय और सफल समुदायों में से एक हैं। वे स्थानीय रीति-रिवाजों और अपने देश की परंपराओं का उत्तम सम्मिश्रण हैं, यहाँ तक कि इसे बढ़ावा देने में भी उनका योगदान है। उनका दिल अभी भी भारत के लिए धड़कता है और इसलिए जरूरत पड़ने पर उन्होंने हमेशा भारत की मदद की है।

श्री नरेन्द्र मोदी हमेशा से प्रवासी भारतीयों के बीच लोकप्रिय रहे हैं जो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो भारत में बदलाव लाने में सक्षम हैं। हर विदेशी दौरे में प्रधानमंत्री ने प्रवासी भारतीयों से जुड़ने का प्रयास किया है। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से सिडनी के अल्फोंस एरेना तक, हिंद महासागर में सेशल्स और मॉरीशस से शंघाई तक, हर जगह नरेंद्र मोदी का भारतीय समुदाय ने गर्मजोशी से स्वागत किया है।

प्रधानमंत्री के भाषण अत्यंत आकांक्षी एवं प्रेरणादायी रहे हैं जिसमें उन्होंने भारत में बदलाव की शुरुआत, लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए सरकार के प्रयासों और भारत के विकास में प्रवासी भारतीयों की भूमिका के बारे में बात की है।

एक अत्यंत आवश्यक सुधार जो किया गया है, वह है - पीआईओ और ओसीआई को एक करने का। प्रवासी भारतीयों ने इस कदम का स्वागत किया है। वीजा नियमों में छूट दी गई और प्रक्रियाओं को सरलीकृत किया गया है। इस कदम की भी कई जगहों पर प्रशंसा की गई है।

सामुदायिक स्वागत के अलावा भारतीय समुदाय ने श्री मोदी का हवाई अड्डों पर एवं विभिन्न समारोहों में भी स्वागत किया। विदेशों में जिन-जिन समारोहों में प्रधानमंत्री ने भाग लिया, वहां सर्वत्र ‘मोदी मोदी मोदी’ के स्वर गुंजायमान रहे। फ्रांस में प्रथम विश्व युद्ध के स्मारक पर प्रधानमंत्री ने लोगों से कहा कि वे उनका नाम न लें और इसके बजाय “शहीदों अमर रहो” के नारे लगाएं।

प्रधानमंत्री प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका को समझते हैं और भारत के विकास के लिए उन लोगों के साथ हमेशा जुड़े रहने के लिए प्रयासरत हैं।

पड़ोसियों के साथ संबंध

सार्क देशों के साथ बेहतर संबंध

सार्क भारत की विदेश नीतियों का एक महत्वपूर्ण पहलू है। सार्क क्षेत्र में सबसे विशाल देश होने के साथ-साथ भारत आर्थिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले दिन से ही इस बात का वर्णन करते रहे हैं कि कैसे सार्क देशों के साथ बेहतर संबंध उनकी विदेश नीतियों में प्रमुख है।

श्री नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए सभी सार्क नेताओं को आमंत्रित किया था। श्री मोदी के इस शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रपति हामिद करजई (अफ़गानिस्तान), अध्यक्ष शर्मिन चौधरी (बांग्लादेश) (प्रधानमंत्री शेख हसीना जापान के पूर्व-निर्धारित दौरे पर थीं), प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे (भूटान), राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन (मालदीव), प्रधानमंत्री सुशील कोइराला (नेपाल), प्रधानमंत्री नवाज शरीफ (पाकिस्तान) और राष्ट्रपति राजपक्षे (श्रीलंका) उपस्थित थे। अगले दिन उन्होंने इन नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठक की जो अत्यंत सफल रही। ये बैठक एक नये युग की शुरुआत का द्योतक रहीं जिसमें सार्क देशों के साथ संबंधों को और मजबूत बनाने एवं इसमें अभूतपूर्व प्रगति की उम्मीदें हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने प्रथम विदेशी दौरे के लिए भूटान को चुना। जून 2014 में 15 को वहां पहुँचने पर उनका अत्यंत गर्मजोशी से स्वागत किया गया और इस यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री ने इस यात्रा के दौरान भूटान की संसद को भी संबोधित किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 में काठमांडू यात्रा 17 साल में किसी भारतीय भी प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा थी। नेपाल में भी महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री और नेपाल के अग्रणी नेताओं के बीच हुई वार्ता एवं विचार-विमर्श से भारत-नेपाल संबंधों में एक ऐतिहासिक युग की शुरुआत हुई। नवंबर 2014 में सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्री मोदी एक बार फिर नेपाल गये जहाँ उन्होंने सार्क के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की।

फरवरी 2015 श्रीलंका के में नव-निर्वाचित राष्ट्रपति सिरिसेना भारत आये जोकि जनवरी 2015 में पद ग्रहण के बाद उनकी प्रथम विदेश यात्रा थी। मार्च 2015 में प्रधानमंत्री श्रीलंका गये जो विगत कई वर्षों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए और प्रधानमंत्री ने श्रीलंका की संसद को संबोधित किया और जाफना का भी दौरा किया। श्री मोदी जाफना का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री एवं विश्व के दूसरे नेता हैं। जाफना में उन्होंने भारत सरकार की सहायता से चल रही आवासीय परियोजना के तहत लोगों को आवास प्रदान किये और जाफना सांस्कृतिक केन्द्र की आधारशिला रखी।

मई 2015 अफगानिस्तान के में राष्ट्रपति अशरफ घानी ने भारत का दौरा किया और दोनों देशों ने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया।

मई 2015 में भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से भारत बांग्लादेश सीमा समझौता बिल पारित किया जो भारत-बांग्लादेश संबंधों में मील का पत्थर साबित हुआ। यह एक ऐतिहासिक कदम था। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने सभी राजनीतिक दलों और मुख्यमंत्रियों की भूमिका की सराहना की और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी इस पर अपनी शुभकामनाएं दीं। यह उम्मीद की जा रही है कि प्रधानमंत्री बांग्लादेश के साथ संबंधों को आगे और मजबूत बनाने के लिए जल्द ही बांग्लादेश का दौरा करेंगे।

इस प्रकार, द्विपक्षीय बैठकों, महत्वपूर्ण समझौतों और अन्य कार्यों के माध्यम से श्री नरेन्द्र मोदी सार्क देशों के साथ रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

'मेक इन इंडिया'

भारत में उपलब्ध अवसरों का सदुपयोग करने के लिए विश्व को आमंत्रण

हनोवर मेला दुनिया के सबसे बड़े और सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक मेलों में से एक माना जाता है। इस जर्मन शहर में दुनिया भर से लोग विश्व के शीर्ष विनिर्माताओं के उत्पादों को देखने आते हैं। 2015 में भारत हनोवर मेले का एक भागीदार देश बना।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने संयुक्त रूप से इस मेले का उद्घाटन किया। भारत में निवेश से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति इसके प्रेरक दृष्टिकोण और यहाँ की असीमित क्षमता की झलक मिलती है। 'मेक इन इंडिया' पवेलियन को शानदार तरीके से तैयार किया गया था जिसमें भारत की संस्कृति और यहाँ हो रहे बदलावों को दिखाया गया था। यह भारत को निवेश का एक आकर्षक स्थल बनाता है। भारत के विभिन्न राज्यों के लिए अलग-अलग पवेलियन था जिसकी हर तरफ सराहना की गई थी।

अपने भाषण में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात की खुशी जताई कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पहले वर्ष के शासन में ही भारत को प्रतिष्ठित हनोवर मेले में एक सहयोगी राष्ट्र बनने का अवसर मिला। उन्होंने व्यापार कार्य को आसान बनाने, कर प्रणाली को सरल बनाने और विदेशी निवेश के लिए आकर्षक माहौल बनाने के लिए पहले ही वर्ष में एनडीए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों का उल्लेख किया।

द्विपक्षीय मुलाकातों के दौरान दुनिया के कई नेताओं ने श्री मोदी से कहा कि वे 'मेक इन इंडिया' को लेकर बहुत आशान्वित हैं। इसमें मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक, सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सीन लूंग, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एबोट, जापान के प्रधानमंत्री अबे, फ्रांस के राष्ट्रपति होलांद और कनाडा के प्रधानमंत्री हार्पर शामिल हैं।

भारत में एक सकारात्मक माहौल तैयार करने, भारत में उत्पाद का निर्माण करने और यहाँ निवेश करने के लिए पिछले एक वर्ष में प्रधानमंत्री द्वारा किये गए प्रयासों के सार्थक एवं बेहतरीन परिणाम देखने को मिले हैं। भारत और यहाँ उपलब्ध असीमित अवसरों ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।

मानवता में हमारा विश्वास

संकट के समय में मित्रों और पड़ोसियों की मदद

"लोगों के पासपोर्ट का रंग अलग-अलग हो सकता है लेकिन मानवता के बंधन से मजबूत और कोई बंधन नहीं है" - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कथन बार-बार कहा है और हर त्रासदी के बाद इसे वास्तविकता में करके दिखाया है।

जब यमन में संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया था तो वहां कई देशों के लोग प्रभावित क्षेत्र में फंस गए थे। भारत सरकार ने लोगों को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, और न केवल भारतीय बल्कि अन्य देशों के नागरिकों को भी वहां से सुरक्षित निकाला। कई देशों ने अपने बचाव कार्य में भारत से मदद मांगी और भारत ने व्यापक स्तर पर जिस तीव्र गति से बचाव कार्य किया, वह अभूतपूर्व और अत्यधिक प्रभावी रहा।

उच्चतम अधिकारियों ने बचाव कार्य में भारत की इस तीव्र और व्यापक प्रतिक्रिया की निगरानी की। विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज लगातार स्थिति पर नजर रख रही थीं। विदेश राज्य मंत्री श्री वीके सिंह व्यक्तिगत रूप से इस अभियान की अगुआई करते हुए यमन और जिबूती गये।

अप्रैल 2015 में 25 सुबह की, जब नेपाल में विनाशकारी भूकंप आया तो भारत ने नेपाल के लोगों के दर्द को साझा करने के लिए हरसंभव कार्य किया। भारतीय सशस्त्र बल, आपदा प्रबंधन दल और सर्वोच्च अधिकारियों ने नेपाल जाकर लोगों की मदद की और स्थिति को सामान्य करने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री ने स्थिति पर नजर रखने के लिए कई उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। साथ-ही-साथ भूकंप प्रभावित नेपाल से भारतीय और विदेशी नागरिकों को बचाने के लिए जो कुछ संभव था, भारत ने किया।

दुनिया के मंच पर भारत के इन प्रयासों की सराहना की गई। जब श्री मोदी ने विश्व के नेताओं से मुलाकात की, चाहे वो फ्रांस के राष्ट्रपति होलांद हों या प्रधानमंत्री हार्पर, सभी ने राहत और बचाव कार्य में भारत के प्रयासों की सराहना की। इजरायल के प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने प्रधानमंत्री के साथ टेलीफोन पर बात कर भारत के प्रयासों की सराहना की। भारत में अमेरिका के राजदूत श्री रिचर्ड वर्मा ने भी भारत की भूमिका की सराहना की।

फ़रवरी 2015 में फादर एलेक्सिस प्रेम कुमार अफगानिस्तान में आठ महीने की एक लंबी अवधि तक कैद रहने के बाद घर वापस आये। वे अपने कार्यों के प्रति समर्पित थे और लोगों की मदद किया करते थे लेकिन अमानवीय तत्वों ने उनके लिए और ही योजना बना रखी थी। उनका अपहरण कर लिया गया था लेकिन महीनों से उनकी रिहाई पर गतिरोध बना हुआ था। आख़िरकार सरकार उन्हें वापस घर लाने एवं उन्हें अपने परिवार से मिलवाने में सफल रही। इससे परिवार बहुत खुश था और रिहाई के लिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को धन्यवाद दिया।

इसी तरह, मध्य-पूर्व के विभिन्न हिस्सों में फंसे भारतीय नर्सों को भी सरकार ने वहां से सुरक्षित निकाला। केरल के मुख्यमंत्री श्री ओमन चांडी ने नर्सों को इराक से वापस लाने में केंद्र सरकार के प्रयासों के लिए केन्द्र को धन्यवाद दिया।

इस तरह केंद्र सरकार ने हमेशा यह दिखाया है कि संकट के समय में मानवता का बंधन पासपोर्ट के रंग की तुलना में अधिक मायने रखता है।

एनडीए सरकार को प्रमुख एजेंसियों का प्रोत्साहन

अग्रणी वैश्विक एजेंसियां नए सिरे से फिर से आशान्वित

प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के कार्यों और भारत में परिवर्तन लाने के लिए शुरू की गई नीतियों की सराहना की है।

विश्व बैंक ने उम्मीद जताई है कि भारत 2014-15 में 5.6% की तुलना में  2015-16 में 6.4% की अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ेगा। विश्व बैंक ने यह भी कहा कि विकास का यह मार्ग ‘मोदी लाभांश’ से जुड़ा हुआ है। विश्व बैंक ने आगे कहा कि सरकार की नीतियों और तेल की कीमतों में हो रही गिरावट के फलस्वरूप निवेश में वृद्धि होगी।

विश्व बैंक के अध्यक्ष श्री जिम योंग किम ने यह सकारात्मक उम्मीद जताई है। श्री किम ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मजबूत दूरदर्शी नेतृत्व’ से भारत में लोगों के वित्तीय समावेशन पर “असाधारण प्रभाव” पड़ा है। यहां तक कि उन्होंने जन-धन योजना के रूप में वित्तीय समावेशन की दिशा में भारत सरकार के प्रयास की भी सराहना की।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों और तेल की कीमतों में हो रही गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था में उम्मीद से ज्यादा विकास होगा और इस मामले में यह चीन को भी पीछे छोड़ देगा। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इन सुधारों को निवेशकों के बढ़ते विश्वास से जोड़ा है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) का मानना है कि भारत में हो रहे आर्थिक सुधारों से भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और सतत एवं समावेशी विकास के मार्ग पर आगे बढ़ेगी। यह प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सुधार के लिए किये जा रहे कार्यों और इसके लिए उनके उत्साह को दिखाता है।

अग्रणी और सम्मानित वैश्विक एजेंसी मूडी ने भारत की पिछली रेटिंग “स्थिर” को बदलकर अब “सकारात्मक” कर दिया है। इससे निवेशकों को काफ़ी प्रोत्साहन मिलेगा और यह दिखाता है कि सुधार के लिए प्रधानमंत्री और उनकी टीम के प्रयासों को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है।

भारत के विकास पर इसी तरह की एक आशावादी प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र ने भी दी जिसने विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाओं पर वर्ष के मध्य में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस वर्ष और अगले वर्ष भारत की विकास दर 7% से ऊपर रहेगी।

इस प्रकार प्रधानमंत्री के सुधारवादी उत्साह और सुधार के लिए तीव्र गति से उठाये गए कदमों ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति आशावादी सोच को दिखाता है।

भारत की सोच को विश्व स्तर पर समर्थन

विश्व व्यापार संगठन में भारत का साहसी रूख

प्रधानमंत्री ‘भारत प्रथम’ के सिद्धांत पर हमेशा जोर देते रहे हैं जिसकी विश्व भर में चर्चा है। जब विश्व व्यापार संगठन व्यापार सुविधा समझौता (टीएफए) पर विचार-विमर्श कर रहा था भारत ने इस पर अपनी पूर्ण असहमति जताते हुए कहा कि यह खाद्य सुरक्षा के लिए भारत की प्रतिबद्धता के साथ समझौता है। भारत के लिए खाद्य सुरक्षा का अर्थ है - गरीबों के प्रति इसका विश्वास और प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से इसके लिए प्रतिबद्ध हैं।

भारत ने खाद्यान्नों के सार्वजनिक भंडारण के चिरस्थायी समाधान की मांग की है। विश्व स्तर पर कई देशों ने एक साथ मिलकर इस मुद्दे पर भारत के रुख का समर्थन किया। आखिरकार भारत यह सुनिश्चित करने में सफल रहा कि खाद्य सुरक्षा में कोई समझौता न हो और साथ-ही-साथ इसने विश्व समुदाय के साथ संवाद का विकल्प भी खुला रखा है।