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पूज्य संत गण, मंचस्थ सभी महानुभाव, नौजवान मित्रों..! वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, ये नाम सुन कर के लोगों को लगता है कि सारा रुपयों-पैसों का खेल होगा। इन्वेस्टमेंट आता है तो लोगों को लगता है कि यहाँ तो सिर्फ रूपये इन्वेस्ट होते हैं। मित्रों, उससे ज्यादा अगर सचमुच में इन्वेस्टमेंट में ताकत कहीं है तो वो नॉलेज में है, ज्ञान में है। चीन में एक बहुत प्रचलित कहावत है और वो कहावत ये है कि कोई अगर एक साल के लिए सोचता है तो अनाज बोता है, दस साल के लिए सोचता है तो फल के वृक्ष बोता है, लेकिन अगर वो पीढ़ियों के लिए सोचता है तो मनुष्य बोता है। भाइयों-बहनों, युवाओं की ये युवा संसद उस मकसद से है कि हमारी युवा पीढ़ी को उस रुप से सज्ज करें कि भविष्य की अनेक पीढियों का भला हो। आज अगर हम कुछ सुख को प्राप्त कर पा रहे हैं, आज अगर हमारे जीवन में कुछ अच्छाइयाँ हैं, तो उसके पीछे हमारे पूर्वजों ने कभी ना कभी उस युग की युवा पीढी की चिंता की होगी और उसी का फल हम आज भोग रहे हैं। तो हम लोगों का दायित्व बनता है कि हम लोग भी समाज को कुछ ऐसा दे कर के जाएं, कुछ ऐसा करके जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों की जो युवा पीढ़ी होगी उनके नसीब में भी कुछ अच्छी चीजें आएं। और ये सबसे बड़ा काम हर युग के लोगों का रहता है।

ज 12 जनवरी है, स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती का एक अवसर है। देश और दुनिया में स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जंयती मनाने का भरसक प्रयास हो रहा है। गुजरात ने इस अवसर को युवा वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय किया और गत पूरा एक वर्ष अनेकविध प्रयोगों के द्वारा गुजरात में युवा शक्ति के जागरण की दिशा में सरकार ने प्रयास किये हैं। एक स्थायी व्यवस्था के रूप में गुजरात ने गाँव-गाँव विवेकानंद युवा केन्द्रों की रचना की है। उन विवेकानंद युवा केन्द्रों के माध्यम से युवा प्रवृतियाँ कैसे बढ़ें, सच्चे अर्थ में एक ऐसे एन.जी.ओ. तैयार हों जो समाज की भलाई के लिए कार्य करते हों, समाज के आने वाले कल के लिए चिंता करते हों। गाँव-गाँव इस प्रकार से युवक और युवतियों के समूह तैयार हों और ये परंपरा बनी रहे, लगातार नई पीढ़ी समाज के प्रति संवेदना के साथ, समाज के लिए कुछ भला करने की दिशा में अविरत प्रयास करती रहे, ये हमारी कोशिश है। मित्रों, जिन लोगों ने स्वामी विवेकानंद जी को पढ़ा होगा, सुना होगा, जाना होगा, उन लोगों को पता होगा कि विवेकानंद जी युवा पीढ़ी से कोई बड़ी आध्यात्म की अपेक्षा नहीं रखते थे। वे नहीं चाहते थे कि हमारे नौजवान नाक पकड़ के बैठ जाएं और गुरूमंत्र बोलते रहे। ये विवेकानंद जी ने कभी नहीं कहा। स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र नारायण की सेवा का उपदेश दिया था। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो गरीब से गरीब व्यक्ति है उसके अंदर परमात्मा का वास होता है, वो परमात्मा कर रूप होता है, और किसी दरिद्र नारायण कि सेवा करें, वो ईश्वर की सेवा से कम नहीं होती है, ये संदेश देने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में था। वे एक क्रांतिकारी महापुरूष थे, लोग सोचते थे उससे भिन्न सोचते थे। अगर कोई संत महात्मा होगा तो वो ये कहेगा कि तुम जरा ध्यान धरो, पूजा-पाठ करो, सुबह-शाम आरती करो, धूप-दीप करो, भगवान को भोग चढाओ... ज्यादातर वही परंपराओं की चर्चा होती है। लेकिन स्वामी विवेकानंद एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनके शब्द आज भी हमारे लिए काम के हैं। और विशेषता ये है कि मृत्यु के कुछ वर्ष पहले उन्होंने कहा था कि मैं देश के युवाओं से प्रार्थना करता हूँ, देश के नागरिकों से प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने देवी-देवताओं को भूल जाएं। कोई साधु-महात्मा ऐसा कहे कि आप अपने देवी-देवताओं को भूल जाएं, उस युग में ऐसा कोई सोच नहीं सकता था। लेकिन स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि आप अपने देवी-देवताओं को भूल जाओ और आने वाले पचास साल के लिए एक ही देवी की चिंता करो, एक ही परमात्मा के रूप की कल्पना करो और वो सिर्फ भारत माता..! अगर आप भारत माता की सेवा करोगे तो आपके सारे ईष्ट देवताओं की सेवा अपने आप हो जाएगी। ये बात स्वामी विवेकानंद जी ने 1897 में कही थी और ये कहा था कि 50 साल, ये भी उन्होंने कहा था और मजा देखिए, ठीक 50 साल के बाद 1947 में हिन्दुस्तान आजाद हुआ था। इस प्रकार की क्रांतिकारी सोच, ईश्वर की सेवा नहीं, मानव की सेवा करो, ये कहने का सामर्थ्य उस युग में मामूली बात नहीं थी। प्रवाह से विपरित जाना, और मित्रों, वो प्रवाह से विपरित जाने का सामर्थ्य इसलिए रखते थे क्योंकि वे युवा थे, उनकी सोच युवा थी, उनके सपने युवा थे, उनके संकल्प युवा थे और इसलिए वो आज भी युवाओं की प्रेरणा का कारण बने हुए हैं।

मित्रों, हम सभी नौजवानों के मन में कभी-कभी निराशा का माहौल बन जाता है। ये निराशा क्यों आती है? मैं नौजवान मित्रों से पूछना चाहूंगा। कभी ना कभी आप सोचिए, अपनी आत्मा से पूछिए कि वो कौन सा कारण है कि जीवन में निराशा को हमें झेलना पड़ता है। ज्यादातर निराशा का कारण ये होता है और अधिकतम लोगों की जिंदगी में निराशा का मुख्य कारण ये होता है कि उन्होंने हर पल कुछ बनने का सपना देखा होता है। और जब बनने का सपना पूरा नहीं होता है या बनने का सपना संभव नहीं ऐसा नजर आने लगता है तो निराशा अपने आप पैदा होती है और इसलिए भाइयो-बहनों, मैं नौजवान मित्रों से एक सलाह देना चाहता हूँ, क्या जीवन में कुछ बनने के सपने रखना आवश्यक है..? मैं मानता हूँ नहीं है। अगर आपने डॉक्टर बनने का सपना देखा, लेकिन डॉक्टर नहीं बन पाए और टीचर बन गए तो आपको जीवन में कभी भी टीचर बनने का आनंद नहीं आएगा। हर पल मन में यही आएगा कि यार, बनना था डॉक्टर, टीचर बन गया..! यार, बड़ी इच्छा थी कि डॉक्टर बनूं, लेकिन उस समय दादी माँ का स्वर्गवास हो गया, एक्जाम खराब हो गई और मैं टीचर बन गया। क्या करूँ यार, मुझे तो डॉक्टर बनना था लेकिन हमारे स्कूल की लैब ठीक नहीं थी और उसके कारण मेरे प्रैक्टिकल में मार्क्स बहुत कम आए और मैं टीचर बन गया..! मित्रों, वो जीवन भर टीचर होने का आनंद ही नहीं ले पाएगा। डॉक्टर नहीं बना उसी के बोझ में उसकी पूरी जिंदगी समाप्त हो जाएगी। अगर उसने डॉक्टर बनने के सपने नहीं देखे होते और ईश्वर ने जितनी उसे शक्ति और क्षमता दी है उसका उपयोग करते हुए अगर मानों टीचर बन गया होता, तो सीना तान कर दुनिया को कहता कि मैं अपनी इच्छा से टीचर बना हूँ, एक पीढ़ी की जिंदगी बदलने के लिए काम कर रहा हूँ और मुझे उसका संतोष है। जिदंगी का आनंद कुछ और होता। और इसलिए नौजवानों, क्या जिंदगी ऐसी हो सकती है जिसमें सपने ही ना हों..? और ऐसा कैसा ये मुख्यमंत्री है और ऐसा कैसा ये नरेन्द्र मोदी है जो ये कहते हैं कि सपने मत देखो..! मित्रों, मैं सपने देखने से मना नहीं कर रहा हूँ, लेकिन सपने देखें तो कौन से देखें..? और इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ बनने के लिए सपने मत देखो, कुछ करने के सपने देखो। और मित्रों, जब कुछ करने का सपना देखते हैं तो जीवन में कभी निराशा नहीं होती। आपने अगर तय कर लिया कि मुझे सायकिल से जाना है सोमनाथ तक, कुछ कर के दिखाना है। हो सकता है एक बार राजकोट से वापिस आ जाओ, तो दूसरी बार जाएगें, लेकिन करके रहेगें आप, क्यों कि मन में ठान ली है कि मुझे कुछ करके रहना है। अगर कुछ करने का सपना होगा तो भीतर से ऊर्जा पैदा होती है। आप ही अपने आप के गाईड बन जाते हो, आप ही अपने आप को दिशा देते हो, आप खुद ही अपने रास्ते खोजते हो, आप खुद ही अपनी मंजिल को पार कर लेते हो, और इसलिए मित्रों, जीवन में बहुत बड़े बदलाव की आवश्यकता है। और कोई नौजवान ऐसा नहीं होना चाहिए जिसके सपने ना हो, कोई नौजवान ऐसा नहीं होना चाहिए जिसको कुछ करने का सपना ना हो और कोई ऐसा नौजवान नहीं होना चाहिए जिसके सपने सिर्फ तरंग बन कर रह जाएं। मित्रों, कभी-कभी नौजवानों की जिंदगी में कठिनाई आती है, सुबह अगर किसी क्रिकेटर की फोटो अखबार में देख ली, उसकी वाह-वाही देख ली तो मन करता है कि यार, क्रिकेटर बनना अच्छा है, दोपहर को किसी टी.वी. चैनल पर किसी फिल्मी कलाकार का नाम रोशन होता दिखता है तो मन करता है नहीं-नहीं यार, ये अच्छा है। शाम को किसी डॉक्टर ने बहुत अच्छा काम किया है और देख लिया तो मन करता है कि यार, ये अच्छा है..! यानि कई नौजवान मिलेंगे आपको जो हफ्ते में तीन नई-नई योजनाएं बताएंगे और आप भी परेशान होंगे कि यार पिछले हफ्ते तो ये कह रहा था कि मुझे बिजनेस मैन बनना है और इस हफ्ते कह रहा है कि मुझे तो पॉलिटिशियन बनना है..! मित्रों, ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिनकी इच्छाएं रोज जन्म लेती हैं और ज्यादातर इच्छाओं का बाल मृत्यु हो जाता है। मित्रों, ऐसी क्या इच्छा रखनी जिसकी बाल मृत्यु हो जाए। कुछ लोगों की तो इच्छाएं ऐसी होती है जिसका गर्भ धारण ही नहीं होता। और मित्रों कुछ लोग होते हैं जिनकी इच्छाएं रोज-रोज बदलती रहती हैं और जब इच्छाएं रोज-रोज बदलती रहती हैं तो आपके साथी आपको क्या कहते हैं..? आपको यही कहेंगे कि यार छोड़ो, वो तो बड़ा तरंगी है, वो तो सुबह-शाम नई-नई चीजें सोचता रहता है। वो तो ऐसे ही बेकार है यार, ऊंट पटांग की बातें करता है..! ऐसा ही होता है ना..! मित्रों, मेरा कोई नौजवान साथी ऐसा नहीं होना चाहिए जिसकी इच्छाएं लोगों के लिए मजाक का कारण बनें। कोई नौजवान ऐसा नहीं होना चाहिए जिसकी इच्छाएं तरंग बन जाए। और इसलिए मित्रों आवश्यक है कि कोशिश करनी चाहिए। इच्छा बुरी चीज नहीं है, लेकिन इच्छाओं को बदलते रहना बुरी चीज है। इच्छाएं स्थिर होनी चाहिए। और अगर इच्छा स्थिर है तो वो संकल्प बनती है और संकल्प में जब परिश्रम जुड़ता है तो वो सिद्घी बन जाती है। और इसलिए इच्छा प्लस स्थिरता इज इक्वल टू संकल्प, संकल्प प्लस परिश्रम इज इक्वल टू सिद्घि। ये छोटे से एलजेब्रा के समीकरण को लेकर के हम जिंदगी को बनाने की कोशिश करेंगे तो मैं मानता हूँ मित्रों, हम जीवन में कभी विफल नहीं हो सकते।

मित्रों, ये वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट मैंने पूरी तरह मेरे राज्य के नौजवानों को समर्पित की हुई है। हम एक ऐसा गुजरात बनाना चाहते हैं जहाँ 21 वीं सदी के ज्ञान के सारे अवसर उपलब्ध हों, हम एक ऐसा गुजरात बनाना चाहते हैं जहाँ हमारा नौजवान ज्ञान के अधिस्थान पर नई ऊंचाइयों को पार करने का सामर्थ्य पैदा करे, हम एक ऐसा गुजरात बनाना चाहते हैं जहाँ विश्व के अंदर हमारे नौजवानों के ज्ञान और सामर्थ्य की पूजा करने पर विश्व को मजबूर होना पड़े, ऐसा हम गुजरात बनाना चाहते हैं। मित्रों, अभी दो दिन पूर्व हमने एक छोटा सा कार्यक्रम किया। छोटा सा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि वो इतना छोटा था, इतना छोटा था, इतना छोटा था कि हमारे अखबार वालों की नजर नहीं गई। किसी के ध्यान में नहीं आया। आपको जान कर आनंद होगा मित्रों, दुनिया की 150 यूनिवर्सिटी एक प्लेटफार्म पर हमने इक्कठी की थी, ये दो दिन पूर्व। विश्व की 150 यूनिवर्सिटी एक साथ आएं, दो दिन तक ज्ञान के क्षेत्र में गुजरात क्या कर सकता है, ज्ञान के क्षेत्र में गुजरात किसके साथ जुड़ सकता है, किससे मदद ले सकता है, इसकी गहन चर्चा करें, गुजरात की स्कूलें, गुजरात की यूनिवर्सिटीज विश्व की युनिवर्सिटीज के साथ जुड़ें... इस ज्ञान के युग के अंदर गुजरात कहीं पीछे ना रह जाए, गुजरात का नौजवान कहीं पीछे ना रह जाए... विश्व से हम क्या-क्या ले सकते हैं, क्या-क्या जोड़ सकते हैं... मित्रों, दो दिन तक, अभी इस बाइब्रेंट समिट के तहत..! विश्व में शायद कहीं एक छ्त के नीचे विश्व की 150 यूनिवर्सिटी का इक्कठा होना कभी नहीं हुआ होगा, जो गांधीनगर की धरती पर हुआ। विश्व के अनेक देश यहाँ आए थे। हमारी सब यूनिवर्सिटियों ने तय किया था कि हाँ, हम इस क्षेत्र में आपके साथ मिल कर काम करना चाहते हैं। आज भी आपने देखा होगा, जो स्पोर्टस यूनिवर्सिटी बनाई है उसने ऑस्ट्रेलिया के साथ अपना समझौता किया, तो ऑस्ट्रेलिया कि स्पोटर्स यूनिवर्सिटी का लाभ गुजरात की स्पोटर्स यूनिवर्सिटी को कैसे मिले और हमारे नौजवान कैसे तैयार हों। और मित्रों, ऐसा नहीं है कि दुनिया में हम कुछ अचीव नहीं कर सकते, हम भी कर सकते हैं, लेकिन हमें अपने आप पर विश्वास पैदा करना चाहिए।

मित्रों, विश्व भारत की तरफ अब दूसरी नजर से देखने लगा है, वरना पहले भारत को जरा अलग नजरिए से देखते थे। मुझे स्मरण है एक घटना। आज से कई वर्ष पहले मैं ताइवान गया था, वहाँ की सरकार के इन्वीटेशन पर। तब तो मैं मुख्यमंत्री नहीं था, तो मेरे पास समय भी था और जानने सीखने की इच्छा भी रहा करती थी। तो मैंने ताइवान सरकार का इन्वीटेशन स्वीकार किया और मैं गया। उनकी भाषा तो चाइनीज भाषा है, हम तो कुछ समझ नहीं पाते थे तो उन्होंने मुझे एक इंटरप्रेटर दिया था। वो इंटरप्रेटर भी बहुत पढ़ा-लिखा था, साफ्टवेयर इंजीनियर था और अमरीका में पढ़ कर आया था, उसको मेरे साथ लगाया हुआ था। तो शुरू में तो वो कार में भी बैठता था तो दूर बैठता था, मैं पीछे बैठा हूँ तो वो आगे बैठता था। शेक हैंड करने से भी डरता था और बड़ा सि$कड सिकुड कर रहता था। मैं दोस्ती करने की कोशिश करता था कि यार, कुछ बात तो करें..! बड़ा मुश्किल था। चार-पाँच दिन होने के बाद थोड़ा वो खुलने लगा और मैं आने वाला था उससे एक दिन पहले उसने मुझे कहा कि साब, आप बुरा नहीं माने तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। मैंने कहा पूछो, आपके मन में क्या है? मैं तो देख रहा हूँ कि तुम्हारी नौकरी है इसलिए तुम कर तो रहे हो, लेकिन तुम्हे आनंद नहीं आ रहा है, मेरे से भागे-भागे जा रहे हो। तो उसने मुझसे पूछा कि साब, मुझे जानना है कि क्या अभी भी हिन्दुस्तान सांप-सपेरों का देश है..? क्या अभी भी हिन्दुस्तान जादू-टोना करता है..? उसके दिमाग में हिन्दुस्तान की यही छवि थी। वो यही सोचता था कि हम लोग ऐसे ही हैं कि आज भी हमारे यहाँ जादू-टोना चलता होगा, सांप-छुछुंदर की दुनिया चलती होगी..! तो मैंने कहा भाई, तुम्हारी बात तो सही है, हम पहले तो स्नेक चार्मर थे, लेकिन अब हमारा डिग्रेडेशन हो गया है, डिवेल्यूएशन हो गया है। हम अभी इससे भी नीचे चले गए हैं। तो मेरी तरफ देखने लगा कि ये क्या कह रहा है? मैंने कहा कि हमारे पूर्वज तो स्नेक चार्मर थे, लेकिन हमारे जो बच्चे हैं वे माउस चार्मर बन गए हैं..! मैंने कहा अब स्नेक वाला उनका हिसाब नहीं रहा, चुहे से ही उनका खेल चल रहा है। उसको समझ नहीं आया। मैंने कहा कि हमारे हर नौजवान के हाथ में कम्प्यूटर का माउस है और वो दुनिया को हिला रहा है। तब जा कर के मित्रों, उसकी आंख खुल गई कि इस देश के विषय में ऐसा है..! मित्रों, एक बार प्रेजिडेंट क्लिंटन हिंदुस्तान के दौरे पर आए थे। फिर वो जयपुर गए थे और जयपुर के नजदीक में एक गाँव में महिलाओं का ज्यादा कोआपरेटिव काम चल रहा है वो उनको देखना था। और आप लोगों को शायद पता होगा ये आठ-नौ साल पहले की घटना है। और हमारे देश में कोई भी इस प्रकार से बाहर से आते हैं तो बड़ी पूजा होती है तो टी.वी. में भी चौबीस घंटे चल रहा था, अखबारों में भी पहला पेज उन्हीं के लिए समर्पित हो जाता था, सालों तक गुलाम रहे हैं तो उसका असर तो रहता ही है। तो बड़ी जय-जयकार चल रही थी उनकी और वे जयपुर के पास उस गाँव में गए। गाँव में गए तो गाँव में अमेरिकन सिक्योरिटी भी थी, हिन्दुस्तानी सिक्योरिटी भी थी और उनको बड़े प्रोटेक्टिड वे में ले जाया जा रहा था। उस गाँव के जो चुने हुए पंच के लोग थे उनको वहाँ स्वागत में खड़ा किया गया था, उन सबको आईडेन्टीफिकेशन दिया हुआ था और सब के लिए तय था कि किसको कहाँ चलना है, किसको कहाँ खड़ा रहना है, किसको कहाँ बैठना है... इतने में एक कालूराम नाम का व्यक्ति, जो उस गाँव का चुना हुआ पंच था, वो लपक कर के क्लिंटन के पास पहुंच गया और वो उनसे बातें करने लगा। अब वो बेचारा हिन्दी बोले, उसको हिन्दी समझ ना आए... उसकी हाईट इतनी, इसकी हाईट इतनी तो वो यूं बातें कर रहा था और वो भी अपनी मुंडी हिला रहे थे कि कुछ कह रहा है। लेकिन वो गाँव के सारे लोग परेशान थे कि अरे कालूराम ने तो अपने गाँव की इज्जत खराब कर दी। ये क्लिंटन के पास जा करके क्या कर रहा है, ये क्यों नियम तोड़ कर के वहाँ चला गया है..? ये जरूर कुछ मांगता होगा उससे। ये शायद उससे वीजा मांगता होगा। ये शायद उससे अपने बेटे के लिए कुछ मांगता होगा या गाँव के लिए कुछ अस्पताल-वस्पताल मांगता होगा, पर ये कुछ मांगता होगा। एक-दो मिनट के लिए सन्नाटा छा गया था उस गाँव के लोगों अंदर कि ये कालूराम कैसे क्लिंटन के साथ बातें करने लगा है..! और वो जो क्लिटंन के इंटरप्रेटर थे वो क्लिंटन को समझा रहे थे कि वो कालूराम क्या कह रहा है। भाइयों-बहनों, आपको जानकर आनंद होगा, उस कालूराम मीणा की बात को सुन कर के। मेरे हिन्दुस्तान के जयपुर के नजदीक के छोटे से गाँव का गरीब माँ की कोख से पैदा हुआ कालूराम, दुनिया की इतनी बड़ी विश्व सत्ता के सामने खड़ा हुआ है, क्लिंटन के सामने खड़ा हुआ है, जो विश्व की महासत्ता है, आर्थिक महासत्ता है, विश्व में जिसका रुतबा है, उस आदमी के साथ आंख में आंख मिला कर के हिन्दुस्तान का एक गरीब मां की कोख से पैदा हुआ कालूराम क्लिंटन को आंख में आंख मिला कर के पूछता है। मित्रों, एक इंसान का मिजाज देखिए। वो कालूराम पूछता है कि मिस्टर क्लिंटन, क्या आप अभी भी ये मानते हो कि हिन्दुस्तान सांप-सपेरे वालों का देश है..? क्या आप अभी भी मानते हो कि हिन्दुस्तान जादूटोने वालों का जगत है..? मित्रों, क्लिटंन हिल गए थे और उन्होंने जब उनके इंटरप्रेटर ने बताया तो नीची मुंडी करके बोले कि नहीं, मैं नहीं मानता। और मैं दुनिया में जहाँ भी जाऊँगा, मैं दुनिया में जाकर के कहूंगा, मैंने जो हिन्दुस्तान देखा वो क्या है..! मित्रों, ये दम मेरे देश के हर नौजवान में होना चाहिए। ये मिजाज होना चाहिए दोस्तों, और यही युवा शक्ति है जो भारत का नाम दुनिया में रोशन कर सकती है। मित्रों, हम वो लोग हैं जो विश्वगुरू पद पर अपने जीवन को प्रस्थापित कर चुके थे और आज भी हम लोगों में सामर्थ्य है कि हम विश्व के अंदर हमारी भारत माता को जगतगुरू के स्थान पर विराजित कर सकते हैं। मित्रों, मेरी स्वामी विवेकानंद के प्रति अपार श्रद्धा है। मेरी वो निरंतर प्रेरणा है। और मुझे स्वामी विवेकानंद के उन शब्दों पर भरोसा है जो उन्होंने जीवन के अंत काल में कहा था कि मैं अपनी आंखों के सामने देख रहा हूँ कि मेरी ये भारत माता फिर एक बार जगतगुरू के स्थान पर विराजमान है। भारत जगतगुरू के स्थान पर विराजमान है ये सपना स्वामी विवेकानंद ने देखा था। जिस स्वामी विवेकानंद ने ये सपना देखा है वो कभी झूठ नहीं निकल सकता, मेरे मित्रों। आवश्यकता सिर्फ ये है कि स्वामी विवेकानंद के उन शब्दों पर भरोसा करके माँ भारती अपनी जगतगुरू के स्थान पर विराजमान हो इसके लिए हम कोशिश करें। और मित्रों, समय हमारा है। ये शब्द लिख कर रखिए, मेरे मित्रों। ये सदी हमारी सदी है, ये सदी हमारे हिन्दुस्तान के नौजवानों की सदी है, ये सदी ज्ञान की सदी है, ये सदी पुरुषार्थ की सदी है। और सबसे युवा मेरा देश हिन्दुस्तान, जिस देश के पास 65% जनसंख्या 35 से कम आयु की है, 2020 में जिस देश की एवरेज उम्र 29 साल हो जाने वाली है, ऐसा नौजवान देश, युवकों से भरा पडा देश ये सपने लेकर के, दुनिया में कुछ करके दिखाने के लिए निकले, इसी अपेक्षा के साथ इस युवा सम्मेलन आपके लिए प्रेरणा बने, गुजरात के आने वाले कल के लिए एक अच्छी ताकत के रूप मे उभरे, इसी एक अपेक्षा के साथ आप सब को बहुत बहुत शुभ कामनाएं देता हूँ।

हुत-बहुत धन्यवाद..!

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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age: PM Modi
June 07, 2021
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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age
25 per cent vaccination that was with states will now be undertaken by Government of India: PM
Government of India will buy 75 per cent of the total production of the vaccine producers and provide to the states free of cost: PM
Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojna extended till Deepawali: PM
Till November, 80 crore people will continue to get free food grain every month: PM
Corona, Worst Calamity of last hundred years: PM
Supply of vaccine is to increase in coming days: PM
PM informs about development progress of new vaccines
Vaccines for children and Nasal Vaccine under trial: PM
Those creating apprehensions  about vaccination are playing with the lives of people: PM

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार! कोरोना की दूसरी वेव से हम भारतवासियों की लड़ाई जारी है।  दुनिया के अनेक देशों की तरह, भारत भी इस लड़ाई के दौरान बहुत बड़ी पीड़ा से गुजरा है। हममें से कई लोगों ने अपने परिजनों को, अपने परिचितों को खोया है। ऐसे सभी परिवारों के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं।

साथियों,

बीते सौ वर्षों में आई ये सबसे बड़ी महामारी है, त्रासदी है। इस तरह की महामारी आधुनिक विश्व ने न देखी थी, न अनुभव की थी। इतनी बड़ी वैश्विक महामारी से हमारा देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा है। कोविड अस्पताल बनाने से लेकर ICU बेड्स की संख्या बढ़ानी हो, भारत में वेंटिलेटर बनाने से लेकर टेस्टिंग लैब्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार करना हो, कोविड से लड़ने के लिए बीते सवा साल में ही देश में एक नया हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी। भारत के इतिहास में कभी भी इतनी मात्रा में मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी महसूस नहीं की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम किया गया। सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। बहुत ही कम समय में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के प्रॉडक्शन को 10 गुना से ज्यादा बढ़ाया गया। दुनिया के हर कोने से, जहां कही से भी, जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था उसको प्राप्त करने का भरसक प्रयास  किया गया, लाया गया। इसी तरह ज़रूरी दवाओं के production को कई गुना बढ़ाया गया, विदेशों में जहां भी दवाइयां उपलब्ध हों, वहां से उन्हें लाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी गई।

साथियों,

कोरोना जैसे अदृश्य और रूप बदलने वाले दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रभावी हथियार, कोविड प्रोटोकॉल है, मास्क, दो गज की दूरी और बाकी सारी सावधानियां उसका पालन ही है। इस लड़ाई में वैक्सीन हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह है। आज पूरे विश्व में वैक्सीन के लिए जो मांग है, उसकी तुलना में उत्पादन करने वाले देश और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं, इनी गिनी है। कल्पना करिए कि अभी हमारे पास भारत में बनी वैक्सीन नहीं होती तो आज भारत जैसे विशाल देश में क्या होता?  आप पिछले 50-60 साल का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाते थे। विदेशों में वैक्सीन का काम पूरा हो जाता था तब भी हमारे देश में वैक्सीनेशन का काम शुरू भी नहीं हो पाता था। पोलियो की वैक्सीन हो, Smallpox जहां गांव में हम इसको चेचक कहते हैं। चेचक की  वैक्सीन हो, हेपिटाइटिस बी की वैक्सीन हो, इनके लिए देशवासियों  ने दशकों तक इंतज़ार किया था। जब 2014 में देशवासियों ने हमें सेवा का अवसर दिया तो भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज, 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के ही आसपास था। और हमारी दृष्टि में ये बहुत चिंता की बात थी। जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा था, उस रफ्तार से, देश को शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब-करीब 40 साल लग जाते। हमने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष को लॉन्च किया। हमने तय किया कि मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन किया जाएगा और देश में जिसको भी वैक्सीन की जरूरत है उसे वैक्सीन देने का प्रयास होगा। हमने मिशन मोड में काम किया, और सिर्फ 5-6 साल में ही वैक्सीनेशन कवरेज 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। 60 से 90,  यानि हमने वैक्सीनेशन की स्पीड भी  बढ़ाई और दायरा भी बढ़ाया।

 हमने बच्चों को कई जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए कई नए टीकों को भी भारत के टीकाकरण अभियान का हिस्सा बना दिया। हमने ये इसलिए किया, क्योंकि हमें हमारे देश के बच्चों की चिंता थी, गरीब की चिंता थी, गरीब के उन बच्चों की चिंता थी जिन्हें कभी टीका लग ही नहीं पाता था। हम शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की तरफ बढ़ रहे थे कि कोरोना वायरस ने हमें घेर लिया। देश ही नहीं, दुनिया के सामने फिर पुरानी आशंकाएं घिरने लगीं कि अब भारत कैसे इतनी बड़ी आबादी को बचा पाएगा? लेकिन साथियों,जब नीयत साफ होती है, नीति स्पष्ट होती है, निरंतर परिश्रम होता है, तो नतीजे भी मिलते हैं। हर आशंका को दरकिनार करके भारत ने एक साल के भीतर ही एक नहीं बल्कि दो 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन्स लॉन्च कर दीं। हमारे देश ने, देश के वैज्ञानिकों ने ये दिखा दिया कि भारत बड़े बड़े देशों से पीछे नहीं है। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश में 23 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी हैं।

साथियों,

हमारे यहाँ कहा जाता है- विश्वासेन सिद्धि: अर्थात, हमारे प्रयासों में हमें सफलता तब मिलती है, जब हमें स्वयं पर विश्वास होता है। हमें पूरा विश्वास था कि हमारे वैज्ञानिक बहुत ही कम समय में वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर लेंगे। इसी विश्वास के चलते जब हमारे वैज्ञानिक अपना रिसर्च वर्क कर ही रहे थे तभी हमने लॉजिस्टिक्स और दूसरी तैयारियां शुरू कर दीं थीं। आप सब भली-भांति जानते हैं कि पिछले साल यानि एक साल पहले, पिछले साल अप्रैल में, जब कोरोना के कुछ ही हजार केस थे, उसी समय वैक्सीन टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया था। भारत में, भारत के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया। वैक्सीन निर्माताओं को क्लिनिकल ट्रायल में मदद की गई, रिसर्च और डवलपमेंट के लिए ज़रूरी फंड दिया गया, हर स्तर पर सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। 

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मिशन कोविड सुरक्षा के माध्यम से भी उन्हें हज़ारों करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गये। पिछले काफी समय से देश लगातार जो प्रयास और परिश्रम कर रहा है, उससे आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई और भी ज्यादा बढ़ने वाली है। आज देश में 7 कंपनियाँ, विभिन्न प्रकार की वैक्सीन का प्रॉडक्शन कर रही हैं। तीन और वैक्सीन का ट्रायल भी एडवांस स्टेज पर चल रहा है। वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की कंपनियों से भी वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इधर हाल के दिनों में, कुछ एक्सपर्ट्स द्वारा हमारे बच्चों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इस दिशा में भी 2 वैक्सीन्स का ट्रायल तेजी से चल रहा है। इसके अलावा अभी देश में एक 'नेज़ल' वैक्सीन पर भी रिसर्च जारी है। इसे सिरिन्ज से न देकर नाक में स्प्रे किया जाएगा। देश को अगर निकट भविष्य में इस वैक्सीन पर सफलता मिलती है तो इससे भारत के वैक्सीन अभियान में और ज्यादा तेजी आएगी।

साथियों,

इतने कम समय में वैक्सीन बनाना, अपने आप में पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। वैक्सीन बनने के बाद भी दुनिया के बहुत कम देशों में वैक्सीनेशन प्रारंभ हुआ, और ज्यादातर समृद्ध देशों में ही शुरू हुआ। WHO ने वैक्सीनेशन को लेकर गाइडलाइंस दीं। वैज्ञानिकों ने वैक्सीनेशन की रूप रेखा रखी। और भारत ने भी जो अन्य देशों की best practices थी , विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक  थे, उसी आधार पर चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन करना तय किया। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अनेकों बैठकों से जो सुझाव मिले, संसद के विभिन्न दलों के साथियों द्वारा जो सुझाव मिले, उसका भी पूरा ध्यान रखा। इसके बाद ही ये तय हुआ कि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए ही, हेल्थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के नागरिक, बीमारियों से ग्रसित 45 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिक, इन सभी को वैक्सीन पहले लगनी शुरू हुई। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोरोना की दूसरी वेव से पहले हमारे फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन नहीं लगी होती तो क्या होता? सोचिए, हमारे डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को वैक्सीन ना लगी तो क्या होता? अस्पतालों में सफाई करने वाले हमारे भाई-बहनों को, एंबुलेंस के हमारे ड्राइवर्स भाई - बहनों को वैक्सीन ना लगी होती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स का वैक्सीनेशन होने की वजह से ही वो निश्चिंत होकर दूसरों की सेवा में लग पाए, लाखों देशवासियों का जीवन बचा पाए।

लेकिन देश में कम होते कोरोना के मामलों के बीच, केंद्र सरकार के सामने अलग-अलग सुझाव भी आने लगे, भिन्न-भिन्न मांगे होने लगीं। पूछा जाने लगा, सब कुछ भारत सरकार ही क्यों तय कर रही है? राज्य सरकारों को छूट क्यों नहीं दी जा रही? राज्य सरकारों को लॉकडाउन की छूट क्यों नहीं मिल रही? One Size Does Not Fit All जैसी बातें भी कही गईं। दलील ये दी गई कि संविधान में चूंकि Health-आरोग्य, प्रमुख रूप से राज्य का विषय है, इसलिए अच्छा है कि ये सब राज्य ही करें। इसलिए इस दिशा में एक शुरूआत की गई। भारत सरकार ने एक बृहद गाइडलाइन बनाकर राज्यों को दी ताकि राज्य अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार काम कर सकें। स्थानीय स्तर पर कोरोना कर्फ्यू लगाना हो, माइक्रो कन्टेनमेंट जोन बनाना हो, इलाज से जुड़ी व्यवस्थाएं हो, भारत सरकार ने राज्यों की इन मांगों को स्वीकार किया।

साथियों,

इस साल 16 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल महीने के अंत तक, भारत का वैक्सीनेशन कार्यक्रम मुख्यत: केंद्र सरकार की देखरेख में ही चला। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने के मार्ग पर देश आगे बढ़ रहा था। देश के नागरिक भी, अनुशासन का पालन करते हुए, अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवा रहे थे। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने फिर कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सीनेशन के लिए Age Group क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सीनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया।

साथियों,

काफी चिंतन-मनन के बाद इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकारें अपनी तरफ से भी प्रयास करना चाहती हैं, तो भारत सरकार क्यों ऐतराज करे? और भारत सरकार ऐतराज क्यों करे? राज्यों की इस मांग को देखते हुए, उनके आग्रह को ध्यान में रखते हुए 16 जनवरी से जो व्यवस्था चली आ रही थी, उसमें प्रयोग के तौर पर एक बदलाव किया गया। हमने सोचा कि राज्य ये मांग कर रहे हैं, उनका उत्साह है, तो चलो भई 25 प्रतिशत काम उन्ही की शोपित कर दिया जाये, उन्ही को दे दिया जाए। स्वभाविक है, एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम उनके हवाले दिया गया, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपने-अपने तरीके से प्रयास भी किए। 

इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, ये भी उनके ध्यान में आने लगा, उनको पता चला। पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की क्या स्थिति है, इसकी सच्चाई से भी राज्य परिचित हुए। और हमने देखा, एक तरफ मई में सेकेंड वेव, दूसरी तरफ वैक्सीन के लिए लोगों का बढ़ता रुझान और तीसरी तरफ राज्य सरकारों की कठिनाइयां। मई में दो सप्ताह बीतते-बीतते कुछ राज्य खुले मन से ये कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था ही अच्छी थी। धीरे-धीरे इसमें कई राज्य सरकारें जुड़ती चली गईं। वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए, जो इसकी वकालत कर रहे थे, उनके विचार भी बदलने लगे। ये एक अच्छी बात रही कि समय रहते राज्य, पुनर्विचार की मांग के साथ फिर आगे आए। राज्यों की इस मांग पर, हमने भी सोचा कि देशवासियों को तकलीफ ना हो, सुचारू रूप से उनका वैक्सीनेशन हो, इसके लिए एक मई के पहले वाली, यानि 1 मई के पहले 16 जनवरी से अप्रैल अंत तक जो व्यवस्था थी, पहले वाली पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जाए।

 

साथियों,

आज ये निर्णय़ लिया गया है कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा जो 25 प्रतिशत काम था, उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी। ये व्यवस्था आने वाले 2 सप्ताह में लागू की जाएगी। इन दो सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नई गाइड-लाइंस के अनुसार आवश्यक तैयारी कर लेंगी। संयोग है कि दो सप्ताह बाद, 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी है। 21 जून, सोमवार से देश के हर राज्य में, 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के सभी नागरिकों के लिए, भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन मुहैया कराएगी। वैक्सीन निर्माताओं से कुल वैक्सीन उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार खुद ही खरीदकर राज्य सरकारों को मुफ्त देगी। यानि देश की किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। अब तक देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिली है।

 अब 18 वर्ष की आयु के लोग भी इसमें जुड़ जाएंगे। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार ही मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी। गरीब हों, निम्न मध्यम वर्ग हों, मध्यम वर्ग हो या फिर उच्च वर्ग, भारत सरकार के अभियान में मुफ्त वैक्सीन ही लगाई जाएगी। हां, जो व्यक्ति मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते, प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाना चाहते हैं, उनका भी ध्यान रखा गया है। देश में बन रही वैक्सीन में से 25 प्रतिशत,  प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल सीधे ले पाएं, ये व्यवस्था जारी रहेगी। प्राइवेट अस्पताल, वैक्सीन की निर्धारित कीमत के उपरांत एक डोज पर अधिकतम 150 रुपए ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी करने का काम राज्य सरकारों के ही पास रहेगा।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-प्राप्य आपदं न व्यथते कदाचित्, उद्योगम् अनु इच्छति चा प्रमत्तः॥ अर्थात्, विजेता आपदा आने पर उससे परेशान होकर हार नहीं मानते, बल्कि उद्यम करते हैं, परिश्रम करते हैं, और परिस्थिति पर जीत हासिल करते हैं। कोरोना से लड़ाई में 130 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अभी तक की यात्रा आपसी सहयोग, दिन रात मेहनत करके तय की है। आगे भी हमारा रास्ता हमारे श्रम और सहयोग से ही मजबूत होगा। हम वैक्सीन प्राप्त करने की गति भी बढ़ाएंगे और वैक्सीनेशन अभियान को भी और गति देंगे। हमें याद रखना है कि, भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार आज भी दुनिया में बहुत तेज है, अनेक विकसित देशों से भी तेज है। हमने जो टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाया है- Cowin, उसकी भी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। अनेक देशों ने भारत के इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में रुचि भी दिखाई है। हम सब देख रहे हैं कि वैक्सीन की एक एक डोज कितनी महत्वपूर्ण है, हर डोज से एक जिंदगी जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने ये व्यवस्था भी बनाई है कि हर राज्य को कुछ सप्ताह पहले ही बता दिया जाएगा कि उसे कब, कितनी डोज मिलने वाली है। मानवता के इस पवित्र कार्य में वाद-विवाद और राजनीतिक छींटाकशी, ऐसी बातों को कोई भी अच्छा नहीं मानता है। वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार, पूरे अनुशासन के साथ वैक्सीन लगती रहे, देश के हर नागरिक तक हम पहुंच सकें, ये हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रिय देशवासियों,

टीकाकरण के अलावा आज एक और बड़े फैसले से मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। पिछले वर्ष जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाना पड़ा था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 8 महीने तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन की व्यवस्था हमारे देश ने की थी। इस वर्ष भी दूसरी वेव के कारण मई और जून के लिए इस योजना का विस्तार किया गया था। आज सरकार ने फैसला लिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को अब दीपावली तक आगे बढ़ाया जाएगा। महामारी के इस समय में, सरकार गरीब की हर जरूरत के साथ, उसका साथी बनकर खड़ी है। यानि नवंबर तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को, हर महीने तय मात्रा में मुफ्त अनाज उपलब्ध होगा। इस प्रयास का मकसद यही है कि मेरे किसी भी गरीब भाई-बहन को, उसके परिवार को, भूखा सोना ना पड़े।

साथियों,

देश में हो रहे इन प्रयासों के बीच कई क्षेत्रों से वैक्सीन को लेकर भ्रम और अफवाहों की  चिंता बढ़ाती है। ये चिंता भी मैं आपके सामने व्यक्त करना चाहता हूं। जब से भारत में वैक्सीन पर काम शुरू हुआ, तभी से कुछ लोगों द्वारा ऐसी बातें कही गईं जिससे आम लोगों के मन में शंका पैदा हो। कोशिश ये भी हुई कि भारत के वैक्सीन निर्माताओं का हौसला पस्त पड़ जाए और उनके सामने अनेक प्रकार की बाधाएं आएं। जब भारत की वैक्सीन आई तो अनेक माध्यमों से शंका-आशंका को और बढ़ाया गया। वैक्सीन न लगवाने के लिए भांति-भांति के तर्क प्रचारित किए गए। इन्हें भी देश देख रहा है। जो लोग भी वैक्सीन को लेकर आशंका पैदा कर रहे हैं, अफवाहें फैला रहे हैं, वो भोले-भाले भाई-बहनों के जीवन के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

ऐसी अफवाहों से सतर्क रहने की जरूरत है। मैं भी आप सबसे, समाज के प्रबुद्ध लोगों से, युवाओं से अनुरोध करता हूँ, कि आप भी वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करें। अभी कई जगहों पर कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच से कोरोना चला गया है। हमें सावधान भी रहना है, और कोरोना से बचाव के नियमों का भी सख्ती से पालन करते रहना है। मुझे पूरा विश्वास है, हम सब कोरोना से इस जंग में जीतेंगे, भारत कोरोना से जीतेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत धन्यवाद!