पूर्वोत्तर भारत अपनी समृद्ध और रंग-बिरंगी सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां 200 से ज़्यादा जनजातियां रहती हैं, जिनकी अपनी खास परंपराएं, रीति-रिवाज और खाने-पीने की शैली है।
फिर भी, इतनी अनोखी सांस्कृतिक विविधता होने के बावजूद, यह क्षेत्र अक्सर लोगों की नज़र से दूर रह गया। इसका कारण है – भौगोलिक दूरी और पिछली सरकारों की ओर से उचित प्रतिनिधित्व की कमी। अब समय आ गया है कि पूर्वोत्तर की यह अनमोल विरासत मुख्यधारा में आए और दुनिया के सामने अपने पूरे गौरव के साथ खड़ी हो।
हालांकि, 2014 के बाद से इस क्षेत्र में एक मजबूत सांस्कृतिक बदलाव देखने को मिला है। जहां पहले पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति को नजरअंदाज किया जाता था, वहां अब उसकी पहचान को अपनाया जा रहा है और उसे देश की मुख्यधारा में जगह मिल रही है। पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक परंपराएं, रीति-रिवाज और विरासत अब न सिर्फ देशभर में, बल्कि दुनिया के मंच पर भी दिखने लगी हैं। यह समय है गर्व से कहने का कि पूर्वोत्तर अब हाशिये पर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “पूर्वोत्तर न तो दिल्ली से दूर है और न ही दिल से”, तो यह बात पिछले 11 वर्षों में उनकी सरकार द्वारा पूर्वोत्तर को देश के विकास से जोड़ने के लिए किए गए प्रयासों को साफ़ दिखाती है।
इस बदलाव में संस्कृति का संरक्षण और प्रचार एक अहम हिस्सा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने कई ऐसे कार्यक्रम किए हैं, जिनसे पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान को देशभर में पहचान मिली।
2024 में पहली बार दिल्ली में अष्टलक्ष्मी महोत्सव हुआ, जहां लोगों को पूर्वोत्तर के 8 राज्यों की अलग-अलग परंपराओं और कला को करीब से देखने का मौका मिला। इसका फायदा पर्यटन और निवेश दोनों में हुआ।
इसी तरह 2024 में पीएम मोदी ने दिल्ली में पहले बोडोलैंड महोत्सव का उद्घाटन किया। यह आयोजन 2020 के बोडो शांति समझौते के बाद बोडो समाज की मजबूती और नए सफर का प्रतीक बना।
पहले जिन सरकारों ने शांति और संस्कृति को नज़रअंदाज़ किया, उनके विपरीत यह समय राष्ट्रीय स्तर पर पूर्वोत्तर की संस्कृति को सम्मान देने और उसे सेलब्रैट करने का नया युग बन गया है।
पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति को आगे बढ़ाने का एक और अहम तरीका है – वहां के विरासत स्थलों का विकास और संरक्षण। ‘स्वदेश दर्शन’ योजना के तहत पर्यटन मंत्रालय ने पूर्वोत्तर में 16 खास परियोजनाओं को मंजूरी दी है। ये परियोजनाएं क्षेत्र की विरासत, वन्यजीव, आध्यात्मिकता, जनजातीय संस्कृति और एडवेंचर पर्यटन से जुड़ी हैं। इन पर 1,337 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किया जा रहा है। स्वदेश दर्शन 2.0 योजना के तहत भी क्षेत्र की 11 नई परियोजनाएं पास की गई हैं।
इसी तरह, PRASHAD योजना के तहत तीर्थस्थलों और धार्मिक विरासत को पुनरुद्धार के लिए, लगभग 253 करोड़ रुपये की लागत से 11 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है। इन सभी प्रयासों का असर साफ दिखा – साल 2023 में 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय पर्यटक और 2 लाख से अधिक विदेशी पर्यटक पूर्वोत्तर भारत घूमने आए। यह सब बताता है कि सरकार की कोशिशों से अब पूर्वोत्तर सिर्फ एक भूखंड भर नहीं, बल्कि भारत के पर्यटन मानचित्र का चमकता हुआ हिस्सा बन रहा है।
सरकार ने दीमापुर में उत्तर पूर्व क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (NEZCC) की स्थापना की है, ताकि संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके। इसके अलावा, उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) ने देशभर से लोगों की भागीदारी बढ़ाने, पर्यटन को बढ़ावा देने और सांस्कृतिक अंतर को कम करने के लिए विभिन्न उत्सवों जैसे संगाई महोत्सव (मणिपुर), बेहदीनखलम महोत्सव (मेघालय), और हॉर्नबिल महोत्सव (नागालैंड) के आयोजन में राज्य सरकारों का समर्थन किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के तौर पर, अप्रैल 2023 में असम में हुए बिहू उत्सव में पीएम मोदी शामिल हुए, जहाँ 11,000 से अधिक कलाकारों ने एक साथ प्रदर्शन किया और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। इसी तरह, इस साल भी उन्होंने झुमोर बिनंदिनी कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिसमें 8,000 कलाकारों ने झुमोर नृत्य प्रस्तुत किया, जो असम की चाय जनजातियों और आदिवासी समुदायों का लोक नृत्य है।
इसके अलावा, पीएम मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जब असम की प्रसिद्ध गमछे को प्रदर्शित किया, तब पूर्वोत्तर की इस सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर भी बढ़ावा मिला।
सरकार ने न सिर्फ संस्कृति को बढ़ावा दिया है, बल्कि एक ऐसा माहौल भी तैयार किया है, जहां स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय उत्पाद दुनिया भर में अपनी पहचान बना रहे हैं। कई जीआई-टैग वाले उत्पाद अब वैश्विक बाजार में बिक रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, सिक्किम से सोलोमन आइलैंड्स को पहली बार जीआई-टैग वाली डले मिर्च का निर्यात किया गया है, और दुबई को खासी मंदारिन और अदरक भेजे जा रहे हैं।
करीब दस साल पहले, देश के कई लोग पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों के नाम भी नहीं जानते थे। लेकिन अब, आज़ादी का अमृत महोत्सव जैसी पहलों और सरकार के लगातार प्रयासों की वजह से यह क्षेत्र हर भारतीय के दिल में अपनी जगह बना चुका है।
साल 2022 में एक खास उत्सव मनाया गया, जो महान अहोम योद्धा लचित बोरफुकन की 400वीं जयंती को समर्पित था। लचित बोरफुकन ने सरायघाट की लड़ाई में मुगलों के खिलाफ बड़ी बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी।
अब इस क्षेत्र के ऐसे गुमनाम नायकों को भी सम्मान दिया जा रहा है जिनके बलिदान के बारेमें आमजन को पहले ज्यादा पता नहीं था। मणिपुर में रानी गाइदिन्ल्यू के नाम पर एक संग्रहालय बनाया गया है, जो इस महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि है। इसी तरह, खासी नेता यू तिरोत सिंह की बहादुरी को भी याद किया जा रहा है। उन्होंने एंग्लो-खासी युद्ध के समय अंग्रेजों के खिलाफ डटकर लड़ाई लड़ी थी। उनकी कहानी 'मन की बात' कार्यक्रम के जरिए पूरे देश तक पहुंचाई गई।
सरकार ने पूर्वोत्तर भारत के गौरवशाली इतिहास को फिर से सामने लाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की है। इसी उद्देश्य से असम के शिवसागर में रंग घर को सुंदर बनाने की योजना शुरू की गई है, ताकि अहोम शासन की समृद्ध विरासत को सम्मान दिया जा सके।
साल 2014 के बाद से, इस क्षेत्र के दो ऐतिहासिक स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है — सिक्किम का कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान और असम में अहोम राजवंश की मोइदम्स (टीले-दफन स्थल)। यह इसलिए खास है क्योंकि इससे पहले इस क्षेत्र से कोई भी नया स्थल 1985 के बाद यूनेस्को सूची में नहीं जुड़ा था।
सरकार सिर्फ संस्कृति का जश्न नहीं मना रही, बल्कि संस्कृति और साहित्य से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित भी कर रही है और उन्हें सम्मान भी दे रही है। साल 2014 से अब तक पूर्वोत्तर भारत के 130 से ज्यादा लोगों को पद्म पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें से करीब 50 लोगों को कला और साहित्य के क्षेत्र में काम करने के लिए ये सम्मान मिला है।
इन पुरस्कारों से न सिर्फ कलाकारों को पहचान मिली, बल्कि उनकी अनोखी कलाओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों को भी देशभर में जानने का मौका मिला। जैसे जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 'सुकनानी ओजापाली' और 'देवधनी नृत्य' के प्रसिद्ध कलाकार द्रोण भुयान को पद्मश्री दिया, तो इन लोक परंपराओं की ओर पूरे देश का ध्यान गया।
अब वो समय चला गया जब देश के बाकी हिस्सों के लोग पूर्वोत्तर भारत के बारे में कम जानते थे।
प्रधानमंत्री मोदी अब तक इस क्षेत्र में करीब 80 बार आ चुके हैं और केंद्र सरकार के मंत्री भी 700 से ज्यादा बार पूर्वोत्तर का दौरा कर चुके हैं। इसकी वजह से पूर्वोत्तर अब देश की मुख्य नीतियों और योजनाओं का अहम हिस्सा बन गया है।
आज पूर्वोत्तर की संस्कृति को न सिर्फ देशभर में, बल्कि दुनिया भर में भी सम्मान और पहचान मिल रही है। यह भारत की 'सॉफ्ट पावर' यानी सांस्कृतिक ताकत के रूप में उभर रही है।